कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४४० कंब रामायण
उन्हीं चक्रवर्ती के पुत्र हैं, यह तेजस्वी पुरुष, जो अपनी माता (कैकेयी) की आज्ञा से अपने स्वत्वभूत राज्य-संपत्ति को अपने अनुज को प्रेम से देकर बड़े अरण्य में प्रविष्ट हुए हैं, इन पुरुष का नाम है, राम। दीर्घ धनुष के प्रयोग में कुशल इस वीर पुरुष का किंकर हूँ मैं।
इस भाँति, रामचन्द्र के जन्म से प्रारंभ कर रावण के मायामय क्षुद्रकार्य (सीता-हरण) तक की सारी व्यथाएँ, किंचित् भी त्रुटि के बिना, बताईं। सारा वृत्तांत सुनकर वायु-कुमार अत्यंत आनंदित हुआ और (राम के) चरणों पर प्रणत हुआ।
यों उसके प्रणाम करने पर, राम ने उससे कहा—वेद-शास्त्रों के ज्ञाता हे ब्रह्मचारिन्! तुमने यह कैसा अनुचित कार्य किया (ब्राह्मण होकर मुझ क्षत्रिय के चरणों पर क्यों नत हुए)? यह सुनकर बलवान्, सुन्दर तथा विशाल भुजावाले वीर मारुति ने कहा—पंकज-समान रक्तनेत्र तथा चक्रधारी हे वीर! यह दास कपिकुल में उत्पन्न व्यक्ति है।
फिर, धर्म को अनाथ होने से बचानेवाला वह (हनुमान्), अपना वास्तविक रूप लेकर इस प्रकार खड़ा हुआ कि स्वर्णमय मेरु पर्वत भी उसकी भुजाओं की समता नहीं कर सकता था। मानो, वेद तथा शास्त्र ही बड़ा आकार लेकर खड़े हो गये हों। सभी बड़े-बड़े पदार्थ उनके सम्मुख छोटे लगने लगे। तब उसे देखकर विद्युत्-जैसे धनुष को धारण करनेवाले वे वीर (राम-लक्ष्मण) विस्मय करने लगे।
तीनों लोकों को अपने चरण से मापनेवाले पुंडरीक-नयन, चक्रधारी (विष्णु के अवतार, श्रीरामचन्द्र), स्वर्णमय उज्ज्वल कुंडलों से भूषित उसके मुख को नहीं देख पाते थे (अर्थात्, हनुमान् उतना ऊँचा हो गया था)। तो, अब उसके विश्वरूप का वर्णन किस प्रकार कर सकते हैं, जिसने सूर्य से प्राचीन शास्त्रों को अधीत किया था।
ताल से पृथक् हुए कमल-सदृश विशाल नयनवाले राम ने अपने भाई से कहा—हे तात! वह मोक्ष-पद ही इस वानर का रूप लेकर उपस्थित हुआ है, जो क्षुद्र गुणों से रहित होकर (अर्थात्, केवल सत्त्वगुणमय होकर) अमल प्रकाश से युक्त, नित्य वेदों एवं दोष-रहित ज्ञान से भी दुर्ज्ञेय है।
(फिर राम ने लक्ष्मण से कहा—) इस महानुभाव से भेंट हुई। एक अच्छा साधन हमने प्राप्त किया (अर्थात्, सीता के अन्वेषण के लिए अच्छा साधन मिला है)। अब हमारी विपदा मिट जायगी। सुख प्राप्त होगा। हे धनुर्धर! यदि यह महावीर, कपिकुलनायक (सुग्रीव) की आज्ञा का पालक है, तो न जाने वह स्वयं किस प्रकार के प्रभाव से संयुत है।
यों आनंदित होकर, प्रसन्नवदन रहनेवाले, पर्वत-सम पुष्ट कंधोंवाले वीरों (राम-लक्ष्मण) को देखकर वानर-श्रेष्ठ ने निवेदन किया—मैं अभी जाकर उस (सुग्रीव) को ले आता हूँ। हे पराक्रमशीलो! किंचित् समय तक आप यहीं रहें और उनकी अनुमति पाकर वह त्वरित गति से चला गया। (१-३८)