कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३
सख्य पटल
मंदर पर्वत-सदृश भुजाओ तथा दीर्घ यश से युक्त हनुमान् अपने ज्ञान से, मनुवंश में उत्पन्न उस (राम) के सद्गुणो का चिंतन करता हुआ चला और युद्धोचित क्रोधयुक्त राजा (सुग्रीव) के समीप जाकर बोला—मैं, तुम्हारा कुल और यह लोक, तीनो तर गये।
सुरभित हारधारी, अपार बल से संपन्न वाली नामक वीर के प्राण-हरण के लिए काल आ गया है। हम दुःख-सागर के पार पहुँच गये—अंतरिक्षगामी (सूर्य) के पुत्र (सुग्रीव) के प्रति इस प्रकार कहा और हलाहल विष पीनेवाले (रुद्र) के समान अपूर्व नृत्य करने लगा।
वे (राम-लक्ष्मण) इस धरती के रहनेवाले हैं। स्वर्ग के हैं (अर्थात्, सर्वत्र इनका प्रभाव है)। वे (हमारे) मन में रहते हैं, क्रियाओं में रहते हैं, वचनों में रहते हैं और नेत्रों में रहते हैं। वे शत्रुवान् हैं (अर्थात्, उनके कुछ शत्रु भी हैं) और शत्रुओं के द्वारा किये गये अनेक घावों से युक्त लोगों के अपूर्व प्राणों के लिए अमृत-समान भी है।
वे अपने पराक्रम से समस्त लोकों को एकच्छत्र की छाया में लानेवाले विजयी शासक, मुखपट्टधारी हाथियों की सेनावाले राजाओ से वंदित चरणवाले, दशरथ के श्रीकुमार हैं। वे महान् ज्ञानवाले हैं। अतिसुन्दर हैं और अनायास ही तुम्हें अपना राज्य दिलाकर तुम्हारी सहायता कर सकनेवाले हैं।
वे नीतिमान् हैं। मधुर करुणा से भरे हैं। सन्मार्ग से कभी न हटनेवाले हैं। सबसे अधिक महिमावान् हैं। बिना सीखे ही, स्वयं उत्पन्न अपार ज्ञान से संपन्न हैं। महान् कीर्त्तिमान् हैं। गाधिसुत (विश्वामित्र) के द्वारा प्रदत्त समुद्र-सदृश विशाल दिव्य अस्त्र-समुदाय के स्वामी हैं।
(उनमें से ज्येष्ठ वीर ने) बडे क्रोध से युक्त, शूलधारी ताडका को अपने वाण से निहत किया। उसके क्रूर कर्मवाले बेटे (सुबाहु) को मारा। अपने चरण की रज से एक बड़े प्रस्तर के रूप में पड़ी हुई अहल्या को दुष्प्राप्य आत्म-स्वरूप प्रदान किया।
उत्तम सामुद्रिक लक्षणों से युक्त उन वीरों में ज्येष्ठ (राम) ने मिथिला नगरी में जाकर, उस शिवजी के महान् धनुष का भंग किया था, जिन (शिव) ने अंधकार के नाम तक को मिटा देनेवाले उज्ज्वल किरण-समुदाय से युक्त सूर्यदेव के दाँतो को गिरा दिया था।¹
चैमर से शोभायमान अश्ववाले दशरथ का घर प्राप्त करके अपार पातिव्रत्य से संपन्न छोटी माता (कैकेयी) ने उन्हें (राम को) आदेश दिया, तो (उसे मानकर) शंख-भरे समुद्र से घिरी धरती का सारा राज्य अपने छोटे भाई को देकर वे यहाँ आये हैं।
१. यह कहानी पुराण में प्रसिद्ध है कि दक्षयज्ञ के समय शिवजी ने दक्ष को मारकर उसके यज्ञ का विध्वंस किया था और उस यज्ञ में आये सब देवताओ का अपमान किया था। उस समय उन्होंने पूषा (सूर्य) को तमाचा मारकर उसके दाँतों को गिरा दिया था।—अनु०