कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६४ | कंब रामायण |
|---|
क्षमा की मूर्त्ति और अनुपम सुन्दरी वह देवी, इस प्रकार व्याकुल होकर जैसे मर्मस्थान में रक्ताचित खड्ग धँस गया हो, हे प्रभु ! हे अनुज ! कहकर पुकार उठी ।
उस समय, उस क्रूर (रावण) ने, पहले दिये गये अपने इस शाप¹ का स्मरण करके कि उसे परनारी का स्पर्श (उसकी इच्छा के बिना) नहीं करना चाहिए, अपनी स्तम्भ-जैसी बलवान् एवं ऊँची भुजाओं से उस आश्रम के स्थान को ही नीचे से एक योजन पर्यन्त खोदकर उठा लिया ।
(इस प्रकार सीता को उनके आश्रम के साथ) उठाकर उसने अपने रथ पर रख लिया । सुन्दर ककण-भूषित सीता ने रावण का यह कार्य देखा । किन्तु, अपने प्राणों (के समान प्रभु) को नहीं देखा । वह इस प्रकार मूर्च्छित हो गिर पड़ी जैसे मेघों से छूटकर कोई बिजली धरती पर आ गिरी हो । तब उस (रावण) ने आकाश-मार्ग से जाने का विचार किया । (१—७५)
●
अध्याय ६
जटायु-मरण पटल
रावण ने अपने सारथी से कहा कि रथ आगे बढ़ाओ । उस कथन को सुनकर सीता अग्नि में पड़ी हुई पुष्प-लता के समान तड़पने लगी । वह नीचे गिरकर लोटती । विह्वल होकर काँपती । मूर्च्छित होती । पीडा से छटपटा उठती । 'हे धर्म देवता ! इस विपदा से शीघ्र मुझे बचाओ'—यों प्रार्थना करती ।
(सीता कहती—) हे पर्वतो ! हे वृक्षो ! हे मयूरो ! हे कोयलो ! हे हरिणो ! हे हरिणियो ! हे हाथियो ! हे करिणीयो ! हे मेरे कातर प्राणो ! तुम मेरे प्रभु के निकट शीघ्र जाओ और उन अचंचल बलवान् वीर से मेरा हाल कहो ।
हे मेघो ! हे उद्यानो ! हे वनदेवताओ ! उत्तम वीर, वे मेरे प्रभु कहाँ हैं ? क्या तुम जानते हो ? यदि तुम मुझे अभयदान दो, तो मैं जीवित रह सकती हूँ—इससे तुम्हारी क्या हानि हो सकती है ?
हे वरद ! हे अनुज ! क्या आप (दोनो), कालमेघ के समान शरवर्षा करते हुए और राक्षस आदि क्रूर जनो का विनाश करते हुए यहाँ नहीं आयेंगे ? हे निष्कलंक भरत ! हे अनुज (शत्रुघ्न) ! क्या तुम अपयश के भागी बनोगे ?
¹ यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार रंभा अपने प्रियतम कुबेर के पुत्र नलकुबर से मिलने के लिए जा रही थी । मार्ग में रावण ने बलात् उसको पकड़ लिया । तब रंभा और नलकूवर ने रावण को यह शाप मिला कि यदि आगे कभी वह किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसका स्पर्श करेगा, तो उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे और पतिव्रता स्त्री के पातिव्रत्य की अग्नि में वह जल जायगा । इसी भय के रहने से रावण ने सीता का स्पर्श नहीं किया ।—अनु०