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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 465

किष्किन्धाकाण्डं ४५७

( सुग्रीव, उसके चार मंत्री, राम और लक्ष्मण ) वे सब ऐसे चले, जैसे भयंकर नेत्रवाला एक शरभ ( सुग्रीव ), दो पराक्रमी व्याघ्र ( नल और नील ), शीघ्र गतिवाले दो गज ( हनुमान् और तार ) तथा दो सिंह (राम और लक्ष्मण ) जा रहे हो। साल, हरे-भरे तमाल, ऐला, कदली, आम्र, नाग आदि वृक्षों से होकर पर्वत के सानु-मार्ग पर वे चले ।

उस मार्ग में हरिणनयनोवाली वानरियों के झूले लगे थे। जहाँ झूले नहीं थे, वहाँ हवा में स्पंदित होनेवाले पत्नों से शोभायमान चंदन के वृक्ष लगे थे। जहाँ चंदन के वृक्ष नहीं थे, वहाँ मेघों से आवृत सानु-प्रदेश थे। जहाँ वैसे सानु-प्रदेश नहीं थे, वहाँ सुरभिमय चंपक-उद्यान थे। जहाँ वैसे चंपक-उद्यान नहीं थे, वहाँ स्वर्ण से भरे टीले थे ।

धर्म-स्वरूप वे दोनों ( राम-लक्ष्मण ) वानर-वीरों के साथ उस पर्वत-मार्ग में कहीं उतरते, कहीं चढ़ते हुए जा रहे थे। उनके मुखर वीर-वलय अपार शब्द करते थे। उस शब्द को सुनकर सोये पड़े रहनेवाले मेघ भी मानो जग जाते थे और आकाश मे उड़ जाते थे।

मेघ ऊँचे आकाश में उड़ रहे थे। झरने झर रहे थे। पुन्नाग-वृक्षों से भरित सानुओ में फनवाले सर्प इनकी आहट पाकर हट जाते थे । मत्तगज इधर-उधर बिखर जाते थे। सिंह भाग जाते थे। सोतों में विचरण करनेवाली मछलियों के साथ जल-सर्प भी त्वरित गति से जाकर छिप जाते थे और व्याघ्रों के साथ काले मुखवाले लंगूर भी भाग जाते थे।

जब मदमत्त गज डालों पर के वृक्षों से टकराते थे, तब वज्रमय काले रंगवाले अगरु और चंदनवृक्ष टूटकर लुढ़क जाते थे, जिससे ( उनपर लगे हुए ) मधु के छत्ते बिखर जाते थे और उनसे मधु बह चलता था, उस मधु के कारण उस विकट पर्वत-मार्ग पर चलना कठिन हो रहा था ।

वहाँ चमकनेवाले रत्नसमुदाय, अपनी कांति को गगन तक फैला रहे थे और ऐसे लगते थे, मानो पर्वत पर अग्नि-ज्वाला फैल रही हो। स्वर्णमय टीलों की कांति इस प्रकार फैल रही थी, मानो उस अग्नि-ज्वाला को बुझाने के लिए जल-धाराएँ बह रही हो ।---उन धनुर्धारियों के मार्ग पर ऐसा दृश्य उपस्थित हो रहा था।

उस पर्वत पर के सब जलस्रोतों में आकाश-गंगा बहती थी। जलाशयों के मीन आसपास के वृक्षों पर झपटते थे। जल-स्रोत नदियों पर झपटते थे। हाथी एक दूसरे पर झपटते थे। पक्षी शालि के पौधों पर झपटते थे और लंगूर वृक्ष-शाखाओं पर झपटते थे ।

स्वर्गवासियों को भी आकृष्ट करनेवाली ऐला की सुगंधि से युक्त वे पर्वत-शिखर मधु के बहने के कारण पिच्छिल हो गये थे। उनपर जल के बहने से गगन के नक्षत्र भी फिसल जाते थे। आकाश में दिखाई पड़नेवाला इन्द्र-धनुष भी फिसल जाता था। धवल चंद्र-बिंब फिसल जाता था और अंतरिक्ष में संचरण करनेवाले ग्रह भी फिसल जाते थे।

इस प्रकार के पर्वत-मार्ग से चलनेवाले वे सब वीर दस योजन चलकर वाली के निवासभूत उस पर्वत के निकट पहुँचे, जो ऐसा था, मानों स्वर्णमय स्वर्ग ही उतर आया हो। फिर, वे अपने कर्त्तव्य का विचार करने लगे। (१-४२)