कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 466, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ वाली-वध पटल
उस समय, शत्रु-विजयी राम ने विचार कर तथा अपने निर्णय को उचित मानकर सुग्रीव से कहा—तुम जाकर वाली नामक उस अनुपम क्रूर विष के साथ युद्ध करो। उस समय मैं अलग एक स्थान पर रहकर (वाली पर) शर का प्रयोग करूँगा। यही मेरा निश्चित विचार है।
रामचन्द्र का वचन सुनते ही गगनगामी रथवाले (सूर्य) के पुत्र ने ऐसा बड़ा गर्जन किया कि उस शब्द को सुनकर तरंगों से पूर्ण जलधि भयभीत हो उठी। नीले मेघ लज्जित हो गये। भूमि के निवासी थरथराकर भागने लगे। स्वर्गवासी व्याकुल हुए। वह गर्जन ब्रह्माण्ड-भर में गूँज उठा।
सुग्रीव किष्किन्धा के निकट जा पहुँचा। अपना ओंठ चबाता हुआ उसने गर्जन के साथ वाली के प्रति यह कहा—यदि तुम युद्ध करने के लिए आओगे, तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा। यह कहकर वज्र के समान शब्दों में धमकी देता हुआ, पैर पटकता हुआ और भुजाओं को ठोंकता हुआ वह खड़ा रहा। यह ध्वनि किष्किन्धा में सोये हुए वाली के कानों में जाकर पड़ी और उसके वाम अंग फड़क उठे।
पर्यंक पर मानों एक क्षीरसमुद्र ही लेटा हो, यों पड़े हुए वाली ने सुग्रीव के गर्जन की उस महान् ध्वनि को सुना; जैसे हिंस्र सिंह ने किसी मत्तगज का चिंघाड़ सुना हो।
पर्वत-सदृश कंधोंवाला वाली, अपने भाई को युद्ध करने के लिए आया हुआ जानकर हँस पड़ा। उसकी उस हँसी से चौदहों भुवन तथा दिशाओं के परे रहनेवाले प्रदेश भी काँप उठे।
ऊँची तरंगों से पूर्ण समुद्र प्रलय-काल में उमड़ उठा हो, उसी प्रकार वाली उत्तर उठा। तब उसके भार से वह पर्वत धँस गया। उसकी बाँहों के हिलाने से जो हवा उठी, उससे समीपस्थ पर्वत बह गये।
उसका शरीर रोमाञ्चित हो उठा। तब उसके रोओं से चिनगारियाँ निकल पड़ीं। उसके नेत्र यों आग उगलने लगे कि वडवाग्नि की आँखें भी उसकी तीव्रता को देखकर अंधी हो जायें। उसके श्वास से धुआँ ऐसा उठा कि वह देवलोक के भी ऊपर पहुँच गया।
वाली ने हाथ से ताल ठोंका। उसे सुनकर दिशाओं के रक्षक गज भी मद्ररहित हो गये। वज्र शक्ति-हीन हो गये। ऊपर के लोक थरथरा उठे। धरती पर स्थिर खड़े हुए पहाड़ भी ढह गये।
वाली का यह शब्द कि, 'मै आ गया, मै आ गया'—पूर्व आदि अष्ट दिशाओं में गूँज उठा। वह उठ खड़ा हुआ। तब उसके मणिमय किरीट के स्पर्श से नक्षत्र झड़ पड़े।
उसके चलते समय हवा बड़े वेग से बह चली, जिससे पर्वत-समूह जड़ से उखड़