कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | कंब रामायण |
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पुत्र की देह पुलकित हो उठी। देवता लोग पुष्प-वर्षा करने लगे। मेघ वर्षा की बूँदें बरसाने लगे।
तब अंजना का सिंह-सदृश पुत्र उठकर (राम के) चरणों पर नत हुआ और निवेदन किया—हे स्तंभ-समान पुष्ट स्कंधवाले चक्रवर्ती कुमार। आपके मित्र (सुग्रीव) और आप चिरकाल तक जीते रहे। इस समय मेरी इच्छा है कि आप दोनों अपने आवास मे (अर्थात्, सुग्रीव के निवास-स्थान में) चलकर आराम से रहे। आपकी इच्छा क्या है। तब राम ने कहा—तुम्हारा विचार उत्तम है।
रविपुत्र चल पड़ा ! दोनों वीर भी चल पड़े। वानर-सिंह (हनुमान्) भी अन्य वानरों के साथ चल पड़ा। तब धर्म-देवता भी उनका अनुसरण करके चल पड़ा और आनंद के साथ उन्हें आशीर्वाद देता रहा। वे लोग पुन्नाग, नरद आदि वृक्षों तथा कमलमय सरोवर से युक्त होने से भोग-भूमि (अर्थात्, स्वर्ग) को भी निंदित कर देनेवाले नवपुष्पों से भरे उद्यान में जा पहुँचे।
(उस उद्यान मे) चंदन और अगरु के वृक्ष अधिक संख्या में थे। स्थान-स्थान पर स्फटिक-शिलाओं के वितान तने हुए थे, जो ऐसे लगते थे, मानो स्वच्छ जल ही खड़ा कर दिया गया हो। नूतन पुष्पों से पूर्ण सरोवरों के दोनों तटों पर, दिव्य सुन्दरता से युक्त वृक्षों से, जलक्रीड़ा करनेवाली अप्सराओं के झूले लग रहे थे—इस प्रकार की शोभा से (वह उद्यान) युक्त था।
वहाँ के रत्नों की कांति के सम्मुख सूर्यांतप और चंद्र की रजत-चन्द्रिका भी उसी प्रकार प्रकाशहीन हो जाती थी, जिस प्रकार प्रगाढ़ शास्त्रज्ञान से युक्त विद्वानों के सम्मुख शास्त्र-ज्ञान से हीन व्यक्ति प्रकाशहीन हो जाते हैं।
इस प्रकार के सुन्दर उद्यान मे, राम-लक्ष्मण तथा कपिराज एक शुद्ध पुष्पमय आसन पर आसीन होकर स्नेहालाप करने लगे।
वानरों ने फल, कंद, शाक तथा अन्य शुद्ध रसों से पूर्ण भोजन ला दिया और पवित्र प्रभु ने स्नान आदि से निवृत्त होने के उपरांत सुखासीन होकर उनका आहार किया।
इस प्रकार, भोजन समाप्त करने के पश्चात्, सत्य स्नेह से पूर्ण होकर वे सुग्रीव के साथ बैठ गये और कुछ समय तक विचार करके सुग्रीव से पूछा—क्या तुम भी गृहस्थ-जीवन के लिए अनुकूल सहायक अपनी पत्नी से वियुक्त हो गये हो ?
जब राम ने ऐसा प्रश्न किया, तब मारुति पर्वत के समान उठ खड़ा हुआ और अपने हाथ जोड़कर (राम से) निवेदन किया—हे स्थिर धर्मवाले । इस दास को कुछ कहना है । आप सावधानी से सुनें।
वाली नामक एक असीम पराक्रमी वानर वीर रहता है जो, चतुर्वेद-रूपी समुद्र के लिए किनारे जैसे रहनेवाले, अनादि (कैलास) पर्वत पर निवास करनेवाले त्रिशूलधारी (शिव) के वर से अत्यन्त प्रबल हो गया है।
वह इतना बलशाली है कि पूर्वकाल में उसने विख्यात देवों तथा असुरों के सम्मुख