कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८४ | कंब रामायण |
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रक्तकुमुद नाट्य-रंग पर रखे हुए दीपो की पंक्तियों के समान थे। कोमल 'करुविल' पुष्प दर्शको के नेत्रों के समान थे।
भ्रमर और भ्रमरी के वेग से उड़कर आने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि, उनके टकराने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि—दोनों ध्वनियाँ—देवागनाओ के नृत्य की ध्वनि की समता करती थी। 'कूदाल' के विशाल पुष्प ऐसे विकसित थे, जैसे उन (देवागनाओ) के अमृत-समान आर्यभाषा (सस्कृत) के गीतों के गायन के उपयुक्त बडे भाल हों।
पुन्नाग के वनों से बहनेवाली नदियाँ अपने पुत्रो के लिए पुष्ट पर्वत-रूपी स्तनों से स्रवित धरतीमाता की दुग्ध-धाराओं के समान थी। कर्णिकार वृक्ष ऐसे थे, मानों धन की इच्छा से आकर याचना करनेवालो को सदा दान देने के लिए अपनी शाखाओ में स्वर्ण-खंडों को लटकाये हुए खड़े हों।
पुष्प-भरे वनों में सर्वत्र मधुर गान करनेवाला विविध चित्तियों से युक्त भ्रमर आदि कीडे भरे हुए थे, जो दर्शकों को वड़ा आनन्द देते थे, हरिण अपने मार्ग में पड़नेवाले वृक्षों से रगड़ खाते हुए और उस कारण से (चन्दन, अगरु आदि) विविध सुगंधों से युक्त होकर आते थे और हरिणियाँ उन्हें (उनकी गंध के कारण) कोई दूसरा मृग समझकर उनसे रूठ जाती थी।
अपने प्रियतम के रथारूढ होकर प्रवास में चले जाने पर जिस प्रकार विरहिणी तरुणियों के भाले-सदृश नयन आनन्दहीन हो मुकुलित हो जाते हैं, उसी प्रकार कुवलय-पुष्प बद हो गये। मन्मथ-सदृश अपने प्रियतमों के आगमन पर जिस प्रकार उमंग से भरी उन तरुणियों का किंचित् दत-प्रकाशन से युक्त मदहास छिटक पडता है, उसी प्रकार कुदललताएँ पुष्पित हो उठी।
पर्वत से प्रवहमाण जलधाराएँ स्वर्ण को बहुलता से दोनों ओर बिखेरने लगीं, मानों आनन्द-नृत्य करनेवाले मयूरों को देखकर उन्हें नटवर्ग समझकर राजा लोग उन्हें भूरि-भूरि पुरस्कार दे रहे हों। कमललताएँ जल-मध्य इस प्रकार उठी हुई थी, मानों गगनपथ में आनेवाले मेघो को देखकर उन्हें अतिथि समझकर आनन्दित हुई (गृहस्थ-धर्म मे निरत) तरुणियों के वदन हों।
कामशास्त्र मे निपुण विटों के समान ही भ्रमर सद्योविकसित मधुपूर्ण पुष्पों का आलिंगन करते हुए उनके मधु का संचय करने लगे। वे ऐसे थे, मानों कविगण भरतशास्त्र के अनुसार नाटक का निर्माण करने के उद्देश्य से सफल अर्थ-व्यवस्था के अनुकूल रस-सञ्चय कर रहे हों।
हिरण अत्यन्त आनन्दित हो उठे, मानों यह सोचकर ही वे ऐसे प्रसन्न हुए हों कि हमे अपनी चितवन से परास्त करनेवाली सूक्ष्म कटि-युक्त अति सुन्दरी (सीता) को एक राक्षस ने हमारा ही रूप धारण कर दुःसह दुःख दिया है, इस कारण से उत्पन्न अपने आनन्द को हम शब्दों में व्यक्त नही कर पाते।
हस छोटी नदियों मे गोते लगाकर इस प्रकार आनन्दित होने लगे. मानों