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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 549 में से

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पृष्ठ 470
४६२कंब रामायण

परस्पर रगड़ा उठे, जिससे अग्निकण निकलकर अंतरिक्ष में ऐसे उड़ चले, जैसे उज्ज्वल विद्युत्-खंड उड़ रहे हों।

अत्यधिक भुजबल से युक्त, एक ही माता से उत्पन्न तथा एक ही मुग्धा स्त्री के लिए लड़नेवाले वे दोनों, (उनके शरीरों पर) फैली हुई रक्त रेखाओं से शोभित, उज्ज्वल नेत्रोंवाली सुन्दरी तिलोत्तमा के लिए लड़नेवाले प्राचीन काल के सुन्द-उपसुन्द नामक दो राक्षसों के जैसे लगते थे।

एक समुद्र को दूसरे समुद्र से लड़ते हुए, भूमि की रक्षा करनेवाले मेरुपर्वत को दूसरे मेरुपर्वत से लड़ते हुए, क्रोध को स्वयं दो रूप धारण कर आपस में युद्ध करते हुए, हमने कभी नहीं देखा है। अतः, इस संसार में उन बलवानों (वाली-सुग्रीव) के भयंकर युद्ध के लिए कोई उपमान भी हम नहीं दे सकते।

उन वानरों के नायकों (वाली-सुग्रीव) के नयनों से जो अग्नि-ज्वालाएँ उठीं, उनसे मेघ जल गये, पहाड़ जल गये, दिग्गज काँप उठे, धरती के चारों प्रकार के प्रदेश¹ अस्त-व्यस्त हो गये, अंतरिक्ष में रहनेवाले देवता दूर भागकर कहीं छिप गये।

देखनेवाले यह सोचकर विस्मय करते थे कि ये (वाली-सुग्रीव) अंतरिक्ष में हैं, ऊँचे पर्वत पर हैं, भूमि पर हैं, चारों दिशाओं की सीमाओं पर हैं अथवा हमारे नयनों में ही हैं; वे कहाँ खड़े हैं? (अर्थात्, वे दोनों इतनी त्वरित गति से लड़ रहे थे कि यह विदित नहीं होता था कि वे कहाँ खड़े हैं)। इस प्रकार, वे दोनों वानर एक दूसरे को मुष्टि से आहत करते थे और दाँतों से काटते थे, जिससे क्षत उत्पन्न होकर रक्त बह चलता था।

दसों दिशाओं में स्थित सातों समुद्र एक साथ गरज उठें, तो उनके उस गर्जन से भी पाँचगुना अधिक था उन दोनों वानर-नायकों का गर्जन-घोष। एक दूसरे की बड़ी भुजाओं और वक्ष पर वे तीव्र मुष्टि-प्रहार करते थे, तो उससे उत्पन्न शब्द युगात के मेघों के गर्जन की समानता करता था।

वे बलवान् वीर एक दूसरे पर झपटकर अपने कराल दाँतों से काटते थे। तब उनके क्षतों से बहकर रक्त सब दिशाओं में छितरा जाता था, जिससे अंतरिक्ष के सब नक्षत्र मंगल-ग्रह के समान हो गये—(मंगल-ग्रह रक्त कान्ति से चमकता है, उसी प्रकार अन्य नक्षत्रों की कान्ति भी रक्त वर्ण हो गई); बादल भी लाल आकाश-जैसे दीखने लगे।

जिस प्रकार अत्यधिक तपाये गये लौह-खंड को बड़े हथौड़े से मारने पर चिनगारियाँ छिटक उठती हैं, उसी प्रकार इन्द्र-पुत्र (वाली) की भुजाओं द्वारा रवि-पुत्र (सुग्रीव) के वक्ष पर दीर्घ करों का आघात होने से चिनगारियाँ निकल रही थीं।

वे दोनों एक दूसरे को छाती से ढकेलते, टाँगों को फैलाकर लात मारते, बड़े वेग के साथ हाथों से मारते, काटते, खड़े होकर टकरा जाते, पेड़ों से पीटते हुए चिल्लाते,


१. तमिल-साहित्य में चार प्रकार के प्रदेशों का वर्णन होता है, जिन्हें मुल्लै, कुरिंजी, मरुदम और नेयिदल कहते हैं। जो क्रमशः अरण्य-भूमि, पर्वतीय स्थान, खेती से भरी समतल भूमि और समुद्र-तट का प्रदेश होते हैं, पाँचवे प्रदेश पालै, अर्थात्, मरुभूमि का भी उल्लेख होता है। किंतु, वहाँ प्राणियों का निवास न होने से कदाचित् प्रस्तुत प्रसंग में उसे नहीं लिया गया है। —अनु०