कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| .५४ | कंब रामायण |
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रामचन्द्र की क्या दशा हुई, उसका वर्णन हम कैसे कर सकते हैं ! हम यह नहीं कह सकते कि उनका शरीर जलती आग में गिरे लोह-जैसा पिघल रहा। और यह भी नहीं कह सकते कि उन्होंने अपने प्राणों को तृप्ति देनेवाले अमृत का पान किया।
देवी के स्तनों को विभूषित करनेवाले वे आभरण उनकी इन (उत्तरीय) से युक्त स्तनों-जैसे ही दिखाई पड़े। कटि के आभरण कटि ही जैसे दिखाई पड़े। अन्य अंगों पर धारण किये जानेवाले आभरण उन-उन अंग ही जान पड़े। अब उन आभरणों से और अधिक क्या ज्ञान हो सकता था ?
क्या यह कहूँ कि (रामचन्द्र की) खोई हुई बुद्धि को वे आभरण वापस लाये ! या यह कहूँ कि उन (आभरणों) ने उनके प्राणों को आकृष्ट किया ? या यह कहूँ कि वे शरीर पर लगाये चंदन-लेप के समान शीतल लगे ! या यह कहूँ कि इन आभरणों ने उन्हें जला ही दिया ! क्या कहूँ ?
सीतादेवी के वे आभरण (रामचन्द्र के) नासिका-अग्रज के लिए सुगंधित पुष्प बने; कंधे पर धारण करने के लिए उत्तरीय वस्त्र बने। स्तनहार (स्वर्ण और मणियों की) कांति के फैलने से चंदन-लेप बने तथा उनकी देह को आवृत्त करने से वे (आभरण) उनकी सुन्दर चादर बन गये।
उन (रामचन्द्र) के दोनों अरुण नयनों से जो अश्रुजल बहा, उससे सब वस्तुएँ बह चलीं। रोमाँच ने उनकी देह को ढक दिया। सूखी हुई भुजाएँ, स्वेद से भर गईं या यह कहूँ कि ताप से तप्त हो रहीं। उस समय की उनकी दशा का मैं क्या वर्णन करूँ ?
राम की देह में ऐसी वेदन उत्पन्न हुई, मानो उसमें विष व्याप्त हो गया हो; जिससे वे दीर्घकाल तक, श्वास के साथ अन्धी हुई सी आँखें (मूर्च्छित हो) पड़े रहे। तब उस विशाल-नयन को सुग्रीव ने सँभाल लिया। तब उसके शरीर पर के रोंम (राम की देह में) चुभ गये।
सुग्रीव ने रामचन्द्र को सँभालकर बिठाया। उनके दुःख से स्वयं भी संतप्त होकर द्रवितचित्त हुआ और अश्रु बहाने लगा। वह यह कहकर विलाप कर रहा कि—हे दृढ़ कंधोंवाले ! मुख रूपी से इन आभरणों को देकर आपके प्राणों को हरा है।
हे श्रुति-शास्त्र-निपुण ! इस ब्रह्मांड में भी, परे जाकर हम आपकी देवी का अन्वेषण करेंगे। हम अपना पराक्रम दिखाकर आपकी कमल-मुखी को ला देंगे। आप क्यों व्याकुल होते हैं ?
लक्ष्मी के समान, और दिव्य सतीत्व से युक्त उस देवी को भय-त्रिकम्पित करनेवाले उस निष्ठुर पापी (रावण) की बीस भुजाएँ तथा दस सिर, आपके एक शर के लिए भी पर्याप्त लक्ष्य नहीं बन सकेंगे। सातों लोक भी क्या आपके एक बाण का लक्ष्य बनने की योग्यता रखते हैं ?
आप यहीं रहें। मैं अपने पराक्रम से चौदहों भुवनों में प्रवेश करूँगा और वहाँ देवी का अन्वेषण करूँगा। मेरी छोटी चेष्टा को भी देखिए मैं किस प्रकार आपकी पत्नी को यहाँ ले आता हूँ।