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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 549 में से

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पृष्ठ 471

किष्किन्धाकाण्ड / ४६३

शिलाओं को उखाड़कर एक दूसरे के शिर पर फेंकते और धमकी देकर डराते। ऐसे घूरते कि आँखों से चिनगारियाँ निकल पड़ती।

वे एक दूसरे को पकड़कर ऊपर उठाते, दूर फेक देते, फिर समीप आकर अपना वक्ष फुलाकर दिखाते। मुष्टि का ऐसा प्रहार करते कि हाथ शरीर मे गड़ जाता। अति वेग से लट्टू के समान दायें और वायें पैंतरे बदलने, एक दूसरे को रोककर खड़े हो जाते, पीछे हटते, (परस्पर की) भुजाओं को बंधन में बाँधकर नीचे गिर जाते।

कभी पूँछ से एक दूसरे के वक्ष को बाँधकर ऐसे खींचते कि उनकी हड्डियाँ भी चूर-चूर हो जाती। अपनी टाँग से दूसरे की टाँग को उलझाकर कष्ट देते। फिर, कुछ ढील देते। जैसे भाला तानकर मारा हो, ऐसे ही अतिदृढ तीक्ष्ण नखों से परस्पर की देह को चीर देते. जिससे शरीर का चर्म ऐसा फट जाता, जैसे पर्वत की कंदरा हो।

धरती मे गड़े हुए पर्वत, वृक्ष तथा दृष्टि मे पड़नेवाले सभी पदार्थों को वे अपने बलवान् हाथो से उखाड़-उखाड़कर फेंकते थे और उनसे आघात करते थे, जिससे वे (पर्वत, वृक्ष आदि) टूटकर कुछ अंतरिक्ष में अदृश्य हो जाते और कुछ समुद्र में जा गिरते।

उस युद्ध मे कोई किसी से हारा नही। दोनों उस युद्ध-जन्य उमंग से मत्त होकर लड़ रहे थे। उनके श्वेत रोमों से रक्त वर्ण अग्नि-कण निकल रहे थे, जैसे सूखी घास से भरी भूमि पर आग फैल रही हो। (उस भयंकर युद्ध को देखकर) देवता भी भय से व्याकुल हो उठे, तो अब उस युद्ध के बारे में और क्या कहा जाय ?

जब इस प्रकार वे दोनों बड़े पराक्रम से लड़ रहे थे, तब दीर्घ तथा पुष्ट भुजाओं तथा शत्रुध्वंसकारी पराक्रम से युक्त वाली ने सुग्रीव को अपने भयंकर नखों तथा करो से ऐसे मारा, जैसे सिंह हाथी को मारता है।

तब रविकुमार (सुग्रीव) बहुत पीड़ित हो उठा और श्रीराम के पास गया। तब रामचन्द्र ने उससे कहा—दुःखी मत होओ। मैं तुम दोनों में कोई अंतर नही देख सका। अब तुम वनपुष्पों की माला पहनकर जाओ—यों कहकर उन्होंने सुग्रीव को दुबारा भेजा। सुग्रीव फिर जाकर वाली से युद्ध करने लगा।

सुग्रीव, जिसके शिर पर की पुष्पमाला ऐसी थी, मानों उज्ज्वल नक्षत्रों की गूँथी हुई माला हो, अपने गर्जन से भयंकर व्याघ्र और मेघ-गर्जन को भी चकित करता हुआ त्वरित गति से आया और शत्रु-विनाशक वाली को मुक्कों से मार-मारकर त्रस्त कर दिया।

तब वाली मन में आशंकित हुआ। वह क्रोध के साथ इस प्रकार घूरा कि यम भी उससे डर गया। वह मदहास कर उठा। फिर, अपने दृढ हाथो और पैरो से सुग्रीव के मर्म-स्थानो में आघात किया, जिससे वह मूर्च्छित हो गया।

सुग्रीव अपने निःश्वासो के साथ प्राण भी उगलने लगा। उसके कानों और नेत्रो से अग्नि-ज्वालाओ के साथ रक्त की धारा भी बह चली। तब सूर्यपुत्र (सुग्रीव) चारो दिशाओ मे व्याकुल होकर देखने लगा और इन्द्रपुत्र (वाली) गर्व मे आगे बढ़कर अधिका-धिक प्रहार करने लगा।

(फिर) वाली ने, यह सोचकर कि इसे धरती पर पटककर मार दूँगा, अपने