कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 445, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४३७
उस समय, जब वे वानर व्याकुल तथा भयभीत हो साहस छोड़कर खड़े थे, तब हनुमान् ने सोच-विचार करके उन्हें उसी प्रकार सांत्वना दी, जिस प्रकार लंबी जटायुक्त रुद्रदेव ने (क्षीरसागर के मथन के समय) हलाहल विष को देखकर डरे हुए देवों तथा दानवों के भय को दूर करते हुए उन्हें सांत्वना दी थी ।
अञ्जनि-पुत्र एक ब्रह्मचारी का रूप धारणकर नील पर्वत-सदृश रामचन्द्र के निकट जा पहुँचा और एक स्थान में छिपकर उन्हें देखकर सोचने लगा— ये तपस्वी के वेष में हैं, किंतु हाथों में धनुष धारण किये हैं और कठोर क्रोध से भरे लगते हैं। फिर, विवेक से विचार करने लगा—
क्या इन्हें, देवों के अद्वितीय नायक त्रिमूर्त्ति मानें ? किन्तु वे तो तीन हैं, जबकि ये दो ही हैं, ये धनुर्धारी भी हैं। इनकी समता करनेवाले संसार में कौन हो सकते हैं ? इनके लिए असाध्य कार्य ही क्या हो सकता है ? उनके स्वभाव को मैं किस प्रकार सरलता से पहचान सकता हूँ ?
इन्हें देखने से ऐसा लगता है, जैसे चित्त की किसी व्यथा से ये शिथिल हों । ये ऐसे नहीं लगते कि किसी सामान्य विषय पर ये चिंतित हो सकते हों । क्या ये स्वर्गवासी देव हैं ? पर नहीं, ये तो मानव-रूप में हैं। अपने मन को मुग्ध करनेवाली किसी वस्तु के अन्वेषण में अनन्यचित्त होकर व्यस्त हैं ।
ये धर्म एवं चारित्र्य को ही सर्वस्व माननेवाले हैं। इनका यहाँ आगमन अन्य किसी उद्देश्य से नहीं हो सकता । ये दोनों ओर किसी ऐसी वस्तु को ढूँढते जा रहे हैं, जो इनके लिए अलभ्य अमृत-सदृश है और बीच में ही खो गई है ।
ये कोप नामक दोष से हीन हैं। करुणा के समुद्र हैं। (पर) हित को छोड़कर दूसरा व्यापार जानते नहीं हैं। ऐसी गंभीर आकृतिवाले हैं कि इन्हें देखकर इन्द्र भी सहम जाय । ऐसे चरित्रवाले हैं कि धर्मदेवता भी इनके सम्मुख परास्त हो जाय और ऐसे पराक्रम-वाले हैं कि यम भी त्रस्त हो जाय ।
अपने उत्तम गुणों के कारण, अपना उपमान स्वयं ही बननेवाले, अन्य उपमान से रहित उस (हनुमान्) ने इस प्रकार अनेक तरह से विचार करके दोनों को ध्यान से देखा । फिर, उनके प्रति अधिक प्रेम (भक्ति) से खड़ा रहा, जैसे वह अपने बिछुड़े हुए प्रियजनों को देख रहा हो ।
फिर, हनुमान् सोचने लगा—बडे सुखवाले, भय-रहित हाथी इनको देखकर ऐसे खड़े हैं, जैसे अपने बच्चों को देख रहे हों (अर्थात्, इनके प्रति प्रेम से भरे हैं)। बिजली को भी (अपनी उज्ज्वलता से) मंद करनेवाले दाँतों से युक्त सिंह, बाघ-जैसे हिंस्र प्राणी भी इनके प्रति आकृष्ट होकर इनके पीछे-पीछे चल रहे हैं। भूत भी उनका आदर करते हुए द्रवितमन हो जाते हैं। तो, उनके संबंध में विविध प्रकार की बातें सोचकर व्याकुल क्यों होना चाहिए ?
मयूर आदि पक्षी भी इनकी मनोहर देह पर धूप लगने से (मन में) पिघल उठते हैं और वितान-जैसे अपने पंखों को फैलाकर और प्राचीर-जैसे उन्हें चारों ओर से घेरकर