कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
४४२ कंब रामायणँ
इस राघव ने, ससार को शत्रुहीन बनानेवाले, ज्वालामय परशु से युक्त उस राम के असीम वल को मिटा दिया। क्रोध करके आक्रमण करनेवाले अंधकार-सदृश क्रूर विराध को मिटा दिया।
समुद्र-जैसी सेनावाले खर आदि करुणाहीन राक्षसो के शिरो को अपने धनुष को झुकाकर (बाणो का प्रयोग कर), काट दिया। वह सब दिशाओ मे रहनेवाले शत्रुओ को मिटानेवाला है। उत्तम देव शकर आदि से भी अधिक पराक्रम से युक्त है।
हे राजन् ! यह (मानव) शरीर धारण कर आया हुआ पुरुष, दिव्य देवताओ से वदित चक्रधारी (विष्णु) ही हैं। तुम उस महानुभाव से मित्रता कर लो। यह मायामृग वनकर आये हुए राक्षस मारीच के लिए भयंकर यम बना था।
जो कबंध अपने दीर्घ करो को सब दिशाओ में फैलाकर, बडे क्रोध के साथ सब प्राणियो का विनाश करता था, उसे मारकर, उसके भारी शरीर को गिराकर, उसी प्रकार उसको मोक्षपद में जाने दिया, जिस प्रकार उसने देवताओ के द्वारा पूजित शबरी को (मोक्ष पद) दिया था। उसकी उस महिमा का वर्णन हम-जैसे लोग किस प्रकार कर सकते हैं?
हे रविकुमार ! मुनि तथा दूसरे लोग अनादिकाल से इनके आगमन के लिए अपनी-अपनी शक्ति-भर तपस्या करते रहे और कर्म-बंधन से मुक्त होकर मोक्षपद को प्राप्त कर गये। मैं कैसे उन (राम-लक्ष्मण) का वखान कर सकता हूँ?
हे प्रभो ! बुद्धिहीन राक्षसराज उनकी पत्नी को माया से हरण कर भयंकर अरण्य-पथ से ले गया। उसी देवी का अन्वेषण करते हुए ये वीर, तुम्हारे सत्कर्म और तुम्हारी निष्कपटता के कारण तुम्हारी मित्रता प्राप्त करने की इच्छा से आये हैं।
हे ज्ञान-संपन्न ! उनकी करुणा हमारी ओर है। हमारे प्रतापवान् शत्रु वाली की मृत्यु निकट आ गई है। अतः, उनसे सख्य करने के लिए चलो—प्रसिद्ध नीतिशास्त्री की रीति को जानकर मंत्रणा देनेवाले (हनुमान्) ने यो कहा।
अपने सूक्ष्म ज्ञान से इस प्रकार के वचनो को ठीक-ठीक विचार कर सुग्रीव ने सब कुछ समझ लिया। फिर, यह कहकर कि हे स्वर्णपुंज-सदृश ! जब तुम मेरे साथी बने हो, तब मेरे लिए कौन-सा कार्य असाध्य है? 'चलो'—यह कहकर अपने ही सदृश रहनेवाले (अर्थात्, पत्नी से वंचित) राम के चरणो के समीप आया।
सूर्यपुत्र ने प्रफुल्ल पकज-पुष्पो से भरे, काले मेघ से ढके हुए और उदीयमान चंद्रमा से शोभित मरकत-गिरि की समता करनेवाले (राम) के उस वदन को, जो सुन्दर कुडलों से रहित होकर भी देखने में अति मनोहर था, तथा उनके शीतल नयनो को देखा।
(सुग्रीव ने राम को) देखा। देखता हुआ देर तक खड़ा रहा और सोचने लगा कि क्या अवर्णनीय कमलासन (ब्रह्मा) की सृष्टि मे रहनेवाले प्राणियो का, आदिकाल से अबतक किया हुआ, समस्त भाग्य पुंजीभूत होकर इन दोनो अत्युन्नत स्कधवाले वीरों के आकार मे उपस्थित हुआ है?
अथवा, देवो के अधिदेव आदि भगवान् (विष्णु) ने ही अपना रूप बदलकर इस अवतार मे मनुष्य-रूप धारण किया है। इस कारण से मनुष्य-जन्म ने गगाधारी जटा-
किष्किन्धाकाण्ड
वाले शिव और ब्रह्मा प्रभृति के दिव्य जन्मों को भी जीत लिया है—यों सुग्रीव ने सोचा ।
इस प्रकार सोचकर, अधिकाधिक उमड़ते हुए प्रेम-रूपी तरंगायमान समुद्र का पार न पाता हुआ, अपने आनन्दपूर्ण नयनयुग्म से उस अनघ राम को देखता हुआ उनके निकट आ पहुँचा । उस महानुभाव ने प्रेम के साथ अपने रक्तकमल-सदृश करों को पसार-कर कहा—यहाँ आकर आराम से बैठो ।
जिसके चित्त ने कामना को समूल मिट दिया था; वह अनघ (राम) तथा कपिकुल के राजा (सुग्रीव), अमावास्या के दिन परस्पर मिले हुए चंद्र तथा सूर्य के सदृश थे, मानों, वे अक्षीण बलवाले राक्षस नामक अंधकार को मिटाकर पुंजीभूत धर्म को सुस्थिर रखने के लिए उपयुक्त समय पर परस्पर मिले हों ।
मित्र बनकर रहनेवाले वे दोनों वीर (राम और सुग्रीव) अभिलषित कार्य की पूर्ति के लिए संयुक्त—पूर्व-अर्जित पुण्य एवं वर्त्तमान में किये जानेवाले प्रयत्न के समान थे और क्रूर राक्षस-रूपी पाप का उन्मूलन करने के लिए सम्मिलित हुए (आचार्यों ने) श्रुत विद्या एवं यथार्थ विवेक के समान थे ।
जब वे दोनों इस प्रकार आसीन हुए, तब सूर्यपुत्र ने रामचन्द्र को देखकर कहा—हे संपन्न ! सब लोकों में अत्युत्तम कहलाने योग्य अनेक सद्गुणों से पूर्ण तुमसे मिलने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ । अतः, मुझसे बढ़कर पापनाशक तपस्या करनेवाले व्यक्ति और कौन हैं ? यदि स्वयं भाग्य ही कुछ देना चाहे, तो उसके लिए असंभव क्या हो सकता है ?
तब राम ने कहा—हे उत्तम ! दोष-रहित तपस्या से संपन्न शबरी ने कहा था कि तुम इस ऋष्यमूक पर्वत पर रहते हो । यह सोचकर कि हमारी बड़ी विपदा तुमसे दूर हो सकती है, हम यहाँ आ पहुँचे हैं । हमारा दुःख तुमसे ही दूर होगा । तब कपिकुल-नायक ने कहा—
मेरा अग्रज मुझे छोटे भाई को मारने के लिए अपने बलिष्ठ कर को ऊपर उठाये दौड़ा और मुझे इस संसार में सर्वत्र और संसार के परे रहनेवाले तपोमय प्रदेश में भी खदेड़ता रहा । तब मैं केवल इस पर्वत को अपना दुर्ग बनाकर बच गया । यहीं पर अपने प्यारे प्राणों को रखे जी रहा हूँ । मैं आपकी शरण में आया हूँ । मेरी रक्षा करना आपका धर्म है ।
तब, उस कपिकुल के राजा को कृपा के साथ देखकर, राम ने ये वचन कहे—तुम्हारे सुख-दुःखों में से जो व्यतीत हो चुके हैं; उन्हें छोड़कर अब आगे होनेवाले तुम्हारे सब दुःखों को मैं दूर करूँगा । अब से होनेवाले सब सुख-दुःख, तुमको और मुझे एक समान होंगे (अर्थात् तुम्हारे सुख-दुःख मेरे सुख-दुःख होंगे) ।
अब अधिक क्या कहूँ ? स्वर्ग में या धरती में, तुमको दुःख देनेवाले मुझे दुःख देनेवाले होंगे । दुष्टजन ही क्यों न हो; यदि वे तुम्हारे मित्र हैं; तो मेरे भी मित्र होंगे । अब से तुम्हारे लोग मेरे लोग हैं । मेरा प्यारे बन्धुवर्ग तुम्हारे भी बन्धु हैं । तुम मेरे प्राण-समान हो ।
तब वानर-सेना यह सोचकर कि अनघ (राम) के वचन सब कुलों के व्यक्तियों के लिए वेदवाक्य से भी अधिक सत्य प्रमाणित होंगे, आनन्द से कोलाहल कर उठी । अंजनि-
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पुत्र की देह पुलकित हो उठी। देवता लोग पुष्प-वर्षा करने लगे। मेघ वर्षा की बूँदें बरसाने लगे।
तब अंजना का सिंह-सदृश पुत्र उठकर (राम के) चरणों पर नत हुआ और निवेदन किया—हे स्तंभ-समान पुष्ट स्कंधवाले चक्रवर्ती कुमार। आपके मित्र (सुग्रीव) और आप चिरकाल तक जीते रहे। इस समय मेरी इच्छा है कि आप दोनों अपने आवास मे (अर्थात्, सुग्रीव के निवास-स्थान में) चलकर आराम से रहे। आपकी इच्छा क्या है। तब राम ने कहा—तुम्हारा विचार उत्तम है।
रविपुत्र चल पड़ा ! दोनों वीर भी चल पड़े। वानर-सिंह (हनुमान्) भी अन्य वानरों के साथ चल पड़ा। तब धर्म-देवता भी उनका अनुसरण करके चल पड़ा और आनंद के साथ उन्हें आशीर्वाद देता रहा। वे लोग पुन्नाग, नरद आदि वृक्षों तथा कमलमय सरोवर से युक्त होने से भोग-भूमि (अर्थात्, स्वर्ग) को भी निंदित कर देनेवाले नवपुष्पों से भरे उद्यान में जा पहुँचे।
(उस उद्यान मे) चंदन और अगरु के वृक्ष अधिक संख्या में थे। स्थान-स्थान पर स्फटिक-शिलाओं के वितान तने हुए थे, जो ऐसे लगते थे, मानो स्वच्छ जल ही खड़ा कर दिया गया हो। नूतन पुष्पों से पूर्ण सरोवरों के दोनों तटों पर, दिव्य सुन्दरता से युक्त वृक्षों से, जलक्रीड़ा करनेवाली अप्सराओं के झूले लग रहे थे—इस प्रकार की शोभा से (वह उद्यान) युक्त था।
वहाँ के रत्नों की कांति के सम्मुख सूर्यांतप और चंद्र की रजत-चन्द्रिका भी उसी प्रकार प्रकाशहीन हो जाती थी, जिस प्रकार प्रगाढ़ शास्त्रज्ञान से युक्त विद्वानों के सम्मुख शास्त्र-ज्ञान से हीन व्यक्ति प्रकाशहीन हो जाते हैं।
इस प्रकार के सुन्दर उद्यान मे, राम-लक्ष्मण तथा कपिराज एक शुद्ध पुष्पमय आसन पर आसीन होकर स्नेहालाप करने लगे।
वानरों ने फल, कंद, शाक तथा अन्य शुद्ध रसों से पूर्ण भोजन ला दिया और पवित्र प्रभु ने स्नान आदि से निवृत्त होने के उपरांत सुखासीन होकर उनका आहार किया।
इस प्रकार, भोजन समाप्त करने के पश्चात्, सत्य स्नेह से पूर्ण होकर वे सुग्रीव के साथ बैठ गये और कुछ समय तक विचार करके सुग्रीव से पूछा—क्या तुम भी गृहस्थ-जीवन के लिए अनुकूल सहायक अपनी पत्नी से वियुक्त हो गये हो ?
जब राम ने ऐसा प्रश्न किया, तब मारुति पर्वत के समान उठ खड़ा हुआ और अपने हाथ जोड़कर (राम से) निवेदन किया—हे स्थिर धर्मवाले । इस दास को कुछ कहना है । आप सावधानी से सुनें।
वाली नामक एक असीम पराक्रमी वानर वीर रहता है जो, चतुर्वेद-रूपी समुद्र के लिए किनारे जैसे रहनेवाले, अनादि (कैलास) पर्वत पर निवास करनेवाले त्रिशूलधारी (शिव) के वर से अत्यन्त प्रबल हो गया है।
वह इतना बलशाली है कि पूर्वकाल में उसने विख्यात देवों तथा असुरों के सम्मुख
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क्षीरसागर को अकेले ही इस प्रकार मथ डाला था कि घूमनेवाला मंदर पर्वत और वासुकि सर्प के शरीर घिस गये थे।$^१$
पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन—इन चारों भूतों की समस्त शक्ति उस (वाली) मे एकत्र हुई है। वह सप्त समुद्रों से परे स्थित चक्रवाल पर्वत से इस पर्वत तक फाँद सकता है ।
कोई उसके साथ युद्ध करने के लिए उसके निकट आ जाय, तो युद्ध करने के लिए आये हुए व्यक्ति के प्राप्त वरों का अर्धभाग उस (वाली) को प्राप्त हो जाता है।
उस (वाली) के वेग के आगे पवन भी नहीं बह सकता। उसके वक्ष में स्कंद का बरछा भी धँस नहीं सकता। जहाँ वाली की पूँछ चलती है, वहाँ रावण का अधिकार नहीं चल सकता। और, उस रावण की विजय भी उसके सामने कुछ नहीं है।
यदि वह (आक्रमण कर) उठे, तो मेरु आदि पर्वत, सब जड़ से उखड़ जायँ । उसकी विशाल भुजाओं मे विशाल मेघ, आकाश, सूर्य-चंद्र और पर्वत सब छिप जायँ ।
वह आदिवराह, जिसने पूर्वकाल मे भूमि को अपने दत से ऊपर उठाया था, आदिकूर्म, जो क्षीरसागर का मथन करने के लिए उपयुक्त साधन बना था और वह नरसिंह, जिसने अपने नख से हिरण्यकशिपु का वक्ष फाड़ डाला था—वे भी उस वाली की विजयमाला-भूषित भुजाओ से संघर्ष नहीं कर सकते ।
आदिशेष अपने विशाल फनों को फैलाकर, उनपर भूमि का बोझ रखे, (भूमि के) नीचे से इसकी रक्षा कर रहा है। किंतु, इस पर्वत पर निवास करनेवाला (वाली) स्वयं (इस भूमि पर) चलता-फिरता हुआ ही इस (धरती) की रक्षा करता है ।
हे शक्ति तथा विजय से विभूषित ! समुद्र निरंतर गरजता है, पवन बहता है, (द्वादश) सूर्य अपने रथों पर संचरण करते हैं, तो यह सब उस (वाली) के क्रोध का लक्ष्य बन जाने के डर से ही है—अन्य किसी कारण से नहीं ।
हे वदान्य ! उस वाली के जीवित रहते हुए, उसकी अनुमति के बिना यम भी वानरी के प्राण-हरण करने मे डरता है । अतः, पाँच सौ साठ समुद्र$^२$ संख्यावाले वानर, जो
१. तमिल में एक पुराण, कांचीपुराणम्, है। उसमें यह कथा हे कि देव तथा असुर, मंदर पर्वत को मथानी, वासुकि को रस्सी तथा चंद्र को मथानी का चक्राकार आधार बनाकर क्षीरसागर को मथने लगे। किंतु, उसे मथ नहीं सके। इतने में वाली, जो नित्य विभिन्न दिशाओ के समुद्रों में जाकर संध्या आदि नित्यकर्म किया करता था, क्षीर-सागर मे सध्या करने के लिए आया। देवासुरों ने उससे प्रार्थना की कि क्षीरसागर को वह मथे। तब वाली ने अकेले ही एक हाथ से वासुकि का सिर और दूसरे हाथ से उसकी पूँछ पकड़कर क्षीरसागर को मथ डाला। इस घटना का उल्लेख कंबन ने अनेक स्थानों पर किया है।—अनु०
२. एक हाथी, एक रथ, तीन अश्व और पाँच पदातियों का दल एक पंक्ति होता है। तीन पंक्तियों का एक सेनामुख होता है। तीन सेनामुखों का एक गुल्म, तीन गुल्मों का एक गण, तीन गणों की एक वाहिनी, तीन वाहिनियों की एक पृतना, तीन पृतनाओं की एक चमू, तीन चमूओं की एक अनीकिनी, दस अनीकिनियों की एक अक्षौहिणी होती है। आठ अक्षौहिणियों का एक ‘एक’, आठ ‘एक’ की एक कोटि, आठ कोटियों का एक शंख, आठ शंखों का एक बिंद, आठ बिंदुओं का एक कुमुद, आठ कुमुदों का एक पद्म, आठ पद्मो का एक देश तथा आठ देशों का एक समुद्र होता है।—शुक्रनीति
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कम्ब रामायण
इतने शक्तिमान् हैं कि मेरु पर्वत को भी ढाहकर गिरा सकते हैं, जीवित रहते हैं।
उस (वाली) से डरकर उसके निवास-स्थान पर मेघ भी नहीं गरजते। क्रूर सिंह अपनी कंदराओं के भीतर भी नहीं गरजते। शक्तिमान् वायु इस डर से नहीं बहता कि कहीं एक छोटा पत्ता न गिर पड़े।
जब वाली ने अपनी पूँछ से बलवान् रावण की पुष्ट भुजाओं को एक साथ बाँध दिया था, तब उस (रावण) के शरीर से जो रक्त बह चला, उसने किस लोक को सिंचित नहीं किया? (अर्थात्, सभी लोकों में रावण का रक्त प्रवाहित हो चला।)
हे पराक्रमशालिन्! इन्द्र का अनुपम पुत्र वह वाली शीतल राकाचन्द्र का-सा रंगवाला है। उसकी आज्ञा का उल्लंघन यम भी नहीं कर सकता। वह इस (सुग्रीव) का अग्रज है।
वह वाली हमारा राजा था और यह (सुग्रीव) युवराज। उस समय एक दिन विद्युत्-जैसे दाँतवाला-एक करवाल-सदृश क्रूर असुर¹ हमारे कुल का शत्रु बनकर आया और वाली पर आक्रमण किया।
युद्ध करता हुआ वह असुर वाली के पराक्रम से भीत होकर भागा और यह सोचकर कि इस धरती पर सजीव रहना असंभव है, एक दुर्गम गुफा में प्रविष्ट होकर पाताल में जा छिपा।
तब क्रोध-पूर्ण वाली, सुग्रीव से यह कहकर उस गुफा में प्रविष्ट हुआ कि हे शक्ति-शालिन्! मैं इस गुफा में प्रविष्ट होकर शीघ्र उस असुर को पकड़ लाऊँगा। तुम इस गुफा के द्वार की रखवाली करते रहो।
गुफा में प्रविष्ट होकर वाली चौदह ऋतुओं (अट्ठाईस मास) तक उस असुर को खोजता रहा और अंत में उसे पाकर उसके साथ युद्ध करता रहा। इधर उसका भाई सुग्रीव व्याकुल हो खड़ा रहा।
रो-रोकर व्याकुल होनेवाले सुग्रीव को देखकर हम सब वानरों ने आदर के साथ उसकी प्रार्थना की, कि हे प्रशंसनीय विजयशालिन्! राज्य करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। अतः, शासन का भार तुम अपने ऊपर लो। यह सुनकर उसने कहा—ऐसा करना अनुचित है।
फिर, यह कहकर कि मैं भी इस गुफा में प्रवेश करूँगा और यदि उस असुर ने मेरे भाई को मार दिया हो, तो मैं उसको मारूँगा, नहीं तो वही युद्ध में मरूँगा—सुग्रीव उस गुफा के भीतर प्रविष्ट होने लगा।
तब वाक्चतुर मंत्रियों ने उसको रोककर बहुत समझाया और उसके दुःख को कम किया। फिर, राज्य का भार इसे दिया। यह सुग्रीव उन वानरों की बात को नहीं टाल सका और किसी-न-किसी प्रकार से राज्य-भार को स्वीकार किया।
उस समय, इस विचार से कि मायावी (नामक वह असुर) कहीं फिर इस बिल से बाहर न आ जाय, हमने, मेरु को छोड़कर, अन्य सब पर्वतों को ला-लाकर उस गुफा के द्वार पर चुन दिये।
१. यह असुर मायावी नामक था।---अनु०
किष्किन्धाकाण्ड २२९
इस प्रकार, उस गुफा को सुरक्षित करके हम ऋक्षराज के पुत्र के साथ इस पर्वत पर रहने लगे । तब वाली उस मायावी के प्राण पीकर—
उन प्राणों को पीने से उत्पन्न नशे से मत्त होकर लौटा । गुफा-द्वार पर (अपने भाई को ) पुकारता रहा । किन्तु, कोई उत्तर न पाकर वह सोचता हुआ कि मेरा भाई भी मेरी रखवाली कर रहा है, अत्यन्त क्रुद्ध हुआ ।
फिर, उस (वाली) ने अपनी पूँछ उठाई और अपने पैरों को उठाकर ऐसा आघात किया, जैसे प्रमंजन वज्र उठा हो । तब (गुफा के द्वार पर रखे ) सब पर्वत आकाश में उड़कर समुद्र में जा गिरे ।
वाली (उस गुफा से ) बाहर निकलकर सबको भयभीत करनेवाले क्रोध से मत्त हुआ इस पर्वत के ऊँचे शिखर पर आ पहुँचा, तब सत्य-मार्ग पर चलनेवाले और कपटहीन इन सूर्यपुत्र ने उसके समीप आकर उसके चरणों को नमस्कार किया ।
प्रणाम करके वाली से सुग्रीव ने कहा—हे अग्रज ! हे प्रभु ! बहुत दिनों तक तुम्हारे न लौटने पर मैं बहुत चिंतित हुआ और तुम्हारे निकट आना चाहता था । किन्तु, तुम्हारी प्रजा ने इससे सहमत न होकर कहा कि राज्य पर शासन करना ही मेरा कर्त्तव्य है ।
हे आभरणों से भूषित भुजावाले ! प्रजा की आज्ञा मानकर, राज्यभार वहन करता हुआ मैं निर्लज्ज-सा जीवित रहता हूँ । तुम मेरे इस अपराध को क्षमा करो । सुग्रीव का कथन सुनकर वैरभाव से भरे हुए वाली ने अत्यंत क्रोध के साथ अनेक निष्ठुर वचन कहे।
बलिष्ठ भुजाओं से युक्त उस (वाली ) से हम सब वानर यों डरने लगे कि हमारी आँतों में हलचल मच गई । पूर्वकाल में समुद्र को मथनेवालों ने अपने करों से सुग्रीव को मार-पीटा, जिससे यह बहुत पीडित हुआ ।
यह बहुत पीडित होकर सात समुद्रों के पार, ब्रह्मांड की बाहरी सीमा की दीवार पर जा पहुँचा । पीडा-हीन वाली भी पवन के समान इसके पीछे चलकर सप्त समुद्रों को सिंह के समान फाँद गया ।
वायुपुत्र के इस प्रकार कहने पर, प्रभु कह उठे—अच्छा ! अति वेग से पीछा करनेवाले वाली के आगे-आगे भागनेवाला सुग्रीव वाली से भी अधिक वेग से फाँद सकता था।
वीर-कवचधारी कृपामूत्ति (राम) ने अपने भाई लक्ष्मण-समेत इस प्रकार आश्चर्य करते हुए फिर कहा—इन दोनों वीरों ने आगे क्या किया; सुनाओ । तब विनय से भूषित मारुति कहने लगा—
सुग्रीव मकरों से भरे सातों समुद्रों के पार चला गया । किन्तु, उस चक्रवाल पर्वत को भी जहाँ सूर्य की रक्तिम किरण भी नहीं पहुँचती है, पारकर वह (वाली,) वहाँ आ गया और सुग्रीव को पकड़ लिया ।
भाई को पीड़ित करने के अपवाद से न डरकर उसने सुग्रीव को अपने क्रूर करों से मारने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया । किन्तु, सुग्रीव मौका पाकर झट वहाँ से निकल भागा ।
हे प्रभु ! यदि वह (वाली) क्रोध करके दाँत पीसे, तो यम को भी सुरक्षित रहने
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के लिए कोई स्थान नही मिलेगा। तो भी (वाली के प्रति) पूर्व में दिये गये एक शाप के कारण यह (सुग्रीव) इस पर्वत पर आकर बच गया।
हे भगवन् ! इसके स्वत्व को तथा दुर्लभ अमृत-समान इसकी पत्नी को भी उसने छीन लिया। यह, राज्य और पत्नी दोनों से एक साथ वंचित हो गया। यही सारा वृत्तांत है।—यों हनुमान् ने कहा।
असत्य-हीन (हनुमान्) ने जब सारा वृत्तांत कह सुनाया, तब सहस्र नामयुक्त उस अमल प्रभु के समस्त लोकों को (प्रलय-काल में) निगलनेवाले मुख का अधर फड़क उठा। नेत्र-रूपी कमल रक्तकुमुद के समान लाल हो उठे।
अनेक अंगों से युक्त वेदी को अधिगत करनेवाले ब्रह्मा, पंचमुख (रुद्र) तथा अन्य देव, अपने बाहर और अन्तर में खोजकर भी जिसे पा नही सकते, वह भगवान् यदि अपने सुन्दर पद-कमलों को दुखाकर और उन्हें अधिक लाल करते हुए इस धरती पर अवतीर्ण होता है, तो यह धर्म की रक्षा तथा अधर्म का विनाश करने के लिए ही तो है?
करुणाहीन विमाता के कहने पर जिस प्रभु ने अपने स्वत्वभूत राज्य को, रत्न-भूषित पुष्ट भुजावाले अपने भाई को दे दिया, वे यह सुनकर भी कि एक निष्ठुर व्यक्ति ने अपने कनिष्ठ भ्राता की पत्नी का अपहरण किया है, कैसे चुप रह सकते हैं?
प्रभु ने सुग्रीव से कहा—चौदहों भुवनों के सब प्राणी भी उस (वाली) के प्राणों को बचाने के लिए आये, तो भी मैं अपने धनुष से प्रयुक्त शर से उसे मार दूँगा और तुम्हारे राज्य के साथ तुम्हारी पत्नी को भी तुम्हें दिला दूँगा। हे विज्ञ ! दिखाओ, वह कहाँ रहता है।
यह सुनकर सुग्रीव (बहुत आनन्दित हुआ), मानों वह महान् आनन्द-रूपी समुद्र की बड़ी-बड़ी तरंगों के उमड़ उठने से, दुःख-रूपी समुद्र के किनारे पर आ लगा हो। उसने यह सोचकर कि वाली की शक्ति अब समाप्त हुई, आदर के साथ (वाली-वध की) प्रतिज्ञा करनेवाले महावीर से कहा—पहले हमें कुछ विचार करना है।
उसके पश्चात् सूर्यपुत्र, विद्या, विवेक नीति, मंत्रणा आदि में कुशल हनुमान् आदि के साथ पृथक् रहकर कुछ मंत्रणा करने लगा। उस समय पवनपुत्र ने कहा—
हे शक्तिशालिन् ! तुम्हारे मनोभाव को मै समझ गया। तुम शंका कर रहे हो कि उस (वाली) को यम के मुँह में भेजने की शक्ति इन वीरों में है या नही। मेरे वचन को ध्यान से सुनो। फिर, वह कहने लगा—
(श्रीराम चन्द्र के) विशाल हाथों और चरणों में शंख और चक्र के चिह्न हैं। इनके जैसे उत्तम लक्षण कही किसी में नहीं हैं। अरुणनयन और धनुर्धारी श्रीराम, धर्म की रक्षा करने के लिए धरती पर अवतीर्ण, लक्ष्मी के वल्लभ विष्णु ही हैं।
जिन शिवजी ने लोककंटक तथा अतिशक्तिशाली त्रिपुरासुरों को अपने क्रोध की अग्नि से जला दिया था और निष्ठुर क्रोध से युक्त काल को भी अपने पद के आघात¹ से
१. इस पद्य में मार्कण्डेय के जीवन की ओर संकेत है। मार्कण्डेय शिवभक्त था, किंतु उसकी आयु की अवधि सोलह वर्ष की ही थी। जब काल उसके प्राण-हरण करने के लिए आया, तब वह शिवलिंग का आलिंगन करके शिव के ध्यान में निमग्न हो गया। काल उसको पाश से खींचने लगा, तो शिवजी ने क्रुद्ध होकर उसे पदाघात से हटा दिया और मार्कण्डेय को अमर कर दिया।—अनु०
किष्किन्धाकाण्ड २२६
दूर हटा दिया था; उनके हस्त के स्वर्णमय अनुपम धनुष को तोड़ देना उस विष्णु के अति- रिक्त अन्य किसी के लिए संभव नहीं था। हे राजन् ! मेरे पिता ने मुझसे कहा था—'तुम इस संसार के सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा की भी सृष्टि करनेवाले भगवान् (विष्णु) की सेवा करोगे। वह सेवा ही उत्तम तपस्या है। हे तात ! उससे मेरा (पिता का) भी बड़ा हित होगा। यह श्रीराम ही वह भगवान् हैं- इसका और भी एक प्रमाण है। मैंने अपने पिता से पूछा था—'तुम्हारे कथित उस भगवान् के अवतार को मैं कैसे पहचान सकूँगा ? तब मेरे पिता ने कहा था—'जब समस्त लोकों को विपदा उत्पन्न होगी, तब वह भगवान् अवतार लेंगे। उसे देखते ही तुम्हारे मन में उसके प्रति प्रेम (भक्ति) उत्पन्न होगा। यही उसे पहचानने का प्रमाण होगा। हे स्वामिन् ! इसी वीर को देखते ही (मेरे मन में ऐसा प्रेम उमड़ा; जिससे) मेरी अस्थियाँ भी गल गईं, जिससे उनका रूप तक पहचानने में नहीं आया। फिर, और क्या शंका हो सकती है ? हे उत्तम ! यदि तुम अब भी उस वीर (श्रीराम) के अपार पराक्रम की परीक्षा करके देखना चाहते हो, तो उसके लिए एक उपाय है। वह यह—अतिविशाल सप्त साल- वृक्ष, जो एक ही पंक्ति में खड़े हैं, उनको एक ही शर से वह वीर छेद डाले। यह सुनकर सुग्रीव आनंदित हुआ और कहा—'अच्छा ! अच्छा। उसने अपने हाथी मान्दति की पर्वतों को भी लज्जित करनेवाली दोनों भुजाओं का आलिंगन कर लिया। फिर, श्रीरामचन्द्र के निकट जाकर कहा—'आपसे मेरा एक निवेदन है। श्रीरामचन्द्र ने वह सुनकर कहा—'कहो; क्या कहना चाहते हो ? (१-२४)
अध्याय ४
सालवृक्ष-छेदन पटल
सुग्रीव, यह कहता हुआ कि इस ओर से जाना है; इधर से आइए (राम को) ले चला और (सालवृक्षों के निकट जाकर) कहा—'गगन को छूनेवाले, आकाश छोटा करते हुए, शाखाओं को फैलाकर खड़े रहनेवाले सात सालवृक्षों को एक ही शर से आप छेद डालें, तो मेरे मन की व्याकुलता दूर होगी। उस निष्कलंक (सुग्रीव) के यह कहने पर देवताओं के प्रभु (राम) उसका विचार जानकर मुस्करा उठे। फिर, अपने विशाल करों से अपने धनुष पर डोरी चढ़ाई। और कल्पना से भी दुर्जेय उन सालवृक्षों के समीप गये। वे वृक्ष ऐसे थे कि प्रलय-काल में भी अपने स्थान से विचलित नहीं होनेवाले थे। जब सब लोक विध्वस्त हो जाते थे, तब भी खड़े रहनेवाले थे। मानो, धरती का आधार बने हुए सातों कुलपर्वत वहाँ आकर एक साथ खड़े हो गये हों।
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कमल पर आसीन रहनेवाले ब्रह्मदेव भी उन वृक्षों के बारे में इतना ही कह सकता था कि 'षोडश कलावाले चंद्रमा और सहस्र किरणवाले (सूर्य) को भी उन वृक्षों के शिखरों को पार करके जाने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। मैंने अत्युन्नत उन पर्वतों¹ के डालों को ही देखा है।' इनके अतिरिक्त (वह ब्रह्मा भी) यह नहीं कह सकता था कि मैंने (उन वृक्षों के) पत्ते देखे हैं।
नित्य एक समान वेग से दौड़ते रहनेवाले सूर्य के रथ के घोड़े अन्यत्र कहीं अपनी थकावट मिटा पाते हों—यह हम नहीं जानते, किंतु (इतना हम जानते हैं कि) वे घोड़े आकाश में चारों ओर व्याप्त इन वृक्षों की शाखाओं के बीच से होकर जाते समय इनकी शीतल छाया में अपनी थकावट दूर कर लेते हैं।
वे वृक्ष इतने ऊँचे थे कि नक्षत्र तथा ग्रह, उन (वृक्षों) की शाखाओं में लगे पुष्पों-जैसे थे। आकाशगामी धवल चंद्रमा में जो कलंक है, वह इन वृक्षों की शाखाओं की रगड़ लगने से ही उत्पन्न चिह्न है, यों कह सकते हैं।
वे वृक्ष अनश्वर विशाल शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होने के कारण वेदों के समान थे। स्वर्ग से भी ऊँचे थे। ब्रह्मांड की सृष्टि करनेवाले उस (ब्रह्मा) का वाहन हंस अपनी हंसिनी के साथ इन वृक्षों में ही निवास करता था।
पवन के चलने पर उन वृक्षों के सुगंधित पत्र, पुष्प, फल इत्यादि विविध वस्तुएँ धरती पर नहीं गिरती थीं, कोलाहलयुक्त विशाल आकाशगंगा में गिरती थीं और तरंगायित समुद्र में जाकर मिलती थीं।
उन वृक्षों के शिखर, चतुर्वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा के अंडगोल से भी परे बढ़े हुए थे। अतः, वे अनंत विष्णु भगवान् की समानता करते थे। वे जल-मध्य-स्थित धरती पर जो मेरुपर्वत खड़ा है, उससे भी अधिक भारी थे।
उन वृक्षों में हीर (निर्याम) उसी प्रकार फैला था, जिस प्रकार इंद्रकुमार वाली और उसके भाई के हृदयों में परस्पर वैर फैला था। उनकी जड़ें, जल-मध्य-स्थित पृथ्वी को ढोनेवाले शेषनाग के रजत-जैसे धवल फनों को भी चीरकर नीचे चली गई थीं।
उनकी शाखाएँ सब दिशाओं को नापती थीं, जिससे देवों को यह आशंका होती थी कि कदाचित् सूर्य का मार्ग ही न रुक जाय। वे वृक्ष सूर्य-चंद्र जहाँ संचरण करते हैं, उन पर्वतों से भी (मेरुपर्वत अथवा उदयगिरि या अस्ताचल) ऊँचे थे। किसी भी दृष्टि से वे वृक्ष उनसे कम नहीं थे और एक दूसरे से अनेक योजन दूर पर खड़े थे।
अमल (श्रीराम) ने उन वृक्षों को ध्यान से देखा और दीर्घ बाण को छोड़ने के लिए धनुष की डोरी से ऐसा टंकार किया कि देवलोक और दिशाएँ बधिर हो गईं। देवों को ऐसा भय उत्पन्न हुआ, जैसा पहले कभी नहीं हुआ था।
वह टंकार-ध्वनि सब लोकों में एक समान व्याप्त हो गई। उस समय समीप में खड़े रहनेवालों की क्या दशा हुई—यह कैसे कहें ? उस ध्वनि से दिग्गज मूच्छित हो गये और दिशाएँ व्याकुल हो उठीं। उस ध्वनि से मर्त्यलोक भी काँप उठा।
१. वे वृक्ष इतने विशाल थे कि वे पर्वत-जैसे लगते थे ।—अनु०
किष्किन्धाकाण्ड ४५१
ज्यों ही उस अरिंदम (राम) के धनुष की ध्वनि हुई, त्यों ही देवता इस भय से त्रस्त होकर भागे कि कहीं प्रलय-काल ही तो नही आ गया। भक्तिपूर्ण कनिष्ठ प्रभु (लक्ष्मण) ही उन (राम) के समीप दृढ खड़े रह सके। यदि दूसरे लोगो की दशा का वर्णन करने लगेंगे, तो उन सबकी बदनामी होगी।
असत्य-रहित मारुति आदि वीर यह सोचकर कि राम का शर-प्रयोग हमे अवश्य देखना चाहिए, किसी प्रकार उनके निकट आकर उपस्थित रहे। तब कुशल धनुर्धारी (राम) ने दृढ तथा दीर्घ कोदंड में लगी डोरी को भली भाँति खींचकर शर का संधान किया।
वह राम-बाण, सातों सालवृक्षो का भेदकर चला। नीचे रहनेवाले सातों लोको को भेदकर चला। फिर, उनसे आगे सप्त-संख्या से युक्त किसी वस्तु के न होने से लौट आया। अब भी यदि वह बाण सप्त संख्यावाली किसी वस्तु को देखे, तो उसे छेदे बिना नहीं रहेगा।
सप्त समुद्र, ऊपर के सप्त लोक, सप्त कुलपर्वत, सप्त ऋषि, सप्त अश्व और सप्त कन्याएँ भी यह आशंका कर काँप उठी कि कदाचित् सप्त संख्या का कोई भी पदार्थ इस बाण का लक्ष्य हो सकता है।
ऐसा भय होने पर भी सब लोग, श्रीराम के उस स्वभाव को जानकर स्वस्थ हुए, जो धर्म के आधारभूत सभी पदार्थों को सुरक्षित रखता है। तब सूर्यकुमार ने स्वर्णमय वीर-कंकणों से भूषित श्रीराम के चरणो को अपने शिर पर रखकर ये वचन कहे—
तुम पृथ्वी हो, आकाश हो, अन्य सब भूत हो, पंकज से उत्पन्न देव (ब्रह्मा) हो, क्षीरशायी भगवान् हो, पापो का विनाश करनेवाले सद्धर्म के देवता हो। तुमने आदिकाल में लोको को उत्पन्न किया। अब मुझ श्वान-जैसे दास को तारने के लिए यहाँ आये हो।
हे राजाओ के अधिराज! मेरे पूर्वपुण्यो ने ही तुम्हे यहाँ लाकर मेरी सहायता की है। तुम मातृ-सदृश प्रभु के दासो का मै दास हूँ। अब मेरे लिए सब कार्य संभव हो गये। कौन-सा कार्य अब असंभव रह गया ?—इस प्रकार उस दोषहीन सुग्रीव ने कहा।
चिरकाल से दुःखी रहनेवाले सब वानर यह विचार कर कि वाली के लिए यम बननेवाले एक व्यक्ति हमें मिल गया है, आनंद-मधु का पान करके मत्त हो गये और उनकी भुजाएँ फूल उठीं। वे नाचने लगे, गाने लगे तथा यत्र-तत्र झुंडों में दौड़ने और कूदने लगे।
रामचन्द्र ने उस पर्वत पर, समुद्र-सदृश दुंदुभि के एक दूसरे पर्वत-जैसे शरीर को (अर्थात्, उसके अस्थिपंजर को) वहाँ देखा, जो रक्तहीन होने पर भी आकाश को छूता हुआ पड़ा था, मानो सारा ब्रह्माण्ड ही अग्नि मे जलकर झुलस गया हो।
श्रीराम ने सुग्रीव से प्रश्न किया—यह क्या दक्षिणदिशाधिप (यम) का वाहन महिष है ? या दिग्गजों में से कोई मरकर यहाँ पड़ा है ? या कोई तिमिंगिल सूखकर अस्थिशेष रह गया है ? असीम प्रेमयुक्त तुम, कहो। तब सुग्रीव ने दुंदुभि की कहानी सुनाई। (१-२३)
अध्याय ५
दुंदुभि पटल
दुंदुभि नामक असुर, जो शत्रु-विध्वंसक क्रोध से युक्त था, जो इतना ऊँचा बढ़ा हुआ था कि गगन तक पहुँचकर चन्द्र को भी छूता था। जिसके दो सींग थे (महिषाकार था)। वह क्षीरसागर को मन्दर-पर्वत के समान मथकर कालवर्ण विष्णु को ढूँढ़ने लगा।
तब विष्णु भगवान् उसके सम्मुख आये और उससे पूछा—तू यहाँ किसलिए आया है? दुंदुभि ने उत्तर दिया—मै तुम्हारे साथ युद्ध करने आया हूँ। तब विष्णु ने कहा—तुझ-जैसे महान् शक्तिसंपन्न व्यक्ति से युद्ध करने की शक्ति केवल नीलकंठ (शिव) मे ही है।
तब वह असुर शीघ्र वहाँ से चलकर शिवजी के कैलाश को अपने सींगों से ढकेलने लगा। तब शिवजी उसके सामने आये और पूछा कि तुझे क्या चाहिए? उसने उत्तर दिया—मै तुम्हारे साथ ऐसा युद्ध करना चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो।
तब शिव ने उससे कहा—तू बड़ा दक्ष है और वीरता से युक्त है। तुझसे युद्ध करना संभव नहीं। तू देवताओ के पास जा। यह कहकर (शिवजी ने) उसे वहाँ से भेज दिया। तब उसने देवेंद्र के पास जाकर अपनी इच्छा प्रकट की। देवेंद्र ने उत्तर दिया—यदि अनेक दिन तक युद्ध करने की इच्छा है, तो तू वाली के पास चला जा।
देवेंद्र से प्रेषित होकर वह प्रमत्ततापूर्वक (ऋष्यमूक पर) आ पहुँचा और यह गर्जन करता हुआ कि हे वानरराज, आओ, मेरे साथ युद्ध करो, पर्वतों को अस्त-व्यस्त करने लगा। तब मेरा अग्रज क्रुद्ध होकर उसके साथ युद्ध करने लगा।
वे दोनो ऐसा भयंकर युद्ध करने लगे कि जब वे वेग से घूम जाते थे, तब यह पहचानना कठिन हो जाता था कि कौन कहाँ है। किसी भी लोक मे न डरनेवाले वे दोनो कभी गिरते और कभी उठकर खडे होते। उनके भयंकर युद्ध से भीत हो असुर और देवता भी उनके निकट नहीं आ पाते थे।
जब वे अपना पद भूमि पर पटकते थे, तब ऐसी आग निकलती थी, जो आकाश को छू लेती थी। उनका निनाद दीर्घ दिशाओ में सुनाई पड़ता था। उनकी उस अग्नि का धूम सर्वत्र फैल गया। जलमय समुद्र तथा महान् पर्वत भी अपने-अपने रूप को खो बैठे। (अर्थात्, जहाँ पर्वत थे, वहाँ गढे पड़ गये और समुद्र ऊपर उठ आये।)
मेघ, आकाश, विशाल समुद्र, समुद्र से घिरी पृथ्वी, सब उनके द्वारा उठाई गई धूलि से इस प्रकार आवृत हो गये कि वे अपना रूप-रंग खो बैठे। मय नामक असुर का पुत्र दुंदुभि और वाली दोनों बारह मास पर्यंत युद्ध करते रहे।
वैसा भयंकर युद्ध करते समय, विजयी वाली ने अपनी भुजाओं के बल से उस असुर के, दिशाओ मे फैले हुए दोनों सींगों को उखाड़कर (उन्ही से) उसे मारा। तब वह असुर मेघगर्जन के जैसे चिग्घार उठा।
उसके शिर पर चोट लगी। उसकी टाँगें टूट गईं। वह पर्वत की गुहा-जैसे
किष्किन्धाकाण्ड ४५३
अपने मुख-गह्वर को खोलकर रक्त उगलने लगा। तब वाली ने उसपर ऐसा घूँसा मारा, जैसे पर्वत पर बिजली गिरी हो। उसके शब्द से ऊपर के सब लोक काँप उठे और सब दिशाएँ बहरी हो गईं।
वाली ने उसे अपने हाथो में यों उठा लिया जैसे चामर हो, और उसे घुमाने लगा। उसमे (दुन्दुभी का) रक्त चारो ओर छितरा गया, जिससे सब दिग्गज, जो दीर्घ दंतो तथा मद से युक्त थे, लाल हो गये।
वाली ने अपने वज्रमय करो से उस असुर को उठाकर इस प्रकार ऊपर फेंका कि मेघ-मंडल, सूर्य-मंडल तथा देवलोक को पार कर वह (दुन्दुभि का शरीर) ऊपर उठ गया। फिर, उसके प्राण ऊपर चले गये और शरीर धरती पर आ गिरा।
दुर्गंध-भरित उसका शरीर गगन की ऊपरी सीमा से टकराकर फिर नीचे आ गिरा। तब करुनालु मतंग मुनि ने जो शाप दिया, वह अब मेरे लिए सहायक बना है।—इस प्रकार (सुग्रीव ने) पूरा वृत्तांत कह सुनाया।
अमल प्रभु (राम) ने सारी कथा सुनी और अपने युद्ध-कुशल भाई (लक्ष्मण) से कहा—हे वीर! इस शव को तुम दूर फेंक दो। लक्ष्मण ने अपने पैर के अगूँठे से उसे उठाकर फेका। तब वह अस्थिपंजर पुनः एक वार सत्यलोक तक जाकर नीचे आ गिरा।
उस समय कपि-समूह मुँह खोलकर वज्र के समान गरज उठा। जब श्रीराम उद्यान में लौटकर आये, तब सुग्रीव ने राम से कहा—हे प्रभु! मेरा आपसे एक निवेदन है। (१-१५)
अध्याय ६
आभरण-दर्शन पटल
पहले एक दिन, हम (वानर) इस स्थान पर बैठे थे, तब पापी रावण एक स्त्री को (अपहरण करके) लिये जा रहा था, न जाने वह आपकी पत्नी ही थी या अन्य कोई स्त्री। वह स्त्री दूर आसमान पर से इस वन की ओर देखकर विलाप कर उठी थी।
कदाचित् यह विचार करके कि उसके आभरण दूत का काम देंगे, ताटंको तक फैले हुए नयनोवाली उस नारी ने अपने आभरणो को एक वस्त्र मे बाँधकर वर्षा के समान नयन-जल के साथ धरती पर गिरा दिया। हमने उस (आभरणो की गठरी) को अपने हाथो से पकड़ लिया।
हे वदान्य! हमने उन्हें सुरक्षित रखा है। हम आपके पास उन्हे ला देंगे। आप देखकर समझें (कि वे सीता के ही हैं या नही)।—ये वचन कहकर घृत-मिश्रित दूध-जैसे सद्भाववाले उस (सुग्रीव) ने आभरणो को अपने हाथ से लाकर दिखाया।
देवी सीता के आभरणो को (रामचन्द्र ने) भली भाँति देखा। उस समय
| .५४ | कंब रामायण |
|---|
रामचन्द्र की क्या दशा हुई, उसका वर्णन हम कैसे कर सकते हैं ! हम यह नहीं कह सकते कि उनका शरीर जलती आग में गिरे लोह-जैसा पिघल रहा। और यह भी नहीं कह सकते कि उन्होंने अपने प्राणों को तृप्ति देनेवाले अमृत का पान किया।
देवी के स्तनों को विभूषित करनेवाले वे आभरण उनकी इन (उत्तरीय) से युक्त स्तनों-जैसे ही दिखाई पड़े। कटि के आभरण कटि ही जैसे दिखाई पड़े। अन्य अंगों पर धारण किये जानेवाले आभरण उन-उन अंग ही जान पड़े। अब उन आभरणों से और अधिक क्या ज्ञान हो सकता था ?
क्या यह कहूँ कि (रामचन्द्र की) खोई हुई बुद्धि को वे आभरण वापस लाये ! या यह कहूँ कि उन (आभरणों) ने उनके प्राणों को आकृष्ट किया ? या यह कहूँ कि वे शरीर पर लगाये चंदन-लेप के समान शीतल लगे ! या यह कहूँ कि इन आभरणों ने उन्हें जला ही दिया ! क्या कहूँ ?
सीतादेवी के वे आभरण (रामचन्द्र के) नासिका-अग्रज के लिए सुगंधित पुष्प बने; कंधे पर धारण करने के लिए उत्तरीय वस्त्र बने। स्तनहार (स्वर्ण और मणियों की) कांति के फैलने से चंदन-लेप बने तथा उनकी देह को आवृत्त करने से वे (आभरण) उनकी सुन्दर चादर बन गये।
उन (रामचन्द्र) के दोनों अरुण नयनों से जो अश्रुजल बहा, उससे सब वस्तुएँ बह चलीं। रोमाँच ने उनकी देह को ढक दिया। सूखी हुई भुजाएँ, स्वेद से भर गईं या यह कहूँ कि ताप से तप्त हो रहीं। उस समय की उनकी दशा का मैं क्या वर्णन करूँ ?
राम की देह में ऐसी वेदन उत्पन्न हुई, मानो उसमें विष व्याप्त हो गया हो; जिससे वे दीर्घकाल तक, श्वास के साथ अन्धी हुई सी आँखें (मूर्च्छित हो) पड़े रहे। तब उस विशाल-नयन को सुग्रीव ने सँभाल लिया। तब उसके शरीर पर के रोंम (राम की देह में) चुभ गये।
सुग्रीव ने रामचन्द्र को सँभालकर बिठाया। उनके दुःख से स्वयं भी संतप्त होकर द्रवितचित्त हुआ और अश्रु बहाने लगा। वह यह कहकर विलाप कर रहा कि—हे दृढ़ कंधोंवाले ! मुख रूपी से इन आभरणों को देकर आपके प्राणों को हरा है।
हे श्रुति-शास्त्र-निपुण ! इस ब्रह्मांड में भी, परे जाकर हम आपकी देवी का अन्वेषण करेंगे। हम अपना पराक्रम दिखाकर आपकी कमल-मुखी को ला देंगे। आप क्यों व्याकुल होते हैं ?
लक्ष्मी के समान, और दिव्य सतीत्व से युक्त उस देवी को भय-त्रिकम्पित करनेवाले उस निष्ठुर पापी (रावण) की बीस भुजाएँ तथा दस सिर, आपके एक शर के लिए भी पर्याप्त लक्ष्य नहीं बन सकेंगे। सातों लोक भी क्या आपके एक बाण का लक्ष्य बनने की योग्यता रखते हैं ?
आप यहीं रहें। मैं अपने पराक्रम से चौदहों भुवनों में प्रवेश करूँगा और वहाँ देवी का अन्वेषण करूँगा। मेरी छोटी चेष्टा को भी देखिए मैं किस प्रकार आपकी पत्नी को यहाँ ले आता हूँ।
किष्किन्धाकाण्ड ४५५
हम आपका आदेश पूरा करनेवाले आपके तुच्छ साथी हैं। यह आपका अनश्वर पराक्रमी अनुज भी यहाँ उपस्थित है। हे पुरुषश्रेष्ठ ! यदि आपमें इतना बल है, तो क्या त्रिलोक भी आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है? आप क्यों अपने को छोटा समझते हैं ?
उत्तम जन, बड़े होने पर भी अपनी महिमा को स्वयं नहीं बताते। संसार उनके कार्य को ही देखता है। धर्म ही आपके रूप में साकार बना है; आपके अतिरिक्त और धर्म क्या है ? आपके लिए असाध्य क्या है ? इतने पर भी आप क्यों शोक-उद्विग्न होते हैं ?
हे संशयहीन वचनवाले ! पंकजभव (ब्रह्मा); कार्त्तिकेय के पिता एवं कोमलांगी को अपने वाम भाग में धारण करनेवाले ( शिव ) तथा चक्रधारी ( विष्णु )—ये तीनों एक साथ मिलकर आपकी समता कर सकते हैं। पृथक्-पृथक् होने पर वे भी आपकी समता नहीं कर सकते ।
हे उज्ज्वल धनुष धारण करनेवाले ! मेरे छोटे-से अभाव की पूर्ति अब नहीं तो पीछे भी आप कर सकते हैं (अर्थात्, वाली का वध पीछे ही हो)। पहले हम उन दुःखी देवी को मुक्त करके लायेंगे। इस प्रकार सुग्रीव ने कहा—
उष्णकिरण के पुत्र के यह कहने पर लक्ष्मी-अंकित वक्षवाले ( श्रीराम ); किसी-न-किसी प्रकार मूर्च्छा त्यागकर संज्ञा प्राप्त कर सके और अपने अश्रुसिक्त मनोहर नयनों को खोलकर स्नेह के साथ ( सुग्रीव को ) देखा ; फिर कहने लगे—
पर्वत-सदृश उन्नत भुजाओंवाले ! मुझ पापी के इस उज्ज्वल धनुष को हाथ में रखकर जीवित रहने पर भी, उस ( जानकी ) ने अपने आभरण उतारकर फेंक दिये। क्या ताटंकधारिणी, पतिव्रता नारियों में इस प्रकार करनेवाली अन्य कोई स्त्री भी थी ? (अर्थात्, नहीं ।)
उधर, करवाल-सदृश दीर्घ नयनोंवाली ( जानकी ) मेरे आगमन की प्रतीक्षा करती हुई व्याकुल बैठी है। इधर मैं बड़े-बड़े पर्वतों और सरोवरों में भटकता हुआ, उसके आभरणों के साथ रोता हुआ व्यर्थ समय व्यतीत कर रहा हूँ। डोरीवाले इस दीर्घ धनुष को ढोने पर मुझे लज्जित होना चाहिए।
यदि कोई किसी नारी का अपमान कर दे, तो राह चलनेवाले व्यक्ति भी उस अपमान करनेवाले को रोकेंगे और उससे युद्ध करके अपने प्राण भी त्याग देंगे। मैं तो, अपने-आप पर भरोसा रखकर जीवित रहनेवाली ( सीता ) के दुःख को भी दूर नहीं कर रहा हूँ।
मेरे कुल में ऐसे राजा उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने समुद्र खोदा था। जिन्होंने व्याघ्र और हरिण को एक ही घाट पानी पिलाया था। किन्तु, उसी वंश में उत्पन्न हुआ मैं ऐसा हूँ कि आभरण-धारिणी अपनी पत्नी को दुःख-मुक्त करने का भी सामर्थ्य मुझमें नहीं है।
मेरे पिता ने उस ( शंबर नामक ) असुर को, जो यमराज के लिए दुर्निवार था और जो त्रिलोक-कंटक था, मिटाकर देवेन्द्र का दुःख दूर किया था। उनका पुत्र होकर जनमा हुआ मैं, अपने धनुष के साथ, अत्यन्त पीड़ा देनेवाले क्रूर अपवाद को भी ढो रहा हूँ।
४५६ कंब रामायण
सब से प्रशंसनीय महिमा से युक्त मेरे पिता का सत्य-व्रत यदि टूट जाय, तो उससे बड़ा अपवाद होगा—यह विचार करके मैने राज्य-मुकुट धारण नही किया । अब यहाँ इक्षुरस-सदृश बोलीवाली (पत्नी) के शत्रु से अपहृत होने का सबसे बड़ा अपवाद मुझे प्राप्त हुआ है । अपवाद-मुक्त मै कब हुआ ?
राम, इस प्रकार के वचन कहकर वर्णनातीत दुःख से मूर्च्छित हो गये । उनकी वेदना को देखकर सहस्रकिरण के पुत्र ने उन्हें सांत्वना दी और उन्हें दुःख-सागर के तट पर लाकर खड़ा किया ।
(तब राम ने सुग्रीव से कहा—) हे मित्र ! तुम्हारे वचनों से मेरा दुःख शांत हुआ । नहीं तो क्या मैं जीवित रह सकता था ? मेरे लिए मृत्यु से बढ़कर, हितू अन्य कोई नहीं है । अपवाद-मुक्ति के लिए वही कर्तव्य है (अर्थात्, मर जाना ही भला) । फिर भी, जबतक मैं तुम्हारे दुःख को दूर न करूँ, तबतक मैं मृत्यु को नहीं अपनाऊँगा ।
राघव ने इस प्रकार कहा। इसी समय अतिबली मारुति ने (राम को) नमस्कार किया और कहा—हे उन्नत पर्वत-सदृश कंधोवाले ! मुझे कुछ निवेदन करना है। आप ध्यान से सुनने की कृपा करें ।
हे अपने आज्ञाचक्र को सर्वत्र चलानेवाले ! क्रूरकर्मी वाली का वध होना चाहिए । सूर्यपुत्र को राजा बनाना चाहिए और फिर बड़ी सेना का संगठन करना चाहिए । तभी भयंकर आयुधधारी राक्षसों के निवास-स्थान को ढूँढ़कर हम वहाँ जा सकते हैं । अन्यथा; यह कार्य असंभव है ।
हे भ्रमरों से संकुल पुष्पमालाधारी ! राक्षसों का निवास धरती पर है ? कही पर्वतों में है ? अंतरिक्ष में है ? इनसे पृथक् नागलोक में है ?—अल्पशक्तिवाले नर-जन्म ¹ में उत्पन्न होने के कारण हम यह निश्चित रूप से नहीं जान सकते कि उनका निवास कहाँ है ।
वे राक्षस पलमात्र में किसी भी लोक मे जा सकते हैं। वहाँ अपने अभिलषित किसी भी पदार्थ को ग्रहण कर सकते हैं। किसी विपदा के समान ही वे अकस्मात् आ गिरते हैं और फिर लौट जाते हैं। अतः, उनके निवास को पहचानना आसान नहीं है ।
एक ही समय में सर्वत्र जाकर सीता का अन्वेषण करना है। यदि एक-एक करके सब दिशाओ में ढूँढ़ने लगेंगे, तो उसमे बड़ी कठिनाई होगी। धरती अनंत रूप में फैली है और अन्वेषण में असंख्य वर्ष लग जायेंगे।
सत्तर 'शारा' संख्यावाली वानर-सेना युगांत मे उमड़नेवाले सागर के समान सर्वत्र फैल जायगी। समुद्र को पी डालना हो, ब्रह्मांड को उठाना हो, आज्ञा पाने पर वह सेना सब कुछ कर सकेगी।
अतः, हे नीतिज्ञ ! यही उचित होगा—(कि पहले वाली-वध हो, फिर सीता का अन्वेषण हो)—यों हनुमान् ने कहा। तब उस सद्गुणागार प्रसिद्ध धनुर्धारी ने कहा—चलो, वाली के निवास-स्थान पर जायेंगे। फिर, वे सब चल पडे।
१. वानर भी नर के जैसे होते हैं, अतः नर-जन्म शब्द से वानर-जन्म को भी लिया गया है।—अनु०
किष्किन्धाकाण्डं ४५७
( सुग्रीव, उसके चार मंत्री, राम और लक्ष्मण ) वे सब ऐसे चले, जैसे भयंकर नेत्रवाला एक शरभ ( सुग्रीव ), दो पराक्रमी व्याघ्र ( नल और नील ), शीघ्र गतिवाले दो गज ( हनुमान् और तार ) तथा दो सिंह (राम और लक्ष्मण ) जा रहे हो। साल, हरे-भरे तमाल, ऐला, कदली, आम्र, नाग आदि वृक्षों से होकर पर्वत के सानु-मार्ग पर वे चले ।
उस मार्ग में हरिणनयनोवाली वानरियों के झूले लगे थे। जहाँ झूले नहीं थे, वहाँ हवा में स्पंदित होनेवाले पत्नों से शोभायमान चंदन के वृक्ष लगे थे। जहाँ चंदन के वृक्ष नहीं थे, वहाँ मेघों से आवृत सानु-प्रदेश थे। जहाँ वैसे सानु-प्रदेश नहीं थे, वहाँ सुरभिमय चंपक-उद्यान थे। जहाँ वैसे चंपक-उद्यान नहीं थे, वहाँ स्वर्ण से भरे टीले थे ।
धर्म-स्वरूप वे दोनों ( राम-लक्ष्मण ) वानर-वीरों के साथ उस पर्वत-मार्ग में कहीं उतरते, कहीं चढ़ते हुए जा रहे थे। उनके मुखर वीर-वलय अपार शब्द करते थे। उस शब्द को सुनकर सोये पड़े रहनेवाले मेघ भी मानो जग जाते थे और आकाश मे उड़ जाते थे।
मेघ ऊँचे आकाश में उड़ रहे थे। झरने झर रहे थे। पुन्नाग-वृक्षों से भरित सानुओ में फनवाले सर्प इनकी आहट पाकर हट जाते थे । मत्तगज इधर-उधर बिखर जाते थे। सिंह भाग जाते थे। सोतों में विचरण करनेवाली मछलियों के साथ जल-सर्प भी त्वरित गति से जाकर छिप जाते थे और व्याघ्रों के साथ काले मुखवाले लंगूर भी भाग जाते थे।
जब मदमत्त गज डालों पर के वृक्षों से टकराते थे, तब वज्रमय काले रंगवाले अगरु और चंदनवृक्ष टूटकर लुढ़क जाते थे, जिससे ( उनपर लगे हुए ) मधु के छत्ते बिखर जाते थे और उनसे मधु बह चलता था, उस मधु के कारण उस विकट पर्वत-मार्ग पर चलना कठिन हो रहा था ।
वहाँ चमकनेवाले रत्नसमुदाय, अपनी कांति को गगन तक फैला रहे थे और ऐसे लगते थे, मानो पर्वत पर अग्नि-ज्वाला फैल रही हो। स्वर्णमय टीलों की कांति इस प्रकार फैल रही थी, मानो उस अग्नि-ज्वाला को बुझाने के लिए जल-धाराएँ बह रही हो ।---उन धनुर्धारियों के मार्ग पर ऐसा दृश्य उपस्थित हो रहा था।
उस पर्वत पर के सब जलस्रोतों में आकाश-गंगा बहती थी। जलाशयों के मीन आसपास के वृक्षों पर झपटते थे। जल-स्रोत नदियों पर झपटते थे। हाथी एक दूसरे पर झपटते थे। पक्षी शालि के पौधों पर झपटते थे और लंगूर वृक्ष-शाखाओं पर झपटते थे ।
स्वर्गवासियों को भी आकृष्ट करनेवाली ऐला की सुगंधि से युक्त वे पर्वत-शिखर मधु के बहने के कारण पिच्छिल हो गये थे। उनपर जल के बहने से गगन के नक्षत्र भी फिसल जाते थे। आकाश में दिखाई पड़नेवाला इन्द्र-धनुष भी फिसल जाता था। धवल चंद्र-बिंब फिसल जाता था और अंतरिक्ष में संचरण करनेवाले ग्रह भी फिसल जाते थे।
इस प्रकार के पर्वत-मार्ग से चलनेवाले वे सब वीर दस योजन चलकर वाली के निवासभूत उस पर्वत के निकट पहुँचे, जो ऐसा था, मानों स्वर्णमय स्वर्ग ही उतर आया हो। फिर, वे अपने कर्त्तव्य का विचार करने लगे। (१-४२)
अध्याय ७ वाली-वध पटल
उस समय, शत्रु-विजयी राम ने विचार कर तथा अपने निर्णय को उचित मानकर सुग्रीव से कहा—तुम जाकर वाली नामक उस अनुपम क्रूर विष के साथ युद्ध करो। उस समय मैं अलग एक स्थान पर रहकर (वाली पर) शर का प्रयोग करूँगा। यही मेरा निश्चित विचार है।
रामचन्द्र का वचन सुनते ही गगनगामी रथवाले (सूर्य) के पुत्र ने ऐसा बड़ा गर्जन किया कि उस शब्द को सुनकर तरंगों से पूर्ण जलधि भयभीत हो उठी। नीले मेघ लज्जित हो गये। भूमि के निवासी थरथराकर भागने लगे। स्वर्गवासी व्याकुल हुए। वह गर्जन ब्रह्माण्ड-भर में गूँज उठा।
सुग्रीव किष्किन्धा के निकट जा पहुँचा। अपना ओंठ चबाता हुआ उसने गर्जन के साथ वाली के प्रति यह कहा—यदि तुम युद्ध करने के लिए आओगे, तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा। यह कहकर वज्र के समान शब्दों में धमकी देता हुआ, पैर पटकता हुआ और भुजाओं को ठोंकता हुआ वह खड़ा रहा। यह ध्वनि किष्किन्धा में सोये हुए वाली के कानों में जाकर पड़ी और उसके वाम अंग फड़क उठे।
पर्यंक पर मानों एक क्षीरसमुद्र ही लेटा हो, यों पड़े हुए वाली ने सुग्रीव के गर्जन की उस महान् ध्वनि को सुना; जैसे हिंस्र सिंह ने किसी मत्तगज का चिंघाड़ सुना हो।
पर्वत-सदृश कंधोंवाला वाली, अपने भाई को युद्ध करने के लिए आया हुआ जानकर हँस पड़ा। उसकी उस हँसी से चौदहों भुवन तथा दिशाओं के परे रहनेवाले प्रदेश भी काँप उठे।
ऊँची तरंगों से पूर्ण समुद्र प्रलय-काल में उमड़ उठा हो, उसी प्रकार वाली उत्तर उठा। तब उसके भार से वह पर्वत धँस गया। उसकी बाँहों के हिलाने से जो हवा उठी, उससे समीपस्थ पर्वत बह गये।
उसका शरीर रोमाञ्चित हो उठा। तब उसके रोओं से चिनगारियाँ निकल पड़ीं। उसके नेत्र यों आग उगलने लगे कि वडवाग्नि की आँखें भी उसकी तीव्रता को देखकर अंधी हो जायें। उसके श्वास से धुआँ ऐसा उठा कि वह देवलोक के भी ऊपर पहुँच गया।
वाली ने हाथ से ताल ठोंका। उसे सुनकर दिशाओं के रक्षक गज भी मद्ररहित हो गये। वज्र शक्ति-हीन हो गये। ऊपर के लोक थरथरा उठे। धरती पर स्थिर खड़े हुए पहाड़ भी ढह गये।
वाली का यह शब्द कि, 'मै आ गया, मै आ गया'—पूर्व आदि अष्ट दिशाओं में गूँज उठा। वह उठ खड़ा हुआ। तब उसके मणिमय किरीट के स्पर्श से नक्षत्र झड़ पड़े।
उसके चलते समय हवा बड़े वेग से बह चली, जिससे पर्वत-समूह जड़ से उखड़
किष्किन्धाकाण्ड ४५६
गये और दिशाओं की सीमा पर जा गिरे। उसके श्वेत रोमों से निकली हुई चिनगारियाँ ब्रह्मांड की भित्ति पर छा गईं। यम भी उन चिनगारियो को देखकर त्रस्त हो उठा। अन्य देवता लोग व्याकुल हुए। वाली के दाँतो के पीसने से जो अग्नि-कण निकले, वे वर्षाकाल मे बिजलियो-जैसे सर्वत्र झड़ पडे। उसके अत्युत्तम भुजा-वलयो के रत्न इस प्रकार चूर-चूर हो झड़ पडे, जैसे विद्युत् ही झड़ रही हो। वह सर्वभयंकर (वाली) उस कालाग्नि की समता करता था, जो प्रलय-काल में पृथ्वी, चारो दिशाओ के समुद्र और देवलोक तथा सृष्टि के कारणभूत तत्त्वो को जला देती है। वह उस (वाली) के द्वारा मथे गये क्षीरसागर से उत्पन्न हलाहल की भी समता करता था। उस समय, अमृत-सदृश, बाँस के जैसे कंधोवाली 'तारा' नामक स्त्री (वाली की पत्नी), उसके मार्ग मे आ खड़ी हुई। वाली के नेत्रो से निकलनेवाली चिनगारियो से उस (तारा) के लंबे केश झुलस गये। हे पर्वतवासी कलापी। मुझे मत रोको। हटो। जिस प्रकार क्षीरसागर का मंथन करके मैने अमृत निकाला था, उसी प्रकार युद्ध का आह्वान देनेवाले सुग्रीव के बल को मथकर उसके प्राणौ का पान करूँगा और शीघ्र लौट आऊँगा—यो वाली ने कहा। तब उसकी पत्नी ने कहा— हे विजयी प्रभु। वह (सुग्रीव) पूर्व-जैसा नही है। तुम्हारी पुष्ट भुजाओं की शक्ति से आहत होकर वह भागा था। अब उसे नई शक्ति कुछ नही मिली है। अपना यह जन्म छोड़कर कोई दूसरा जन्म भी उसने नही पाया है। फिर भी, वह पुनः युद्ध करने के लिए आया है। अवश्य ही उसे कोई बड़ा सहायक मिल गया है। अंतहीन तीनो लोको के रहनेवाले समस्त प्राणी भी यदि एक साथ मिलकर मुझसे युद्ध करने के लिए आयें, तो भी सब मुझसे हार जायेंगे। इसके जो कारण हैं, उन्हें तुम सुनो— मंदर-पर्वत को मथानी, वासुकि सर्प को रस्सी, चक्रधारी (विष्णु) को कटावदार खोरिया, चंद्र को आधार (लकड़ी का वह तख्ता, जो मथानी को खंभे से लगाये रखता है) बनाकर इन्द्र आदि देवता तथा उनके शत्रु असुर, क्षीरसागर को मथने लगे थे। किंतु, उस मथानी को घुमाने की शक्ति उनमें नही थी, इसलिए वे थक गये। तब मैने उन्हे देखा और स्वय क्षीरसागर को मथ डाला एवं उन्हे अमृत निकालकर दे दिया। ऐसी मेरी शक्ति को, हे कलापी-सदृश रूप तथा कोकिल-सदृश कंठ से युक्त रमणी ! क्या तुम भूल गई हो ? युद्ध मे मुझसे अनेक देव और असुर हार गये हैं। उनकी संख्या मै कैसे बताऊँ। यम भी मेरा नाम सुनकर थरथरा उठता है। ऐसा होने पर भी यदि कोई मेरे शत्रु (सुग्रीव) की सहायता करने के लिए आया हो, तो— वह बुद्धिहीन है। यदि मेरे साथ युद्ध करने के लिए कोई आ भी जाय, तो
४६० कंब रामायण
वरदान के प्रभाव से उनके बल का अर्धांश मुझे मिल जायगा । अतः, कोई मेरे साथ क्या वैर कर सकता है ? तुम निश्चिन्त रहो ।—यों वाली ने तारा से कहा । यह सुनकर उस (तारा) ने कहा—हे प्रभु । अपने हितचिन्तक लोगों से मैंने सुना है कि राम नामक व्यक्ति उस (सुग्रीव) का प्राण-मित्र बन गया है। अब वही तुम्हारे प्राणहरण करने के लिए आया है। तब वाली ने तारा से कहा—हे पापिन् ! तुमने यह कैसा वचन कहा ? वह महाभाग (राम) पुण्य-पाप रूपी द्विविध कर्मों का अंत न देखकर, दुःखी होकर पुकारने- वाले प्राणियों को अपने आचरण के द्वारा धर्म का स्वरूप दिखाता है। ऐसे व्यक्ति के प्रति तुमने अनुचित वचन कहे। स्त्री-सुलभ अज्ञान के कारण तुमने कैसा अपराध कर दिया । इहलोक और परलोक, दोनों लोकों के फलों का विचार रखनेवाले उस महाभाग के लिए, तुम्हारा कथित यह कार्य क्या शोभा देनेवाला होगा ? ऐसा करने से उनको लाभ ही क्या होगा ? सब प्राणियों की रक्षा करनेवाला वह अपूर्व पदार्थ धर्म ही क्या स्वयं अपना नाश कर लेगा ? विशाल संसार के राज्य को प्राप्त करके जिसने अपनी माता की सपत्नी के कहने से उस राज्य को अपार आनन्द के साथ उसके पुत्र को दे दिया, उस प्रभु की स्तुति करना छोड़कर तुम (उनके संबंध में) इस प्रकार के निंदा-वचन कहने लगीं ? यदि सारे लोक एक साथ मिलकर सामना करने आयें, तथापि उनपर विजय पाने के लिए, उस (राम) के भयंकर कोदण्ड के अतिरिक्त अन्य किसी की सहायता आवश्यक नहीं है । वह प्रभु जिसकी समता करनेवाला वही है, अन्य कोई नहीं है, क्या क्षुद्रकार्य करनेवाले एक मर्कट (अर्थात्, सुग्रीव) के साथ मित्रता करेगा ? मेरे भाइयों के अतिरिक्त मेरे अन्य प्राण नहीं हैं—ऐसी भावना रखकर चलने- वाला तथा कृपापूर्ण समुद्र-जैसा वह प्रभु (राम), क्या मैं जब अपने भाई के साथ युद्ध करता रहूँगा, तब बीच में मुझपर बाण-प्रयोग करेगा ? तुम कुछ समय तक यहीं ठहरो। मैं एक पल में उस वैरी (सुग्रीव) के प्राण पीकर, उसके साथियों को भी मिटाकर लौट आऊँगा। व्याकुल मत हो ।—यों वाली ने कहा । इसके पश्चात् सुरभित केशोंवाली तारा डर से कुछ नहीं कह सकी और मौन रह गई। वाली, युद्ध के उत्साह से सत्वर ऊँचा चढ़ गया । उसकी बलशाली भुजाएँ देवलोक की सीमा से भी ऊपर उठ गईं। अपने कंधे-रूपी दो पर्वतों के साथ, प्रकृति के वैभव से संपन्न उस पर्वत पर से वह इस प्रकार निकला, जिस प्रकार प्राची के पुरातन पर्वत पर सूर्य उदित होता है। अपने पुष्ट कंधों से मनोहर और महान् पर्वत की समता करनेवाला वाली, क्रूर हिरण्यकश्यप के निर्देश पर बड़े स्तंभ से प्रकट होनेवाले महान् नरसिंह-जैसे उस पर्वत के एक भाग से ऐसे निकला कि देखनेवाले सभी मन में काँप उठे। गर्जन करनेवाले अपने अनुज को देखकर वह (वाली) भी गरज उठा । उसके गर्जन से भीत होकर स्वेद से भरे हुए मेघों से वज्र गिरे। उस गर्जन की ध्वनि सभी लोकों
किष्किन्धाकाण्ड ४६१
मे इस प्रकार व्याप्त हो गई, जिस प्रकार कालवर्ण पर्वत-सदृश विष्णु के चरण हो, जो लोकों को नापने के लिए बढ़ गये थे ।
उस समय, रामचन्द्र ने अपने प्रिय भाई (लक्ष्मण) से कहा—हे तात ! भली भाँति ध्यान से इसे देखो। दानवो और असुरों को रहने दो, सारे ससार मे कौन समुद्र ऐसा है, कौन मेघ ऐसा है, कौन पवन ऐसा है, अथवा कौन-सी ऐसी भयंकर प्रलयाग्नि है, जो इसकी देह की समता कर सके ?
तब उस महाभाग को देखकर अनुज (लक्ष्मण) ने उत्तर मे कहा—यह (सुग्रीव) अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्राणो का हरण करने के लिए यम को बुला लाया है। वानरो के लिए सहज, निंदा रहित युद्ध यह नही कर रहा है। यही बात मेरे मन मे खटकती है। [^१] इसके अतिरिक्त मै और कुछ भी सोच नही पा रहा हूँ।
अशान्त मन से (लक्ष्मण ने) फिर कहा—हे वीर ! धर्म के विरुद्ध विश्वासघाती कार्य करनेवालों पर विश्वास करना हितकारी नही है। यह (सुग्रीव) किसी शत्रु के समान, अपने भाई को ही मारने के लिए सन्नद्ध खड़ा है। भला यह पराये लोगो का सहायक किस प्रकार बन सकेगा ?
तब रामचन्द्र कहने लगे—हे तात ! सुनो, इन विवेकहीन मृगो के चारित्र्य के सबंध मे कुछ कहना ठीक नही है। यदि सभी माताओ के गर्भ से उत्पन्न कनिष्ठ पुत्र अपने बड़े भाइयो के अनुकूल ही आचरण करनेवाले होते, तो भरत अत्यत उत्तम सहोदर कैसे कहलाता ?
प्रकाशमान पर्वत-सदृश मनोहर कंधोवाले। यथार्थ यह है कि (इस ससार में) संपूर्ण रूप से धर्माचरण करनेवाले बहुत कम लोग हैं। विरुद्ध आचरण करनेवाले (अधार्मिक) व्यक्ति अनेक हैं। अतः, हम जिनसे मिलते हैं, उनमे विद्यमान सद्गुणो का ही ग्रहण करना चाहिए। सर्वथा निर्दोष कहलाने योग्य व्यक्ति (ससार मे) कौन है ?—यो राम ने कहा।
वे पराक्रमी वीर (राम-लक्ष्मण) जब आपस मे इस प्रकार के वचन कह रहे थे, तब रथ पर सचरण करनेवाले (सूर्य) का पुत्र और इन्द्र का पुत्र—दोनो, जो धरती पर चलने-फिरनेवाले महान् हिमाचल के जैसे थे, एक दूसरे से ऐसे टकराये, जैसे दो भारी दिग्गज हो।
जैसे एक पर्वत के निकट दूसरा पर्वत आ गया हो, वैसे ही वे दोनो परस्पर ममीप हो गये। जैसे हिंस्र तथा विजयी दो सिंह, एक दूसरे से लड़ने के लिए खड़े हो, वे दोनो वैसे ही लगते थे। वे दोनो, अनेक बार एक दूसरे के दाईं ओर बाईं ओर चक्कर लगाने लगे. जिस प्रकार दृढ बाहुओवाले कुम्हार के द्वारा घुमाया गया चाक हो ।
समीप आये हुए दो ग्रहो के समान स्थित वे दोनों, क्रोधाविष्ट होकर, परस्पर की भुजाओ से टकरा उठे। उनके पैर, जिनके भार से यह पुरातन धरती धँसी जा रही थी,
[^१]. भाव यह है—लक्ष्मण को यह बात खटक रही है कि सुग्रीव धर्म-युद्ध नहीं कर रहा है, बल्कि बाली को मारने के लिए रामचन्द्र को ले आया है। —अनु०