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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 549 में से

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पृष्ठ 472

४६४ । कंब रामायण

भाई की कटि और कंठ में अपने करो को डालकर ऊपर उठा लिया। इतने में रामचन्द्र ने एक बाण लेकर अपने धनुष पर चढ़ाया और उसकी डोरी के साथ अपने हाथ को भी पीछे खींचकर (बाण को) छोड़ दिया।

वह शर जल, जल के कारणभूत अग्नि, वेगवान् वायु, नीचे की पृथ्वी—इन चारों भूतो के बल से युक्त हो वाली के वक्ष को उसी प्रकार छेदकर चला, जिस प्रकार भली भाँति पके हुए कदली फल को सूई छेद देती है। अब और कहने को क्या शेष रह गया ?

वह वाली, जिसने भुजबल से रहित हुए अपने अनुज (सुग्रीव) पर करुणा-रहित होकर, दृढ भूमि पर पटककर उसे मार डालना चाहा था, (राम का शर लगते ही) अत्यन्त व्याकुल हुआ और युगांत के प्रभंजन के लगने से जिस प्रकार मेरुपर्वत जड़ से उखड़कर गिरता हो, उसी प्रकार गिर पड़ा।

वज्र के आघात से उखड़े हुए पर्वत के समान, धरती पर गिरे हुए, युद्ध में शत्रु-भयंकर वाली ने, सूर्य-पुत्र.(सुग्रीव) को पकड़े हुए अपने हाथों को शिथिल कर दिया। किंतु उग्र शर, जो उसके प्राणों को पकडे हुए था, उसे वह ढीला नही कर सका।

विजयशील महावीर (राम) का वह अमोघ बाण उस (वाली) के बलिष्ठ वक्ष में जा लगा। वाली ने उस बाण को (अपने वक्ष को छेदकर पीठ की ओर से) बाहर निकल जाने के पहले ही अपने बलिष्ठ हाथ से पकड़ लिया और अपनी पूँछ और पैरों से उसे बाँधकर रोक लिया। (उसके उस बल को देखकर) विजयी यमराज भी सिर हिलाने लगा (अर्थात्, यम भी वाली की प्रशंसा करने लगा।)

वाली कभी यह विचार कर कि मै उछलकर अंतरिक्ष रूपी ढक्कन से टकराकर उसे चूर-चूर करके गिरा दूँगा, ऊपर उछलता। कभी यह विचार कर कि एक उड़द के लुढ़क जाने के समय के भीतर ही (अर्थात्, क्षणार्ध में) समस्त दिशाओ को विध्वस्त कर दूँगा, आगे लपकता। कभी यह विचार कर कि पृथ्वी को समूल खोद डालूँगा, नीचे गिर जाता। कभी यह सोचने लगता कि मेरे वक्ष में घुस जानेवाले ऐसे (तीक्ष्ण) बाण का प्रयोग करनेवाला कौन है ?

वह धरती पर अपने हाथो को पटकता। चारो ओर आँख उठाकर यों घूरता कि उनसे चिनगारियाँ निकल पड़ती। उस उग्र बाण को अपने दोनो हाथों से पकड़कर पूँछ और पादों से दृढतापूर्वक खींचता। लेकिन, उस शर के न निकलने से अत्यत पीडित होता। फिर, पर्वत के समान लुढ़क जाता।

वह यों शका करता कि (उस शर का प्रयोग करनेवाले) कदाचित् कोई देवता ही हैं; फिर यह सोचता कि ऐसा कार्य करने की शक्ति क्या उन देवताओं में है? तो यह अन्य कौन है ?—यह विचार कर हँसने लगता। कभी यह कहता कि यह ऐसे व्यक्ति का ही कार्य होगा, जो त्रिदेवों की समता करता है।

मेरे वक्ष में लगा हुआ यह क्या (विष्णु का) चक्र ही है? या नीलकंठ (शिव) का त्रिशूल है? यदि उनमे से कोई नही है, तो क्या पर्वतो को ध्वस्त करनेवाले प्रसिद्ध इन्द्र