कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
किष्किन्धाकाण्डं ४५७
( सुग्रीव, उसके चार मंत्री, राम और लक्ष्मण ) वे सब ऐसे चले, जैसे भयंकर नेत्रवाला एक शरभ ( सुग्रीव ), दो पराक्रमी व्याघ्र ( नल और नील ), शीघ्र गतिवाले दो गज ( हनुमान् और तार ) तथा दो सिंह (राम और लक्ष्मण ) जा रहे हो। साल, हरे-भरे तमाल, ऐला, कदली, आम्र, नाग आदि वृक्षों से होकर पर्वत के सानु-मार्ग पर वे चले ।
उस मार्ग में हरिणनयनोवाली वानरियों के झूले लगे थे। जहाँ झूले नहीं थे, वहाँ हवा में स्पंदित होनेवाले पत्नों से शोभायमान चंदन के वृक्ष लगे थे। जहाँ चंदन के वृक्ष नहीं थे, वहाँ मेघों से आवृत सानु-प्रदेश थे। जहाँ वैसे सानु-प्रदेश नहीं थे, वहाँ सुरभिमय चंपक-उद्यान थे। जहाँ वैसे चंपक-उद्यान नहीं थे, वहाँ स्वर्ण से भरे टीले थे ।
धर्म-स्वरूप वे दोनों ( राम-लक्ष्मण ) वानर-वीरों के साथ उस पर्वत-मार्ग में कहीं उतरते, कहीं चढ़ते हुए जा रहे थे। उनके मुखर वीर-वलय अपार शब्द करते थे। उस शब्द को सुनकर सोये पड़े रहनेवाले मेघ भी मानो जग जाते थे और आकाश मे उड़ जाते थे।
मेघ ऊँचे आकाश में उड़ रहे थे। झरने झर रहे थे। पुन्नाग-वृक्षों से भरित सानुओ में फनवाले सर्प इनकी आहट पाकर हट जाते थे । मत्तगज इधर-उधर बिखर जाते थे। सिंह भाग जाते थे। सोतों में विचरण करनेवाली मछलियों के साथ जल-सर्प भी त्वरित गति से जाकर छिप जाते थे और व्याघ्रों के साथ काले मुखवाले लंगूर भी भाग जाते थे।
जब मदमत्त गज डालों पर के वृक्षों से टकराते थे, तब वज्रमय काले रंगवाले अगरु और चंदनवृक्ष टूटकर लुढ़क जाते थे, जिससे ( उनपर लगे हुए ) मधु के छत्ते बिखर जाते थे और उनसे मधु बह चलता था, उस मधु के कारण उस विकट पर्वत-मार्ग पर चलना कठिन हो रहा था ।
वहाँ चमकनेवाले रत्नसमुदाय, अपनी कांति को गगन तक फैला रहे थे और ऐसे लगते थे, मानो पर्वत पर अग्नि-ज्वाला फैल रही हो। स्वर्णमय टीलों की कांति इस प्रकार फैल रही थी, मानो उस अग्नि-ज्वाला को बुझाने के लिए जल-धाराएँ बह रही हो ।---उन धनुर्धारियों के मार्ग पर ऐसा दृश्य उपस्थित हो रहा था।
उस पर्वत पर के सब जलस्रोतों में आकाश-गंगा बहती थी। जलाशयों के मीन आसपास के वृक्षों पर झपटते थे। जल-स्रोत नदियों पर झपटते थे। हाथी एक दूसरे पर झपटते थे। पक्षी शालि के पौधों पर झपटते थे और लंगूर वृक्ष-शाखाओं पर झपटते थे ।
स्वर्गवासियों को भी आकृष्ट करनेवाली ऐला की सुगंधि से युक्त वे पर्वत-शिखर मधु के बहने के कारण पिच्छिल हो गये थे। उनपर जल के बहने से गगन के नक्षत्र भी फिसल जाते थे। आकाश में दिखाई पड़नेवाला इन्द्र-धनुष भी फिसल जाता था। धवल चंद्र-बिंब फिसल जाता था और अंतरिक्ष में संचरण करनेवाले ग्रह भी फिसल जाते थे।
इस प्रकार के पर्वत-मार्ग से चलनेवाले वे सब वीर दस योजन चलकर वाली के निवासभूत उस पर्वत के निकट पहुँचे, जो ऐसा था, मानों स्वर्णमय स्वर्ग ही उतर आया हो। फिर, वे अपने कर्त्तव्य का विचार करने लगे। (१-४२)
अध्याय ७ वाली-वध पटल
उस समय, शत्रु-विजयी राम ने विचार कर तथा अपने निर्णय को उचित मानकर सुग्रीव से कहा—तुम जाकर वाली नामक उस अनुपम क्रूर विष के साथ युद्ध करो। उस समय मैं अलग एक स्थान पर रहकर (वाली पर) शर का प्रयोग करूँगा। यही मेरा निश्चित विचार है।
रामचन्द्र का वचन सुनते ही गगनगामी रथवाले (सूर्य) के पुत्र ने ऐसा बड़ा गर्जन किया कि उस शब्द को सुनकर तरंगों से पूर्ण जलधि भयभीत हो उठी। नीले मेघ लज्जित हो गये। भूमि के निवासी थरथराकर भागने लगे। स्वर्गवासी व्याकुल हुए। वह गर्जन ब्रह्माण्ड-भर में गूँज उठा।
सुग्रीव किष्किन्धा के निकट जा पहुँचा। अपना ओंठ चबाता हुआ उसने गर्जन के साथ वाली के प्रति यह कहा—यदि तुम युद्ध करने के लिए आओगे, तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा। यह कहकर वज्र के समान शब्दों में धमकी देता हुआ, पैर पटकता हुआ और भुजाओं को ठोंकता हुआ वह खड़ा रहा। यह ध्वनि किष्किन्धा में सोये हुए वाली के कानों में जाकर पड़ी और उसके वाम अंग फड़क उठे।
पर्यंक पर मानों एक क्षीरसमुद्र ही लेटा हो, यों पड़े हुए वाली ने सुग्रीव के गर्जन की उस महान् ध्वनि को सुना; जैसे हिंस्र सिंह ने किसी मत्तगज का चिंघाड़ सुना हो।
पर्वत-सदृश कंधोंवाला वाली, अपने भाई को युद्ध करने के लिए आया हुआ जानकर हँस पड़ा। उसकी उस हँसी से चौदहों भुवन तथा दिशाओं के परे रहनेवाले प्रदेश भी काँप उठे।
ऊँची तरंगों से पूर्ण समुद्र प्रलय-काल में उमड़ उठा हो, उसी प्रकार वाली उत्तर उठा। तब उसके भार से वह पर्वत धँस गया। उसकी बाँहों के हिलाने से जो हवा उठी, उससे समीपस्थ पर्वत बह गये।
उसका शरीर रोमाञ्चित हो उठा। तब उसके रोओं से चिनगारियाँ निकल पड़ीं। उसके नेत्र यों आग उगलने लगे कि वडवाग्नि की आँखें भी उसकी तीव्रता को देखकर अंधी हो जायें। उसके श्वास से धुआँ ऐसा उठा कि वह देवलोक के भी ऊपर पहुँच गया।
वाली ने हाथ से ताल ठोंका। उसे सुनकर दिशाओं के रक्षक गज भी मद्ररहित हो गये। वज्र शक्ति-हीन हो गये। ऊपर के लोक थरथरा उठे। धरती पर स्थिर खड़े हुए पहाड़ भी ढह गये।
वाली का यह शब्द कि, 'मै आ गया, मै आ गया'—पूर्व आदि अष्ट दिशाओं में गूँज उठा। वह उठ खड़ा हुआ। तब उसके मणिमय किरीट के स्पर्श से नक्षत्र झड़ पड़े।
उसके चलते समय हवा बड़े वेग से बह चली, जिससे पर्वत-समूह जड़ से उखड़
किष्किन्धाकाण्ड ४५६
गये और दिशाओं की सीमा पर जा गिरे। उसके श्वेत रोमों से निकली हुई चिनगारियाँ ब्रह्मांड की भित्ति पर छा गईं। यम भी उन चिनगारियो को देखकर त्रस्त हो उठा। अन्य देवता लोग व्याकुल हुए। वाली के दाँतो के पीसने से जो अग्नि-कण निकले, वे वर्षाकाल मे बिजलियो-जैसे सर्वत्र झड़ पडे। उसके अत्युत्तम भुजा-वलयो के रत्न इस प्रकार चूर-चूर हो झड़ पडे, जैसे विद्युत् ही झड़ रही हो। वह सर्वभयंकर (वाली) उस कालाग्नि की समता करता था, जो प्रलय-काल में पृथ्वी, चारो दिशाओ के समुद्र और देवलोक तथा सृष्टि के कारणभूत तत्त्वो को जला देती है। वह उस (वाली) के द्वारा मथे गये क्षीरसागर से उत्पन्न हलाहल की भी समता करता था। उस समय, अमृत-सदृश, बाँस के जैसे कंधोवाली 'तारा' नामक स्त्री (वाली की पत्नी), उसके मार्ग मे आ खड़ी हुई। वाली के नेत्रो से निकलनेवाली चिनगारियो से उस (तारा) के लंबे केश झुलस गये। हे पर्वतवासी कलापी। मुझे मत रोको। हटो। जिस प्रकार क्षीरसागर का मंथन करके मैने अमृत निकाला था, उसी प्रकार युद्ध का आह्वान देनेवाले सुग्रीव के बल को मथकर उसके प्राणौ का पान करूँगा और शीघ्र लौट आऊँगा—यो वाली ने कहा। तब उसकी पत्नी ने कहा— हे विजयी प्रभु। वह (सुग्रीव) पूर्व-जैसा नही है। तुम्हारी पुष्ट भुजाओं की शक्ति से आहत होकर वह भागा था। अब उसे नई शक्ति कुछ नही मिली है। अपना यह जन्म छोड़कर कोई दूसरा जन्म भी उसने नही पाया है। फिर भी, वह पुनः युद्ध करने के लिए आया है। अवश्य ही उसे कोई बड़ा सहायक मिल गया है। अंतहीन तीनो लोको के रहनेवाले समस्त प्राणी भी यदि एक साथ मिलकर मुझसे युद्ध करने के लिए आयें, तो भी सब मुझसे हार जायेंगे। इसके जो कारण हैं, उन्हें तुम सुनो— मंदर-पर्वत को मथानी, वासुकि सर्प को रस्सी, चक्रधारी (विष्णु) को कटावदार खोरिया, चंद्र को आधार (लकड़ी का वह तख्ता, जो मथानी को खंभे से लगाये रखता है) बनाकर इन्द्र आदि देवता तथा उनके शत्रु असुर, क्षीरसागर को मथने लगे थे। किंतु, उस मथानी को घुमाने की शक्ति उनमें नही थी, इसलिए वे थक गये। तब मैने उन्हे देखा और स्वय क्षीरसागर को मथ डाला एवं उन्हे अमृत निकालकर दे दिया। ऐसी मेरी शक्ति को, हे कलापी-सदृश रूप तथा कोकिल-सदृश कंठ से युक्त रमणी ! क्या तुम भूल गई हो ? युद्ध मे मुझसे अनेक देव और असुर हार गये हैं। उनकी संख्या मै कैसे बताऊँ। यम भी मेरा नाम सुनकर थरथरा उठता है। ऐसा होने पर भी यदि कोई मेरे शत्रु (सुग्रीव) की सहायता करने के लिए आया हो, तो— वह बुद्धिहीन है। यदि मेरे साथ युद्ध करने के लिए कोई आ भी जाय, तो
४६० कंब रामायण
वरदान के प्रभाव से उनके बल का अर्धांश मुझे मिल जायगा । अतः, कोई मेरे साथ क्या वैर कर सकता है ? तुम निश्चिन्त रहो ।—यों वाली ने तारा से कहा । यह सुनकर उस (तारा) ने कहा—हे प्रभु । अपने हितचिन्तक लोगों से मैंने सुना है कि राम नामक व्यक्ति उस (सुग्रीव) का प्राण-मित्र बन गया है। अब वही तुम्हारे प्राणहरण करने के लिए आया है। तब वाली ने तारा से कहा—हे पापिन् ! तुमने यह कैसा वचन कहा ? वह महाभाग (राम) पुण्य-पाप रूपी द्विविध कर्मों का अंत न देखकर, दुःखी होकर पुकारने- वाले प्राणियों को अपने आचरण के द्वारा धर्म का स्वरूप दिखाता है। ऐसे व्यक्ति के प्रति तुमने अनुचित वचन कहे। स्त्री-सुलभ अज्ञान के कारण तुमने कैसा अपराध कर दिया । इहलोक और परलोक, दोनों लोकों के फलों का विचार रखनेवाले उस महाभाग के लिए, तुम्हारा कथित यह कार्य क्या शोभा देनेवाला होगा ? ऐसा करने से उनको लाभ ही क्या होगा ? सब प्राणियों की रक्षा करनेवाला वह अपूर्व पदार्थ धर्म ही क्या स्वयं अपना नाश कर लेगा ? विशाल संसार के राज्य को प्राप्त करके जिसने अपनी माता की सपत्नी के कहने से उस राज्य को अपार आनन्द के साथ उसके पुत्र को दे दिया, उस प्रभु की स्तुति करना छोड़कर तुम (उनके संबंध में) इस प्रकार के निंदा-वचन कहने लगीं ? यदि सारे लोक एक साथ मिलकर सामना करने आयें, तथापि उनपर विजय पाने के लिए, उस (राम) के भयंकर कोदण्ड के अतिरिक्त अन्य किसी की सहायता आवश्यक नहीं है । वह प्रभु जिसकी समता करनेवाला वही है, अन्य कोई नहीं है, क्या क्षुद्रकार्य करनेवाले एक मर्कट (अर्थात्, सुग्रीव) के साथ मित्रता करेगा ? मेरे भाइयों के अतिरिक्त मेरे अन्य प्राण नहीं हैं—ऐसी भावना रखकर चलने- वाला तथा कृपापूर्ण समुद्र-जैसा वह प्रभु (राम), क्या मैं जब अपने भाई के साथ युद्ध करता रहूँगा, तब बीच में मुझपर बाण-प्रयोग करेगा ? तुम कुछ समय तक यहीं ठहरो। मैं एक पल में उस वैरी (सुग्रीव) के प्राण पीकर, उसके साथियों को भी मिटाकर लौट आऊँगा। व्याकुल मत हो ।—यों वाली ने कहा । इसके पश्चात् सुरभित केशोंवाली तारा डर से कुछ नहीं कह सकी और मौन रह गई। वाली, युद्ध के उत्साह से सत्वर ऊँचा चढ़ गया । उसकी बलशाली भुजाएँ देवलोक की सीमा से भी ऊपर उठ गईं। अपने कंधे-रूपी दो पर्वतों के साथ, प्रकृति के वैभव से संपन्न उस पर्वत पर से वह इस प्रकार निकला, जिस प्रकार प्राची के पुरातन पर्वत पर सूर्य उदित होता है। अपने पुष्ट कंधों से मनोहर और महान् पर्वत की समता करनेवाला वाली, क्रूर हिरण्यकश्यप के निर्देश पर बड़े स्तंभ से प्रकट होनेवाले महान् नरसिंह-जैसे उस पर्वत के एक भाग से ऐसे निकला कि देखनेवाले सभी मन में काँप उठे। गर्जन करनेवाले अपने अनुज को देखकर वह (वाली) भी गरज उठा । उसके गर्जन से भीत होकर स्वेद से भरे हुए मेघों से वज्र गिरे। उस गर्जन की ध्वनि सभी लोकों
किष्किन्धाकाण्ड ४६१
मे इस प्रकार व्याप्त हो गई, जिस प्रकार कालवर्ण पर्वत-सदृश विष्णु के चरण हो, जो लोकों को नापने के लिए बढ़ गये थे ।
उस समय, रामचन्द्र ने अपने प्रिय भाई (लक्ष्मण) से कहा—हे तात ! भली भाँति ध्यान से इसे देखो। दानवो और असुरों को रहने दो, सारे ससार मे कौन समुद्र ऐसा है, कौन मेघ ऐसा है, कौन पवन ऐसा है, अथवा कौन-सी ऐसी भयंकर प्रलयाग्नि है, जो इसकी देह की समता कर सके ?
तब उस महाभाग को देखकर अनुज (लक्ष्मण) ने उत्तर मे कहा—यह (सुग्रीव) अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्राणो का हरण करने के लिए यम को बुला लाया है। वानरो के लिए सहज, निंदा रहित युद्ध यह नही कर रहा है। यही बात मेरे मन मे खटकती है। [^१] इसके अतिरिक्त मै और कुछ भी सोच नही पा रहा हूँ।
अशान्त मन से (लक्ष्मण ने) फिर कहा—हे वीर ! धर्म के विरुद्ध विश्वासघाती कार्य करनेवालों पर विश्वास करना हितकारी नही है। यह (सुग्रीव) किसी शत्रु के समान, अपने भाई को ही मारने के लिए सन्नद्ध खड़ा है। भला यह पराये लोगो का सहायक किस प्रकार बन सकेगा ?
तब रामचन्द्र कहने लगे—हे तात ! सुनो, इन विवेकहीन मृगो के चारित्र्य के सबंध मे कुछ कहना ठीक नही है। यदि सभी माताओ के गर्भ से उत्पन्न कनिष्ठ पुत्र अपने बड़े भाइयो के अनुकूल ही आचरण करनेवाले होते, तो भरत अत्यत उत्तम सहोदर कैसे कहलाता ?
प्रकाशमान पर्वत-सदृश मनोहर कंधोवाले। यथार्थ यह है कि (इस ससार में) संपूर्ण रूप से धर्माचरण करनेवाले बहुत कम लोग हैं। विरुद्ध आचरण करनेवाले (अधार्मिक) व्यक्ति अनेक हैं। अतः, हम जिनसे मिलते हैं, उनमे विद्यमान सद्गुणो का ही ग्रहण करना चाहिए। सर्वथा निर्दोष कहलाने योग्य व्यक्ति (ससार मे) कौन है ?—यो राम ने कहा।
वे पराक्रमी वीर (राम-लक्ष्मण) जब आपस मे इस प्रकार के वचन कह रहे थे, तब रथ पर सचरण करनेवाले (सूर्य) का पुत्र और इन्द्र का पुत्र—दोनो, जो धरती पर चलने-फिरनेवाले महान् हिमाचल के जैसे थे, एक दूसरे से ऐसे टकराये, जैसे दो भारी दिग्गज हो।
जैसे एक पर्वत के निकट दूसरा पर्वत आ गया हो, वैसे ही वे दोनो परस्पर ममीप हो गये। जैसे हिंस्र तथा विजयी दो सिंह, एक दूसरे से लड़ने के लिए खड़े हो, वे दोनो वैसे ही लगते थे। वे दोनो, अनेक बार एक दूसरे के दाईं ओर बाईं ओर चक्कर लगाने लगे. जिस प्रकार दृढ बाहुओवाले कुम्हार के द्वारा घुमाया गया चाक हो ।
समीप आये हुए दो ग्रहो के समान स्थित वे दोनों, क्रोधाविष्ट होकर, परस्पर की भुजाओ से टकरा उठे। उनके पैर, जिनके भार से यह पुरातन धरती धँसी जा रही थी,
[^१]. भाव यह है—लक्ष्मण को यह बात खटक रही है कि सुग्रीव धर्म-युद्ध नहीं कर रहा है, बल्कि बाली को मारने के लिए रामचन्द्र को ले आया है। —अनु०
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परस्पर रगड़ा उठे, जिससे अग्निकण निकलकर अंतरिक्ष में ऐसे उड़ चले, जैसे उज्ज्वल विद्युत्-खंड उड़ रहे हों।
अत्यधिक भुजबल से युक्त, एक ही माता से उत्पन्न तथा एक ही मुग्धा स्त्री के लिए लड़नेवाले वे दोनों, (उनके शरीरों पर) फैली हुई रक्त रेखाओं से शोभित, उज्ज्वल नेत्रोंवाली सुन्दरी तिलोत्तमा के लिए लड़नेवाले प्राचीन काल के सुन्द-उपसुन्द नामक दो राक्षसों के जैसे लगते थे।
एक समुद्र को दूसरे समुद्र से लड़ते हुए, भूमि की रक्षा करनेवाले मेरुपर्वत को दूसरे मेरुपर्वत से लड़ते हुए, क्रोध को स्वयं दो रूप धारण कर आपस में युद्ध करते हुए, हमने कभी नहीं देखा है। अतः, इस संसार में उन बलवानों (वाली-सुग्रीव) के भयंकर युद्ध के लिए कोई उपमान भी हम नहीं दे सकते।
उन वानरों के नायकों (वाली-सुग्रीव) के नयनों से जो अग्नि-ज्वालाएँ उठीं, उनसे मेघ जल गये, पहाड़ जल गये, दिग्गज काँप उठे, धरती के चारों प्रकार के प्रदेश¹ अस्त-व्यस्त हो गये, अंतरिक्ष में रहनेवाले देवता दूर भागकर कहीं छिप गये।
देखनेवाले यह सोचकर विस्मय करते थे कि ये (वाली-सुग्रीव) अंतरिक्ष में हैं, ऊँचे पर्वत पर हैं, भूमि पर हैं, चारों दिशाओं की सीमाओं पर हैं अथवा हमारे नयनों में ही हैं; वे कहाँ खड़े हैं? (अर्थात्, वे दोनों इतनी त्वरित गति से लड़ रहे थे कि यह विदित नहीं होता था कि वे कहाँ खड़े हैं)। इस प्रकार, वे दोनों वानर एक दूसरे को मुष्टि से आहत करते थे और दाँतों से काटते थे, जिससे क्षत उत्पन्न होकर रक्त बह चलता था।
दसों दिशाओं में स्थित सातों समुद्र एक साथ गरज उठें, तो उनके उस गर्जन से भी पाँचगुना अधिक था उन दोनों वानर-नायकों का गर्जन-घोष। एक दूसरे की बड़ी भुजाओं और वक्ष पर वे तीव्र मुष्टि-प्रहार करते थे, तो उससे उत्पन्न शब्द युगात के मेघों के गर्जन की समानता करता था।
वे बलवान् वीर एक दूसरे पर झपटकर अपने कराल दाँतों से काटते थे। तब उनके क्षतों से बहकर रक्त सब दिशाओं में छितरा जाता था, जिससे अंतरिक्ष के सब नक्षत्र मंगल-ग्रह के समान हो गये—(मंगल-ग्रह रक्त कान्ति से चमकता है, उसी प्रकार अन्य नक्षत्रों की कान्ति भी रक्त वर्ण हो गई); बादल भी लाल आकाश-जैसे दीखने लगे।
जिस प्रकार अत्यधिक तपाये गये लौह-खंड को बड़े हथौड़े से मारने पर चिनगारियाँ छिटक उठती हैं, उसी प्रकार इन्द्र-पुत्र (वाली) की भुजाओं द्वारा रवि-पुत्र (सुग्रीव) के वक्ष पर दीर्घ करों का आघात होने से चिनगारियाँ निकल रही थीं।
वे दोनों एक दूसरे को छाती से ढकेलते, टाँगों को फैलाकर लात मारते, बड़े वेग के साथ हाथों से मारते, काटते, खड़े होकर टकरा जाते, पेड़ों से पीटते हुए चिल्लाते,
१. तमिल-साहित्य में चार प्रकार के प्रदेशों का वर्णन होता है, जिन्हें मुल्लै, कुरिंजी, मरुदम और नेयिदल कहते हैं। जो क्रमशः अरण्य-भूमि, पर्वतीय स्थान, खेती से भरी समतल भूमि और समुद्र-तट का प्रदेश होते हैं, पाँचवे प्रदेश पालै, अर्थात्, मरुभूमि का भी उल्लेख होता है। किंतु, वहाँ प्राणियों का निवास न होने से कदाचित् प्रस्तुत प्रसंग में उसे नहीं लिया गया है। —अनु०
किष्किन्धाकाण्ड / ४६३
शिलाओं को उखाड़कर एक दूसरे के शिर पर फेंकते और धमकी देकर डराते। ऐसे घूरते कि आँखों से चिनगारियाँ निकल पड़ती।
वे एक दूसरे को पकड़कर ऊपर उठाते, दूर फेक देते, फिर समीप आकर अपना वक्ष फुलाकर दिखाते। मुष्टि का ऐसा प्रहार करते कि हाथ शरीर मे गड़ जाता। अति वेग से लट्टू के समान दायें और वायें पैंतरे बदलने, एक दूसरे को रोककर खड़े हो जाते, पीछे हटते, (परस्पर की) भुजाओं को बंधन में बाँधकर नीचे गिर जाते।
कभी पूँछ से एक दूसरे के वक्ष को बाँधकर ऐसे खींचते कि उनकी हड्डियाँ भी चूर-चूर हो जाती। अपनी टाँग से दूसरे की टाँग को उलझाकर कष्ट देते। फिर, कुछ ढील देते। जैसे भाला तानकर मारा हो, ऐसे ही अतिदृढ तीक्ष्ण नखों से परस्पर की देह को चीर देते. जिससे शरीर का चर्म ऐसा फट जाता, जैसे पर्वत की कंदरा हो।
धरती मे गड़े हुए पर्वत, वृक्ष तथा दृष्टि मे पड़नेवाले सभी पदार्थों को वे अपने बलवान् हाथो से उखाड़-उखाड़कर फेंकते थे और उनसे आघात करते थे, जिससे वे (पर्वत, वृक्ष आदि) टूटकर कुछ अंतरिक्ष में अदृश्य हो जाते और कुछ समुद्र में जा गिरते।
उस युद्ध मे कोई किसी से हारा नही। दोनों उस युद्ध-जन्य उमंग से मत्त होकर लड़ रहे थे। उनके श्वेत रोमों से रक्त वर्ण अग्नि-कण निकल रहे थे, जैसे सूखी घास से भरी भूमि पर आग फैल रही हो। (उस भयंकर युद्ध को देखकर) देवता भी भय से व्याकुल हो उठे, तो अब उस युद्ध के बारे में और क्या कहा जाय ?
जब इस प्रकार वे दोनों बड़े पराक्रम से लड़ रहे थे, तब दीर्घ तथा पुष्ट भुजाओं तथा शत्रुध्वंसकारी पराक्रम से युक्त वाली ने सुग्रीव को अपने भयंकर नखों तथा करो से ऐसे मारा, जैसे सिंह हाथी को मारता है।
तब रविकुमार (सुग्रीव) बहुत पीड़ित हो उठा और श्रीराम के पास गया। तब रामचन्द्र ने उससे कहा—दुःखी मत होओ। मैं तुम दोनों में कोई अंतर नही देख सका। अब तुम वनपुष्पों की माला पहनकर जाओ—यों कहकर उन्होंने सुग्रीव को दुबारा भेजा। सुग्रीव फिर जाकर वाली से युद्ध करने लगा।
सुग्रीव, जिसके शिर पर की पुष्पमाला ऐसी थी, मानों उज्ज्वल नक्षत्रों की गूँथी हुई माला हो, अपने गर्जन से भयंकर व्याघ्र और मेघ-गर्जन को भी चकित करता हुआ त्वरित गति से आया और शत्रु-विनाशक वाली को मुक्कों से मार-मारकर त्रस्त कर दिया।
तब वाली मन में आशंकित हुआ। वह क्रोध के साथ इस प्रकार घूरा कि यम भी उससे डर गया। वह मदहास कर उठा। फिर, अपने दृढ हाथो और पैरो से सुग्रीव के मर्म-स्थानो में आघात किया, जिससे वह मूर्च्छित हो गया।
सुग्रीव अपने निःश्वासो के साथ प्राण भी उगलने लगा। उसके कानों और नेत्रो से अग्नि-ज्वालाओ के साथ रक्त की धारा भी बह चली। तब सूर्यपुत्र (सुग्रीव) चारो दिशाओ मे व्याकुल होकर देखने लगा और इन्द्रपुत्र (वाली) गर्व मे आगे बढ़कर अधिका-धिक प्रहार करने लगा।
(फिर) वाली ने, यह सोचकर कि इसे धरती पर पटककर मार दूँगा, अपने
४६४ । कंब रामायण
भाई की कटि और कंठ में अपने करो को डालकर ऊपर उठा लिया। इतने में रामचन्द्र ने एक बाण लेकर अपने धनुष पर चढ़ाया और उसकी डोरी के साथ अपने हाथ को भी पीछे खींचकर (बाण को) छोड़ दिया।
वह शर जल, जल के कारणभूत अग्नि, वेगवान् वायु, नीचे की पृथ्वी—इन चारों भूतो के बल से युक्त हो वाली के वक्ष को उसी प्रकार छेदकर चला, जिस प्रकार भली भाँति पके हुए कदली फल को सूई छेद देती है। अब और कहने को क्या शेष रह गया ?
वह वाली, जिसने भुजबल से रहित हुए अपने अनुज (सुग्रीव) पर करुणा-रहित होकर, दृढ भूमि पर पटककर उसे मार डालना चाहा था, (राम का शर लगते ही) अत्यन्त व्याकुल हुआ और युगांत के प्रभंजन के लगने से जिस प्रकार मेरुपर्वत जड़ से उखड़कर गिरता हो, उसी प्रकार गिर पड़ा।
वज्र के आघात से उखड़े हुए पर्वत के समान, धरती पर गिरे हुए, युद्ध में शत्रु-भयंकर वाली ने, सूर्य-पुत्र.(सुग्रीव) को पकड़े हुए अपने हाथों को शिथिल कर दिया। किंतु उग्र शर, जो उसके प्राणों को पकडे हुए था, उसे वह ढीला नही कर सका।
विजयशील महावीर (राम) का वह अमोघ बाण उस (वाली) के बलिष्ठ वक्ष में जा लगा। वाली ने उस बाण को (अपने वक्ष को छेदकर पीठ की ओर से) बाहर निकल जाने के पहले ही अपने बलिष्ठ हाथ से पकड़ लिया और अपनी पूँछ और पैरों से उसे बाँधकर रोक लिया। (उसके उस बल को देखकर) विजयी यमराज भी सिर हिलाने लगा (अर्थात्, यम भी वाली की प्रशंसा करने लगा।)
वाली कभी यह विचार कर कि मै उछलकर अंतरिक्ष रूपी ढक्कन से टकराकर उसे चूर-चूर करके गिरा दूँगा, ऊपर उछलता। कभी यह विचार कर कि एक उड़द के लुढ़क जाने के समय के भीतर ही (अर्थात्, क्षणार्ध में) समस्त दिशाओ को विध्वस्त कर दूँगा, आगे लपकता। कभी यह विचार कर कि पृथ्वी को समूल खोद डालूँगा, नीचे गिर जाता। कभी यह सोचने लगता कि मेरे वक्ष में घुस जानेवाले ऐसे (तीक्ष्ण) बाण का प्रयोग करनेवाला कौन है ?
वह धरती पर अपने हाथो को पटकता। चारो ओर आँख उठाकर यों घूरता कि उनसे चिनगारियाँ निकल पड़ती। उस उग्र बाण को अपने दोनो हाथों से पकड़कर पूँछ और पादों से दृढतापूर्वक खींचता। लेकिन, उस शर के न निकलने से अत्यत पीडित होता। फिर, पर्वत के समान लुढ़क जाता।
वह यों शका करता कि (उस शर का प्रयोग करनेवाले) कदाचित् कोई देवता ही हैं; फिर यह सोचता कि ऐसा कार्य करने की शक्ति क्या उन देवताओं में है? तो यह अन्य कौन है ?—यह विचार कर हँसने लगता। कभी यह कहता कि यह ऐसे व्यक्ति का ही कार्य होगा, जो त्रिदेवों की समता करता है।
मेरे वक्ष में लगा हुआ यह क्या (विष्णु का) चक्र ही है? या नीलकंठ (शिव) का त्रिशूल है? यदि उनमे से कोई नही है, तो क्या पर्वतो को ध्वस्त करनेवाले प्रसिद्ध इन्द्र
किष्किन्धाकाण्ड ४६५
के आयुध वज्र में इतनी शक्ति है कि वह मेरे वक्ष में प्रवेश कर सके ? यह क्या है ?—इस प्रकार सोच-सोचकर वाली व्यथित होता ।
अति वेग से अपने वक्ष में धँस जानेवाले उस शर को देखकर वाली यह सोचता हुआ आश्चर्य करने लगता कि यह बाण एक धनुष से प्रयुक्त हुआ हो, यह असम्भव है। तब क्या ऋषियों ने मन्त्रों के प्रभाव से इसे प्रयुक्त किया है ? फिर, दीर्घकाल तक अपने दाँतों को पीसता रहता ।
अब उसे यह ज्ञात हुआ है कि यह एक शर ही है। अनेक शंकाएँ करते रहने से क्या प्रयोजन है ? प्राणों के साथ मेरे वक्षःस्थल को छेद डालनेवाले इस अनुपम शर को दोनों हाथों, पूँछ और पैरों से निकालकर इसे प्रयुक्त करनेवाले वीर का नाम जान लूँगा— ( अर्थात्, शर पर लिखे नाम को पढ़कर उसके प्रयोक्ता को जान लूँगा )—यों विचार कर वह बाण को निकालने लगा।
अत्यधिक दृढता से युक्त मनवाले तथा अत्यन्त व्याकुलता से भरे सिंह-समान वाली ने उस शर को पकड़कर थोड़ा खींच लिया । वह दृश्य देखकर देवताओं, असुरों तथा अन्य लोगों ने विस्मय में पड़कर अपनी भुजाओं को फुला लिया । वीरों के प्रति विस्मय भी न दिखावे, ऐसे कौन होंगे ?
उस समय ( वाली के वक्ष से ) जो रक्त-प्रवाह हुआ, वह जंगलों और ऊँचे पर्वतों को लाँघकर वह चला, मानों वह समुद्र में जाकर मिलने के लिए ही बहा हो । क्या उसका ऐसा वर्णन करना उचित हो सकता है कि वह ( रक्त-प्रवाह ) ऊँची तरंगों से पूर्ण समुद्र-जैसे गर्जन करता हुआ, सब लोकों को पार कर उमड़ चला ?
सुरभित पुष्पहारों से भूषित ( वाली ) के वक्ष-रूपी पर्वत से बहनेवाले शब्दायमान रक्तप्रवाह को देखकर, सहोदरत्व-रूपी बंधन से बँधा हुआ उसका भाई सुग्रीव, अपनी पीली आँखों से प्रेमाश्रु बहाता हुआ धरती पर गिर पड़ा ।
मेरु को तोड़ने की शक्ति से युक्त वह यशस्वी ( अपने शरीर से ) निकाले हुए शर को अपने विशाल तथा बलवान् हाथो मे लेकर पहले यह सोचा कि मैं इसे तोड़ दूँगा । किन्तु, फिर यह कहता हुआ कि मेरे प्रयत्न करने से भी यह बाण टूटनेवाला नही हैं, उस पर अंकित नाम को देखने लगा ।
जो तीनों लोकों के लिए मूलमंत्र है, जो उसका जप करनेवालों को स्वय को ही (अर्थात्, अपने वाच्य भगवान् को ही) पूर्ण रूप से दे देता है, जो इसी जन्म में सातों प्रकार की ( योनियों १ मे जन्म लेने की ) व्याधियों से मुक्ति देनेवाला औषध हैं, उस अनुपम महिमामय राम-शब्द को वाली ने अपनी आँखों से देखा ।
गृहस्थ-धर्म का त्याग कर ( वनवास मे ) आये हुए तथा मेरे जैसे व्यक्ति के लिए अपने कुल-क्रमागत धनुर्युद्ध के धर्म को भी छोड़नेवाले, ऐसे वीर के उत्पन्न होने के कारण, वह सूर्यवंश भी, जिसने वेद-प्रतिपादित धर्म को कभी नहीं छोड़ा था, आज सनातन धर्म से
१. सात योनियां—मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, रेंगनेवाले प्राणी, स्थावर और जलचर ।—अनु०
४६६ | कंब रामायण
रहित ही गया।—यों विचार कर वह (वाली) हँस पड़ा और फिर मन में लज्जा से भर गया।
बड़ी पीड़ा से शिथिल हो पड़ा हुआ वह वाली, जो एक बड़े गड्ढे में गिरे हुए बलवान् मत्तगज के समान था, मन में लज्जा से भरकर अपने किरीट-भूषित शिर को झुकाता, अट्टहास करता, फिर (मौन हो) सोचता और विचार करता कि क्या इस प्रकार शर का प्रयोग करना धर्म हो सकता है ?
यदि सब (लोकों) के प्रभु (राम) ही धर्म से च्युत हो गये, तो निम्न व्यक्तियों का स्वभाव कैसा होगा ? मेरे विषय में इन प्रभु ने अन्याय कर दिया है।—ऐसे वचन मुँह से बोलनेवाले उस (वाली) के सम्मुख वे रामचन्द्र आ उपस्थित हुए, जो वेद-प्रतिपादित सत्य और क्षत्रियों के लिए विहित प्राचीन धर्म को अस्खलित रूप में सुरक्षित रखने के लिए अवतीर्ण हुए थे।
वाली ने अपनी आँखों के सामने उस विष्णु के अवतार (राम) को देखा, जो ऐसा था, मानों वर्षाकालिक नीलजलद-धनुष को धारण किये, अपने पार्श्व में विकसित स्वर्ण-वन (लक्ष्मण) के साथ, धरती पर उतर आया हो। उस (वाली) ने अपनी आँखों से, घावों से बहनेवाले रुधिर के सदृश ही रक्तवर्ण अग्नि-कणों को निकालते हुए राम को देखा और कहा—'तुमने क्या सोचा ? क्या किया ?' फिर उनकी निंदा में कहने लगा—
सत्य तथा कुल-धर्म की रक्षा करने के लिए अपने उत्तम प्राणों को भी छोड़ने-वाले उदारगुण एवं पवित्रात्म (दशरथ) के हे पुत्र ! तुम भरत से पूर्व (अर्थात्, भरत का बड़ा भाई होकर) जनमे। यदि दूसरों को बुरा काम करने से रोककर स्वयं बुरा काम करो, तो क्या वह पाप नहीं माना जायगा ? संसार के लिए मातृ-वात्सल्य के साथ निष्ठा तथा धर्म का भी निर्वाह करनेवाले (हे राम) ! कहो तो।
उच्च कुल तुम्हारा है। श्रेष्ठ विद्या तुम्हारी है। विजय तुम्हारी है। उचित सत्कर्म तुम्हारे हैं। त्रिभुवन का नायकत्व भी तुम्हारा ही है न ! बल तुम्हारा। इस संसार की रक्षा करनेवाली महिमा भी तुम्हारी। तो भी सबको विस्मृत-सा करके, इस सारी महिमा को विनष्ट करनेवाला ऐसा कार्य करना क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
हे चित्र में अंकित करने के लिए दुष्कर सौंदर्य से विशिष्ट ! तुम्हारे कुल के सब लोगों के लिए क्षत्रिय-धर्म स्वल्प बना हुआ है न ? तो अब क्या तुम अपने प्राण-समान, हंसिनी-तुल्य, जनक की पुत्री, जो तुम्हें अमृत के सदृश प्राप्त हुई थी, उस देवी को खोकर अपने कर्त्तव्य से भी भ्रांत हो गये हो ?
यदि राक्षस तुम्हारा अहित करें, तो उसके बदले, उनके मित्र एक वानर-राजा को मार दो—क्या यही तुम्हारे मनु-धर्मशास्त्र में लिखा है ? क्या नामरूप गुण को तुमने कहीं खो दिया ? मुझमें तुमने कौन-सा दोष देखा ? हे तात ! तुम्हीं यदि ऐसे अपयश का भाजन हो जाओगे, तो यश को धारण करनेवाला और कौन होगा ?
हे कुलनाथ ! सदाचारित ! शब्दायमान समुद्र से आवृत पृथ्वी पर दौड़ते, उछलते रहनेवाले वानरों के मध्य ही क्या कलिकाल आ गया है ? क्या सत्कर्म तथा उच्चवर्गीय कुल
किष्किन्धाकाण्ड ४६७
बलहीनों के पास ही रहने योग्य हो गये हैं ? यदि बलवान् लोग नीच कार्य करेंगे. तो उससे क्या उन्हें अपयश न होकर सुयश प्राप्त होगा ?
हे ( युद्ध में ) किसी की सहायता की अपेक्षा न रखनेवाले वीर ! पिता से दिये गये ऐश्वर्य को उसी समय अपने भाई का स्वत्व बनाकर तुम वनवास के लिए आये । इस प्रकार नगर में तुमने एक ( विलक्षण ) कार्य किया, किंतु मेरे अनुज को यह राज्य देकर वन मे तुमने एक दूसरा ही कार्य किया, इससे बढ़कर भी क्या कोई कार्य हो सकता है ? ( यहाँ वाली व्यंग्य करता है। )
मुखर वीर-वलय तथा विजयमाला को धारण करनेवाले वीर लोग जो भी काम करते हैं, वह वीरों के योग्य ही तो माना जायगा । सब पुरातन शास्त्रों के प्रभु बने हुए तुमने यदि मेरे विषय में ऐसा क्षुद्र कार्य किया है, तो हे क्रोधरहित ! अब लङ्काधिप के अधर्म-कृत्य पर तुम कैसे क्रोध कर सकते हो ?
जब दो व्यक्ति युद्ध करने में निरत हों, तब उन दोनों को समान रूप से न देखकर यदि एक पर दया दिखायो और दूसरे पर आड़ में खड़े होकर अपने दृढ धनुष को भली भाँति झुकाकर तीक्ष्ण बाण को मर्म-स्थान में प्रयुक्त करो, तो क्या यह धर्म है अथवा और कुछ है ? जैसे भी हो. ऐसा पक्षपात अनुचित है ।
( तुम्हारे इस कार्य मे ) वीरता नहीं है । ( शस्त्र मे ) विहित विधि भी नहीं है। वह सत्य में सम्मिलित होनेवाला कार्य भी नहीं है। तुम्हारा स्वत्व बनी हुई इस पृथ्वी के लिए मेरा यह शरीर भारभूत भी नहीं है। मैं तुम्हारा शत्रु भी नहीं हूँ । तो, सद्गुण का त्याग कर ऐसा दया-रहित कार्य तुमने क्यों किया ?
द्विविध कर्मों ( इस लोक के और परलोक के लिए हितकारी कर्म ) का भली भाँति विचार करके, सबके लिए ( अर्थात्, शत्रु. मित्र और तटस्थ—तीनों प्रकार के लोगों के लिए ) समान रूप से उत्तम कार्य करना ही तो धर्म की रक्षा है और उसी में महत्त्व है । अन्यथा पक्षपात से एक को सहायता पहुँचाना क्या धर्म माना जा सकता है और क्या ऐसा करके कोई अपने को दोष से मुक्त रख सकता है ?
तुम्हारी रक्षा को दूरकर ( सीता का ) अपहरण करनेवाले शत्रु ( रावण ) को विनष्ट करने के लिए यदि तुम किसी दूसरे की सहायता पाना चाहते हो, तो तुम्हारा यह कैसा प्रयत्न है कि काले मेघ-जैसे हाथी के प्राण पीनेवाले, क्रोध से उमड़नेवाले सिंह को छोड़कर, तुम एक मगर को अपना साथी बना रहे हो ?
विश्व में विचरण करनेवाले चन्द्र में प्राचीन काल से ही कलङ्क लगा है, कदाचित् यह देखकर ही सूर्य के वंश में तुमने जन्म लेकर उस वंश के लिए भी एक अमिट कलङ्क उत्पन्न कर दिया है ।
युद्ध के लिए किसी दूसरे के आह्वान करने पर मैं यहाँ आया था । तुमने छिप-कर मेरा प्राण-हरण किया । अब जब मैं धरती पर गिरा हूँ, तब तुम दूसरों की दृष्टि में सिंह बनकर यहाँ आ खड़े हुए हो। वाह !
हे प्रतापी वीर ! शास्त्र-विधान की, अपने वंश के पितृ-पितामहों के शील तथा
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स्वभाव की रक्षा किये विना, तुमने (मुझे निहत करके) वाली को नहीं, किंतु राजधर्म की बाड़ को ही गिरा दिया है।
किसी ने तुम्हारी पत्नी का हरण किया, तो तुमने किसी दूसरे पर हाथ उठाया। तुम्हारे हाथ का भार बना हुआ यह धनुष वीरता के लिए कलंक है। तुम्हारी धनुर्विद्या की प्रवीणता, क्या सामने न आकर आड़ में खड़े होकर एक निःशस्त्र के वक्ष में शर छोड़ने के लिए ही है ?
यों अपने दाँतों को पीसता हुआ और अपनी आँखों से चिनगारियाँ निकालता हुआ वाली बोला। तब उसके सामने खड़े हुए महावीर (राम) कहने लगे—
जब तुम (मायावी का पीछा करते हुए) गुहा के भीतर गये थे और अनेक दिनों तक नहीं लौटे थे, तब दुःखी होकर सुग्रीव भी उसी गुहा में जाना चाहता था। उसे देखकर तुम्हारे कुल के बुद्धिमान् वृद्धों ने समझाया कि हे स्वर्णहार-भूषित (सुग्रीव) ! हमारी बात सुनो। अब तुम्हारा राजा बनना ही उचित है।
इसपर सुग्रीव ने कहा—मेरे ज्येष्ठ भ्राता वाली को मायावी ने मारकर वीर-स्वर्ग का शासन दिया है, अतः मैं उस मायावी को उसके परिवार-सहित मिटा दूँगा। या स्वयं प्राण-त्याग करूँगा। मैं जीवित रहकर राज्य करना नहीं चाहता। आपके वचन मेरे लिए योग्य नहीं हैं।
तब उत्तम सेनापतियों और सर्वज्ञ तथा अनुभवी वृद्धों ने उसका मार्ग रोककर समझाया—तुम्हारा राज्य करना ही सब प्रकार से उचित है। तब उस दोषहीन (सुग्रीव) ने विजय-किरीट धारण किया।
वह (सुग्रीव) तुम्हें लौट आया देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तुम्हें नमस्कार कर निवेदन किया—हे प्रभु, यह तुम्हारा राज्य है, जिसका भार वृद्धों ने मुझपर हठ करके रखा है। इस प्रकार, गर्वरहित सुग्रीव ने पूर्व-घटित सारा वृत्तांत तुमसे निवेदन किया था। किंतु तुम उसपर क्रुद्ध हुए और—
उसको निरपराध जानकर भी उसपर तुमने दया नहीं की। जब वह तुमसे यह प्रार्थना कर रहा था कि मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मेरे अपराध को क्षमा करो, तब भी उसको क्षमा न करके तुमने बड़े क्रोध के साथ उसे मारा-पीटा।
बल-समृद्ध सुग्रीव, यह कहकर कि मैं तुम्हारे साथ युद्ध में पराजित हो गया हूँ, अपने शिर पर हाथ जोड़े खड़ा रहा, किंतु तुम उसके प्राण यम को सौंप देना चाहते थे। तब वह चारों दिशाओं में भागने लगा था।
उसे उस प्रकार भागते जानकर भी तुमने उसपर दया नहीं की। यह विचार न करके कि वह तुम्हारा अनुज है, तुम उसका पीछा करने लगे। फिर मुनि के शाप से सुरक्षित पर्वत (ऋष्यमूक) पर जब सुग्रीव चला गया, तब तुम वहाँ से हटे।
दया, कुलीनता, वीरता, विद्या और उसके द्वारा प्राप्त नीति—इन सबका प्रयोजन तो यही है कि पर-नारी के शील की रक्षा करे।
यदि स्वच्छ विवेकवाला भी यह सोचकर कि मैं बड़ा बलवान् हूँ, अपने मन को
किष्किन्धाकाण्डं ४६२
कुमार्ग पर चलाये और बलहीनों पर क्रोध करे, तो वह वीरधर्म से च्युत हो जाता है। ऐसे ही यदि कोई पर-पुरुष की सुरक्षित शीलवाली स्त्री के चारित्र्य को मिटाता है, तो वह भी धर्म से च्युत होता है।
धर्म क्या है?—तुमने यह नहीं सोचा। इहलोक तथा परलोक के फलों (यश और पुण्य) का विचार भी नहीं किया। यदि तुमने यह सोचा होता, तो क्या अधर्मता के साथ अपने छोटे भाई की प्राण-समान पत्नी की संगति प्राप्त करते ?
इन कारणों से, तथा उस सुग्रीव के मेरे प्राणसम मित्र होने से, मैंने तुम्हारे प्राण हरण किये। इतना ही नहीं, पराया होने पर भी, बलहीनों के दुःख को दूर करना ही मेरा ध्येय है।
तुम्हारा यही अपराध है। जब अतिसुन्दर महावीर राम ने इस प्रकार कहा, तब अनुचित कार्य करनेवाला वाली फिर कहने लगा—तुम्हारा यह कथन मेरे लिए लागू नहीं होता। क्योंकि, हम वानरों के लिए अपनी इच्छा के अनुकूल कार्य करना कुछ अधर्म नहीं होता।
वाली ने कहा—हे प्रभु ! पातिव्रत्य धर्म तथा उसके अनुकूल अन्य सद्गुणों से युक्त कर्म, तुम्हारे असत्य-रहित कुल की स्त्रियों के लिए, कमलभव (ब्रह्मा) ने जिस प्रकार विवाह का विधान किया है, उसी प्रकार हमारे कुल की स्त्रियों के लिए नहीं किया। किंतु, हमारे यहाँ जब जैसा संयोग मिले, तब वैसा ही संबंध करने का विधान है।
हे शत्रुओं की मज्जा तथा घृत से लिप्त चक्रायुध धारण करनेवाले ! हमारा मन जैसा चाहता है, वैसा ही हमारा आचरण भी होता है। इसके अतिरिक्त, हम वानरों के लिए वेद-प्रतिपादित विवाह का कोई विधान नहीं है। कुल-परंपरागत गुण भी हममें नहीं होते।
मुझे जीतनेवाले हे विजयशील ! यही हमारे कुल की नीति है। अतः, मैंने अपने कुल-धर्म के अनुसार कोई पाप नहीं किया है। यह तुम समझ लो। वाली के यह कहने पर रामचन्द्र ने उत्तर दिया—
तुम उत्तम गुणवाले देवों के पुत्र बनकर उत्पन्न हुए हो और शाश्वत धर्म-मार्ग के ज्ञाता हो। तुम मृग नहीं हो। अतः, विजय-मालाओं से भूषित रहनेवाले तुम-जैसे वीर के लिए ऐसा कार्य अनुचित ही है।
क्या धर्म, पंचेंद्रियों के वशीभूत शरीर से ही संबंध रखता है ? क्या वह विषयों का विवेचन करनेवाले विवेक से संबंध नहीं रखता है ? तुमने तो (शरीर से वानर होने पर भी विवेक से) धर्म के महत्त्व को भली भाँति जाना है। अतः, क्या पापकर्म करना तुम्हारे लिए उचित है ?
वह गजेंद्र भी जन्म से मृग-जाति का ही तो था, जिसने एक मगर से ग्रस्त होकर शंखधारी विजयशील भगवान् (विष्णु) को पुकारा था और अपने अनुपम विवेक के कारण मोक्ष-पद प्राप्त किया था।
मेरे पितृ-तुल्य वह जटायु भी तो एक गृद्ध ही था, जिसने धर्म-मार्ग में अपने मन
४७० | कंब रामायण
को निरत रखकर स्वर्ण-कंकण-धारिणी लक्ष्मी (-सदृश सीता) के दुःख को दूर करने के प्रयत्न में भयंकर युद्ध किया था और इस संसार से मुक्ति प्राप्त की थी ।
पशुओं का स्वभाव ऐसा होता है कि वे भले और बुरे के विवेक से हीन रहकर जीवन व्यतीत करते हैं । किंतु, तुम्हारे मुख से निकले वचन ही बता रहे हैं कि चिरंतन धर्म का ऐसा कोई मार्ग नहीं है, जिसे तुमने नहीं जाना हो ।
यह उचित है, यह अनुचित है—इस प्रकार का विवेक किसी व्यक्ति में भी न हो, तो वह भी पशु ही होता है। यदि कोई पशु भी मनु के बताये मार्ग पर चले, तो वह देव-तुल्य हो जाता है ।
तुमने यम के प्रभाव को भी मिटा देनेवाले, परशु धारण करनेवाले शिव के प्रति जो भक्ति की थी, उसी के फलस्वरूप, विष्णु के द्वारा सृष्ट चार महाभूतों की शक्ति प्राप्त की थी।
जन्म से नीच कहे जानेवाले, धर्म-मार्ग पर चलनेवाले, निष्पाप तपस्या करनेवाले, अनेक गुणों से युक्त देवता तथा पाप-कृत्य करनेवाले—इन सब लोगों में भी बुरे आचरण करनेवाले होते हैं ।
अतः, किसी भी कुल में उत्पन्न व्यक्ति की महत्ता या क्षुद्रता उसके कार्य से ही होती है। यह जानते हुए भी तुमने अन्य की पत्नी के शील को मिटाया—इस प्रकार, मनु-नीति पर दृढ रहनेवाले (राम) ने कहा।
(रामचन्द्र का) यह कथन सुनकर कपियों के राजा वाली ने राम से पूछा—हे प्रभु ! ऐसी बात है, तो तुम को युद्ध-क्षेत्र में आकर मुझसे युद्ध करते हुए बाण छोड़ना चाहिए था। किंतु, ऐसा न करके, कहीं छिपकर धनुष से शर का प्रयोग तुमने क्यों किया?—इस प्रश्न का उत्तर लक्ष्मण देने लगा ।
तुम्हारा भाई (सुग्रीव), पहले ही उन (राम) की शरण में आ गया था। तब उन्होंने उसे यह वचन दिया था कि नीति से भ्रष्ट हुए तुमको वे निहत करेंगे। यदि वे युद्ध-क्षेत्र में तुम्हारे सम्मुख आते, तो कदाचित् तुम भी अपने प्राणों के मोह से उनकी शरण माँगते—यही सोचकर मेरे भ्राता ने तुम्हारे सामने न आकर छिपकर शर-संधान किया।
कपिकुल के प्रभु वाली ने, जिसने शास्त्रों का ज्ञान रूपी संपत्ति प्राप्त की थी, लक्ष्मण के कथन को हृदयंगम किया और यह जानकर कि अति महिमावान् रामचन्द्र धर्म का विनाश कभी नहीं करेंगे, शांत हो गया और (राम के प्रति) सिर नवाकर क्षुद्र विचारों से हीन वाली कहने लगा—
हे पुरुषोत्तम ! तुम प्राणियों पर मातृ-समान प्रेम रखते हो। धर्म, निष्पक्षता आदि सद्गुणों की साकार मूर्ति हो । (वेद-प्रतिपादित) सन्मार्ग के अनुसार देखा जाय, तो हम श्वान-समान हैं, और हम दोषहीन भी नहीं हैं। हमारे पापों को क्षमा करो।
फिर, रामचन्द्र से वाली ने प्रार्थना की—हे प्रभु ! मुझे विवेकहीन वानर तथा श्वान-सदृश तुच्छ व्यक्ति समझकर मेरे वचनों को मन में न रखो। दुःखद जन्म-व्याधि के लिए अपूर्व औषधि-समान मेरे स्वामी । सब अभीष्टों को देनेवाले हे उदार ! मेरी एक बात सुनो—यह कहकर वाली फिर बोला—
किष्किन्धाकाण्डं ४७१
संधान कर प्रयुक्त किये गये वाण से मुझे आहत कर, प्राण छूटने के समय, श्वान-सदृश मुझ क्षुद्र व्यक्ति को तुमने आत्मज्ञान प्रदान किया। त्रिदेव तुम्ही हो। आदि परब्रह्म तुम्ही हो। पाप और पुण्य भी तुम्ही हो। शत्रु और मित्र भी तुम्ही हो। अन्य सब भी तुम्ही हो।
तुम्हारे शर ने, त्रिपुर-दाह करनेवाले (शिव) आदि देवो के द्वारा मुझे दिये गये सब वरो को निष्फल बनाकर मेरे दोषहीन दृढ वक्ष मे प्रविष्ट होकर मेरे प्राणो को पी लिया। तुम्हारे ऐसे शर के अतिरिक्त अन्य पृथक धर्म क्या है ? (अर्थात्, तुम्हारा शर स्वय धर्म-स्वरूप है।)
हे देव। विचार करने पर ज्ञात होता है कि अति-बलिष्ठ शूल को धारण करने-वाले (शिवजी), उनकी प्रार्थना करनेवाले सब लोगो को श्रेष्ठ वर देते हैं, तो वह तुम्हारे अनुपम नाम का जप करने के ही प्रभाव से ऐसा करते हैं। वैसे प्रभावशाली नाम के विषयभूत तुमको प्रत्यक्ष देखने पर अब मेरे लिए दुष्प्राप्य फल क्या रह गया ? (अर्थात्, मेरी सब अभिलाषाएँ पूर्ण हो गइ।)
तुम सब प्राणी, सब पदार्थ-समूह, सब ऋतुएँ तथा उन ऋतुओ के फल बनकर इस प्रकार व्याप्त रहते हो, जिस प्रकार पुष्प के भीतर सुगंधि रहती है। हे अनुपम ! तुम कौन हो और तुम्हारा रूप क्या है?—यह मेरे ज्ञान ने मुझे जता दिया। अब क्या शाश्वत परमपद भी मेरे लिए दुष्प्राप्य हो सकता है ? (अर्थात्, वह भी सुलभ है।)
सद्धर्म को ही अपना स्वरूप बनाये रहनेवाले तुमको मैने देख लिया है। अब मुझे और क्या देखना शेष रह गया है ? मेरा बहुत बड़ा दीर्घकालिक कर्मजात आज समाप्त हो गया (अर्थात्, अब मै उस कर्म-बधन से मुक्त हो गया)। तुम्हारा दिया हुआ यह दड ही मुझे सद्गति देनेवाला है।
हे गगन से भी उन्नत महत्त्व और विजय से युक्त नरेश। मेरा भाई मुझे मरवाने के लिए तुम्हे ले आया और तुच्छ वानरो की अच्छी मत्रणा से शासित किये जानेवाले मेरे इस चिरकालीन क्षुद्र राज्य को स्वयं लेकर मुझे मुक्ति का राज्य दिया है। इससे बढकर मेरा और क्या उपकार हो सकता है ?
हे चित्र-सदृश आकारवाले। इस दास को तुमसे कुछ माँगना है। मेरा भाई (सुग्रीव) पुष्प-मधु का पान करने से कभी विकृतबुद्धि होकर कोई अपराध भी कर दे, तो उसपर तुम क्रोध मत करना और जिस शर-रूपी यम का प्रयोग मुझपर किया है, उसका प्रयोग उसपर मत करना।
एक और प्रार्थना है। तुम्हारे भ्राता लोग यह सोचकर कि उसने अपने बडे भाई को मरवा डाला है, मेरे भाई को कभी अपमानित न करें। हे उत्तम गुणवाले ! तुम उन्हे वैसा करने से रोकना। हे प्रभु ! तुमने पहले इसके कार्य को पूर्ण करने का वचन दिया था, अतएव इसने जो किया है (अर्थात्, अपने बडे भाई को मरवाया), वह भाग्य का ही खेल है। क्या भाग्य के परिणाम से मुक्त होना संभव है ?
हे विजयी प्रभु ! मुझसे और कुछ नही हो सकता था, तो भी मै अपने वानर
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जन्म के योग्य, कम-से-कम इतना कार्य तो कर दिखाता कि उस मायावी राक्षस (रावण) को अपनी पूँछ में बाँधकर तुम्हारे सम्मुख ला खड़ा कर देता। मेरा उतना भी भाग्य नहीं हुआ। पर जो बीत गया, उसके बारे में कहने से कुछ लाभ नहीं। कोई कार्य पूरा करवाना हो, या कुछ महत्त्व का कार्य हो, तो उसे करने के लिए यह हनुमान् योग्य व्यक्ति है।
हे चक्रधारी ! हनुमान् को तुम अपने अरुण हस्त में रखा हुआ धनुष समझो। इसके सदृश सहायक अन्य कोई नहीं है। नभ से भी उन्नत कंधोंवाले। तुम उस देवी (सीता) का अन्वेषण करके उसे प्राप्त करो।
राम के प्रति ये वचन कहकर, उस वाली ने, अपनी दोनों बाँहों को बढ़ाकर निकट-स्थित अपने भाई का आलिंगन किया और कहा—हे तात ! तुम्हें कहने योग्य एक हित-वचन है। उसे अपने मन में ठीक से बिठा लो। हे पर्वतोन्नत कंधोंवाले ! मेरी मृत्यु पर तुम शोक मत करना। यह कहकर वह फिर आगे बोला—
हे अधिक विवेकवाले ! जिस परम तत्त्व के बारे में वेद, शास्त्र, मुनि तथा कमलासन ब्रह्मा आदि वर्णन करते हैं, वही परब्रह्म धर्म-मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए शब्दायमान वीर-कंकणधारी राम के रूप में अवतीर्ण हुआ है और शत्रुनाशक धनुष लेकर यहाँ आया है। इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम इसे भली भाँति जान लो।
हे स्वर्णमय पर्वत-सदृश अति उज्ज्वल कंधोंवाले ! शाश्वत आनंद (अर्थात्, मुक्ति) रूपी संपत्ति की कामना करके, उसके योग्य मार्ग पर चलनेवाले सब प्राणी इसी का नाम जपते हैं। इसी का ध्यान करते हैं। इस बात को तुम जान लो। यदि इसके सामान्य गुणों का ही विचार करें, तो भी इसके प्रभाव का प्रमाण देने के लिए इतना पर्याप्त है कि इसने मुझे मारा है। इससे बढ़कर और कोई प्रमाण आवश्यक नहीं।
हे तात ! जो वंचक हैं, जिन्होंने असंख्य असाध्य पाप किये हैं, वैसे जन भी इस उदार के शर-प्रयोग से मारे जाकर अति उत्तम मुक्ति-पद को प्राप्त करते हैं, तो उन लोगों के द्वारा मुक्ति-पद प्राप्त करने के बारे में कहना ही क्या है, जो इनके उभय चरणों की सेवा में निरत रहते हैं ?
जब भाग्य ही स्वयं सहायता देने के लिए प्रस्तुत हो, तो फिर दुर्लभ वस्तु क्या हो सकती है ? अतः, इहलोक और परलोक, दोनों के फल तुमने प्राप्त कर लिये हैं। अब यही तुम्हारा कर्त्तव्य रह गया है कि लक्ष्मी तथा श्रीवत्स-चिह्नों से अंकित वक्षवाले इस (राम) की आज्ञा को शिरोधार्य करके, उसी में अपने चित्त को एकाग्र बना लो। यों त्रिभुवनों में तुम-उन्नति पाओगे।
वानर-सुलभ अज्ञान और चपलता को दूर कर दो। उदारमना (रामचन्द्र) के द्वारा किये गये उपकार को कभी न भूलो। उसके लिए आवश्यक होने पर अपने प्राण भी त्यागने के लिए सन्नद्ध रहो। परमपद को प्रदान करनेवाले उस परब्रह्म की सभी आज्ञाओं का सुचारु रूप से पालन करके अपार जन्म-परंपरा से अनायास ही मुक्त हो जाओ।
राज्य प्राप्त करने के आनन्द से मत्त होकर इसकी उपेक्षा न कर बैठना। उसके कमल-चरणों की छाया से कभी न हटना। इसी भाँति जीवन बिताना। यह स्मरण रखना
किष्किन्ध्याकाण्ड ४७३
कि नरपति जलती अग्नि की उपमा के योग्य होते हैं। इसके बताये गये सब कार्य पूर्ण करना। यह न सोचना कि नरपति तुच्छ सेवकों के अपराधों को क्षमा कर देते हैं।
इस प्रकार के हित-वचन अपने दुःखी भाई के प्रति कहकर वाली ने अपने सम्मुख स्थित सुन्दर (राम) को देखकर कहा—हे चक्रवर्त्ती कुमार। यह (सुग्रीव) अपने सारे परिवार-सहित तुम्हारी ही शरण में है। यह कहकर अपने अनुज को राम के समीप प्रेषित किया और अपने दोनो कर शिर पर जोड़ लिये।
इस प्रकार, हाथ जोड़ने के पश्चात् अपने प्रेम-पात्र अनुज का मुख देखकर (वाली ने) कहा—तुम मेरे प्यारे पुत्र (अंगद) को शीघ्र बुलाओ। सुग्रीव के बुलाने पर, अपने हाथो से समुद्र को मथनेवाले उस (वाली) का पुत्र अंगद शीघ्र वहाँ आ पहुँचा।
वह अंगद, जिसने कभी कल्पना में भी दुःखी मनवाले व्यक्तियों को नही देखा था, उज्ज्वल पूर्णचन्द्र के समान वहाँ आ पहुँचा। आकर उसने अपनी आँखो से अपने प्रिय पिता को, पुष्पमय सुगंधित शय्या के बदले रक्त-समुद्र के मध्य पड़ा हुआ देखा।
सूर्य-चन्द्र के सदृश दो उज्ज्वल लोल कुंडलों से विभूषित तथा पुष्ट कंधोवाले कुमार ने अपने पिता को उस दशा में पड़े हुए देखा। देखकर अपने पिता के शरीर पर ऐसा गिरा, जैसे अश्रु तथा रक्त के प्रवाह के मध्य, धरती पर पड़े हुए चन्द्र-मंडल पर, गगन तल से कोई उज्ज्वल नक्षत्र आ गिरा हो।
हाय मेरे पिता ! मेरे पिता ! तुमने अपने मन से या कर्म से, उत्तुंग तरंग-भरे समुद्र से आवृत इस धरती पर, किसी को हानि नही पहुँचाई। फिर, भी तुम पर यह विपदा क्यो आई ? खैर जो हो, किंतु यह कैसे हुआ कि तुम्हारी आँखो के सामने ही यम भी तुम्हारे पास आ पहुँचा ? उस (यम) के सामर्थ्य को निर्भय होकर मिटा देनेवाले (तुम्हारे) अतिरिक्त और कौन है ?
जिस रावण ने, अष्ट दिशाओ मे कील के समान ठोके गये-से अविचल रहनेवाले दिग्गजो को भी परास्त किया था, उसका मन भी तुम्हारी पुष्ट मूलवाली सुन्दर पूँछ का स्मरण होने मात्र से ऐसा धड़क उठता है, जैसे पटह बजाया जा रहा हो। हाय ! उसका वह भय अब समाप्त हो गया।
हे पिता ! कुलपर्वतो तथा चक्रवाल नामक गगनोन्नत पर्वतो के शिखर अब तुम्हारे सुन्दर पद-चिह्नों से रहित हो जायेंगे। मंदर पर्वत, वासुकि सर्प, चन्द्रमा तथा अन्य उपकरणो को लेकर तरंगायमान समुद्र को मथने के लिए किसी से-प्रार्थना करनी हो, तो अब कौन उसे मथ सकेगा ?
रूई-जैसे कोमल चरणोवाली पार्वती को अपने अर्धभाग मे धारण किये हुए शिवजी के चरणो के अतिरिक्त और किसीके प्रति कभी तुमने अजलि नही दी। ऐसे शासन-चक्र से युक्त हे मेरे पिता ! तुम्हारे द्वारा क्षीरसागर के मथे जाने से ही देवगण भी मरणहीन बने हुए हैं। किन्तु, मधुर अमृत देनेवाले तुम, मृत्यु को प्राप्त हो रहे हो। तुम्हारे सदृश महिमा-वाले अन्य कौन हैं ?
इस प्रकार के विविध वचन कहकर अंगद रोने लगा। उसे देखकर अतिशोकातुर,
४७४
कंब रामायण
रक्त-नेत्र वाली ने, जिसका मन आग में पडे मोम के-जैसा पिघल गया था, उसे आलिंगन करते हुए कहा—अब तुम दुःखी मत होओ। यह, प्रभु (राम) का किया हुआ पुण्य-कार्य है।
त्रुटिहीन रूप से यदि विचार करके देखो, तो विदित होगा कि जन्म लेना और मृत्यु पाना—तीनो लोको के निवासियो के लिए आदि से ही नियत हैं। मेरे पूर्वकृत तप के कारण ही मुझे इस प्रकार की मृत्यु मिली है। सर्वसाक्षी बने हुए महावीर ने स्वय आकर मुझे मुक्ति प्रदान की है।
हे तात ! हे पुत्र ! तुम बाल्यावस्था को पार कर चुके हो। यदि मेरी बात मानो, तो कहूँगा कि वही परमतत्त्व, जिससे परे और कोई तत्त्व नहीं है, हमारी दृष्टि के गोचर बनकर, (मनुष्य-रूप में) अपने चरणो को धरती पर रखे और कर में धनुष धारण करके उपस्थित हुआ है। अज्ञान में डालनेवाली जन्म-रूपी व्याधि की यह (राम) ओषधि है। यह जान लो और इसको नमस्कार करो।
हे स्वर्णमय आभरणधारी ! इसने मेरे प्राण हरण किये—यह बात किंचित् भी न सोचना। तुम अपने प्राणों की रक्षा करो। यदि इस (राम) का शत्रुओं के साथ युद्ध छिडे, तो तुम इसका साथी बनना। यह (राम), सब जीवो का उनके सस्कार के अनुसार, हित करनेवाला है। इसके कमल सदृश-चरणो को अपना शिर पर धारण करके जीना।
इस प्रकार के हित-वचन कहने के उपरांत पर्वत से भी अधिक दृढ कंधोंवाले वानर-राज ने अपने पुत्र (अंगद) का अपनी दीर्घ बाँहो से आलिंगन कर लिया। फिर, स्वर्णमय रत्नखचित आभरण पहननेवाले रक्षक राम को देखकर बोला—
हे असत्य मनवालो के लिए अदृश्य ज्ञान-स्वरूप ! यह मेरा पुत्र ऐसे कंधोवाला है, जो घृत लगे दीर्घ त्रिशूलधारी कालवर्ण राक्षस-सेना-रूपी तूल-समुदाय के लिए अग्नि-स्वरूप है। दोषहीन आचरणवाला है। यह तुम्हारी शरण मे है।—यों कहकर वाली ने उसे राम को दिखाया। तब—
वह (अंगद) राम के चरणो पर नत हुआ। कमल-सदृश विशाल नयनोवाले राम ने अपने सुन्दर करवाल को अंगद के आगे बढाकर उससे कहा—यह लो। तब सातों लोक उन (राम) की प्रशंसा कर उठे। वाली अपना शरीर छोडकर उत्तम लोको के परे रहनेवाले परमपद को जा पहुँचा।
उस समय वाली के हाथ शिथिल पड़ गये। वेगवान् बाण वाली के यम-समान कठोर वक्ष मे न रहकर उसको पार करके निकल गया और ऊपर उठ गया। फिर, पवित्र समुद्र के जल में धुलकर, देवताओं के दिये पुष्पहारो से विभूषित होकर, प्रभु (राम) की पीठ से कभी न हटनेवाले विजयी तूणीर मे जा पहुँचा। (१-१५३)
अध्याय ८
शासन पटल
वाली स्वर्ग को सिधारा। वटपत्र पर शयन करनेवाले (विष्णु के अवतार राम) उसको अनंत आनंद (अर्थात्, मोक्ष) देकर अपने सम्मुख खड़े सूर्यपुत्र के अरुण हस्त को अपने कर में लिये, अंगद को भी साथ लेकर वहाँ से चले गये। जब शूल-जैसे नयनोंवाली तारा ने (वाली की मृत्यु का) समाचार पाया, तब वह वहाँ आकर उसके शरीर पर गिर पड़ी।
वाली के शरीर से बहनेवाले भयंकर रक्त-प्रवाह से, उसके पर्वतोपम स्तन, जिनका अग्रभाग मुकुलित था, कुंकुमरस-लिप्त जैसे हो गये। उसके घुँघुराले केश लाल हो गये। वह, वहाँ गिरे हुए मनोहर तथा विशाल कंधोंवाले वाली के वक्ष पर इस प्रकार लोटने लगी, जिस प्रकार सूर्य के अरुण किरणों से आवृत विशाल गगन में कोई विद्युत् कौंध रही हो।
तारा विषण्ण हुई। दीन और व्याकुल हुई। आह भरी। द्रवितहृदय हुई। अपने दोनों करों को सिर पर जोड़कर रखा। शिथिल हुई। उसका केश-पाश गलित होकर बिखर पड़ा। वह ऊँचे स्वर में निम्नलिखित प्रकार के वचन कह-कहकर रो पड़ी। उसके कंठ की ध्वनि से बाँसुरी, मधुर नादवाला याऴ् और वीणा के नाद भी लज्जित हो गये :
हे मेरे अत्युत्तम अपूर्व प्राण ! हे मेरे हृदय ! हे मेरे प्रभु ! तुम्हारी पर्वत-सदृश भुजाओं के मध्य, नित्य सुरक्षित रहती हुई, मैंने कभी वेला-हीन दुःख-सागर को देखा भी नहीं था। अब मैं तुम्हारी यह दशा देखकर बहुत त्रस्त हो रही हूँ।
तुम कभी मेरे प्रतिकूल नहीं हुए। तुम्हारे इस दुःख को देखकर भी मैं प्राण छोड़े बिना जीवित हूँ। अतः, अब तुम मुझे अपने निकट नहीं बुलाओगे। हे मेरे भाग्य-देवता ! प्राणों के जाने पर क्या देह जीवित रह सकती है ?
हे मेरे प्रभु ! क्या यमदेवता यह नहीं जानते कि तुम्हारे द्वारा सुरभिमय अमृत दिये जाने के कारण ही वे अमर बने हुए हैं ? क्या वे इतने क्षुद्र हैं कि अपने प्रति (तुम्हारे द्वारा) किये उपकार का स्मरण नहीं करते ?
तुम सब दिशाओं में जाकर, सच्ची भक्ति के साथ, न कुम्हलानेवाले पुष्पों से, अपने अर्धांग में उमादेवी को धारण करनेवाले देव की पूजा किये बिना, इतनी देर तक यहीं पड़े हो। क्या यह उचित है ?
हे प्रभो ! पुष्पशय्या पर, मृदु वस्त्रों के आवरण पर, शयन करनेवाले तुम अब भूमि पर पड़े हो। यह देखकर मेरा मन द्रवित हो रहा है। मैं तुम्हारे सम्मुख खड़ी होकर आँसू बहा रही हूँ। फिर भी, तुम मुझसे कुछ नहीं कह रहे हो। मुझसे कौन-सा अपराध हुआ है ?
हे कभी असत्य न बोलनेवाले पुण्यात्मा ! मैं यहाँ रहकर इस प्रकार दुःखी हो रही हूँ और तुम सत्य-परायण देवों के लोक में जाकर सुख भोग रहे हो। हे प्रभु ! क्या
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तुम्हारा यह कथन असत्य ही है कि मैं तुम्हारा प्राण हूँ ? (अर्थात्, तुम जो यह कहते थे कि तुम मेरे प्राण हो, क्या वह कथन झूठ ही था ?)
युद्ध के अभ्यस्त कंधोंवाले ! यदि यह सत्य है कि मैं तुम्हारे हृदय में हूँ, तो शत्रु का शर मेरे प्राण भी हर लेता। यदि यह सत्य है कि तुम मेरे हृदय में रहते हो, तो तुम निश्चय ही जीवित रहते । हम दोनों ही एक दूसरे के हृदय में नहीं थे।
हे मेरे प्रभु ! देवताओं ने तुम्हारा यह उपकार स्मरण करके कि तुमने उन्हें अमृत ला दिया था, जिससे वे अमर बन सके, अब क्या (तुमको स्वर्ग में आये हुए देखकर) उन्होंने तुम्हें कल्पपुष्प प्रदान करके, तुम्हें अपना मित्र समझकर, तुम्हारी आवभगत करके तुम्हारा सत्कार कर रहे हैं ?
तुम तो अमरता प्रदान करनेवाला अमृत भी (देवों को) ला देनेवाले हो। छिपे रहकर शर छोड़ने के लिए तैयार होकर आया हुआ राम यदि अपने मुँह से माँगता, तो क्या तुम अपना सर्वस्व भी उसको नहीं दे देते ?
मैंने पहले ही कहा था (कि राम सुग्रीव की सहायता करने के लिए आया है)। मेरा कहना न मानकर, यह कहते हुए कि वह राम वैसा अनुचित कार्य नहीं करेगा, तुम अपने भाई से युद्ध करने लगे और युगात तक जीवित रहने योग्य तुम मृत्यु को प्राप्त हो गये। मैं तुम्हे फिर कब देखूँगी ?
यदि तुम प्रहार करते, तो मेषूपर्वत भी चूर-चूर हो जाता। आह ! एक शर ने तुम्हारे सामने होकर तुम्हारे वक्ष को कैसे विदीर्ण कर दिया ? क्या यह देवों की माया है? मैं नहीं समझ रही हूँ। अथवा यहाँ जो मरा पड़ा है, वह कोई दूसरा ही वाली है ?
हे नाथ ! तुम्हारे भाई ने उत्तम यश की गरिमा से युक्त रहकर तुम से वैर किया, जिसके परिणाम-स्वरूप तुम मृत्यु को प्राप्त हुए और हमारा सर्वस्व विनष्ट हो गया। हाय! तुम हमारी यह दशा क्यों नहीं देखते ?
अपूर्व अमृत के समान विपदाओं को दूर करनेवाले उस राम ने अब एक वीर का अहित सोचकर क्या कार्य कर दिया ? क्या यह वचन केवल कथन ही है (किंतु, यथार्थ नहीं है) कि धर्म पर स्थिर रहनेवालों की कसौटी, उनके कार्य ही होते हैं ?
इस प्रकार के अनेक वचन कहकर, अति दुःखित हो, बुद्धिभ्रष्ट हो वह निश्चेष्ट पड़ी रही। उसकी वह दशा देखकर नीतिनिपुण तथा दृढ़ पर्वत के सदृश हनुमान् ने--
वानर-स्त्रियों के द्वारा उसको उसके निवास पर पहुँचा दिया और वाली के अंतिम कृत्य करवाये। फिर, श्रीरामचन्द्र के पास जाकर सब वृत्तांत सुनाया।
तब सूर्यदेव, जो अपने प्रकाश से अंधकार को निर्मल कर देता है, अपने गम्य-स्थान अस्ताचल पर जा पहुँचा। वह (सूर्य) पर्वत-सदृश वानरराज (वाली) के मुख की समता कर रहा था (अर्थात्, रक्तवर्ण दीखता था)।
संध्या के समय सूर्य अस्त हुआ। उदारशील (राम) सीता का स्मरण करते हुए, विश्रांत होकर शिथिल तथा द्रवितहृदय हो उठे। और, इस प्रकार (कष्टों से) भरे हुए उस निशा-सागर को बड़ी कठिनाई से पार किया।