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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 549 में से

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पृष्ठ 467

किष्किन्धाकाण्ड ४५६

गये और दिशाओं की सीमा पर जा गिरे। उसके श्वेत रोमों से निकली हुई चिनगारियाँ ब्रह्मांड की भित्ति पर छा गईं। यम भी उन चिनगारियो को देखकर त्रस्त हो उठा। अन्य देवता लोग व्याकुल हुए। वाली के दाँतो के पीसने से जो अग्नि-कण निकले, वे वर्षाकाल मे बिजलियो-जैसे सर्वत्र झड़ पडे। उसके अत्युत्तम भुजा-वलयो के रत्न इस प्रकार चूर-चूर हो झड़ पडे, जैसे विद्युत् ही झड़ रही हो। वह सर्वभयंकर (वाली) उस कालाग्नि की समता करता था, जो प्रलय-काल में पृथ्वी, चारो दिशाओ के समुद्र और देवलोक तथा सृष्टि के कारणभूत तत्त्वो को जला देती है। वह उस (वाली) के द्वारा मथे गये क्षीरसागर से उत्पन्न हलाहल की भी समता करता था। उस समय, अमृत-सदृश, बाँस के जैसे कंधोवाली 'तारा' नामक स्त्री (वाली की पत्नी), उसके मार्ग मे आ खड़ी हुई। वाली के नेत्रो से निकलनेवाली चिनगारियो से उस (तारा) के लंबे केश झुलस गये। हे पर्वतवासी कलापी। मुझे मत रोको। हटो। जिस प्रकार क्षीरसागर का मंथन करके मैने अमृत निकाला था, उसी प्रकार युद्ध का आह्वान देनेवाले सुग्रीव के बल को मथकर उसके प्राणौ का पान करूँगा और शीघ्र लौट आऊँगा—यो वाली ने कहा। तब उसकी पत्नी ने कहा— हे विजयी प्रभु। वह (सुग्रीव) पूर्व-जैसा नही है। तुम्हारी पुष्ट भुजाओं की शक्ति से आहत होकर वह भागा था। अब उसे नई शक्ति कुछ नही मिली है। अपना यह जन्म छोड़कर कोई दूसरा जन्म भी उसने नही पाया है। फिर भी, वह पुनः युद्ध करने के लिए आया है। अवश्य ही उसे कोई बड़ा सहायक मिल गया है। अंतहीन तीनो लोको के रहनेवाले समस्त प्राणी भी यदि एक साथ मिलकर मुझसे युद्ध करने के लिए आयें, तो भी सब मुझसे हार जायेंगे। इसके जो कारण हैं, उन्हें तुम सुनो— मंदर-पर्वत को मथानी, वासुकि सर्प को रस्सी, चक्रधारी (विष्णु) को कटावदार खोरिया, चंद्र को आधार (लकड़ी का वह तख्ता, जो मथानी को खंभे से लगाये रखता है) बनाकर इन्द्र आदि देवता तथा उनके शत्रु असुर, क्षीरसागर को मथने लगे थे। किंतु, उस मथानी को घुमाने की शक्ति उनमें नही थी, इसलिए वे थक गये। तब मैने उन्हे देखा और स्वय क्षीरसागर को मथ डाला एवं उन्हे अमृत निकालकर दे दिया। ऐसी मेरी शक्ति को, हे कलापी-सदृश रूप तथा कोकिल-सदृश कंठ से युक्त रमणी ! क्या तुम भूल गई हो ? युद्ध मे मुझसे अनेक देव और असुर हार गये हैं। उनकी संख्या मै कैसे बताऊँ। यम भी मेरा नाम सुनकर थरथरा उठता है। ऐसा होने पर भी यदि कोई मेरे शत्रु (सुग्रीव) की सहायता करने के लिए आया हो, तो— वह बुद्धिहीन है। यदि मेरे साथ युद्ध करने के लिए कोई आ भी जाय, तो