कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 460, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५
दुंदुभि पटल
दुंदुभि नामक असुर, जो शत्रु-विध्वंसक क्रोध से युक्त था, जो इतना ऊँचा बढ़ा हुआ था कि गगन तक पहुँचकर चन्द्र को भी छूता था। जिसके दो सींग थे (महिषाकार था)। वह क्षीरसागर को मन्दर-पर्वत के समान मथकर कालवर्ण विष्णु को ढूँढ़ने लगा।
तब विष्णु भगवान् उसके सम्मुख आये और उससे पूछा—तू यहाँ किसलिए आया है? दुंदुभि ने उत्तर दिया—मै तुम्हारे साथ युद्ध करने आया हूँ। तब विष्णु ने कहा—तुझ-जैसे महान् शक्तिसंपन्न व्यक्ति से युद्ध करने की शक्ति केवल नीलकंठ (शिव) मे ही है।
तब वह असुर शीघ्र वहाँ से चलकर शिवजी के कैलाश को अपने सींगों से ढकेलने लगा। तब शिवजी उसके सामने आये और पूछा कि तुझे क्या चाहिए? उसने उत्तर दिया—मै तुम्हारे साथ ऐसा युद्ध करना चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो।
तब शिव ने उससे कहा—तू बड़ा दक्ष है और वीरता से युक्त है। तुझसे युद्ध करना संभव नहीं। तू देवताओ के पास जा। यह कहकर (शिवजी ने) उसे वहाँ से भेज दिया। तब उसने देवेंद्र के पास जाकर अपनी इच्छा प्रकट की। देवेंद्र ने उत्तर दिया—यदि अनेक दिन तक युद्ध करने की इच्छा है, तो तू वाली के पास चला जा।
देवेंद्र से प्रेषित होकर वह प्रमत्ततापूर्वक (ऋष्यमूक पर) आ पहुँचा और यह गर्जन करता हुआ कि हे वानरराज, आओ, मेरे साथ युद्ध करो, पर्वतों को अस्त-व्यस्त करने लगा। तब मेरा अग्रज क्रुद्ध होकर उसके साथ युद्ध करने लगा।
वे दोनो ऐसा भयंकर युद्ध करने लगे कि जब वे वेग से घूम जाते थे, तब यह पहचानना कठिन हो जाता था कि कौन कहाँ है। किसी भी लोक मे न डरनेवाले वे दोनो कभी गिरते और कभी उठकर खडे होते। उनके भयंकर युद्ध से भीत हो असुर और देवता भी उनके निकट नहीं आ पाते थे।
जब वे अपना पद भूमि पर पटकते थे, तब ऐसी आग निकलती थी, जो आकाश को छू लेती थी। उनका निनाद दीर्घ दिशाओ में सुनाई पड़ता था। उनकी उस अग्नि का धूम सर्वत्र फैल गया। जलमय समुद्र तथा महान् पर्वत भी अपने-अपने रूप को खो बैठे। (अर्थात्, जहाँ पर्वत थे, वहाँ गढे पड़ गये और समुद्र ऊपर उठ आये।)
मेघ, आकाश, विशाल समुद्र, समुद्र से घिरी पृथ्वी, सब उनके द्वारा उठाई गई धूलि से इस प्रकार आवृत हो गये कि वे अपना रूप-रंग खो बैठे। मय नामक असुर का पुत्र दुंदुभि और वाली दोनों बारह मास पर्यंत युद्ध करते रहे।
वैसा भयंकर युद्ध करते समय, विजयी वाली ने अपनी भुजाओं के बल से उस असुर के, दिशाओ मे फैले हुए दोनों सींगों को उखाड़कर (उन्ही से) उसे मारा। तब वह असुर मेघगर्जन के जैसे चिग्घार उठा।
उसके शिर पर चोट लगी। उसकी टाँगें टूट गईं। वह पर्वत की गुहा-जैसे