कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 494, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें४८६ | कंब रामायण
रहे थे। वे मूच्छित हो गये, नहीं तो वे किसको देखकर अपने प्राण को वश में रख सकते थे ?
सीमाहीन वर्षाकाल के आगमन से मनुष्य शिथिलमन हो जाते हैं—यह कथन तपस्या करनेवाले मुनियों के विषय में भी सत्य सिद्ध होता है तब उन प्रभु के दुःखी होने में क्या आश्चर्य हो सकता है, जो मधु तथा अमृत से भी अधिक मधुर बोलीवाली धवल (शंख)-वलयधारिणी सीता की भुजाओं का आलिंगन-सुख प्राप्त करते रहते थे।
नीलोत्पल, नीलकमल, अतसी-पुष्प आदि की समानता करनेवाले वे प्रभु शोकोद्विग्न हुए। वे ऐसी आशंका उत्पन्न करते थे कि कदाचित् इनकी देह में प्राण नहीं हों। इस प्रकार, व्याकुल होकर हंसिनी-सदृश सहज सुन्दरी सीता देवी के संबंध में निम्नलिखित वचन कह उठे—
हे काले मेघ ! राक्षसों ने कंचुकाबद्ध स्तनोंवाली सीता को कहाँ ले जाकर छिपा रखा है ? उन (राक्षसों) का आवास कहाँ है ? यह भी मैं नहीं जान पाया हूँ, तो भी मैं जीवित हूँ। तुम जल से भरे हो, तो भी क्या तुम में दया नहीं है ? मेरे प्राणों को क्यों व्याकुल कर रहे हो ?
तुम विद्युत्-रूपी दंतों से भयंकर हो। अपने काले रूप को गगन में सब ओर फैलाकर तुम बढ़ते हो। पापी तथा मायावी राक्षसों की समता करनेवाले तुम क्या मेरे प्राणों का हरण किये बिना नहीं हटनेवाले हो ?
हे मयूर ! बरछे तथा तीर के समान तीक्ष्ण नयनोंवाली तथा समुद्र में उत्पन्न दिव्य अमृत एवं कोकिल के सदृश बोलीवाली मेरी देवी को ढूँढ़कर नहीं लाते हो। तुम बड़े कठोर हो। मुझ एकाकी तथा निद्राहीन रहनेवाले की मनोव्यथा को जानते हुए भी क्यों अपना बल दिखाकर मुझे सताते हो ?
हे लता ! वर्षाकालिक उत्तरी पवन के अनुसार तुम हिल-डुलकर मेरे प्राणों में घुम जाती हो। तुम अब पुष्पमय हो गई हो और उज्ज्वल ललाटवाली सीता की कटि के समान ही लचक-लचककर क्यों मेरे प्राणों को गला रही हो ?
हे हरिण ! किसी भी स्पृहणीय वस्तु को मैं अब नहीं चाहता हूँ। पराक्रमपूर्ण कार्य भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। प्रज्ञा के मिट जाने से अब मैं कैसे जीवित रह सकूँगा ? मेरे प्राण-समान देवी मुझसे वियुक्त हो चली गयी हैं। तुम कहो कि वह अब कहाँ हैं ?
हे मेरे प्राण ! पाद-कटक से भूषित तथा रूई के समान मृदुल चरणोंवाली दोषहीन जानकी के साथ ही क्या तुम भी मुझे छोड़कर जाना चाहते हो ? यदि ऐसा करना था, तो जब देवी मुझसे वियुक्त हुई, तभी तुम भी निश्शंक होकर मुझे छोड़ जाते। हे मिटनेवाले, (मेरे प्राण) ! क्या तुम्हें उस देवी के साथ का अपना सम्बन्ध तब ज्ञात नहीं हुआ था ?
हे निष्ठुर ! 'कानरे' वृक्ष, जानकी के केशों के साथ तुम्हारा वैर था, अतः तुम मेरे साथ भी कड़ा वैर निकाल रहे हो ? तुम उस (जानकी) को मुझे नहीं ला देते। उसके बारे में कुछ कहते भी नहीं, भला तुम कब मेरे हितकारी रहे ?
कुरवंड पुष्प-सदृश तीक्ष्ण एवं उज्ज्वल दंतोंवाले घोर सर्प विष के समान ही यह काम्पू पुष्पों से भरित कुन्दलता भी प्राणहारी बन गई है। दुस्सह पीडाग्नि को प्रज्वलित कर