कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 447, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४३१
कौन-ऐसा है, जो इसकी जैसी वाक्पटुता रखता हो ? समस्त वेदो में पारगत इस ब्रह्मचारी के वचनो के सम्मुख सर्वश्रेष्ठ त्रिमूत्तियों का महान् कौशल भी कुछ नही है ।
फिर ( रामचन्द्र ने हनुमान् से ) कहा—उस कपिकुलनायक को, जिसके सबध में तुमने कहा है, देखने की इच्छा से ही हम यहाँ आये हैं। यहाँ तुमसे साक्षात् हुआ है। तुम्हारे मधुवचन के सदृश ही, सन्मार्ग पर चलनेवाले मन से युक्त उस ( कपिराज ) को हमे दिखाओ।
( तब हनुमान् ने ये वचन कहे— ) भूधर-सदृश कधोवाले वीरो। इस विशाल धरती पर, जो आठो दिशाओं के ( चक्रवाल ) पर्यन्त-पर्यन्त फैली है, आप लोगो के समान पवित्र कौन हो सकते हैं ? यदि आप ही उस ( कपिराज ) से, बड़े आदर के साथ मिलने आये हैं, तो उसका संयम के साथ अर्जित किया हुआ तप-रूपी धन कितना अत्यधिक है ?
पर्वत से भी अधिक पुष्ट भुजाओवाले ( हे वीरो )। प्रेमहीन इन्द्र-पुत्र ( वाली ) के क्रुद्ध होने से रवि-पुत्र ( सुग्रीव ) एकाकी दुःख भोगता हुआ, निर्झरो से युक्त इस पर्वत पर आकर, मेरे साथ ( छिपकर ) रहता है । अब आप ऐसे आये हैं, जैसे उसकी संपत्ति ही आ गई हो।
( धार्मिक व्यक्ति ) इस विशाल ससार के सब लोगो के सभी अभीष्ट पदार्थों का दान देते हुए यज्ञ करते हैं तथा अन्य ( तप आदि ) कार्य भी करते हैं, इस प्रकार वे अनादि धर्म को स्थिर रखते हैं । किन्तु, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो मारने के लिए यम के समान आये हुए अपने कुल-शत्रु से डरकर, शरण मे आया हो, उसको अभयदान देने से भी श्रेष्ठ धर्म और कोई हो सकता है ?
यह कहना कि आप हमारी रक्षामात्र करेगे, बहुत छोटी-सी बात होगी ; क्योकि आप अपलक देवताओ से लेकर सब चर-अचर पदार्थों से भरे हुए, तीन प्रकार से बने हुए सप्तलोको की भी रक्षा करने मे समर्थ हैं, मुरुगन ( कार्त्तिकेय ) के समान सौंदर्य तथा पराक्रम से युक्त हैं। आपकी शरण में आने से बढ़कर हमारा और क्या भला हो सकता है ?
सत्य ( रूपी शस्य ) के लिए ( उसकी रक्षा करनेवाले ) घेरे के जैसे रहनेवाले उस हनुमान् ने कहा—हे वीर ! अपने नायक को मैं यह बताऊँगा कि आप कौन हैं। अतः, आप हमसे कहें ( कि आप कौन हैं )। तब वीर-ककण से भूषित लक्ष्मण, ठीक विचार करके, किंचित् भी सत्य से स्खलित न होकर, अपना सारा वृत्तान्त स्पष्ट रूप मे कहने लगे—
सूर्यवश में उत्पन्न आर्य चक्रवर्ती, जो एक श्वेतच्छत्रधारी हो, सर्वत्र अपने उज्ज्वल शासन-चक्र को चलाते थे, जिन्होंने अपने पराक्रम से असुरो के प्राण पी डाले थे, अनेक यज्ञो की संपन्न करके स्वर्गलोक पर भी अपना प्रभाव डाला था, जो करुणामय दृष्टि-युक्त थे :
जिन्होंने मेघ के सदृश मद वर्षा करनेवाले, दृढ दंतवाले, लाल बिंदियोवाले पर्वत-सदृश श्रेष्ठ गज पर आरूढ होकर अपने दृढ धनुष को लेकर ऐसा युद्ध किया था, जिससे मदमत्त असुर विध्वस्त हो गये थे, जो सहजात ज्ञान और राजनीति से युक्त थे, जिनकी समता मनुप्रभृति नरेशो में कोई भी नही कर सकता था, ऐसे दशरथ नामक वह ( चक्रवर्ती ) स्वर्ण-प्रासादो तथा विशाल प्राचीरो से शोभायमान अयोध्या के राजा थे।