भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 454

४४६

कम्ब रामायण

इतने शक्तिमान् हैं कि मेरु पर्वत को भी ढाहकर गिरा सकते हैं, जीवित रहते हैं।

उस (वाली) से डरकर उसके निवास-स्थान पर मेघ भी नहीं गरजते। क्रूर सिंह अपनी कंदराओं के भीतर भी नहीं गरजते। शक्तिमान् वायु इस डर से नहीं बहता कि कहीं एक छोटा पत्ता न गिर पड़े।

जब वाली ने अपनी पूँछ से बलवान् रावण की पुष्ट भुजाओं को एक साथ बाँध दिया था, तब उस (रावण) के शरीर से जो रक्त बह चला, उसने किस लोक को सिंचित नहीं किया? (अर्थात्, सभी लोकों में रावण का रक्त प्रवाहित हो चला।)

हे पराक्रमशालिन्! इन्द्र का अनुपम पुत्र वह वाली शीतल राकाचन्द्र का-सा रंगवाला है। उसकी आज्ञा का उल्लंघन यम भी नहीं कर सकता। वह इस (सुग्रीव) का अग्रज है।

वह वाली हमारा राजा था और यह (सुग्रीव) युवराज। उस समय एक दिन विद्युत्-जैसे दाँतवाला-एक करवाल-सदृश क्रूर असुर¹ हमारे कुल का शत्रु बनकर आया और वाली पर आक्रमण किया।

युद्ध करता हुआ वह असुर वाली के पराक्रम से भीत होकर भागा और यह सोचकर कि इस धरती पर सजीव रहना असंभव है, एक दुर्गम गुफा में प्रविष्ट होकर पाताल में जा छिपा।

तब क्रोध-पूर्ण वाली, सुग्रीव से यह कहकर उस गुफा में प्रविष्ट हुआ कि हे शक्ति-शालिन्! मैं इस गुफा में प्रविष्ट होकर शीघ्र उस असुर को पकड़ लाऊँगा। तुम इस गुफा के द्वार की रखवाली करते रहो।

गुफा में प्रविष्ट होकर वाली चौदह ऋतुओं (अट्ठाईस मास) तक उस असुर को खोजता रहा और अंत में उसे पाकर उसके साथ युद्ध करता रहा। इधर उसका भाई सुग्रीव व्याकुल हो खड़ा रहा।

रो-रोकर व्याकुल होनेवाले सुग्रीव को देखकर हम सब वानरों ने आदर के साथ उसकी प्रार्थना की, कि हे प्रशंसनीय विजयशालिन्! राज्य करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। अतः, शासन का भार तुम अपने ऊपर लो। यह सुनकर उसने कहा—ऐसा करना अनुचित है।

फिर, यह कहकर कि मैं भी इस गुफा में प्रवेश करूँगा और यदि उस असुर ने मेरे भाई को मार दिया हो, तो मैं उसको मारूँगा, नहीं तो वही युद्ध में मरूँगा—सुग्रीव उस गुफा के भीतर प्रविष्ट होने लगा।

तब वाक्चतुर मंत्रियों ने उसको रोककर बहुत समझाया और उसके दुःख को कम किया। फिर, राज्य का भार इसे दिया। यह सुग्रीव उन वानरों की बात को नहीं टाल सका और किसी-न-किसी प्रकार से राज्य-भार को स्वीकार किया।

उस समय, इस विचार से कि मायावी (नामक वह असुर) कहीं फिर इस बिल से बाहर न आ जाय, हमने, मेरु को छोड़कर, अन्य सब पर्वतों को ला-लाकर उस गुफा के द्वार पर चुन दिये।


१. यह असुर मायावी नामक था।---अनु०