कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 488, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८० | कंब रामायण |
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प्रभु ने मारुति को देखकर कहा—हे सुन्दर वीर ! तुम भी उस राजा (सुग्रीव) के शासन के योग्य कार्य अपने विवेक से पूरा करते रहो ।
प्रेम से परिपूर्ण तथा असत्य-रहित मनवाले हनुमान् ने यह कहकर कि, यह दास यहीं रहकर (आपकी) आज्ञा के अनुसार योग्य सेवा करता रहेगा, उनके पदयुगल पर गिर पड़ा । तब सत्य में दृढ रहनेवाले प्रभु ने कहा—
एक प्रतापी राजा के द्वारा शासित अपार ऐश्वर्य से युक्त राज्य को जब दूसरा कोई वीर बलात् हस्तगत कर लेता है, तब उससे सदा भलाई ही हो, ऐसी बात नहीं। किन्तु, उससे कभी बुराई भी उत्पन्न हो सकती है। अतः, हे तात ! वैसा राज्य तुम-जैसे बड़े दायित्व का वहन कर सकनेवाले विवेकी पुरुष से ही स्थिर रह सकता है ।
(गुणों से) परिपूर्ण उस (सुग्रीव) के राज्य को स्थिर बनाकर, उसके पश्चात् मेरे कार्य को पूरा कर सकनेवाला (पुरुष) तुमसे बढ़कर और कौन है ? अतः, तुम मेरी इच्छा के अनुसार, साकार धर्म-जैसे उसके पास जाओ ।
चक्रधारी के ये वचन कहने पर मारुति ने नमस्कार करके कहा—हे प्रभु ! आप विजयी हों ! यदि आपकी यही आज्ञा है, तो यह दास वैसा ही करेगा । और, वहाँ से चला गया । पुरातन सृष्टि के नायक (राम) भी मुखपट्टधारी बड़े हाथी के सदृश अपने भाई के साथ एक ऊँचे पर्वत पर चले गये ।
आर्य (राम) की आज्ञा से सुग्रीव विशाल किष्किन्धा में जा पहुँचा और महिमा-वान् मन्त्रियों तथा बंधुजनों से युक्त होकर तारा को प्रणाम किया और उसको अपनी माता तथा अपने अग्रज के उपदेशों को ही अपना पिता मानकर, उत्तम रीति से शासन करता रहा ।
वह अपार ऐश्वर्य को प्राप्त कर, आनन्द से शासन करता रहा । अन्य वानर उसके अनुकूल आचरण करते रहे। उसका शासन-चक्र दिगन्तों में व्याप्त हुआ । अपार पराक्रम-युक्त अंगद को उसने राज्य का युवराज-पद दिया ।
उदार (राम), वहाँ से चलकर मतंग महर्षि के आवासभूत गगनस्पर्शी (ऋष्यमूक) पर्वत पर जाकर ठहरे, जहाँ उनके उस भाई ने, जिसके मन की सच्ची भक्ति को भर-भरकर लिया जा सकता है, प्रेम से पर्णशाला बनाई थी । यों वे विश्राम करते रहे । (१-५४)
अध्याय ६
वर्षाकाल पटल
सूर्य, महिमा-भरी उत्तर दिशा से (दक्षिण दिशा की ओर) चल पड़ा, मानों चित्रप्रतिमा-समान उज्ज्वल तथा लावण्ययुक्त (सीता) देवी का अन्वेषण करने के लिए देवाधिप (राम) के द्वारा पहले भेजा गया दूत हो ।