कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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कंब रामायण
रक्त-नेत्र वाली ने, जिसका मन आग में पडे मोम के-जैसा पिघल गया था, उसे आलिंगन करते हुए कहा—अब तुम दुःखी मत होओ। यह, प्रभु (राम) का किया हुआ पुण्य-कार्य है।
त्रुटिहीन रूप से यदि विचार करके देखो, तो विदित होगा कि जन्म लेना और मृत्यु पाना—तीनो लोको के निवासियो के लिए आदि से ही नियत हैं। मेरे पूर्वकृत तप के कारण ही मुझे इस प्रकार की मृत्यु मिली है। सर्वसाक्षी बने हुए महावीर ने स्वय आकर मुझे मुक्ति प्रदान की है।
हे तात ! हे पुत्र ! तुम बाल्यावस्था को पार कर चुके हो। यदि मेरी बात मानो, तो कहूँगा कि वही परमतत्त्व, जिससे परे और कोई तत्त्व नहीं है, हमारी दृष्टि के गोचर बनकर, (मनुष्य-रूप में) अपने चरणो को धरती पर रखे और कर में धनुष धारण करके उपस्थित हुआ है। अज्ञान में डालनेवाली जन्म-रूपी व्याधि की यह (राम) ओषधि है। यह जान लो और इसको नमस्कार करो।
हे स्वर्णमय आभरणधारी ! इसने मेरे प्राण हरण किये—यह बात किंचित् भी न सोचना। तुम अपने प्राणों की रक्षा करो। यदि इस (राम) का शत्रुओं के साथ युद्ध छिडे, तो तुम इसका साथी बनना। यह (राम), सब जीवो का उनके सस्कार के अनुसार, हित करनेवाला है। इसके कमल सदृश-चरणो को अपना शिर पर धारण करके जीना।
इस प्रकार के हित-वचन कहने के उपरांत पर्वत से भी अधिक दृढ कंधोंवाले वानर-राज ने अपने पुत्र (अंगद) का अपनी दीर्घ बाँहो से आलिंगन कर लिया। फिर, स्वर्णमय रत्नखचित आभरण पहननेवाले रक्षक राम को देखकर बोला—
हे असत्य मनवालो के लिए अदृश्य ज्ञान-स्वरूप ! यह मेरा पुत्र ऐसे कंधोवाला है, जो घृत लगे दीर्घ त्रिशूलधारी कालवर्ण राक्षस-सेना-रूपी तूल-समुदाय के लिए अग्नि-स्वरूप है। दोषहीन आचरणवाला है। यह तुम्हारी शरण मे है।—यों कहकर वाली ने उसे राम को दिखाया। तब—
वह (अंगद) राम के चरणो पर नत हुआ। कमल-सदृश विशाल नयनोवाले राम ने अपने सुन्दर करवाल को अंगद के आगे बढाकर उससे कहा—यह लो। तब सातों लोक उन (राम) की प्रशंसा कर उठे। वाली अपना शरीर छोडकर उत्तम लोको के परे रहनेवाले परमपद को जा पहुँचा।
उस समय वाली के हाथ शिथिल पड़ गये। वेगवान् बाण वाली के यम-समान कठोर वक्ष मे न रहकर उसको पार करके निकल गया और ऊपर उठ गया। फिर, पवित्र समुद्र के जल में धुलकर, देवताओं के दिये पुष्पहारो से विभूषित होकर, प्रभु (राम) की पीठ से कभी न हटनेवाले विजयी तूणीर मे जा पहुँचा। (१-१५३)