कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 481, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्ध्याकाण्ड ४७३
कि नरपति जलती अग्नि की उपमा के योग्य होते हैं। इसके बताये गये सब कार्य पूर्ण करना। यह न सोचना कि नरपति तुच्छ सेवकों के अपराधों को क्षमा कर देते हैं।
इस प्रकार के हित-वचन अपने दुःखी भाई के प्रति कहकर वाली ने अपने सम्मुख स्थित सुन्दर (राम) को देखकर कहा—हे चक्रवर्त्ती कुमार। यह (सुग्रीव) अपने सारे परिवार-सहित तुम्हारी ही शरण में है। यह कहकर अपने अनुज को राम के समीप प्रेषित किया और अपने दोनो कर शिर पर जोड़ लिये।
इस प्रकार, हाथ जोड़ने के पश्चात् अपने प्रेम-पात्र अनुज का मुख देखकर (वाली ने) कहा—तुम मेरे प्यारे पुत्र (अंगद) को शीघ्र बुलाओ। सुग्रीव के बुलाने पर, अपने हाथो से समुद्र को मथनेवाले उस (वाली) का पुत्र अंगद शीघ्र वहाँ आ पहुँचा।
वह अंगद, जिसने कभी कल्पना में भी दुःखी मनवाले व्यक्तियों को नही देखा था, उज्ज्वल पूर्णचन्द्र के समान वहाँ आ पहुँचा। आकर उसने अपनी आँखो से अपने प्रिय पिता को, पुष्पमय सुगंधित शय्या के बदले रक्त-समुद्र के मध्य पड़ा हुआ देखा।
सूर्य-चन्द्र के सदृश दो उज्ज्वल लोल कुंडलों से विभूषित तथा पुष्ट कंधोवाले कुमार ने अपने पिता को उस दशा में पड़े हुए देखा। देखकर अपने पिता के शरीर पर ऐसा गिरा, जैसे अश्रु तथा रक्त के प्रवाह के मध्य, धरती पर पड़े हुए चन्द्र-मंडल पर, गगन तल से कोई उज्ज्वल नक्षत्र आ गिरा हो।
हाय मेरे पिता ! मेरे पिता ! तुमने अपने मन से या कर्म से, उत्तुंग तरंग-भरे समुद्र से आवृत इस धरती पर, किसी को हानि नही पहुँचाई। फिर, भी तुम पर यह विपदा क्यो आई ? खैर जो हो, किंतु यह कैसे हुआ कि तुम्हारी आँखो के सामने ही यम भी तुम्हारे पास आ पहुँचा ? उस (यम) के सामर्थ्य को निर्भय होकर मिटा देनेवाले (तुम्हारे) अतिरिक्त और कौन है ?
जिस रावण ने, अष्ट दिशाओ मे कील के समान ठोके गये-से अविचल रहनेवाले दिग्गजो को भी परास्त किया था, उसका मन भी तुम्हारी पुष्ट मूलवाली सुन्दर पूँछ का स्मरण होने मात्र से ऐसा धड़क उठता है, जैसे पटह बजाया जा रहा हो। हाय ! उसका वह भय अब समाप्त हो गया।
हे पिता ! कुलपर्वतो तथा चक्रवाल नामक गगनोन्नत पर्वतो के शिखर अब तुम्हारे सुन्दर पद-चिह्नों से रहित हो जायेंगे। मंदर पर्वत, वासुकि सर्प, चन्द्रमा तथा अन्य उपकरणो को लेकर तरंगायमान समुद्र को मथने के लिए किसी से-प्रार्थना करनी हो, तो अब कौन उसे मथ सकेगा ?
रूई-जैसे कोमल चरणोवाली पार्वती को अपने अर्धभाग मे धारण किये हुए शिवजी के चरणो के अतिरिक्त और किसीके प्रति कभी तुमने अजलि नही दी। ऐसे शासन-चक्र से युक्त हे मेरे पिता ! तुम्हारे द्वारा क्षीरसागर के मथे जाने से ही देवगण भी मरणहीन बने हुए हैं। किन्तु, मधुर अमृत देनेवाले तुम, मृत्यु को प्राप्त हो रहे हो। तुम्हारे सदृश महिमा-वाले अन्य कौन हैं ?
इस प्रकार के विविध वचन कहकर अंगद रोने लगा। उसे देखकर अतिशोकातुर,