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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 401

अरण्यकाण्ड ३६३

नहीं है। फिर, यह सोचती हुई खड़ी रही कि यह कौन हो सकता है ? इतने मे वह कपट सन्यासी ऐसा बन गया जैसा कोई विषधर कालमप क्रोधानल से उत्तप्त होकर अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया हो।

(राम के वियोग से) पहले से ही अत्यन्त विषण्ण वह देवी, इस समय जिम प्रकार के दुःख मे निमग्न हुई, यदि उसके बारे में विचार करें, तो विदित होगा कि इससे बढ़कर अन्य कोई कही दुःख हो ही नहीं सकता। उन देवी के पास ऐसा कोई शब्द नही रहा, जिसे वे धीरज के साथ उम राक्षस को कह सकें। उनसे कोई काम भी करते नही बनता था। वे इस प्रकार विकम्पित हुईं, जिस प्रकार यम के आने पर प्राण काँपने लगते हैं।

तब रावण ने कहा—देवता लोग भी मेरी सेवा करते हे। ऐसे मेरे पराक्रम को तुमने नही जाना और (तुमने) मिट्टी के कीड़े-जैसे जीनेवाले मनुष्य को बलवान् कहा। तुम स्त्री हो, अतः बच गई, नहीं तो मैं तुमको पीसकर खा डालता। पर यदि वैसा करने का विचार भी करूँ, तो मेरे प्राण मिट जायेगे—(अर्थात्; तुम्हे मार डालूँगा, तो तुम्हारे वियोग में मैं भी मर जाऊँगा, अतः तुम्हें नहीं मारूँगा)।

हे हंसिनि ! भयविकम्पित मत होओ। जो मेरे मिर इसके पहले किसी के सामने नहीं झुके, उनपर वारी-वारी से, मुकुट के समान तुम्हे वहन करके मै आनंदित होऊँगा। असंख्य आभरणो से भूषित देव-सुन्दरियाँ तुम्हारी चरण-सेवा करेंगी। यों तुम चतुर्दश भुवन की सम्राज्ञी बनकर रहोगी।

ये वचन सुनते ही सीता ने झट अपने कर-पल्लवो से कानो को वन्द कर लिया। फिर कहा—अरे राक्षस ! मनोहर तथा भयंकर धनुष को धारण करनेवाले उनके कर, तथा विजय से शोभायमान काकुत्स्थ के प्रति अनन्य प्रेम तथा पातिव्रत्य रखनेवाली मेरे प्रति तू ने ससार के उत्तम धर्म की उन्नति के लिए प्रज्वलित वह्नि मे पवित्र ऋषियो के द्वारा देने योग्य हवि को खाने की इच्छा करनेवाले कुत्ते-जैसे (होकर), क्या कहा ?

घास की नोक पर रहनेवाली ओस की बूँद के जैसे क्षण-भगुर जो प्राण हैं, उनके खो जाने के भय से क्या मै उत्तम कुल के योग्य आचरण को त्याग दूँगी ? यह संभव नही। यदि तू अपने प्राणो की रक्षा करना चाहता है, तो बिजली के जैसे चमकते हुए वज्र के जैसे छोप करनेवाले तीक्ष्ण (राम के) बाण के लगने के पूर्व ही यहाँ से भाग जा।

सीता का यह वचन सुनकर उम क्रूर राक्षस ने कहा—दिशाओं को वहन करने- वाले हाथियों के अतिदृढ दाँतो को तोडनेवाले मेरे वक्ष पर यदि तुम्हारे पति का बाण आकर लगेगा, तो वह पर्वत रग गिरी हुई पुष्पमाला-जैसा जान पड़ेगा।

लक्ष्मी के लिए भी लक्ष्मी होनेवाली हे सुदरि ! तुम्हारे प्रति उत्पन्न प्रेम की व्याधि के कारण मेग शरीर दुर्बल हो रहा है। मुझे प्राण-दान करो और स्वर्गवासिनी घने केशोवाली अप्सराओं के लिए भी दुर्लभ पद को प्राप्त करो—यों कहकर भूधर से भी दृढ भुजावाले रावण ने उसे नमस्कार किया।

ज्योंहि वह (रावण) सीता के चरणों को प्रणाम करने के लिए झुका-त्योंही