कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअरण्यकाण्ड ३६५
हे गोदावरि ! तू शीतल है। तू द्रवीभूत है। तू माता-समान है। तेरा अन्तः-करण स्वच्छ है। तू दौड़कर जा और कुछ न कहने पर भी (दर्शन मात्र से मन की बात) समझने की शक्ति रखनेवाले मेरे प्रभु के निकट पहुँच जा और मुझ अभागिन का समाचार उन्हें दें।
सम्मुख दिखनेवाले हे निर्झरो ! पर्वत-कंदराओ मे निवास करनेवाले सिंहो ! तुम (मेरे प्रभु को) यह समाचार देकर उनसे धरती के साथ मुझे उठा ले जानेवाले इस रावण की बीस भुजाओ और उसके दस सिरों को विध्वस्त कराके आनंदित होओ।
इस प्रकार के विविध वचन कहकर मुक्त होने की इच्छा से रोनेवाली सीता को देखकर, अपने जीवन के दिनो को व्यर्थ करनेवाले उस रावण ने कहा—हे स्वर्णहारो से भूषित संयुत स्तनोवाली ! स्वर्णमय कर्णाभरणो से शोभायमान हे सुन्दरि ! वे मनुष्य क्या युद्ध में मुझे मारकर तुम्हे मुक्त कर सकेंगे ? और, अपने बलिष्ठ हाथो से ताली बजाकर ठठाकर हँस पड़ा।
उसके यों कहने पर सीता ने कहा—तूने माया से एक कपट-हरिण बनाया। तेरे प्राणो के लिए यम-सदृश प्रभु को तूने आश्रम से बाहर भेजने का उपाय किया। फिर, आश्रम में घुसकर मुझे हरकर ले जा रहा है यदि उनसे (अर्थात्, राम से) युद्ध करने की शक्ति तुझमे है; तो अपना रथ आगे न बढ़ा।
फिर सीता ने कहा—यदि तुम वीर होते तो, क्या यह सुनने के पश्चात् भी कि तुम्हारे कुल के राक्षसो को क्षणकाल में मारनेवाले और तुम्हारी बहन की नाक-कान काटने-वाले मनुष्य अरण्य मे ही हैं। (उन मनुष्यो के साथ युद्ध कर उन्हे मारे बिना), इस प्रकार माया करके मेरा अपहरण करते ? यह भय से उत्पन्न तुम्हारे मन की कायरता ही तो है ?
सीता के यह कहने पर रावण ने उससे कहा—हे नारीरत्न ! सुनो ! बलहीन शरीरवाले क्षुद्र मनुष्यो के साथ यदि मैं युद्ध करूँ, तो ललाट-नेत्र के पर्वत (हिमालय) को उठानेवाली मेरी भुजाओ का अपमान होगा। उस अपवाद की अपेक्षा ऐसी माया ही फलप्रद है न ?
मनोहर नयनोवाली प्रतिमासमान सुन्दर देवी ने वह वचन सुनकर कहा—अपने कुल के जो शत्रु हैं, उनके सम्मुख जाना अपमान है। उनके साथ करवाल लेकर युद्ध करना अपमान है। किन्तु, पतिव्रताओ को धोखा देना अपमान नहीं है। अहो ! निष्करुण राक्षसो के लिए अपमान क्या है ? अपयश क्या है ?
इस समय, 'अरे ! तू कहाँ जा रहा है ? ठहर, ठहर'—यों गर्जन करता हुआ, आँखो से क्रोध की अग्नि उगलता हुआ, विद्युत् के जैसे चमकती हुई चोंच के साथ जटायु ऐसा आया, मानो मेरु नामक स्वर्णमय पर्वत ही गगन-मार्ग से उड़कर आ गया हो।
उसके दोनो पंखो के हिलने से ऐसा प्रभंजन उठा कि उससे बडे-बडे पर्वत अपने स्थान से उखड़कर उड़ते और एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होकर धूल बनकर उड़ गये। समुद्र का जल गगन में भर गया और जल और थल एकाकार हो गये। ऐसा लगता था, जैसे प्रलयकालीन पवन विश्व-भर में फैल रहा हो।