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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 485

किष्किन्धाकाण्ड ४७७

सूर्य, यह सोचकर कि उसका पुत्र (सुग्रीव) स्वर्ण-मुकुट धारण करनेवाला है, बड़ी उमंग से भर गया। (उस राजतिलक के उत्सव में) सहयोग देने के लिए लक्ष्मी का भी आगमन हो—इस उद्देश्य से, उस (सूर्य) ने अपने अरुण करों से उत्तम कमल-दल-रूपी कपाट खोल दिये।

उस समय, करुणानाथ (राम) ने अपने उत्तम मतिवाले अपने अनुज को देखकर यह आदेश दिया—हे तात ! तुम अपने हाथों से सूर्य-पुत्र को यथाविधि राज्य पर अभिषिक्त कर दो।

आज्ञापालक, महिमावान् लक्ष्मण ने तुरत ही जाकर नीति से स्खलित न होने-वाले तथा युद्ध में कुशल हनुमान् से कहा—हे वीर ! इस शुभ कार्य के लिए आवश्यक समस्त सामग्री को तुम अभी ले आओ—तब,

अभिषेक के योग्य तीर्थ-जल, मंगल-द्रव्य, प्रशंसनीय स्वर्णमुकुट आदि उपकरण—सब हनुमान् के द्वारा लाये गये। पुरुषोत्तम (राम) के भाई लक्ष्मण ने महिमा-भरे सुग्रीव से व्रत आदि कर्त्तव्य कराये। फिर—

ब्राह्मण लोग आशीर्वाद दे रहे थे। देव मधु-पूर्ण पुष्प बरसा रहे थे। सद्धर्म के पथपर चलनेवाले मुनि (पुरोहित बनकर) कृत्य करा रहे थे। धर्मात्माओं के बताये विधि से लक्ष्मण ने उस महाभाग (सुग्रीव) को मुकुट पहनाया।

स्वर्णमय किरीट धारण करके सुग्रीव ने असत्य-रहित प्रभु (राम) के महिमामय चरणों को प्रणाम किया। तब प्रभु ने, जो अर्थपूर्ण वाणी के भी परे हैं, अपने सुन्दर वक्ष से उसे लगा लिया, और कहा—

हे वीर ! तुम यहाँ से अपने प्राकृतिक निवास-स्थान (अर्थात्, किष्किन्धानगर) में जाओ, और अपने द्वारा करणीय कार्यों का ठीक-ठीक विचार कर, यथाविधि उन्हें पूरा करो। यों जिस राज्य-भार को तुमने अपने ऊपर लिया है, उसके लिए आवश्यक सब कार्य करो और युद्ध में मरे हुए वाली का जो प्रिय पुत्र है, उसके साथ उत्तम ऐश्वर्य के साथ चिर-काल तक जीते रहो।

सत्य से भरित, विवेकपूर्ण मन्त्रियों के साथ तथा दोष-रहित सदाचारी एवं पराक्रमी सेनापतियों के साथ पवित्र मैत्री का भाव रखो, और तुम स्वयं भी त्रुटिहीन कार्य करते हुए इस प्रकार रहो कि वे (मन्त्री तथा सेनापति) तुम्हारे अति निकट या अति दूर न रहकर तुम्हें देवता के समान मानकर व्यवहार करें।

संसार इतना विवेक-पूर्ण है कि यदि कहीं धूम दिखाई पड़े, तो यह अनुमान कर लेता है कि वहाँ जलती आग भी होगी। अतः, तुम्हें चाहिए कि तुम शास्त्रज्ञों के द्वारा कथित कूटनीति को भी अपनाओ। तुम हँसमुख रहो। मधुर वचन बोलो और दूसरों के स्वभाव को जानकर, इस प्रकार आचरण करते रहो कि उससे तुम्हारे प्रति वैर रखनेवालों का भी हित हो।

वह दोष-रहित महान् ऐश्वर्य, जिसे देखकर देवलोक भी मुग्ध होते हैं, तुमको प्राप्त हुआ है। तो उस सम्पत्ति के महत्त्व को ठीक-ठीक पहचानकर सदा सजग रहो। क्योंकि,