कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
अरण्यकाण्ड ३६५
शिर ह । उन (शिरो) से भी अधिक सख्या मे मेरी भुजाएँ है । फिर, तुझे क्या क्लेश हो सकता है ?
यो कहकर वह (रावण) हँसने लगा और अपनी आँखो से चिनगारियाँ निकालने लगा । फिर पूछा—ऊँचे पर्वतों से भरे दडकारण्य मे रहनेवाले खर आदि राक्षसो ने क्या इन निस्सहाय मनुष्यो को अपने शस्त्रो से मिटा नही दिया ?
रावण के ये बच्चन कहते ही, शूर्पणखा निर्झर के समान अश्रु बहाती हुई, अपनी छाती पीटती हुई, धरती पर लोट-लोटकर रोने लगी और बोली—हे तात ! हमारे वे बन्धु भी शीघ्र उन (मनुष्यो) के द्वारा ध्वस्त हो गये । फिर, सिर पर हाथ धरकर सारा वृत्तात कहने लगी ।
खर आदि वृषभ-सदृश वीर, मेरे मुँह से घटित वृत्तात को सुनकर अपनी सारी सेना को लेकर बड़े कोलाहल के साथ वहाँ गये और सूर्य-किरणो का स्पर्श पाकर विकसित कमल की समता करनेवाले अरुण नयनों से शोभित राम नामक वीर के धनुष से तीन घड़ी के अन्दर ही वे स्वर्ग मे जा पहुँचे—यों शूर्पणखा ने कहा ।
'उसके भाई (खर और दूषण), एकाकी राम के साथ के युद्ध में, अपनी विजय माला-भूषित सेना के साथ मारे गये'—यह वचन उसके कानो मे पहुँचने के पूर्व ही रावण की विशाल आँखे, वज्र और जलधारा को गिरानेवाले मेघ के समान अश्रुओं के साथ अग्निकण उगलने लगी ।
उस समय रावण के मन मे जो क्रोध उत्पन्न हुआ, उससे दबकर उसका दुःख, अग्नि मे पडे घृत के जैसा काम करने लगा । उसने प्रश्न किया—वे मनुष्य तुम्हारी नाक और कान काटे—ऐसा तुमने कौन-सा अपराध किया ?
शूर्पणखा ने उत्तर दिया—किसी के द्वारा चित्रित करने के लिए असम्भव रूपवाले उन ( राम ) के साथ (एक स्त्री आई हुई है, वह) कमल के आवास को छोड़कर आई हुई लक्ष्मी के समान है, बिजली के तुल्य कटि से शोभित है, बाँस के जैसे कोमल कंधोवाली है एव स्वर्ण के रग की देहवाली है । उस नारी के निकट मैं गई थी, बस इतना ही मेरा अपराध था ।
यह सुनकर रावण ने पूछा—वह नारी कौन है ? तब उस राक्षसी ने कहा—हे प्रभु ! उस नारी का जघन-तट चक्रवाला रथ है, उसके स्तन रक्त-स्वर्ण के कलश हैं, जिनपर इगुर्दिक धातु के सपुट लगे हैं, यह भूमि का बड़ा सौभाग्य है कि उस नारी के पद-तल का स्पर्श उसे मिला है । अहो ! उसका नाम सीता है ।—यो कहकर शूर्पणखा सीता के रूप का वर्णन करने लगी ।
उसकी वाणी भ्रमरों की गुजार तथा मधु के समान रस-भरी है, उसके केशपाश मधुपूर्ण पुष्पो से सुवासित है । अप्सराओ के लिए भी पूजनीय, कमल में निवास करनेवाली सुन्दरी लक्ष्मी उसकी दासी बनने के लिए भी योग्य नहीं है । यह कहना भी कि हम उसके सौंदर्य का वर्णन करेंगे, अज्ञान का कार्य होगा ।
हे प्रभु ! अपनी वाणी को अमृत से भर-भरकर लानेवाली (अर्थात् . अमृत-समान
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मीठी बोलीवाली) उस नारी के अलक, मेघ-समान हैं। सुसज्जित केश-पाश, झुके हुए सजल घन की समता करते हैं। उसकी उँगलियाँ, रक्त-प्रवाल के तुल्य हैं। उसका वदन, यद्यपि निर्दोष कमल-पुष्प के परिमाण का है, तथापि उसके नयन समुद्र से भी अधिक विशाल हैं।
'मन्मथ शिव के नेत्र की अग्नि से जल गया'—यह कथन सत्य नहीं है। सत्य बात तो यह है कि उस मन्मथ ने, स्वाभाविक सुगंधि से भरे केश-पाशवाली उस सीता को देखा, किन्तु उसके सौंदर्य को अपनाने में असमर्थ रहा, जिससे अवर्णनीय पीडा से दुःखी होकर उसका शरीर क्षीण हो गया, इसीलिए वह अनंग बन गया !
हमारे शत्रु-देवों के लोक में जाकर ढूँढ़ो, फनवाले नागों के लोक में जाकर ढूँढ़ो, कहीं भी वैसी रूपवती नहीं मिलेगी। लुहार की गरम भट्ठी में तपाकर बनाये गये बरछे और करवाल को भी परास्त करनेवाले नयनों से शोभित वह नारी इसी धरती पर है, किन्तु किसी के लिए भी उसका चित्र अंकित करना असंभव है।
क्या मैं उसके कटी की सुन्दरता का वर्णन करूँ ? या उसके उज्ज्वल मुख पर स्पंदित होनेवाले मीनों (अर्थात्, नयनों) का वर्णन करूँ ? या अन्य अति मनोहर अंगो का वर्णन करूँ ? मैं पुनः-पुनः चकित रह जाती हूँ, किन्तु उसका वर्णन नहीं कर पाती हूँ। तुम तो कल स्वयं ही उसे देखनेवाले हो तो फिर मैं क्यो तुमसे उसका वर्णन करके बताऊँ।
यदि यह कहे कि उसकी भौंहें धनुष के समान हैं, उसके नेत्र बरछे के समान हैं, उसके दाँत मोतियों के समान हैं, उसका अधर प्रवाल के समान है, तो यह केवल कथन-मात्र होगा। वास्तव में ये सब उपमान उसके अवयवों के योग्य नहीं हैं। अतः, कहने योग्य उपमान कुछ भी नहीं है। इस प्रकार का उपमान देने की अपेक्षा तो यही कहना अधिक संगत होगा कि धान धान के समान ही है (अर्थात्, धान की उपमा धान से ही दी जा सकती है।)
हे प्रभु, इन्द्र ने शची देवी को पाया है। षण्मुख (कार्तिकेय) के पिता (शिव) ने उमा को पाया है। कमलनयन (विष्णु) ने सुन्दर लक्ष्मी को पाया है। यदि तुम सीता को पा लोगे, तो फिर वे (इन्द्र, शिव और विष्णु) तुम से छोटे रह जायेंगे। इससे तुम्हारा महत्त्व उनसे अधिक बढ़ जायगा।
गगनोन्नत कंधोंवाले हे वीर ! एक (अर्थात्, शिव) ने (अपनी देवी को) अर्धाङ्ग में रख लिया- एक (विष्णु) ने कमलभव लक्ष्मी को अपने वक्ष पर रख लिया। ब्रह्मा ने वाणी देवी को अपनी जिह्वा पर रख लिया, यदि तुम घन की विद्युत् को परास्त करनेवाली सूक्ष्म कटि से शोभित उस सीता को पाओगे तो उसे कहाँ रखोगे ? (भाव यह है—सीता तुम्हारे लिए शिर पर धारण करने योग्य है।)
हे प्रभु ! हे नरदार ! शिशु की सी मधुर बोलीवाली उस सीता को पाने पर तुम कुछ भी कमी का अनुभव नहीं करोगे। तुम अपनी इस संपत्ति को, जिसे दूसरों पर लुटा रहे हो, उसी को दे दोगे। मैं तुम्हारा हित करनेवाली हूँ, किन्तु तुम्हारे अन्तःपुर में रहनेवाली शुक की-सी बोलीवाली सब युवतियों का आहत अवश्य कर रही हूँ।
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रथ-तुल्य जघन-तट से शोभित वह सीता, देवलोक में या इस लोक में किसी कंचुक-बद्ध स्तनवाली स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नहीं है। पूर्वकाल में, शंख के समान श्वेत जलवाले समुद्र ने, देवासुरों के द्वारा मथे जाने पर प्रफुल्ल कमल में आसीन लक्ष्मी को उत्पन्न किया था। अब भूमि, उस लक्ष्मी को भी परास्त करनेवाली सीता को देकर धन्य हुई है।
मीनकेतन के आनन्द को बढ़ाते हुए, संसार की प्रशंसा का पात्र बनते हुए, भ्रमरों से आवासित पुष्पों से विभूषित कुन्तलोंवाली तथा सूक्ष्म कटिवाली सीता को तुम अपना स्वत्व बना लो और अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके राम को मेरे वश में दे दो।
हे मेरे प्रभु ! यद्यपि भाग्य हमें (जीवन के) फल प्रदान करता है, तो भी महान् तपस्वियों को भी वे फल, समय पर ही प्राप्त होते हैं। उसके पूर्व नहीं मिलते हैं। दस मुख, बीस नयन, बीस हाथ, सुन्दर रूप और मनोहर वक्ष से शोभायमान तुम अब आगे चल-कर ही बड़ा गौरव प्राप्त करनेवाले हो।
इस प्रकार की सीता को तुम्हारे पास पहुँचाने के विचार से मैं उसके निकट गई, तब उस राम के भाई ने बीच में पड़कर चमकते हुए कटार से मेरी नाक काट दी। मेरा जीवन तो तभी समाप्त हो गया। फिर भी, इस विचार से कि तुम्हारे सम्मुख आकर सारा वृत्तांत बताने के पश्चात् ही अपने प्राण त्याग करूँगी, यहाँ आई हूँ, यों शूर्पणखा ने कहा।
(शूर्पणखा के वचन सुनते ही रावण के मन में) क्रोध, वीरता, अभिमान के कारण उत्पन्न ताप—ये सब इसी प्रकार मिट गये, जिस प्रकार पाप के रहने के स्थान से धर्म मिट जाता है और जिस प्रकार एक दीप, दूसरे दीप के स्पर्श से प्रज्वलित होता है। उसी प्रकार रावण के मन में काम-व्याधि और उससे उत्पन्न होनेवाले ताप ने घर कर लिया।
रावण खर को भूल गया, अपनी बहन की नाक को काटनेवाले वीर के पराक्रम को भूल गया, उससे उत्पन्न अपने अपयश को भूल गया, शिव को जीतनेवाले मन्मथ के बाणों के प्रभाव के कारण वह पूर्वकाल में प्राप्त अपने वरों को भी भूल गया, किन्तु सीता, जिसके रूप के विषय में उसने अभी सुना था, उसको नहीं भूल सका।
सूक्ष्म कटिवाली सीता का नाम और रावण का मन दोनों एक होकर रह गये। अब सीता के अतिरिक्त अन्य किसी विषय के बारे में सोचने के लिए भी उसके पास दूसरा मन कहाँ था ? सीता को भूलने का कोई उपाय ही उसके पास नहीं था। पढ़े-लिखे व्यक्ति भी जबतक आत्म-ज्ञान नहीं प्राप्त करते, तबतक वे काम को कैसे जीत सकते हैं ?
उन्नत प्राचीरवाली लंका का अधिपति, कलापी-तुल्य रूपवाली सीता का हरण करके बंदी बनाने के पूर्व ही उसको अपने मन-रूपी कारागार में बंदी बना लिया। धूप के स्पर्श से मक्खन जैसे पिघलता है, उसी प्रकार शूलधारी रावण का हृदय धीरे-धीरे पिघलने लगा।
विधि की विडंबना के कारण, भावी की प्रबलता के कारण एवं उस लंका का विनाश निकट आने के कारण रावण की काम-व्याधि उसकी सब इन्द्रियों में उसी प्रकार व्याप्त हो गई, जिस प्रकार विद्याविहीन मूढ़ व्यक्ति का छिपकर किया हुआ कोई पाप-कर्म सर्वत्र प्रकट हो जाता है।
३७० कंब रामायण
अत्यन्त शिथिल हो गया। तब उसने अपने परिजनों को आज्ञा दी कि तुमलोग जाकर शीघ्र चंद्रमा को ले आओ, क्योंकि लोग कहते हैं कि वह शीतल होता है।
परिजनों ने जाकर उस पूर्णचंद्र से, जो दारुण क्रोधवाले राक्षस (रावण) के द्वारा शासित उस विशाल लंकापुरी के ऊपर जाने से भी डरता था, कहा कि—डरो नहीं, शीघ्र आओ। राजा तुझे बुला रहा है। इसपर चंद्र अपने मन की अधीरता को छोड़कर आकर प्रकट हुआ।
युद्ध में परास्त होकर बैर को छिपाकर दबे रहनेवाले लोग, अपने शत्रु के कमजोर पड़ने पर जिस प्रकार उस (शत्रु) को सताने के लिए आगे बढ़ जाते हैं, उसी प्रकार मंडलाकार चंद्र रावण के प्राणों के लिए यम-जैसा बनकर, सूक्ष्म सिकता से युक्त जल-भरे समुद्र से उदित हुआ।
चंद्रमा, अपनी अवर्णनीय किरणों को सब दिशाओं में फैलाकर ऊपर उठा और स्वर्ग तथा धरती के निवासियों में से किसी के लिए भी प्रिय न होनेवाले उस रावण को सताता हुआ (वह चंद्र) इस प्रकार दिखाई पड़ा, जैसे आदिशेष पर शयन करनेवाले विष्णु के द्वारा रावण के वध के लिए भेजा गया चक्रायुध ही हो।
क्षीर-सागर के अमृत को छक-छककर पान करनेवाला चंद्रमा, अपनी शीतल किरणों के समुदाय को चारों ओर व्याप्त करने लगा। वह चंद्रिका टेढ़ी भौंहों और लाल आँखोंवाले रावण को ऐसी लगी, जैसे आग में पिघली हुई चाँदी भर-भरकर चारों ओर छिड़की जा रही हो।
चंद्र-किरणें, जो धरती पर संचरण करनेवाली बिजली-सी लगती थीं, लाल धान के मनोहर खेतों से आवृत मिथिला नगर के राजा की पुत्री के सौंदर्य का वर्णन सुनकर विरह-पीड़ा से तप्त होनेवाले रावण को उसी प्रकार जलाने लगीं, जिस प्रकार कभी पराजित न होनेवाले शत्रु की कीर्ति किसी वीर को जलाती है।
वीर-कंकणधारी यम भी जिसको देखकर भयभीत होता है, उस रावण ने पूछा— मैंने कहा था कि शीतल किरणोंवाले चंद्र को ले आओ, तो जलानेवाली आग और दारुण विष में बुझी हुई तपती किरणों से युक्त सूर्य को कौन ले आया ?
उस समय, कुछ दासों ने भय के साथ निवेदन किया—हे प्रभु ! यह कथन सत्य नहीं है कि जिसे लाने की आज्ञा नहीं हुई थी, उसे हम लाये हैं। अरुण किरणोंवाला सूर्य सदा रथ पर ही आता है। यह चंद्रमा यद्यपि आपको उष्ण किरण-सा लगता है, तो भी विमान पर ही आरूढ़ है।
सर्प के फन के जैसे जघन-तट तथा शीतल वचनों से युक्त रमणियों के प्रति होने-वाले प्रेम की वेदना को उस (रावण) ने इससे पहले कभी नहीं जाना था। वह अब चंद्रमा से अत्यन्त पीड़ित हुआ। अब उसे ज्ञात हुआ कि शीतल और मनोहर कमल-पुष्पों का शत्रु चंद्रमा, यही है। फिर, उस चंद्र से प्रार्थना करने लगा कि हे चंद्र ! तू मेरे प्राणों को ला दे।
रावण कहने लगा—हे नक्षत्रों के पति ! तू क्षीण होता है। तेरा शरीर श्वेत
अरण्यकाण्ड ३७१
पड़ गया है। तेरा अन्तर काला हो गया है। अपना सहज गुण—शीतलता—छोड़कर तू तप रहा है, क्या तू भी अकेला रहता है और किसी सुन्दरी को देखे हुए व्यक्ति से उस (सुन्दरी) के सौंदर्य की चर्चा सुनी है? (जिससे वो विरह से पीड़ित हो रहा है)। मेरे हृदय में पुष्पवाण बिना रोक टोक के लग रहे हैं। उनसे मेरी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। अब मेरे प्राणों को कौन बचायेगा ?
मेरे प्राणों के लिए यम बनी हुई उत्तम कुलजात उस सीता के दो कुवलयों-जैसे शोभायमान कमल (जैसे वदन) से तू पराजित हो गया है, इसीलिए तू काला पड़ गया है, क्षीण हो गया है और तप्त हो उठा है। यदि शत्रु की सम्पत्ति को देखकर ही इस प्रकार मिट गये, तो तू विजय कैसे पा सकता है? बुद्धिमान् व्यक्ति (शत्रु को हराने के) पराक्रम से रहित होते हैं, तो विवेक से अपने ऊपर संयम रखते हैं।
इस प्रकार, अनेक वचन कहकर वह पीड़ित होता रहा। फिर, उसने परिजनों को आज्ञा दी कि इस चन्द्र को रात्रि-सहित यहाँ से हटा दो और सूर्य को दिन सहित ले आओ। उसके यह कहने के पूर्व ही उपेक्षित चन्द्रमा और रात्रिकाल हट गये। एक क्षण काल में ही अवर्णनीय सूर्य तथा दिन का समय आ पहुँचा।
वेद की ऋचाओं को जाननेवाले (ब्राह्मण) अग्नि में घृत डालकर जब होम करते हैं तब जिस प्रकार वह अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार पिघले हुए ताँबे के जैसी किरणों- वाला सूर्य प्रकाशमान हुआ। उससे रक्त-कमल विकमित हुए। सूर्य के आगमन से रक्त कुमुद दबकर निर्जीव-से हो गये। वे उन क्षुद्र व्यक्तियों के जैसे थे, जिन्होंने अपने लिए अयोग्य उत्तम पदार्थों को प्राप्त कर उससे गर्वित होकर फिर उन्हें खो दिया हो।
विश्व के आभरण-जैसे रहनेवाला सूर्य एक दिशा में आकर प्रकट हुआ, तो चन्द्रमा लज्जित हो, कांतिहीन हो, काँपता हुआ और अपनी पत्नी—रात्रि द्वारा अनुसृत होता हुआ, दूसरी दिशा में गगन-मध्य से टल चला। वह उस क्षुद्र राजा के समान था, जो किसी यशस्वी तथा पराक्रमी शासक की आज्ञा से अपने स्थान को छोड़कर चला जाता है।
विविध कर्णाभरणों से भूपित जो राक्षस-सुन्दरियाँ पुष्प-पर्यंकों पर अपने पतियों के समागम का सुख उठाती हुई प्रणय-कलह में क्रुद्ध हो गई थीं, अब हठात् रात्रि के हट जाने पर भी उस बात को न जानकर, स्वप्न में भी मान करती हुई (निद्रित) पड़ी रहीं।
कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, अर्धरात्रि में ही हठात रात्रि के समाप्त हो जाने के कारण, मुमूर्षु-प्राण सी हो गई, थरथराती हुई काँप उठी और उनकी आँखों से आँसू इस प्रकार बह चले, जिस प्रकार प्रफुल्ल नीलोत्पल से मधु-बिंदु बह चलते हैं।
कुछ राक्षस-स्त्रियाँ, जो रूई के कोमल पर्यंक पर काम-सुख का आनन्द प्राप्त कर चुकी थी, वृक्ष की पुष्ट शाखा से लिपटी हुई लताओं के समान, अपने प्राण-पतियों के पुष्प-सदृश दोनों बाहों द्वारा दृढ़ता से बँधी हुई, निद्रित पड़ी थीं।
उत्तम मत्तगज, जो उनके कुंभों पर गुंजार करते हुए मँडरानेवाले भ्रमरों के झुंड को और उज्ज्वल सूर्य-प्रकाश को न जानते हुए नीचे पड़े थे, उन मद्यपों के समान ये कोमल शय्या पर प्रज्ञहीन होकर निद्रामग्न रहते हैं।
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जिस प्रकार कुल-नारियाँ, विद्या-वृद्धि से युक्त अपने प्रियतमो से वियुक्त होकर कांतिहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार, वहाँ के प्रासादों में रखे हुए दीप, तेल के न घटने पर भी, निष्प्रभ हो गये।
प्रभात-काल में विकसित होनेवाले पुष्प, उनके सुन्दर दलों को खोलनेवाले सूर्योदय के होने पर भी, प्रफुल्ल न होकर, विशाल पर्यंक पर सोई हुई सुन्दरी के बन्द नयनों के जैसे बंद पड़े रहे।
सब लोग गहरी निद्रा में सो रहे थे। अतः, उनकी आँखें सचमुच प्रभात होने पर भी नहीं खुलीं। वे आँखें किसी को भिक्षा देने का विचार न करनेवाले लोभियों के बड़े घरों के दरवाजों के समान बंद थीं।
चक्रवाक दिन के निकल आने से विष-सदृश वियोग-पीडा से मुक्त हुए और कठोर कारावास से मुक्ति पानेवाले अपराधी के हृदय के समान आनंद से भर गये।
चन्द्र के कर-स्पर्श के अतिरिक्त अन्य किसी भी उपाय से विकसित न होनेवाले पुष्पों की ओर संगीत गानेवाले भ्रमर झपटे थे। लेकिन (इतने में चन्द्र के अस्त होकर सूर्य के उदित हो जाने से, उन बंद हुए पुष्पों से निकट) कला की महत्ता को नहीं जाननेवाले लोगों के दरवाजे पर दुःखी होकर खड़े रहनेवाले भाट लोगो के समान वे भ्रमर दुःखी होकर रह गये।
सूर्य की उष्ण किरणें, अपूर्व रत्नों से जटिल वातायनों के मार्ग से (प्रासादों के) भीतर पहुँचकर निद्रा-मग्न सुन्दरियों को जगाने लगीं। किन्तु, वे (स्त्रियाँ) सत्य को स्पष्ट न जाननेवाले लोगों के समान, तंद्रा और जागरण की मिश्रित दशा में पड़ी रहीं।
रावण की कठोर आज्ञा से परिचय न रखनेवाले विद्वान्, जो ज्योतिष-शास्त्र लिख रखा था, उसे भली भाँति जानकर कुछ गणित-शास्त्र में कुशल व्यक्ति अभी तक सोये पड़े थे। (प्रभात-काल मे) टेर लगानेवाले कुक्कुट भी सो रहे थे।
संसार में इस प्रकार के व्यापार हो उठे थे। ऐसे समय में शब्दायमान वीर-कंकणधारी रावण ने आँख उठाकर सूर्य को देखा और बोला—यह (सूर्य) उसका ध्यान करनेवाले के मन को भी तपाता है। अतः, पहले यहाँ आकर जिस चन्द्र ने हमको तपाया था, यह भी वही है।
तब कुछ दासों ने निवेदन किया—हे ईश! यह चन्द्र नहीं है। यह अरुण-किरणवाला सूर्य ही है। देखिए, इसके रथ मे दीर्घ केसरोंवाले मनोहर हरित अश्व जुते हैं। उष्ण किरणोंवाला सूर्य शरीर को तपाता है। किंतु, शीतल रहनेवाला चन्द्र नहीं तपाता।
शिखरों से शोभित नील पर्वत के जैसे रावण ने उन (दासों) से कहा कि यह सूर्य विष से अधिक दारुण है। अतः, इसे यहाँ से हटा दो। समुद्र के गर्जन को भी बन्द कर दो और संध्या-वेला में, पश्चिम दिशा में, प्रकट होनेवाली चन्द्र-कला को शीघ्र ले आओ।
राक्षस-राज ने यह वचन कहा। यह कहते ही, षोडश कलाओं से शोभायमान
अरण्यकाण्ड ३७३
चन्द्र तुरन्त तृतीया का चन्द्र बनकर एक ओर प्रकट हुआ। अब कहो तो सदा प्रभावशाली रहनेवाली तपस्या से बढकर योग्य कार्य दूसरा कौन-सा है?¹
पश्चिम दिशा में उदित उस चन्द्रकला को देखकर, क्रूर गुणवाला रावण कहने लगा—यह (चन्द्रकला) वडवाग्नि है, वह नहीं, तो यह धरती का वहन करनेवाले शेषनाग का विष-दन्त है, अगर वह भी नहीं है तो, मध्या-काल मुझे मारने के लिए ही इस (चन्द्रकला-रूपी) कटार को लेकर आया है।
पूर्वकाल में जब शीतल तरंगों से पूर्ण समुद्र से दारुण विष उत्पन्न हुआ, तब उसे अपने कंठ के भीतर रखनेवाले शिव ने इस चन्द्रकला को भी पुण्य-रज से पूर्ण अपने जटाजूट में रख लिया था. शायद वह इसी कारण से होगा कि यह (चन्द्र-कला) भी विषमयी है।
वज्र के समान भयकर रूप में सञ्चरण करते हुए जिस चंद्र ने मेरे प्राण पी लिये थे, उससे, उसका यह परिवर्तित लघु रूप, कठोरता में कुछ कम नहीं है। दारुण कोप से भरे विषमयी सर्प के बड़े आकार की अपेक्षा उस (सर्प) का छोटा रूप क्या अपने विष के प्रभाव में कुछ कम होता है?
(फिर, रावण कहने लगा) अति घोर अंधकार का गुण कैसा होता है—यह भी देखें। इस चन्द्रकला से तो पूर्व आगत सूर्य ही अच्छा था। इस (चन्द्रकला) को शीघ्र हटा दो। पराक्रम से प्रसिद्ध रहनेवाले मुझ को ही यह (चन्द्रकला) तपाती है, तो अब यह कैसे कहा जा सकता है कि मत्त लोकों में कोई इसकी पीडा से बचकर जीवित रह सकता है?
उस समय, उस चन्द्रकला के हट जाते ही अंधकार इतना घना होकर आ पहुँचा कि उसे छुआ जा सकता था। उसपर किसी भी वस्तु को रगड़ा जा सकता था। चाहे तो कोई उसे (अर्थात्, अंधकार को) खड्ग से काट सकता था या उसे (अंधकार को) खराद पर चढ़ाकर उसके खंभे बनाकर रखा जा सकता था।
अब क्या यह कहा जाय कि उस अंधकार को काठ की तरह काट-काटकर टुकड़े बनाकर फेंका जा सकता था? वह अंधकार इतना काला था, जितना निर्दोष तत्त्वज्ञान-रूपी प्रकाश के प्रविष्ट न होने से अंधा बनकर किंचित् भी दयाभाव से हीन (किसी भ्रष्ट व्यक्ति का) हृदय काला होता है।
कहीं भी भिन्न न रहनेवाला (अर्थात्, अत्यन्त घना रहनेवाला) वह अंधकार अंतराल को सर्वत्र भरकर व्याप्त हुआ और सारी धरती को निगल लिया। तब रावण ने कहा—(शायद) विष को निगलनेवाले शिव ने यह न सोचकर कि यह (विष) सारे विश्व को मिटा देगा, उसे उगल दिया है।
मैंने ठीक-ठीक जान लिया है कि यह (अंधकार) समुद्र से उत्पन्न होकर शिवजी के द्वारा निगला गया विष नहीं है। यह, धरती, आकाश आदि सब प्रदेशों को अपनी जिह्वाओं से चाटनेवाली प्रलयाग्नि ही है, जो काले हलाहल विष को पीकर स्वयं कालीपड़ गई है।
१. भाव यह है—रावण ने पूर्वकाल में बड़ी तपस्या की थी, जिसके परिणामस्वरूप चन्द्र-सूर्य आदि भी उसकी आज्ञा के पालक बने हुए थे। अतः, तपस्या ही सबसे उत्तम कार्य है। —अनु०
३७४ कंब रामायण
बाण और अग्नि भी जिसमें प्रवेश करके उसे भिन्न नहीं कर सकते, ऐसे इस अंधकार में, मुक्त विरह से पीडित होनेवाले एकाकी व्यक्ति के सम्मुख अपना उपमान न रखनेवाली एक प्रवाल-लता (के सदृश सुंदरी), अपने ऊपर काले मेघ को धारण किये, नारिकेल के कोमल फल-युगल से शोभित होकर, एक चंद्र को भी धारण किये हुए, दीपक के समान प्रकाशमान हो रही है।
यह क्या मेरे मोह से उत्पन्न भ्रम है ? या मेरा ज्ञान ही किसी कारण से अन्यथा हो गया है ? स्पष्ट ज्ञात नहीं होनेवाला यह आकार क्या है ? अंजन का प्रवाह भी जिसकी ममता नहीं कर सकता, ऐसे इस घने अंधकार में एक उज्ज्वल पूर्ण-चंद्र, दो कुंडलों से शोभित होता हुआ, अति काले केशों के साथ मेरे सम्मुख आकर प्रकट हुआ है।
अपने दोनों पाश्र्वों में बढ़नेवाले स्तन-युगल तथा जघन-तट से संयुक्त होकर रहनेवाली कटि को हम नहीं देख पा रहे हैं। उसके अतिरिक्त अन्य सब अवयवों को हम देख रहे हैं। विषपूर्ण नयनोंवाला यह आकार धीरे-धीरे एक नारी बनकर मेरे मन में प्रविष्ट हो रहा है।
चिरकाल से मैं सप्त लोकों की सुंदरियों को देखता आ रहा हूँ, किन्तु उनमें इसके जैसे रूपवाली किसी स्त्री को कहीं नहीं देखा है। अवश्य यह अद्भुत रूपवती रमणी मेरी बहन शूर्पणखा के द्वारा बताई गई, भ्रमरों से आवृत केशोंवाली, वह तरुणी (सीता) ही है।
मेरी इस विरह-पीडा को जानकर कदाचित् वह (सीता) स्वयं मुझे ढूँढती हुई यहाँ आ गई है। उसके इस उपकार का मैं क्या प्रत्युपकार कर सकता हूँ? दर्शन-मधुर इस (सीता) को अपनी आँखों से शूर्पणखा ने देखा है। उसी से पूछकर मैं अपने संदेह को दूर कर लूँगा (यही सीता है या नहीं—यह संदेह दूर करूँगा)। इस प्रकार, विचार कर रावण ने अपने दासों को आज्ञा दी कि वे उसे (अर्थात्, शूर्पणखा को) शीघ्र वहाँ बुला लावें।
रावण की यह आज्ञा सुनते ही परिजन शीघ्र दौड़े और शूर्पणखा को समाचार दिया। तुरन्त वह (शूर्पणखा), जिसने पराक्रमी राक्षसों के कुल का समूल नाश करने के कार्य में लगी हुई, अपनी नासिका तथा कर्णाभरणों से भूषित कानों को खो दिया था, (राम के विरह में) कामाग्नि से तप्त होनेवाले मन के साथ (रावण के स्थान में) आ पहुँची।
शत्रुओं के रक्त में बुझे हुए तीक्ष्ण बरछे को धारण करनेवाले रावण ने, अगल के आवासभूत मनवाली क्रूर शूर्पणखा को वहाँ आये हुए देखकर पूछा- हे स्त्रीरत्न! मेरे सम्मुख खड़ी हुई अंजन-अञ्चित करवाल-तुल्य नयनोंवाली, कलापी-समान यह स्त्री ही क्या तुम्हारी बताई हुई वह सीता है ?
तब शूर्पणखा ने उत्तर दिया—अरुण कमल-जैसे नयनों, रक्त बिंबफल-समान अधर, मनोहर और उन्नत कंधों, लंबी दीर्घ बाहुओं तथा सुन्दर पुष्पमाला से भूषित वक्ष के साथ आया हुआ, अंजन-पर्वत सदृश दीखनेवाला यह दृढ धनुर्धारी रामचन्द्र है।
श्रोङ्गारकाण्ड ३७५
यह सुनकर रावण ने कहा—मैं यहाँ एक स्त्री का रूप देख रहा हूँ। हे मुग्धे ! तुम ऐसे एक पुरुष के रूप की बात कह रही हो, जो मेरे विचार में भी नहीं है, यह कैसे ? हम तो दूसरों की आँखों के सामने माया उत्पन्न करके उनको भ्रम में डालनेवाले हैं। क्या क्षुद्र मनुष्य हमारे सामने कोई माया कर सकते हैं ?
तब शूर्पणखा ने कहा—तुम्हारी बुद्धि सीता के ध्यान में निमग्न होकर अन्य किसी विषय में प्रवृत्त नहीं हो रही है। तुम ऐसी काम-वेदना से पीडित हो कि तुम्हारी आँखें जहाँ भी पड़ती हैं, वहाँ वही सीता दिखाई देती है। ऐसा भ्रम होना चिरकाल की बात ही है, (अर्थात्, कामुक लोग अपने प्रेम-पात्र को सर्वत्र देखते हैं) : यह कोई नई बात नहीं है ।
शूर्पणखा के यों कहने पर रावण ने उससे पूछा—ठीक है। वैसा ही होगा। किन्तु, तुम्हारी आँखों को वह राम क्यों दिखाई देता है ? इसका उत्तर शूर्पणखा ने यों दिया—जिस दिन (राम) ने मेरा प्रतिकार-रहित अपमान किया, उस दिन से अबतक मैं उसे भूल नहीं पाई हूँ ।
तब रावण ने कहा—सच है, तुम्हारा कथन संगत ही है। इस समय मेरी इस पीडा का निवारण किस प्रकार हो सकता है ? इसका उत्तर शूर्पणखा ने दिया—तुम समस्त विश्व के एकमात्र प्रभु हो। तुम क्यों इस प्रकार दीन हो रहे हो ? तुम जाओ और उस पुष्प-भूषित कुन्तलोंवाली सुन्दरी (सीता) को उठा लाओ।
यों कहकर वह (शूर्पणखा) वहाँ से हट चली। वह राक्षस (रावण) भी शक्तिहीन होकर, कुछ भी सोच नहीं पाता हुआ, व्याकुल प्राणी के न्याय पड़ा रहा। उसे उस दशा में देखकर समीप खड़े रहनेवाले लोग भी काँप उठे। फिर भी, वह (रावण) अपनी शेष रही आयु के प्रभाव से मरा नहीं।
कोई मृत व्यक्ति पुनः जीवित हो उठा हो, इस प्रकार उठकर वह रावण अपने पराक्रम का स्मरण करके वहाँ स्थित लोगों से कहने लगा कि धारा-रूप में जल को प्रवाहित करनेवाली चन्द्रकान्त-शिलाओं से एक अति सुन्दर मंडप का निर्माण करो।
देवशिल्पी, रावण के मन की बात जानकर तुरन्त आ पहुँचा और अपने संकल्पमात्र से ही नहीं, किंतु हस्त-कौशल को भी दिखाकर ऐसा एक सहस्र स्तम्भोंवाला अति सुन्दर मंडप निर्मित किया, जिसे देखकर ब्रह्मा भी लज्जित हो जाय ।
उस (देवशिल्पी) ने उस मंडप में ऐसी चंद्रकान्त-शिलाएं बिछाईं, जिनसे किरणों के स्पर्श के बिना ही, जल-धारा बह चलती थी। ऐसे वातायन भी निर्मित किये, जिनसे पुष्प की सुरभि से पूर्ण मन्द पवन संचरण कर सकता था। उसने सुन्दर लता-भवनों का एक मनोहर और शीतल उद्यान भी बनाया।
उभरे हुए कंधोंवाला रावण एक माणिक्यमय विमान पर आरूढ होकर, उस मंडप को देखने के लिए गया। उनके दोनों पार्श्वों में, रत्नों की उज्ज्वल प्रभाएं, गगन तक परिव्याप्त अंधकार को दूर करती हुईं, अपने सुन्दर रूपों में ज्योतिःपूर्ण दीप लिये आईं।
३७६ | कंब रामायण
वह अंधकार यद्यपि ऐसा था, जैसे अनेक सहस्र रात्रियों को एक करके रखा गया हो, तथापि उन सुन्दर रमणियों के वदन-रूपी शीतल चन्द्रिका को बिखेरनेवाले अत्युज्ज्वल तथा अनेक सहस्र कोटि चंद्रमंडल के एक हो जाने से, वह अंधकार छिन्न-भिन्न हो मिट गया।
अति मनोहर नव रत्नों से खचित पुष्पों से युक्त कल्पतरुओं से, सूर्य को भी लज्जित करनेवाला कांतिपुंज प्रकट हो रहा था, जिससे अंधकार मिट गया और दिन का-सा प्रकाश व्याप्त हो गया। सूर्य के उदित होते ही, उसकी दीर्घ किरणों के प्रभाव से, अंधकार मिटकर प्रभात हो जाता है न ? (उसी प्रकार कल्पतरुओं के प्रकाश से प्रभात हो आया।)
स्पर्श, शब्द आदि विषयों का ग्रहण करनेवाली जिसकी इंद्रियाँ एक समान मंद पड़ गई थीं, जिसका मन स्तब्ध हो गया था और जो कर्त्तव्य-ज्ञान से रहित हो गया था ऐसा वह रावण, इच्छा के आवेग से खींचा जाकर उस मंडप में इस प्रकार आकर प्रविष्ट हुआ, जिस प्रकार जन्मान्तर के समय प्राण नवीन शरीर के भीतर प्रविष्ट होते हैं।
निष्पाप तपस्या से संपन्न व्यक्तियों के सब अभीष्टों को पूरा करनेवाला तथा वर्तुलाकार मीनों से पूर्ण क्षीर-समुद्र ही मानो, अमृत के साथ, आ गया हो—ऐसा भ्रम उत्पन्न करनेवाले, गानेवाले भ्रमरों से आवासित, हरित वृक्षों के कोमल पल्लवों तथा पुष्प-दलों से निर्मित, शीतल पर्यंक पर आकर वह (रावण) लेट गया।
ऐसा मंद पवन, जो किसी मरनेवाले व्यक्ति के प्राणों को भी रोक सकता था, - सुन्दर आभरणों से भूषित सुन्दरियों के कुंतलों की सुगंधि को लेकर, वहाँ पर यों आ पहुँचा, जैसे उस सुगंधित उद्यान में मन्मथ को भोज देने के लिए क्षीर सागर ने अमृत भेजा हो।
रक्त-बिंदुओं और अग्निकणों को बरसानेवाली आँखों से युक्त वह रावण, वातायन से मंद पवन का संचार होने पर उसका सहन नहीं कर सका और इस प्रकार घबड़ा उठा, मानो कोई, अपने घर में अजगर को घुसते हुए देखकर भयभीत हो उठा हो। फिर, अपने समीपस्थ लोगों से उसने कहा—
मानो कुएँ का थोड़ा-सा जल सारे संसार को डुबो रहा हो, इसी प्रकार, देवों में एक, यह वायु मुझे पीड़ित कर रहा है। मेरी आज्ञा के बिना यह पवन यहाँ किस प्रकार घुस पाया? फिर, उसने आज्ञा दी कि द्वारपालकों को शीघ्र ले आओ।
उस समय, सेवक दौड़ चले और द्वारपालकों को शीघ्र ले आये। क्रूर रावण ने कठोर नेत्रों से उन्हें देखकर पूछा—क्या तुमने मंद मारुत के वेश में आये हुए वायुदेव को भीतर आने का मार्ग दिया? तब उन द्वारपालकों ने निवेदन किया—जब आप इस स्थान में रहते हैं, तब उसे यहाँ आने से कोई रोक नहीं सकता है न ?
इसपर रावण ने सोचा कि वायु पर कोप करने से कुछ प्रयोजन नहीं है। अगर मैं वरछे-जैसे नयनोंवाली सीता की कृपा को नहीं प्राप्त करूँगा, तो अभी यम आकर मेरे प्राण हर लेगा। फिर, उसने सेवकों को आज्ञा दी कि बुद्धि के कौशल से सब कार्यों को पूर्ण करनेवाले मंत्रियों को बुला लाओ।
अरण्यकाण्ड ३७७
रावण की आज्ञा पाकर वे सेवक, 'हुं' ध्वनि करने के समय के भीतर ही (अर्थात्, अतिशीघ्र ही) अनेक स्थानो मे दौडे और मन्त्रियो को समाचार दिया। समाचार पाते ही वे मंत्री लोग, पताकाओ से युक्त रथों पर, घोड़ों पर, शिविकाओ में तथा त्रिविध मद से युक्त गजो पर आरूढ होकर इस प्रकार आ पहुँचे कि उन्हे देखकर भूसुरो और देवताओ के मन भी व्याकुल हो उठे।
मन मे उठे विचार को शीघ्र कार्यान्वित करनेवाले, किन्तु अब अपने कर्त्तव्य को निश्चित नही कर पानेवाले रावण ने अपने मंत्रियों के साथ ठीक मंत्रणा की, फिर गगन-गामी विमान पर चढकर अकेले ही उस मारीच के आश्रम मे आ पहुँचा, जो पन्चेन्द्रियो का दमन करके तपस्या मे निरत था।
रावण के आते ही मारीच ने, सभय तथा व्याकुल होकर काले तथा बड़े आकारवाले रावण का आगे जाकर सब प्रकार से स्वागत-सत्कार किया और उसके मुख की ओर देखकर कहने लगा---
मन में यह सोचकर चिंतित होता हुआ कि न जाने यह (रावण) किस प्रयोजन से यहाँ आया है, मारीच कहने लगा—सुन्दर तथा शीतल कल्पवृक्षो की छाया मे रहकर शासन करनेवाले देवेंद्र और यमराज को भी भयभीत करते हुए राज्य करनेवाले, हे शासक ! अब इस अरण्य मे, मेरे इस कष्टदायक कुटीर में, दीन जन के जैसे किस प्रयोजन से आये हो ? कहो।
रावण कहने लगा—अपनी शक्ति-भर प्रयत्न करके मै अपने प्राणों को रोके हुआ हूँ। अब शिथिल हो रहा हूँ। मेरे महत्त्व, कीर्त्ति, प्रभाव—सब मिट गये हैं। इसका क्या कारण है, मै उसके बारे मे तुमसे किस प्रकार शांति के साथ कह सकता हूँ ? इस घटना से हमे ऐसा अपयश प्राप्त हुआ है कि देवताओ से हमे लजित होना पड़ा है।
हे शूलधारी ! मनुष्य पराक्रम दिखाने लगे हैं? उनके खड्ग से तुम्हारी भतीजी की नाक और कान कट गये है। विचार करने पर मेरे और तुम्हारे वशो के लिए इससे बढकर और क्या अपमान हो सकता है? तुम्ही कहो।
एक मनुष्य ने दृढ धनुष को लेकर, बड़े क्रोध के साथ अधिक सख्या मे आकर युद्ध करनेवाले मेरे भाइयो की आयु को समाप्त कर दिया। यह तो अबतक की हमारी सब विजयों के लिए कलक है न। दृढ शूलधारी तुम्हारे भतीजे इस प्रकार मर मिटे। वह मनुष्य तो अपनी दोनो भुजाओ को ही लेकर अबतक सुखी रहता है न ?
मेरे मन की अग्नि शान्त नहीं हुई है। मरण की वेदना भोग रहा हूँ। वे मेरे समान नहीं हैं। अत. मै उनसे युद्ध करना नही चाहता हूँ। मै यहाँ इसलिए आया हूँ कि तुम्हारी सहायता लेकर उन (मनुष्यो) के साथ रहनेवाली; प्रवाल को भी परास्त करनेवाले लाल अधर से युक्त, लता-समान सुन्दरी को उठा ले आऊँ और अपने अपमान का बदला लूँ—यो रावण ने कहा।
भड़कती हुई ज्वाला में जैसे लोह को पिघलाकर डाला गया हो, उसी प्रकार रावण के वचन मारीच को तप्त करने लगे। उसका कथन पूरा होने के पूर्व मारीच ने
| ३७८ | कंब रामायण |
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'छिः । छिः !' कहते हुए अपने कान बंद कर लिये । उसके मन से भय दूर हो गया और क्रोध उत्पन्न हुआ । फिर वह (मारीच) कहने लगा—
हे राजन् ! तुम अपना जीवन समाप्त कर रहे हो । तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है । यह तुम्हारा दोष नहीं है । मेरा विचार है कि यह कर्मों का ही परिणाम है । मेरा कथन तुम्हें मीठा नहीं लगेगा । तो भी मैं यह हित-वचन बताता हूँ—यों कहकर उस (मारीच) ने अनेक हितकारी उपदेश उस (रावण) को दिये ।
तुमने स्वयं अपने हाथो से अपने करो और शिरो को काट-काटकर अग्नि में होम किया था और दीर्घकाल तक भूखे रहकर, अपने प्राणो को पीडित करके तपस्या की थी । उसके पश्चात् ही सारी सम्पत्ति प्राप्त की । उस सम्पत्ति को यदि तुम अब अनुचित कार्य करके खो डालोगे, तो क्या उसे पुनः प्राप्त कर सकोगे ?
हे विचारणीय वेदों के पंडित ! तुमने अपूर्व तपस्या करके संपत्ति प्राप्त की है । यह धर्म के प्रभाव से हुआ या अधर्म के प्रभाव से ? बताओ तो । तुमने यह महत्त्व धर्म के प्रभाव से ही तो पाया है ? अब क्या उसे अधर्म करके खो देना चाहते हो ?
जो राजा अपने ऊपर विश्वास करनेवाले मित्रों के राज्य का हरण करते हैं, जो राजा न्यायेतर मार्ग से अपनी प्रजा से अधिक कर उगाहते हैं और जो व्यक्ति पर-पुरुष की गृहिणी को अपने वश में करते हैं—इन सबके धर्म का देवता स्वयं ही विनाश कर देता है । यह तुम जान लो, हे तात ! लोक-पीडा उत्पन्न करनेवालों में से कौन उद्धार पा सका है ?
स्वर्ग का अधिपति (इन्द्र) अहल्या के रूप की आसक्ति के कारण दुर्दशा-ग्रस्त हुआ । उस (इंद्र) के जैसे अनेक लोग हुए हैं, जो पर-स्त्री के मोह में पड़कर अधःपतन को प्राप्त हुए हैं । गौरवर्ण लक्ष्मी के समान अनेक सुन्दरियाँ तुम्हारे भोग की भागिनी हैं । तो भी तुमने बिना सोचे-समझे कुछ कह दिया है । तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है ।
यदि तुम अपनी इच्छा के अनुसार काम भी करो, तो भी इससे पाप और अपयश ही तुम्हारे हाथ आयेंगे । तुम्हारी इच्छा पूर्ण नहीं होगी, नहीं होगी । ससार को उत्पन्न करनेवाला राम शाप-सदृश कठोर शरों से तुम्हारी शक्ति को मिटाकर तुम्हारी संतति और तुम्हारे सारे कुल को मिटा देगा, यह निश्चित है ।
मेरे ऐसा कहने पर भी, न जाने क्यों, तुम कुछ ठीक विचार नहीं कर रहे हो । अहो ! तुम्हारी सेना का सबसे बड़ा सेनापति खर अपनी सेना के साथ उस (राम) के एक ही शर से मारा गया । वह (राम) अब सारे राक्षस-कुल को मिटानेवाला है ।
क्रूर व्यक्तियों में वीर विराध से बढ़कर कौन था ? वह (राम के) एक ही शर से, परलोक में पहुँच गया, तो अब हममें से कौन बचनेवाला है ? जब मैं यह बात सोचता हूँ, तब मेरा मन व्याकुल हो जाता है । अब तुम अपने वचनों से मेरी चिन्ता को और भी बढ़ा रहे हो ।
जिनको मरना था, वं मर गये । उन मरनेवालों के जैसा काम मत करो । यदि तुम भी वैसा ही कार्य करोगे, तो क्या तुम को भाग्य बचा सकेगा ? ससार में कितने ही
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शासक हुए, उनमें अधर्मी राजाओ ने कभी सुख नही पाया। इस ससार मे कौन चिरकाल तक जीवित रहनेवाला है। सब मिट जानेवाले ही तो हैं?
उस वीर (राम) से जिसने अपने वाण से मेरे भाई (सुबाहु) को और मेरी माता (ताड़का) को मार डाला और जिसके निकट खड़े रहनेवाले उनके भाई से मेरा सारा पराक्रम मिट गया, उनके स्मरण से ही मेरा व्याकुल मन काँप उठता है। राम के ऐसे पराक्रम से मै बहुत चिन्तित हूँ।
हम इस सत्य को प्रत्यक्ष देखते हैं कि सब स्थावर तथा जगम पदार्थ अस्थिर हैं, नष्ट होनेवाले हैं, अतः हे तात! कोई नीच कार्य करने का विचार न करो। मेरी बात सुनो, अपनी महान् समृद्धि के साथ तुम चिरकाल तक जियो। इस प्रकार, मारीच ने (रावण से) कहा।
यह सुनकर रावण अपनी भयंकर आँखो मे आग उगलने लगा। उसकी भौंहि तन गई; बहुत क्रुद्ध होकर उसने कहा—तुम कहते हो कि मेरी ये पराक्रमी सुन्दर भुजाएँ, जिन्होने गंगा को अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) को उनके कैलास के सहित, एक हथेली पर उठाया था, अब एक मनुष्य से पराजित होनेवाली हैं।
अभी जो घटना हुई, उसके वारे में तुमने नही सोचा, पर निःसंकोच होकर मेरी निंदा की। जिन्होने मेरी वहन के मुँह में एक गढ़ा-सा खोद डाला हो, उन (मनुष्यो) की तुमने प्रशसा की, यह तुम्हारा एक अपराध है। फिर भी, मैने इसके लिए क्षमा कर दिया।
तब मारीच, यह सोचकर भी कि उसके ऊपर क्रोध करनेवाला वह निर्भीक (रावण) उनके वचनों को सुनकर पुनः क्रुद्ध होगा - चुप नही रहा। किन्तु, फिर कहा—तुम्हारा यह क्रोध मुझ पर नही है, किंतु यह स्वय तुम पर ही है और तुम्हारे कुल पर है।
यदि तुम यह सोचते हो कि तुमने कैलास पर्वत को उठाया था, तो यह भी तो सोचो कि जब जनक ने (राम से कहा कि यह धनुष शिवजी के द्वारा झुकाया हुआ पर्वत ही है, तुम इसे चढ़ाओ, तो राम ने एक क्षण में अनायास ही उस (धनुष) को हाथ मे उठा लिया और उस पर डोरी चढ़ाने के निमित्त उसे झुकाकर तोड़ दिया। वह पर्वताकार शिव-धनुष गगन को छूनेवाला मेरु-पर्वत ही तो था।
तुम (राम के प्रभाव के बारे मे) कुछ नही जानते हो। मेरे वचन को भी स्वीकार नही करते हो। वह (राम), युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर पुष्पमाला धारण करे, इसके पूर्व ही, उसके शत्रुओ के प्राण लुट जाते हैं। तुमने मूढ़ता से यह समझ रखा है कि वह (सीता) एक मानव-स्त्री मात्र है। क्या वह, सीता का अपना रूप है? वह तो राक्षसो के पाप के परिणाम की ही प्रतिमूर्ति है।
मेरे मन मे, यह सोचकर कि (यदि तुम सीता का हरण करोगे, तो) तुम अपने बंधुओ-सहित मिट जाओगे, नही बच सकोगे, ऐसी धड़कन उत्पन्न हो रही है, जैसे नगाडा बज रहा हो। इसका तुम विचार नही करते। अज्ञान में पड़कर जो विष पीने जा रहा हो, उससे उसके समीप रहनेवाले ज्ञानी व्यक्ति, क्या यह कहेंगे कि यह कार्य ठीक है?
३८० कम्ब रामायण
उग्र तथा कलंक-रहित विश्वामित्र के द्वारा प्रदत्त अनेक ऐसे शस्त्र राम की आज्ञा में हैं, जो शिव आदि देवों के लोकों को तथा सब भुवनों को भी क्षण काल में विध्वस्त कर सकते हैं।
जिस परशुराम ने एक सहस्र बलिष्ठ हाथोंवाले (कार्त्तवीर्य अर्जुन) को अपने परसे से क्षण काल में काटकर ढेर कर दिया था, उस (परशुराम) की सारी शक्ति को, उसके दृढ़ धनुष के साथ ही, राम ने अपने वश में कर लिया था। क्या वैसा बल हमारे लिए प्राप्त करना संभव है ?
काम-पीडा के बढ़ जाने से तुम दुर्बल हो गये हो। अतः, तुमने ऐसे वचन कहे। यह कार्य विनाशकारी है। मैं तुम्हारा मामा हूँ और तुम्हारे कुल का वृद्ध पुरुष हूँ। मैं कहता हूँ, हे तात ! यह पाप-कार्य छोड़ दो।—इस प्रकार मारीच ने कहा।
राक्षसराज ने, अपने कथन के बारे में किंचित् विचार करने का परामर्श देने-वाले उस मारीच का धिक्कार करते हुए कहा—तुम, अपनी माता को मारनेवाले उस (राम) से डरकर जी रहे हो। क्या तुम्हें एक वीर पुरुष मानना उचित है ?
स्वर्गवाली देवी के निवासों को भस्म करके मैं सब लोकों पर इस प्रकार शासन-चक्र चलाता हूँ कि दिग्गज सब भयभीत होकर भागकर छिप गये हैं और देवता भी दुर्दशा-ग्रस्त हो गये हैं। क्या ऐसे मुझको दशरथ के वे पुत्र कष्ट दे सकेंगे ?—यह मेरी शक्ति भी अच्छी है !
मैं त्रिभुवन का एकच्छत्र राज्य वहन करता हूँ। यदि मुझे कोई शक्तिशाली शत्रु प्राप्त हो, तो उससे बढ़कर मेरे आनंद का विषय कोई दूसरा नहीं होगा। मेरी आज्ञा के अनुसार तुम्हें कार्य करना है। राजा के कार्य-संपादन करनेवाले मंत्री के कर्त्तव्य से क्या तुम स्खलित हो जाओगे ?
अगर तुम मेरी आज्ञा का अतिक्रमण करोगे, तो मैं तीक्ष्ण करवाल से तुम्हें काट दूँगा। किन्तु, अपने इच्छित कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं रहूँगा। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो इन घृणास्पद वचनों को छोड़कर मेरे मन की बात करो। यों रावण ने कहा।
राक्षसराज के यह वचन कहने पर, मारीच ने मन में विचार किया—जिसके मन में गर्व उत्पन्न होता है, वह उसी समय मिट जाता है। यही कथन सत्य है। लोग मन में काम-वासना उत्पन्न होने पर, उसी कामना पर प्राण छोड़ने के लिए भी तैयार हो जाते हैं—और वह तपाये हुए पात्र में डाले गये जल के जैसे ही, उफनकर, भीतर शांत हो गया। वह फिर कहने लगा—
तुम्हारे हित की कामना से मैंने यथार्थ बात कही। होनेवाले अपने किसी अहित को सोचकर और उससे डरकर मैंने कुछ नहीं कहा। विनाश का काल आ जाता है, तो भला भी बुरा लगता है। हे क्षुद्र स्वभाववाले ! बताओ, मुझे क्या करना है ? यों मारीच ने कहा।
मारीच के यह कहते ही रावण ने अपना क्रोध शान्त कर उसका आलिंगन किया
अरण्यकाण्ड ३८१
और कहा—पर्वत के समान पुष्ट कंधोंवाले। मन्मथ के उग्र बाणों से मरने की अपेक्षा राम के बाण से मरना ही कीर्त्तिदायक है न ? अतः, मंद मारुत से मेरे हृदय में काम उत्पन्न करनेवाली (सीता) को ला दो।
रावण के यह वचन कहते ही मारीच बोला—(मेरी माँ को मारनेवाले) राम से अपना बदला लेने के लिए मैं एक बार, दो-एक राक्षसों को साथ लेकर तपोवन में गया था। तब राम के बाणों से मेरे साथी मरकर गिर पड़े। भयभीत होकर मैं भाग आया। ऐसा मैं इस समय क्या कार्य कर सकता हूँ ? बताओ।
मारीच की बातें सुनकर रावण ने कहा तुम्हारी माता को मारनेवाले इस राम के प्राण हरने के लिए मैं तैयार हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न कि मैं जाकर क्या करूँ, उचित ही है। हमारा कर्त्तव्य माया से धोखा देकर उस सीता का अपहरण करना ही है।
मारीच ने कहा—हे राजन् ! अब मैं और क्या कह सकता हूँ ? उस (राम) की देवी को पराक्रम से हरण करना उचित है। धोखे से हरण करना नीच कार्य है। तुम (राम से) युद्ध करके, विजय पाकर सीता को अपना लो और अपने प्रताप को बढाओ। ऐसा करना नीतिशास्त्र के अनुकूल होगा।
अपने हित-चिंतक (मारीच) का कथन सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला - उन मनुष्यों को जीतने के लिए क्या सेना की भी आवश्यकता है ? क्या मेरे विशाल हाथ का करवाल पर्याप्त नहीं है ? फिर भी, सोचने की बात यह है कि यदि वे दोनों मनुष्य मर जायेंगे, तो वह नारी (सीता) एकाकिनी होकर अपने प्राण त्याग देगी न ? अतः, धोखे से उस नारी का हरण करना ही ठीक है।
यह सुनकर मारीच ने सोचा—मैं ऐसा उपाय बताता हूँ कि राम की देवी का स्पर्श करने के पूर्व ही इस (रावण) के शिर (राम के) बाणों से बिखर जायें, पर यह मेरी बात नहीं मानता। अब मेरे जीवित रहने का कोई मार्ग नहीं है। विधि के परिणाम को कौन जान सकता है ? अब इसकी आज्ञा का पालन करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।
फिर उस (मारीच) ने कहा—अब मुझे कैसी माया रचनी है, बताओ। रावण ने कहा—तुम एक सोने के हिरण का रूप धारण कर लो और उस सीता के मन को ललचाओ। मारीच वैसा करने की सम्मति प्रकट करके चल पड़ा। उज्ज्वल शूलधारी राक्षसराज (रावण) भी दूसरे मार्ग से चला गया।
मारीच, पूर्वकाल में राम के बाण का प्रभाव जान चुका था। अतः, वह स्वयं हरिण का रूप लेकर वहाँ जाना नहीं चाहता था। किंतु, रावण की वैसी आज्ञा होने के कारण वह गया। अब उसके मन की दशा और उसके व्यापारों का वर्णन करेंगे।
मारीच का मन, अपने बन्धुओं का स्मरण करके दुःखी होता। वह वीर राम-लक्ष्मण से भयभीत होकर चक्कर खाता। गहरे तालाब का पानी विषमय हो जाय, तो उसमे रहनेवाली मछली जिस प्रकार विकल होती है, उसी प्रकार मारीच का मन भी व्याकुल हुआ। उसकी दशा का अनुमान करना भी कठिन है।
३८२ | कंब रामायण
विश्वामित्र के यज्ञ के समय राम से पीड़ित होकर और (दंडकारण्य में) पहले एक बार हरिण-वेष में जाकर भी जो मरा नहीं, वह मारीच अब तीसरी बार प्रयत्न करता हुआ राघव के आश्रम में जा पहुँचा।
उसने ऐसे एक स्वर्ण-हरिण का रूप धारण किया, जिसकी अनुपम उज्ज्वल देह की कांति से गगन और धरती भी प्रकाशित हो उठी। उत्तम हरिणी-समान सीता के मन में आकर्षण उत्पन्न करने के विचार से वह (पर्णकुटी के पास) गया।
किसी पर आसक्ति नहीं रखनेवाले मन तथा कपट से युक्त वेश्याओ की ओर जिस प्रकार सब कामुक व्यक्ति आकृष्ट होते हैं, उसी प्रकार उस स्वर्ण-हरिण की ओर सब प्रकार के हरिण आकृष्ट होकर उसको घेरकर चले।
उसी समय सीतादेवी, अपने अति सुन्दर कंकण-भूषित कोमल कर-कमलों से पुष्प-चयन करती हुई, इस प्रकार वहाँ चली आईं कि देखनेवालों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि इसके कटि है या नहीं।
जिसपर विपदा आनेवाली होती है, वे स्वप्न में ऐसे रूपों को देखते हैं, जिनका विचार तक वे अपने मन में कभी नहीं लाये होंगे। इसी प्रकार, सीता देवी ने, जिनको, इसके पूर्व कभी किसी को न प्राप्त हुई बड़ी विपदा आनेवाली थी, उस माया-मृग को देखा।
रावण की आयु अब समाप्त होनेवाली थी, और उसकी मृत्यु से धर्म की सुरक्षा होनेवाली थी। अतः, सीता उस (माया-मृग) को देखकर, यह नहीं जानती हुई कि यह धोखा है, उसके न चाहने योग्य सौंदर्य पर मुग्ध हो गई ?
वह हिरण ज्यों ही अर्धचंद्र समान ललाटवाली सीता के सम्मुख आकर खड़ा हुआ, त्यों ही वह (सीता) उसके प्रति अत्यधिक आकर्षण से भरकर, इस विचार से कि राम से उस हरिण को पकड़ लाने को कहे, मत्वर विजयी धनुर्धारी (राम) के निकट जा पहुँची।
सीता ने हाथ जोड़कर राम से कहा—हमारे आश्रम में अति उत्तम स्वर्णमय, दूर तक अपना प्रकाश फेंकनेवाला, माणिक्य तथा रत्नमय सुदृढ खुरों और कर्णों से शोभाय-मान एक हरिण आया है। वह अत्यन्त दर्शन-मधुर है।
ऐसा हरिण संसार में कहीं नहीं हो सकता, – ऐसा किंचित् भी विचार किये बिना ही, हमारे प्रभु और कमलभव के पिता (विष्णु के अवतारभूत) राम, हरिण-तुल्य देवी की बात सुनकर उमंग से भर गये।
यह मुझे चाहिए—यों अपनी देवी के कहने पर, राम ने यह नहीं कहा कि यह (हरिण) चाहने योग्य नहीं है। किन्तु, यह कहा कि आभरणधारी, स्वर्णलता-तुल्य हे देवि! हम उस हरिण को देखेंगे। तब अनुज लक्ष्मण ने उनका मनोभाव जानकर उस समय एक वचन कहा—
(उस हरिण के) स्वर्णमय देह है, माणिकमय पैर, पूँछ और कान हैं और वह कुदकता है—यों कहने से यह स्पष्ट है कि वह कोई मायामय मृग है। हे प्रभु! इसके विपरीत उसे यथार्थ मृग मानना ठीक नहीं है।
अरण्यकाण्ड ३८३
तब राम ने कहा— हे मेरे अनुज ! यथार्थ विवेक से सब कुछ जाननेवाले व्यक्ति भी इस अस्थिर संसार की दशा को पूरा-पूरा नहीं जान सकते ; इस संसार में अनेक सहस्र कोटि प्राणी हैं। अतः, संसार में कोई वस्तु असंभव है—ऐसी बात नहीं है।
तुम्हारा मन क्या कहता है ? हम अपने कानों से सृष्टि की विचित्र वस्तुओं के बारे में सुनते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि पूर्वकाल में सात स्वर्णमय हंस¹ पैदा हुए थे ?
सृष्टि के प्राणियों की कोई रूप-व्यवस्था या कोई सीमा नहीं है। यों राम ने अपने भाई से कहा। इतने में मुग्धा (सीता) देवी चिन्ता करने लगीं कि वह स्वर्ण-मृग वन के भागों में जाकर कहीं अदृश्य न हो जाय।
इस प्रकार चिन्ता करनेवाली देवी का मनोभाव जानकर, अंजन-पर्वत सदृश प्रभु, यह कहते हुए कि हे आभरणों से भूषित देवि ! कहाँ है वह हरिण ? मुझे दिखाओ। चल पड़े। मुखरित वीर वलयधारी अनुज (लक्ष्मण) अपने भ्राता का यह कार्य देखकर चिन्तामग्न हो, उनके पीछे-पीछे चले। उसी समय अवश्यंभावी विधि के विधान के समान आया हुआ वह माया-मृग सम्मुख दिखाई पड़ा।
सम्मुख दिखाई पड़नेवाले उस हरिण को देखकर रामचन्द्र अपनी सूक्ष्म बुद्धि से कुछ विचार न करके कह उठे—अहो ! यह तो बहुत सुन्दर है। उन (सर्वज्ञ राम) के इस प्रकार कहने का कारण क्या था ? विष्णु ने सर्पशय्या को छोड़कर धरती पर (राम के रूप में) अवतार लिया था, तो वह देवताओं के पुण्यफल के परिणामस्वरूप ही तो था ? वह (भाग्य) क्या व्यर्थ होगा ? (अर्थात्, देवताओं के भाग्य-परिपाक के कारण ही रामचंद्र मायामृग को पकड़ने के लिए तैयार हुए थे।)
फिर, श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—हे भाई ! इसे देखो। इसका उपमान क्या हो सकता है ? इसका उपमान यह स्वयं है। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपमान नहीं है। इसके दाँत उज्ज्वल मुक्ता-तुल्य हैं। हरी घास पर बढ़ाई गई इसकी जीभ बिजली के सदृश है। इसकी देह रक्त स्वर्ण के तुल्य है जिसपर चाँदी की-सी चित्तियाँ शोभित हो रही हैं।
हे दृढ धनुर्धारी ! इस हरिण की सुन्दरता को देखने पर स्त्री हो या पुरुष,—कौन इसपर मुग्ध नहीं होगा ? रेंगनेवाले और उड़नेवाले सब प्राणी इसे देखकर पिघल उठते हैं और इस प्रकार आकर घेर लेते हैं, जिस प्रकार दीपक पर पतंग आकर गिरते हैं।
१. एक कथा प्रसिद्ध है कि पूर्वकाल में भरद्वाज मुनि के सात पुत्र मानससरोवर पर योग-साधना करते थे। किसी कारण से वे योगभ्रष्ट हो गये और दूसरे जन्म में कौशिक ऋषि के पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस जन्म में एक दिन अत्यन्त क्षुधा से पीड़ित होकर उन्होंने अपने गुरु गर्ग महर्षि की गाय को मारकर खा डाला। किन्तु, खाने के पूर्व पितरों का श्राद्ध कर उन्हें तृप्त किया। इस पाप के कारण उन्हें अनेक योनियों में जन्म लेना पड़ा। किन्तु, पितरों को तृप्त करने के पुण्यफल से उन्हें सब जन्मों में अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना रहता था। एक बार वे सात स्वर्णहंस होकर जनमे थे। कदाचित् इसी कथा की ओर इस पद्य में संकेत है।—अनु०
३८४ | कंब रामायण
आर्य (राम) के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण ने उस हरिण को देखकर यह स्पष्ट रूप से जान लिया कि यह (हरिण) सच्चा नहीं है। फिर कहा—हे सुरभित तथा सुन्दर मालाधारी। यह हरिण स्वर्ण का भले ही हो, तो भी इससे हमें क्या प्रयोजन है? अतः, हमें अपने स्थान पर लौट जाना ही उचित है।
लक्ष्मण के ये वचन समाप्त करने के पूर्व ही उस अतिरूपवती (सीता) ने अनघ (रामचंद्र) को देखकर कहा—हे चक्रवर्त्ती-पुत्र ! मन को आकृष्ट करनेवाले इस हरिण को शीघ्र पकड़ लाओ। जब हम (वनवास की) अवधि पूरा करके नगर को लौटेंगे, तब यह खेलने के लिए अत्यंत उपयुक्त होगा।
'है या नहीं'—यों संदेह उत्पन्न करनेवाली कटि से युक्त (सीता) के यह कहने पर प्रभु उस हरिण को पकड़ने के लिए सन्नद्ध हुए, यह देखकर स्पष्ट विवेकवाले भाई (लक्ष्मण) ने उनसे निवेदन किया—हे भ्राता ! आप सोचकर जान सकते हैं कि हमें धोखा देने के लिए राक्षसों के द्वारा भेजा गया यह मायामय मृग है।
तब देवताओं के कष्टों को दूर करने के लिए अवतीर्ण प्रभु ने उत्तर दिया—यदि यह मायामृग ही है, तो भी मेरे बाण से यह मरेगा। मैं उस दशा में एक क्रोधी (क्रूर) राक्षस का वध करने का कर्त्तव्य पूरा करूँगा। यदि यह यथार्थ हरिण है तो इसे पकड़कर लाऊँगा। इन दोनों बातों में कोई भी अनुचित नहीं।
इसपर लक्ष्मण ने फिर कहा—हे वज्रसदृश दृढ़ तथा अतिसुन्दर कंधोंवाले। इस (हरिण) के पीछे किस प्रकार के राक्षस छिपे हैं—यह हमें विदित नहीं है। उनकी माया कैसी है—इससे भी हम परिचित नहीं हैं। यह हरिण क्या है—यह भी हमने समझा नहीं है। नीति-निष्ठ महाजनों ने जिस आखेट को घृणित और वर्ज्य कहा है, उसे करना कीर्त्तिकारक नहीं होता।
यह सुनकर चतुर्मुख के पिता (विष्णु के अवतार, राम) ने अपने उत्तम भाई से कहा—राक्षस वैर रखनेवाले हैं। उनकी संख्या अपार है। उनकी माया प्रभूत है—इन बातों को सोचकर ही क्या हम अपने व्रत को छोड़ दें? यह हास्यास्पद बात होगी। अतः, (हरिण) को पकड़ने का यह कार्य उचित ही है।
तब लक्ष्मण ने कहा—हे भ्राता। योग्य कार्यों को ठीक सोच-समझकर करना उचित है। इस (हरिण) को पकड़ लाने के लिए मैं जाऊँगा। इसे यहाँ भेजकर इसके पीछे छिपे रहनेवाले राक्षस असंख्य भी क्यों न हों, उन सबको मैं अपने धनुष पर अनेक तीक्ष्ण बाण चढ़ाकर मिटा दूँगा। यदि यह मायामय मृग न हो, तो इसे पकड़कर ले आऊँगा?
उस समय हरिणी-तुल्य उस (सीता) ने, गद्गदकंठ से शुकी की जैसी अमृत-वर्षिणी वाणी में कहा—हे नाथ ! क्या तुम स्वयं जाकर इस (हरिण) को नहीं पकड़ लाओगे? फिर रक्त रेखाओं से संयुक्त नीलोत्पल-जैसे अपने नयनों से मोती जैसे अश्रु-बिंदु बरसाती हुई और मान करती हुई पर्णशाला की ओर चल पड़ी।
इस प्रकार जानेवाली सीता का रोष देखकर रक्षक प्रभुने (लक्ष्मण से) कहा—
अरण्यकाण्ड ३८५
हे सुन्दरमाला-भूषित। इस हरिण को मैं स्वयं पकड़कर शीघ्र लौट आऊँगा। वन में रहनेवाली कलापी-समान सीता की रक्षा करते हुए तुम यहाँ रहो—यों कहकर वरछे-जैसे तीक्ष्ण बाण और धनुष लेकर सत्वर चल पड़े।
तब लक्ष्मण ने यह कहकर कि पहले (विश्वामित्र के) यज्ञ के समय आये हुए तीन राक्षसों में से (अर्थात्, ताड़का, सुबाहु और मारीच—इनमें से) एक राक्षस हमसे बचकर निकल गया था। हे प्रभु! मेरा अनुमान है कि उस समय बचकर भागा हुआ मारीच ही इस रूप में अब यहाँ आया है। आप सत्य को देखेंगे। जाइए। आपकी जय हो। लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और लक्ष्मी-तुल्य सीता के निवास-भूत कुटीर के बाहर पहरा देने हुए खड़े रहे।
पर्वत-समान उन्नत कंधोंवाले रामचंद्र ने अपने विवेकवान् भाई के वचनों पर ध्यान नहीं दिया और पूर्णचंद्र का उपमान बननेवाले सुन्दर मुख से शोभित (सीता) देवी के मान का स्मरण करते हुए, सिंदूर और प्रवाल के जैसे रक्तवर्ण अपने मुँह पर संसंधान भरकर उस हरिण का पीछा करते हुए चल पड़े।
वह हरिण मंद-मट पैर रखता हुआ कभी चलता, कभी स्थिर खड़ा होता। फिर, घबराकर झपटता और कभी कान खड़े करके अपने खुरों को वज्र से सटाता हुआ उछल पड़ता एव अपनी गति से प्रभंजन और मन को भी मानों नवीन गति सिखाने लगता।
राम ने, त्रिभुवन को नापनेवाले अपने पैर को उठाकर आगे रखा। क्या उस चरण की पहुँच से परे रहनेवाला कोई लोक भी हो सकता है ? यो राम ने (उस हरिण का) पीछा किया। उन राम के उस समय के वेग के बारे में इनसे अधिक क्या कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी अनुपम सर्वव्यापिता को प्रकट किया ?
वह (हरिण) पर्वत पर चढ़ता, मेघों के मध्य कूद पड़ता। उसका पीछा करने पर वह बहुत दूर भाग जाता। उसका पीछा करना छोड़कर विलंब करें, तो इतना निकट आ जाता कि हाथ बढ़ाकर उसे छू सकें। स्थिर खड़ा हुआ-सा दिखता; किन्तु झट उछलकर भाग जाता। इस प्रकार, वह (हरिण), धन पर ललचानेवाली वारनारियों के मन के समान सचरण करता। अहो !
तब उदार स्वभाववाले प्रभु ने विचार किया—इस (हरिण) का रूप कुछ है और इसके कार्य कुछ और हैं। पहले ही मेरे अनुज ने जो सोचा, वह ठीक ही लगता है। यदि मैं ठीक-ठीक विचार करता, तो इसके पीछे नहीं आता। राक्षसों की माया के कारण ही मुझे यह क्लेश उठाना पड़ रहा है।
इतने में वह मायावी राक्षस यह सोचकर कि यह (राम) अब मुझे पकड़ेगा नहीं, किंतु अपने बाण से मुझे परलोक में भेजने की बात सोच रहा है—अतिवेग से गगन में उड़ गया।
उसी क्षण प्रभु ने भी अपने चक्रायुध के समान अवार्य एक रक्तवर्ण बाण को यह आज्ञा देकर छोड़ा कि यह हरिण जहाँ भी जाये, वहाँ उसका पीछा करता हुआ जा और उसके प्राण हर ले।
३८६ कंब रामायण
वह दीर्घ, तीक्ष्ण तथा पत्राकार बाण, उस मायावी के वक्ष में जा लगा। तुरन्त वह (मारीच) अपने खुले मुँह से (हा लक्ष्मण ! हा सीते ! कहकर) पुकार उठा और अष्ट दिशाओं और उनसे परे भी प्रतिध्वनि करता हुआ एक पर्वत के जैसे गिर पड़ा।
ज्योही वह क्रूर राक्षस अपने यथार्थ रूप में मरकर गिरा, त्योही राम अपने उस भाई के बारे में, जिसने उस (हरिण को पकड़ने के) प्रयत्न को अहितकारी बताया था, सोचने लगे—मेरा वह भाई चतुर है। मेरे प्राणों के समान प्रिय है। मेरा वह चतुर अनुज मेरा उद्धार करनेवाला है।
फिर, रामचंद्र ने उस मारीच की देह को निकट जाकर देखा, जो दिगंत को अपनी पुकार से प्रतिध्वनित करता हुआ गिरा था, और स्पष्ट रूप से यह जान लिया कि वह वही मारीच है, जो पहले कलंक-रहित विश्वामित्र के महायज्ञ के समय आया था।
फिर, यह सोचकर वे (राम) चिंतित हुए कि दारुण बाण ज्योही उसके वक्ष में लगा, वह अपनी माया से मेरे कंठ स्वर का अनुकरण करके पुकार उठा। वह ध्वनि सुनकर मेघ-समान नयनोंवाली (सीता) देवी चिंतित हुई होगी।
मेरा भाई इस (हरिण) को देखते ही समझ गया था कि यह मायावी मारीच है। वह मेरे पराक्रम को समझने की बुद्धि रखता है। अतः, इस (मारीच) की पुकार के यथार्थ तत्त्व को (सीता को) वह समझा देगा। यो विचार कर राम स्वस्थचित्त हुए।
फिर, यह विचार कर कि यह (मारीच) केवल मरने के उद्देश्य से ही यहाँ नहीं आया होगा, हो न हो, कोई षड्यन्त्र करने का उपाय करके ही आया है, इसकी पुकार से कोई हानि उत्पन्न होने की संभावना है, अतः, ऐसी कोई विपदा उत्पन्न होने के पूर्व ही पर्णशाला को लौट जाना उचित है। रामचंद्र लौट पड़े। (१-२५२)
अध्याय ८
सीता-हरण पटल
शंखों से पूर्ण अनुपम समुद्र के जैसे सुन्दर स्वरूपवाले (राम) के संबंध में हमने वर्णन किया। अब सुरभिपूर्ण पुष्पालंकृत केशोंवाली लता-सदृश (सीता) देवी के सम्बन्ध में कहेंगे।
मारीच ने अपने दाँत पीसकर, अपने कंदरा के समान मुँह को खोलकर जो करुण पुकार की थी, वह ज्योही सीता के कानों में पड़ी त्योही वह वृक्ष पर से धरती पर गिरी हुई कोयल के समान व्याकुल होकर छाती पीटती हुई मूर्च्छित हो गई।
घने कुंतलोंवाली वह (सीता) देवी अवलंब से छूटी हुई लता के समान, और वज्र-ध्वनि के श्रवण से भयभीत हुए सर्प के समान मूर्च्छित होकर धरती पर लोट गई। फिर,