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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 453
किष्किन्धाकाण्ड४४५

क्षीरसागर को अकेले ही इस प्रकार मथ डाला था कि घूमनेवाला मंदर पर्वत और वासुकि सर्प के शरीर घिस गये थे।$^१$

पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन—इन चारों भूतों की समस्त शक्ति उस (वाली) मे एकत्र हुई है। वह सप्त समुद्रों से परे स्थित चक्रवाल पर्वत से इस पर्वत तक फाँद सकता है ।

कोई उसके साथ युद्ध करने के लिए उसके निकट आ जाय, तो युद्ध करने के लिए आये हुए व्यक्ति के प्राप्त वरों का अर्धभाग उस (वाली) को प्राप्त हो जाता है।

उस (वाली) के वेग के आगे पवन भी नहीं बह सकता। उसके वक्ष में स्कंद का बरछा भी धँस नहीं सकता। जहाँ वाली की पूँछ चलती है, वहाँ रावण का अधिकार नहीं चल सकता। और, उस रावण की विजय भी उसके सामने कुछ नहीं है।

यदि वह (आक्रमण कर) उठे, तो मेरु आदि पर्वत, सब जड़ से उखड़ जायँ । उसकी विशाल भुजाओं मे विशाल मेघ, आकाश, सूर्य-चंद्र और पर्वत सब छिप जायँ ।

वह आदिवराह, जिसने पूर्वकाल मे भूमि को अपने दत से ऊपर उठाया था, आदिकूर्म, जो क्षीरसागर का मथन करने के लिए उपयुक्त साधन बना था और वह नरसिंह, जिसने अपने नख से हिरण्यकशिपु का वक्ष फाड़ डाला था—वे भी उस वाली की विजयमाला-भूषित भुजाओ से संघर्ष नहीं कर सकते ।

आदिशेष अपने विशाल फनों को फैलाकर, उनपर भूमि का बोझ रखे, (भूमि के) नीचे से इसकी रक्षा कर रहा है। किंतु, इस पर्वत पर निवास करनेवाला (वाली) स्वयं (इस भूमि पर) चलता-फिरता हुआ ही इस (धरती) की रक्षा करता है ।

हे शक्ति तथा विजय से विभूषित ! समुद्र निरंतर गरजता है, पवन बहता है, (द्वादश) सूर्य अपने रथों पर संचरण करते हैं, तो यह सब उस (वाली) के क्रोध का लक्ष्य बन जाने के डर से ही है—अन्य किसी कारण से नहीं ।

हे वदान्य ! उस वाली के जीवित रहते हुए, उसकी अनुमति के बिना यम भी वानरी के प्राण-हरण करने मे डरता है । अतः, पाँच सौ साठ समुद्र$^२$ संख्यावाले वानर, जो


१. तमिल में एक पुराण, कांचीपुराणम्, है। उसमें यह कथा हे कि देव तथा असुर, मंदर पर्वत को मथानी, वासुकि को रस्सी तथा चंद्र को मथानी का चक्राकार आधार बनाकर क्षीरसागर को मथने लगे। किंतु, उसे मथ नहीं सके। इतने में वाली, जो नित्य विभिन्न दिशाओ के समुद्रों में जाकर संध्या आदि नित्यकर्म किया करता था, क्षीर-सागर मे सध्या करने के लिए आया। देवासुरों ने उससे प्रार्थना की कि क्षीरसागर को वह मथे। तब वाली ने अकेले ही एक हाथ से वासुकि का सिर और दूसरे हाथ से उसकी पूँछ पकड़कर क्षीरसागर को मथ डाला। इस घटना का उल्लेख कंबन ने अनेक स्थानों पर किया है।—अनु०
२. एक हाथी, एक रथ, तीन अश्व और पाँच पदातियों का दल एक पंक्ति होता है। तीन पंक्तियों का एक सेनामुख होता है। तीन सेनामुखों का एक गुल्म, तीन गुल्मों का एक गण, तीन गणों की एक वाहिनी, तीन वाहिनियों की एक पृतना, तीन पृतनाओं की एक चमू, तीन चमूओं की एक अनीकिनी, दस अनीकिनियों की एक अक्षौहिणी होती है। आठ अक्षौहिणियों का एक ‘एक’, आठ ‘एक’ की एक कोटि, आठ कोटियों का एक शंख, आठ शंखों का एक बिंद, आठ बिंदुओं का एक कुमुद, आठ कुमुदों का एक पद्म, आठ पद्मो का एक देश तथा आठ देशों का एक समुद्र होता है।—शुक्रनीति