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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 549 में से

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पृष्ठ 463

किष्किन्धाकाण्ड ४५५

हम आपका आदेश पूरा करनेवाले आपके तुच्छ साथी हैं। यह आपका अनश्वर पराक्रमी अनुज भी यहाँ उपस्थित है। हे पुरुषश्रेष्ठ ! यदि आपमें इतना बल है, तो क्या त्रिलोक भी आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है? आप क्यों अपने को छोटा समझते हैं ?

उत्तम जन, बड़े होने पर भी अपनी महिमा को स्वयं नहीं बताते। संसार उनके कार्य को ही देखता है। धर्म ही आपके रूप में साकार बना है; आपके अतिरिक्त और धर्म क्या है ? आपके लिए असाध्य क्या है ? इतने पर भी आप क्यों शोक-उद्विग्न होते हैं ?

हे संशयहीन वचनवाले ! पंकजभव (ब्रह्मा); कार्त्तिकेय के पिता एवं कोमलांगी को अपने वाम भाग में धारण करनेवाले ( शिव ) तथा चक्रधारी ( विष्णु )—ये तीनों एक साथ मिलकर आपकी समता कर सकते हैं। पृथक्-पृथक् होने पर वे भी आपकी समता नहीं कर सकते ।

हे उज्ज्वल धनुष धारण करनेवाले ! मेरे छोटे-से अभाव की पूर्ति अब नहीं तो पीछे भी आप कर सकते हैं (अर्थात्, वाली का वध पीछे ही हो)। पहले हम उन दुःखी देवी को मुक्त करके लायेंगे। इस प्रकार सुग्रीव ने कहा—

उष्णकिरण के पुत्र के यह कहने पर लक्ष्मी-अंकित वक्षवाले ( श्रीराम ); किसी-न-किसी प्रकार मूर्च्छा त्यागकर संज्ञा प्राप्त कर सके और अपने अश्रुसिक्त मनोहर नयनों को खोलकर स्नेह के साथ ( सुग्रीव को ) देखा ; फिर कहने लगे—

पर्वत-सदृश उन्नत भुजाओंवाले ! मुझ पापी के इस उज्ज्वल धनुष को हाथ में रखकर जीवित रहने पर भी, उस ( जानकी ) ने अपने आभरण उतारकर फेंक दिये। क्या ताटंकधारिणी, पतिव्रता नारियों में इस प्रकार करनेवाली अन्य कोई स्त्री भी थी ? (अर्थात्, नहीं ।)

उधर, करवाल-सदृश दीर्घ नयनोंवाली ( जानकी ) मेरे आगमन की प्रतीक्षा करती हुई व्याकुल बैठी है। इधर मैं बड़े-बड़े पर्वतों और सरोवरों में भटकता हुआ, उसके आभरणों के साथ रोता हुआ व्यर्थ समय व्यतीत कर रहा हूँ। डोरीवाले इस दीर्घ धनुष को ढोने पर मुझे लज्जित होना चाहिए।

यदि कोई किसी नारी का अपमान कर दे, तो राह चलनेवाले व्यक्ति भी उस अपमान करनेवाले को रोकेंगे और उससे युद्ध करके अपने प्राण भी त्याग देंगे। मैं तो, अपने-आप पर भरोसा रखकर जीवित रहनेवाली ( सीता ) के दुःख को भी दूर नहीं कर रहा हूँ।

मेरे कुल में ऐसे राजा उत्पन्न हुए हैं, जिन्होंने समुद्र खोदा था। जिन्होंने व्याघ्र और हरिण को एक ही घाट पानी पिलाया था। किन्तु, उसी वंश में उत्पन्न हुआ मैं ऐसा हूँ कि आभरण-धारिणी अपनी पत्नी को दुःख-मुक्त करने का भी सामर्थ्य मुझमें नहीं है।

मेरे पिता ने उस ( शंबर नामक ) असुर को, जो यमराज के लिए दुर्निवार था और जो त्रिलोक-कंटक था, मिटाकर देवेन्द्र का दुःख दूर किया था। उनका पुत्र होकर जनमा हुआ मैं, अपने धनुष के साथ, अत्यन्त पीड़ा देनेवाले क्रूर अपवाद को भी ढो रहा हूँ।