कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 469, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४६१
मे इस प्रकार व्याप्त हो गई, जिस प्रकार कालवर्ण पर्वत-सदृश विष्णु के चरण हो, जो लोकों को नापने के लिए बढ़ गये थे ।
उस समय, रामचन्द्र ने अपने प्रिय भाई (लक्ष्मण) से कहा—हे तात ! भली भाँति ध्यान से इसे देखो। दानवो और असुरों को रहने दो, सारे ससार मे कौन समुद्र ऐसा है, कौन मेघ ऐसा है, कौन पवन ऐसा है, अथवा कौन-सी ऐसी भयंकर प्रलयाग्नि है, जो इसकी देह की समता कर सके ?
तब उस महाभाग को देखकर अनुज (लक्ष्मण) ने उत्तर मे कहा—यह (सुग्रीव) अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्राणो का हरण करने के लिए यम को बुला लाया है। वानरो के लिए सहज, निंदा रहित युद्ध यह नही कर रहा है। यही बात मेरे मन मे खटकती है। [^१] इसके अतिरिक्त मै और कुछ भी सोच नही पा रहा हूँ।
अशान्त मन से (लक्ष्मण ने) फिर कहा—हे वीर ! धर्म के विरुद्ध विश्वासघाती कार्य करनेवालों पर विश्वास करना हितकारी नही है। यह (सुग्रीव) किसी शत्रु के समान, अपने भाई को ही मारने के लिए सन्नद्ध खड़ा है। भला यह पराये लोगो का सहायक किस प्रकार बन सकेगा ?
तब रामचन्द्र कहने लगे—हे तात ! सुनो, इन विवेकहीन मृगो के चारित्र्य के सबंध मे कुछ कहना ठीक नही है। यदि सभी माताओ के गर्भ से उत्पन्न कनिष्ठ पुत्र अपने बड़े भाइयो के अनुकूल ही आचरण करनेवाले होते, तो भरत अत्यत उत्तम सहोदर कैसे कहलाता ?
प्रकाशमान पर्वत-सदृश मनोहर कंधोवाले। यथार्थ यह है कि (इस ससार में) संपूर्ण रूप से धर्माचरण करनेवाले बहुत कम लोग हैं। विरुद्ध आचरण करनेवाले (अधार्मिक) व्यक्ति अनेक हैं। अतः, हम जिनसे मिलते हैं, उनमे विद्यमान सद्गुणो का ही ग्रहण करना चाहिए। सर्वथा निर्दोष कहलाने योग्य व्यक्ति (ससार मे) कौन है ?—यो राम ने कहा।
वे पराक्रमी वीर (राम-लक्ष्मण) जब आपस मे इस प्रकार के वचन कह रहे थे, तब रथ पर सचरण करनेवाले (सूर्य) का पुत्र और इन्द्र का पुत्र—दोनो, जो धरती पर चलने-फिरनेवाले महान् हिमाचल के जैसे थे, एक दूसरे से ऐसे टकराये, जैसे दो भारी दिग्गज हो।
जैसे एक पर्वत के निकट दूसरा पर्वत आ गया हो, वैसे ही वे दोनो परस्पर ममीप हो गये। जैसे हिंस्र तथा विजयी दो सिंह, एक दूसरे से लड़ने के लिए खड़े हो, वे दोनो वैसे ही लगते थे। वे दोनो, अनेक बार एक दूसरे के दाईं ओर बाईं ओर चक्कर लगाने लगे. जिस प्रकार दृढ बाहुओवाले कुम्हार के द्वारा घुमाया गया चाक हो ।
समीप आये हुए दो ग्रहो के समान स्थित वे दोनों, क्रोधाविष्ट होकर, परस्पर की भुजाओ से टकरा उठे। उनके पैर, जिनके भार से यह पुरातन धरती धँसी जा रही थी,
[^१]. भाव यह है—लक्ष्मण को यह बात खटक रही है कि सुग्रीव धर्म-युद्ध नहीं कर रहा है, बल्कि बाली को मारने के लिए रामचन्द्र को ले आया है। —अनु०