कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४५१
ज्यों ही उस अरिंदम (राम) के धनुष की ध्वनि हुई, त्यों ही देवता इस भय से त्रस्त होकर भागे कि कहीं प्रलय-काल ही तो नही आ गया। भक्तिपूर्ण कनिष्ठ प्रभु (लक्ष्मण) ही उन (राम) के समीप दृढ खड़े रह सके। यदि दूसरे लोगो की दशा का वर्णन करने लगेंगे, तो उन सबकी बदनामी होगी।
असत्य-रहित मारुति आदि वीर यह सोचकर कि राम का शर-प्रयोग हमे अवश्य देखना चाहिए, किसी प्रकार उनके निकट आकर उपस्थित रहे। तब कुशल धनुर्धारी (राम) ने दृढ तथा दीर्घ कोदंड में लगी डोरी को भली भाँति खींचकर शर का संधान किया।
वह राम-बाण, सातों सालवृक्षो का भेदकर चला। नीचे रहनेवाले सातों लोको को भेदकर चला। फिर, उनसे आगे सप्त-संख्या से युक्त किसी वस्तु के न होने से लौट आया। अब भी यदि वह बाण सप्त संख्यावाली किसी वस्तु को देखे, तो उसे छेदे बिना नहीं रहेगा।
सप्त समुद्र, ऊपर के सप्त लोक, सप्त कुलपर्वत, सप्त ऋषि, सप्त अश्व और सप्त कन्याएँ भी यह आशंका कर काँप उठी कि कदाचित् सप्त संख्या का कोई भी पदार्थ इस बाण का लक्ष्य हो सकता है।
ऐसा भय होने पर भी सब लोग, श्रीराम के उस स्वभाव को जानकर स्वस्थ हुए, जो धर्म के आधारभूत सभी पदार्थों को सुरक्षित रखता है। तब सूर्यकुमार ने स्वर्णमय वीर-कंकणों से भूषित श्रीराम के चरणो को अपने शिर पर रखकर ये वचन कहे—
तुम पृथ्वी हो, आकाश हो, अन्य सब भूत हो, पंकज से उत्पन्न देव (ब्रह्मा) हो, क्षीरशायी भगवान् हो, पापो का विनाश करनेवाले सद्धर्म के देवता हो। तुमने आदिकाल में लोको को उत्पन्न किया। अब मुझ श्वान-जैसे दास को तारने के लिए यहाँ आये हो।
हे राजाओ के अधिराज! मेरे पूर्वपुण्यो ने ही तुम्हे यहाँ लाकर मेरी सहायता की है। तुम मातृ-सदृश प्रभु के दासो का मै दास हूँ। अब मेरे लिए सब कार्य संभव हो गये। कौन-सा कार्य अब असंभव रह गया ?—इस प्रकार उस दोषहीन सुग्रीव ने कहा।
चिरकाल से दुःखी रहनेवाले सब वानर यह विचार कर कि वाली के लिए यम बननेवाले एक व्यक्ति हमें मिल गया है, आनंद-मधु का पान करके मत्त हो गये और उनकी भुजाएँ फूल उठीं। वे नाचने लगे, गाने लगे तथा यत्र-तत्र झुंडों में दौड़ने और कूदने लगे।
रामचन्द्र ने उस पर्वत पर, समुद्र-सदृश दुंदुभि के एक दूसरे पर्वत-जैसे शरीर को (अर्थात्, उसके अस्थिपंजर को) वहाँ देखा, जो रक्तहीन होने पर भी आकाश को छूता हुआ पड़ा था, मानो सारा ब्रह्माण्ड ही अग्नि मे जलकर झुलस गया हो।
श्रीराम ने सुग्रीव से प्रश्न किया—यह क्या दक्षिणदिशाधिप (यम) का वाहन महिष है ? या दिग्गजों में से कोई मरकर यहाँ पड़ा है ? या कोई तिमिंगिल सूखकर अस्थिशेष रह गया है ? असीम प्रेमयुक्त तुम, कहो। तब सुग्रीव ने दुंदुभि की कहानी सुनाई। (१-२३)