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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 549 में से

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पृष्ठ 450

४४२ कंब रामायणँ

इस राघव ने, ससार को शत्रुहीन बनानेवाले, ज्वालामय परशु से युक्त उस राम के असीम वल को मिटा दिया। क्रोध करके आक्रमण करनेवाले अंधकार-सदृश क्रूर विराध को मिटा दिया।

समुद्र-जैसी सेनावाले खर आदि करुणाहीन राक्षसो के शिरो को अपने धनुष को झुकाकर (बाणो का प्रयोग कर), काट दिया। वह सब दिशाओ मे रहनेवाले शत्रुओ को मिटानेवाला है। उत्तम देव शकर आदि से भी अधिक पराक्रम से युक्त है।

हे राजन् ! यह (मानव) शरीर धारण कर आया हुआ पुरुष, दिव्य देवताओ से वदित चक्रधारी (विष्णु) ही हैं। तुम उस महानुभाव से मित्रता कर लो। यह मायामृग वनकर आये हुए राक्षस मारीच के लिए भयंकर यम बना था।

जो कबंध अपने दीर्घ करो को सब दिशाओ में फैलाकर, बडे क्रोध के साथ सब प्राणियो का विनाश करता था, उसे मारकर, उसके भारी शरीर को गिराकर, उसी प्रकार उसको मोक्षपद में जाने दिया, जिस प्रकार उसने देवताओ के द्वारा पूजित शबरी को (मोक्ष पद) दिया था। उसकी उस महिमा का वर्णन हम-जैसे लोग किस प्रकार कर सकते हैं?

हे रविकुमार ! मुनि तथा दूसरे लोग अनादिकाल से इनके आगमन के लिए अपनी-अपनी शक्ति-भर तपस्या करते रहे और कर्म-बंधन से मुक्त होकर मोक्षपद को प्राप्त कर गये। मैं कैसे उन (राम-लक्ष्मण) का वखान कर सकता हूँ?

हे प्रभो ! बुद्धिहीन राक्षसराज उनकी पत्नी को माया से हरण कर भयंकर अरण्य-पथ से ले गया। उसी देवी का अन्वेषण करते हुए ये वीर, तुम्हारे सत्कर्म और तुम्हारी निष्कपटता के कारण तुम्हारी मित्रता प्राप्त करने की इच्छा से आये हैं।

हे ज्ञान-संपन्न ! उनकी करुणा हमारी ओर है। हमारे प्रतापवान् शत्रु वाली की मृत्यु निकट आ गई है। अतः, उनसे सख्य करने के लिए चलो—प्रसिद्ध नीतिशास्त्री की रीति को जानकर मंत्रणा देनेवाले (हनुमान्) ने यो कहा।

अपने सूक्ष्म ज्ञान से इस प्रकार के वचनो को ठीक-ठीक विचार कर सुग्रीव ने सब कुछ समझ लिया। फिर, यह कहकर कि हे स्वर्णपुंज-सदृश ! जब तुम मेरे साथी बने हो, तब मेरे लिए कौन-सा कार्य असाध्य है? 'चलो'—यह कहकर अपने ही सदृश रहनेवाले (अर्थात्, पत्नी से वंचित) राम के चरणो के समीप आया।

सूर्यपुत्र ने प्रफुल्ल पकज-पुष्पो से भरे, काले मेघ से ढके हुए और उदीयमान चंद्रमा से शोभित मरकत-गिरि की समता करनेवाले (राम) के उस वदन को, जो सुन्दर कुडलों से रहित होकर भी देखने में अति मनोहर था, तथा उनके शीतल नयनो को देखा।

(सुग्रीव ने राम को) देखा। देखता हुआ देर तक खड़ा रहा और सोचने लगा कि क्या अवर्णनीय कमलासन (ब्रह्मा) की सृष्टि मे रहनेवाले प्राणियो का, आदिकाल से अबतक किया हुआ, समस्त भाग्य पुंजीभूत होकर इन दोनो अत्युन्नत स्कधवाले वीरों के आकार मे उपस्थित हुआ है?

अथवा, देवो के अधिदेव आदि भगवान् (विष्णु) ने ही अपना रूप बदलकर इस अवतार मे मनुष्य-रूप धारण किया है। इस कारण से मनुष्य-जन्म ने गगाधारी जटा-