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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 549 में से

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किष्किन्धाकाण्ड

वाले शिव और ब्रह्मा प्रभृति के दिव्य जन्मों को भी जीत लिया है—यों सुग्रीव ने सोचा ।

इस प्रकार सोचकर, अधिकाधिक उमड़ते हुए प्रेम-रूपी तरंगायमान समुद्र का पार न पाता हुआ, अपने आनन्दपूर्ण नयनयुग्म से उस अनघ राम को देखता हुआ उनके निकट आ पहुँचा । उस महानुभाव ने प्रेम के साथ अपने रक्तकमल-सदृश करों को पसार-कर कहा—यहाँ आकर आराम से बैठो ।

जिसके चित्त ने कामना को समूल मिट दिया था; वह अनघ (राम) तथा कपिकुल के राजा (सुग्रीव), अमावास्या के दिन परस्पर मिले हुए चंद्र तथा सूर्य के सदृश थे, मानों, वे अक्षीण बलवाले राक्षस नामक अंधकार को मिटाकर पुंजीभूत धर्म को सुस्थिर रखने के लिए उपयुक्त समय पर परस्पर मिले हों ।

मित्र बनकर रहनेवाले वे दोनों वीर (राम और सुग्रीव) अभिलषित कार्य की पूर्ति के लिए संयुक्त—पूर्व-अर्जित पुण्य एवं वर्त्तमान में किये जानेवाले प्रयत्न के समान थे और क्रूर राक्षस-रूपी पाप का उन्मूलन करने के लिए सम्मिलित हुए (आचार्यों ने) श्रुत विद्या एवं यथार्थ विवेक के समान थे ।

जब वे दोनों इस प्रकार आसीन हुए, तब सूर्यपुत्र ने रामचन्द्र को देखकर कहा—हे संपन्न ! सब लोकों में अत्युत्तम कहलाने योग्य अनेक सद्गुणों से पूर्ण तुमसे मिलने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ । अतः, मुझसे बढ़कर पापनाशक तपस्या करनेवाले व्यक्ति और कौन हैं ? यदि स्वयं भाग्य ही कुछ देना चाहे, तो उसके लिए असंभव क्या हो सकता है ?

तब राम ने कहा—हे उत्तम ! दोष-रहित तपस्या से संपन्न शबरी ने कहा था कि तुम इस ऋष्यमूक पर्वत पर रहते हो । यह सोचकर कि हमारी बड़ी विपदा तुमसे दूर हो सकती है, हम यहाँ आ पहुँचे हैं । हमारा दुःख तुमसे ही दूर होगा । तब कपिकुल-नायक ने कहा—

मेरा अग्रज मुझे छोटे भाई को मारने के लिए अपने बलिष्ठ कर को ऊपर उठाये दौड़ा और मुझे इस संसार में सर्वत्र और संसार के परे रहनेवाले तपोमय प्रदेश में भी खदेड़ता रहा । तब मैं केवल इस पर्वत को अपना दुर्ग बनाकर बच गया । यहीं पर अपने प्यारे प्राणों को रखे जी रहा हूँ । मैं आपकी शरण में आया हूँ । मेरी रक्षा करना आपका धर्म है ।

तब, उस कपिकुल के राजा को कृपा के साथ देखकर, राम ने ये वचन कहे—तुम्हारे सुख-दुःखों में से जो व्यतीत हो चुके हैं; उन्हें छोड़कर अब आगे होनेवाले तुम्हारे सब दुःखों को मैं दूर करूँगा । अब से होनेवाले सब सुख-दुःख, तुमको और मुझे एक समान होंगे (अर्थात् तुम्हारे सुख-दुःख मेरे सुख-दुःख होंगे) ।

अब अधिक क्या कहूँ ? स्वर्ग में या धरती में, तुमको दुःख देनेवाले मुझे दुःख देनेवाले होंगे । दुष्टजन ही क्यों न हो; यदि वे तुम्हारे मित्र हैं; तो मेरे भी मित्र होंगे । अब से तुम्हारे लोग मेरे लोग हैं । मेरा प्यारे बन्धुवर्ग तुम्हारे भी बन्धु हैं । तुम मेरे प्राण-समान हो ।

तब वानर-सेना यह सोचकर कि अनघ (राम) के वचन सब कुलों के व्यक्तियों के लिए वेदवाक्य से भी अधिक सत्य प्रमाणित होंगे, आनन्द से कोलाहल कर उठी । अंजनि-