कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४७६
स्वर्ग से भी अधिक मनोहर हैं। अतः, तुम कुछ दिन हमारे यहाँ आकर ठहरो, जिससे हम तुम्हारी करुणापूर्ण आज्ञा का पालन कर सकें।
हे अरिंदम ! तुम्हारी शरण मे आकर हम तुम्हारी करुणा के पात्र बने हैं। तुमसे वियुक्त होकर जो ऐश्वर्य्य हम पायेगे, वह दरिद्रता से भी अधिक गर्हित होगा। अतः, जबतक तुम्हारी देवी का अन्वेषण करने का समय न आवे, तबतक तुम हमारे साथ (नगर मे) आकर ठहरने की कृपा करो--यो कहकर सुग्रीव ( राम के ) चरणो पर गिर पड़ा।
यह वचन सुनकर महाभाग ने मधुर मदहास करते हुए कहा--राजाओ के निवास-योग्य नगर, मेरे जैसे व्रतधारियो के लिए योग्य नही है और यदि मै वहाँ आऊँ, तो मेरी सेवा में ही तुम्हारा सारा समय लग जायगा। तुम, विचार कर किये जाने योग्य शासन-कार्य से, स्खलित हो जाओगे।
हे चिरजीव ! मैने यह प्रण किया है कि चौदह वर्ष वन में रहूँगा। अतः, (इस अवधि मे) मै राजाओ के निवास मे नही ठहर सकूँगा। हे दृढ तथा सुन्दर कधोवाले ! वीणा-नाद-सदृश स्वरवाली अपनी देवी के बिना क्या मै सुख भोग सकूँगा ? यह तुमने कदाचित् सोचा नही।
हे तात ! यह अपवाद क्या त्रिभुवनो के विनाश होने पर भी मिट सकेगा कि, राक्षस के द्वारा अपनी पत्नी के बंदी बनाकर रखे जाने पर भी राम, स्वय, अपने प्यारे मित्रो महित, अपार सुखो का भोग करता रहा।
जिन लोगो ने गृहस्थाश्रम का त्याग नही किया है, वैसे लोगो के लिए योग्य धर्म को मैने पूरा नही किया। युद्ध मे धनुष लेकर किये जानेवाले कर्त्तव्य को भी मैने पूर्ण नही किया। यो व्यर्थ जीवन बितानेवाले मुझ-जैसे के लिए सब ( सुग्रीव के साथ नगर मे रहना इत्यादि ) महत्त्वहीन क्षुद्र कार्य हैं। उत्तम गृहस्थ-धर्म को छोड़कर, वानप्रस्थ व्रत का आचरण करके मै अपने पापो का परिहार करूँगा। --यो राम ने कहा।
फिर कहने के लिए सुकर, किंतु करने के लिए दुष्कर सच्चारित्र्य में स्थिर रहने-वाले ( राम ) ने आगे कहा--हे वीर ! शामन के सब कार्यों को यथाविधि पूर्ण करके चार माम व्यतीत होने पर, उत्तुग तरगो से पूर्ण समुद्र-सदृश अपनी सेना को साथ लेकर मेरे निकट आओ। यही तुमसे मेरी प्रार्थना है।
वानरो का नेता इसके विरुद्ध कुछ नही कह सका। यह सोचकर कि गगनोन्नत ( गंभीर ) आकारवाले तथा तपस्वी वेषधारी ( राम ) के मन के अनुसार करना ही दोष-मुक्त बनने का उपाय है, अपने विशाल नयनो से अश्रु बहाता हुआ दडवत् किया और अकथनीय दुःख को मन में भरकर वहाँ से चला।
वाली-पुत्र ( अगद ) गम के चरण-कमलो मे प्रणत हुआ। उसे सकरुण देखकर नीले मेघ-जैसे उन महान् ने कहा--तुम शीलवान् हो। इम ( सुग्रीव ) को अपने पिता का भाई जानकर उसकी आज्ञा मे स्थिर रहो।
इम प्रकार के वचन कहकर सुग्रीव के साथ उसको भेज दिया। तब तुरत ही यशस्वी तथा गुणवान् अगद, उनके उत्तम चरणो को नमस्कार करके विदा हुआ। फिर.