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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 549 में से

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पृष्ठ 446
४३८कंब रामायण

साथ-साथ चल रहे हैं। गगन की घटाएँ मंदगति से इनके साथ चलकर, सर्वत्र वर्षा-बिंदुओं को घने रूप में छिड़क रही हैं।

धूप में तपकर आग-जैसे गरम कंकड़, उनके स्वच्छ रक्त-कमल जैसे चरणों का स्पर्श पाते ही मधु-भरे पुष्पों के समान मृदुल हो जाते हैं। जहाँ-जहाँ ये जाते हैं, वहाँ-वहाँ के वृक्ष एवं पौधे वंदना-से करते हुए झुक जाते हैं। अतः, कदाचित् ये ही धर्म-देवता हैं।

अथवा, क्या ये वही भगवान् हैं, जो (जीवों के) मायाजन्य चिरकर्म बंधन को मिटाकर, जन्मदुःख से मुक्त करके, दक्षिण दिशा के यमलोक के बदले उन्हें अपुनरावृत्ति के (मोक्ष के) मार्ग में भेजते हैं ? इन्हें देखकर (मेरे मन में) अपार प्रेम उमड़ रहा है। मेरी हड्डियाँ भी पिघल रही हैं। मेरे मन में इस प्रेम के उत्पन्न होने का क्या कारण है ?

जब सन्मार्गगामी मनवाला हनुमान् इस प्रकार सोच रहा था, तब वे दोनों (राम-लक्ष्मण) उधर ही आ पहुँचे। तब हनुमान् उनके सम्मुख गया और बोला—आपका आगमन शुभप्रद हो ! करुणामूर्त्ति (राम) ने उससे पूछा—तुम कौन हो ? कहाँ से आ रहे हो ? हनुमान् कहने लगा—

हे सजल मेघ-सदृश मनोहर आकारवाले ! स्त्रियों के लिए विष बननेवाले (अर्थात्, स्त्रियों को अपनी ओर आकृष्ट करके उन्हें प्रेम से पीड़ित करनेवाले) तथा हिम से अम्लान रक्त-कमल की समानता करनेवाले प्रफुल्ल नयनों से युक्त ! मैं वायु का पुत्र हूँ और अंजना के गर्भ में उत्पन्न हूँ। मेरा नाम हनुमान् है।

उस (हनुमान्) ने, जिसकी यश का भार वहन करनेवाली भुजाएँ ऐसी हैं कि कुलपर्वत भी उन्हें देखकर लज्जित हो जायें, कहा—हे प्रभु ! इस ऋष्यमूक पर्वत पर रहने-वाले, उज्ज्वल सहस्रकिरण (सूर्य) के पुत्र की सेवा में मैं रहता हूँ। आपको आते हुए देखकर वह व्यग्र हुआ और आपके बारे में जानने के लिए मुझे भेजा है।

(हनुमान् के) वह वचन कहते ही, दृढ धनुर्धारी चक्रवर्त्ती कुमार (राम) ने मन में कुछ विचार करके यह जान लिया कि इस (हनुमान्) से उत्तम और कोई नहीं है। पराक्रम, शास्त्र-संपत्ति, ज्ञान तथा अन्य सभी गुण इसमें अभिन्न रूप में वर्त्तमान हैं। फिर, वे (लक्ष्मण से) बोले—

हे धनुर्भूषित कंधेवाले वीर (लक्ष्मण) ! कोई कला (शास्त्र), समुद्र-सदृश वेद, ऐसा कहीं भी नहीं हैं, जिसे इस (हनुमान्) ने प्रशंसनीय रूप में अधीत न किया हो। इसका गंभीर ज्ञान इसके वचनों से ही प्रकट होता है। मधुर भाषा से संपन्न यह क्या ब्रह्मदेव है ? या वृषभवाहन (शिव) है ? नहीं तो यह कौन है ?

हे भाई ! इसका (यथार्थ) स्वरूप एक साधारण ब्रह्मचारी का नहीं है। किन्तु, मुझे निश्चित रूप से यह ज्ञात हो रहा है कि यह सर्वलोकों के लिए आधार बन सके, ऐसे पराक्रम तथा अत्यधिक महिमा से संपन्न है। इसकी सत्यता तुम आगे देखोगे (पहचानोगे)।

अतिसुन्दर प्रभु (राम) ने इस प्रकार कहा—

और, इस संसार के निवासी मुनियों, तथा (स्वर्ग के निवासी) देवताओं में