कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४८५
दीर्घकाल के विरह से पीडित होने के कारण अब अति प्रेम के साथ अपनी प्रियतमाओ से मिलकर भरपूर आनन्द उठा रहे हो ।
अपार सागर से जल भरकर चलनेवाले काले मेघो के निकट ही पक्ति बाँधकर उड़नेवाले अति धवल बगुलों का झुण्ड कृष्ण नामक काले वर्णवाले भगवान् के वक्ष पर शोभायमान मुक्ताहार के सदृश लगता था ।
सारस पक्षी, जो पक्ति बाँधकर एक-दूसरे से सटकर वर्षाकालिक काले मेघ के निकट हो गगन में उड़ रहे थे, वे दिव्य देवों के द्वारा लक्ष्मी के नायक के रूप में वर्णित अनुपम भगवान् के वक्ष पर शोभायमान उत्तरीय वस्त्र की समता करते थे ।
अधिक ताप उत्पन्न करनेवाले धूप-रूपी राजा के हट जाने तथा उत्तम सद्गुणो से भरे वर्षाकाल-रूपी राजा के आगमन के कारण विशाल पृथ्वी देवी अपने महिमामय मन में आनन्दित और शरीर से रोमाञ्चित हो उठी हो—हरियाली इस प्रकार का दृश्य उपस्थित कर रही थी ।
मयूर ऐसे लगते थे, मानो मधुवर्षी कमलपुष्प में उत्पन्न ब्रह्मा अति ज्ञानवान्, (देव) तत्त्व-ज्ञान के नायक (अर्थात्, वेद आदि के द्वारा प्रशंसित विष्णु के अवतार श्रीरामचन्द्र) के दुःख को देखकर उनका उपकार करने के उद्देश्य से कानन में सर्वत्र अपनी आँखें फैलाये हुए देवी सीता का अन्वेषण कर रहे हों ।
कमलपुष्प ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे तरुणियो के वे चरण हो, जिनमें (शत्रुओ के रक्त से) रक्तवर्ण हुए भालों तथा दृढ धनुषों को धारण करनेवाले वीर पुरुषों के केशों को भी नया रंग देनेवाले महावर का रस लगा हुआ हो । (भाव यह है कि तरुणियों के चरण महावर से रंजित थे । प्रणय-कलह के समय वे तरुणियां अपने प्रियतमों के सिर पर पदाघात करती, तो उससे उन पुरुषों के काले केश भी लाल रंगवाले बन जाते थे ।)
कोकिल मौन हो रहे, मानो उनके प्रति राघव के यह आदेश देने पर कि तुम अपनी जैसी ही बोलीवाली देवी को ढूँढ़कर लाओ, पृथ्वी में सर्वत्र घूम-घूमकर (देवी सीता को) बुलाते रहे हों और अब थककर चुप हो गये हों ।
वर्षा-सिंचित भूमि पर उगी हुई हरी घास को अघाकर चरनेवाली गायें यत्र-तत्र उगे हुए ‘मालान’ नामक छोटे पौधों को अपने खुरों से उखाड़ देती थी । वे पौधे, जिनमे सफेद पुष्प लगे थे, बिखरे हुए गाढ़े दही का दृश्य उपस्थित करते थे । ‘पिडव’ नामक पौधे के पुष्प, मधु-सदृश मीठी बोलीवाली कुड्मल-सदृश स्तनोंवाली ग्वालिनों के घटो में से छलकनेवाले दूध के झाग का दृश्य उपस्थित करती थी ।
‘वैंगै’ नामक वृक्ष, भीलनियों के केशों के समान सुरभित थे । पुन्नाग-वृक्ष मछुआ-त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे, जिनसे शीघ्रगामी भ्रमरकुल आकृष्ट हो रहा था । उत्पल-पुष्प अन्त्यज जाति की स्त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे । नवोविकसित कुंदलताएँ ग्वालिनों के केश के समान महक रही थीं ।
श्रीरामचन्द्र ने देवी सीता के वदन को नहीं, किन्तु मरणदायक मन्मथ को असंख्य सहस्र पुष्पबाण प्रदान करनेवाले वर्षाकाल को ही देखा । वे दुःख-सागर का पार नहीं देख पा