कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७६ | कंब रामायण |
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तुम्हारा यह कथन असत्य ही है कि मैं तुम्हारा प्राण हूँ ? (अर्थात्, तुम जो यह कहते थे कि तुम मेरे प्राण हो, क्या वह कथन झूठ ही था ?)
युद्ध के अभ्यस्त कंधोंवाले ! यदि यह सत्य है कि मैं तुम्हारे हृदय में हूँ, तो शत्रु का शर मेरे प्राण भी हर लेता। यदि यह सत्य है कि तुम मेरे हृदय में रहते हो, तो तुम निश्चय ही जीवित रहते । हम दोनों ही एक दूसरे के हृदय में नहीं थे।
हे मेरे प्रभु ! देवताओं ने तुम्हारा यह उपकार स्मरण करके कि तुमने उन्हें अमृत ला दिया था, जिससे वे अमर बन सके, अब क्या (तुमको स्वर्ग में आये हुए देखकर) उन्होंने तुम्हें कल्पपुष्प प्रदान करके, तुम्हें अपना मित्र समझकर, तुम्हारी आवभगत करके तुम्हारा सत्कार कर रहे हैं ?
तुम तो अमरता प्रदान करनेवाला अमृत भी (देवों को) ला देनेवाले हो। छिपे रहकर शर छोड़ने के लिए तैयार होकर आया हुआ राम यदि अपने मुँह से माँगता, तो क्या तुम अपना सर्वस्व भी उसको नहीं दे देते ?
मैंने पहले ही कहा था (कि राम सुग्रीव की सहायता करने के लिए आया है)। मेरा कहना न मानकर, यह कहते हुए कि वह राम वैसा अनुचित कार्य नहीं करेगा, तुम अपने भाई से युद्ध करने लगे और युगात तक जीवित रहने योग्य तुम मृत्यु को प्राप्त हो गये। मैं तुम्हे फिर कब देखूँगी ?
यदि तुम प्रहार करते, तो मेषूपर्वत भी चूर-चूर हो जाता। आह ! एक शर ने तुम्हारे सामने होकर तुम्हारे वक्ष को कैसे विदीर्ण कर दिया ? क्या यह देवों की माया है? मैं नहीं समझ रही हूँ। अथवा यहाँ जो मरा पड़ा है, वह कोई दूसरा ही वाली है ?
हे नाथ ! तुम्हारे भाई ने उत्तम यश की गरिमा से युक्त रहकर तुम से वैर किया, जिसके परिणाम-स्वरूप तुम मृत्यु को प्राप्त हुए और हमारा सर्वस्व विनष्ट हो गया। हाय! तुम हमारी यह दशा क्यों नहीं देखते ?
अपूर्व अमृत के समान विपदाओं को दूर करनेवाले उस राम ने अब एक वीर का अहित सोचकर क्या कार्य कर दिया ? क्या यह वचन केवल कथन ही है (किंतु, यथार्थ नहीं है) कि धर्म पर स्थिर रहनेवालों की कसौटी, उनके कार्य ही होते हैं ?
इस प्रकार के अनेक वचन कहकर, अति दुःखित हो, बुद्धिभ्रष्ट हो वह निश्चेष्ट पड़ी रही। उसकी वह दशा देखकर नीतिनिपुण तथा दृढ़ पर्वत के सदृश हनुमान् ने--
वानर-स्त्रियों के द्वारा उसको उसके निवास पर पहुँचा दिया और वाली के अंतिम कृत्य करवाये। फिर, श्रीरामचन्द्र के पास जाकर सब वृत्तांत सुनाया।
तब सूर्यदेव, जो अपने प्रकाश से अंधकार को निर्मल कर देता है, अपने गम्य-स्थान अस्ताचल पर जा पहुँचा। वह (सूर्य) पर्वत-सदृश वानरराज (वाली) के मुख की समता कर रहा था (अर्थात्, रक्तवर्ण दीखता था)।
संध्या के समय सूर्य अस्त हुआ। उदारशील (राम) सीता का स्मरण करते हुए, विश्रांत होकर शिथिल तथा द्रवितहृदय हो उठे। और, इस प्रकार (कष्टों से) भरे हुए उस निशा-सागर को बड़ी कठिनाई से पार किया।