कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ४८७
मुझे निरन्तर सताते रहनेवाले यह (इन्द्रगोप) क्या एक ही हैं ? (अर्थात्, पीडा देनेवाले अनेक हैं)। इस 'रावणकोप' के रहते हुए यह 'इन्द्रगोप'१ भी क्यों मुझे सताने लगा है ?
स्वर्णमय ललाट-पट्ट (ताज) पहनने योग्य ललाटवाली सीता को धोखे से हरण करने के लिए मारीच एक स्वर्णमय हिरण के रूप में आया था। अब यम (मेरे प्राणों का हरण करने के लिए) उत्तरी पवन के रूप में आया है। अहो, अहित करनेवालों को अपने इच्छानुसार रूप धरना भी संभव होता है।
भयंकर कृत्यवाले राक्षसों के समान आकाश में घोर गर्जन करनेवाले हे मेघ ! तुम बार-बार चमककर कमल-पुष्प के आवास को तजकर (मिथिला में) अवतीर्ण हुई उस (लक्ष्मी) देवी को दिखा रहे हो। क्या तुम्हारे मन में मुझपर इतनी दया उत्पन्न हो गई है कि उस सीता को लाकर मुझे देनेवाले हो ?
हे मोर (प्राणियों को पीडा देनेवाला हे मन्मथ) ! विरह-ताप मेरे अन्तर में न समाकर उमड़ रहा है और मेरे प्राणों को जला रहा है। अब (प्राणों के जल जाने के बाद भी) तुम मेरे अन्दर में पुनः-पुनः शर छोड़कर घाव कर रहे हो। यह तुम्हारा कार्य व्यर्थ है। प्रशंसनीय विद्या से युक्त मेरा अनुज यदि तुम्हें एक बार भी देख ले, तो फिर उसके क्रोध को रोकना असंभव होगा।
हे अनंग ! धनुष और तीक्ष्ण बाण इसलिए नहीं है कि भयंकर युद्ध से डरे हुए योद्धाओं पर उनका प्रयोग किया जाय, उनका प्रयोग तो उनपर करना चाहिए, जो (प्रयोग करनेवाले के) पराक्रम का आदर नहीं करते हों। तुम तो निर्दय हो, यह सोचकर कि तुम्हारा बल हम जैसे दुर्बलों पर ही सफल होगा, रात-दिन हमें सताया करते हो। क्या तुम्हारा यह कार्य प्रशंसा के योग्य है ?
इस प्रकार के वचन कहकर शिथिल तथा दुःखित होनेवाले, अपने भाई को, जो अपना उपमान स्वयं ही था, देखकर लक्ष्मण व्याकुल हुआ और अपने सिर पर कर जोड़कर इस प्रकार सांत्वना के वचन कहने लगा—हे महात्मन् ! आपने अपने को क्या समझा है ?
विवेक एवं विद्या से सुसम्पन्न हे सिंह ! हे तपःसंपन्न ! वर्षाकाल का भी अन्त होता है। आप क्यों इस प्रकार दुःखी हो रहे हैं ? क्या आप इसलिए चिंतित हैं कि वर्षा का आगमन हो गया है ? अथवा काले राक्षसों के पराक्रम का विचार करके आप दुःखी हो रहे हैं ? या यह सोच रहे हैं कि वाली के द्वारा निर्मित वानर-सेना अभी तक देवी के अन्वेषण के लिए आई नहीं है ?
वेद भले ही भ्रम में पड़ जाय, चन्द्र अपने स्थान से विचलित हो जाय, गगन तथा गभीर समुद्र से आवृत्त धरती भी हिल उठे, किन्तु तुममें वैसी अस्थिरता (चांचल्य) कभी संभव नहीं है। अनेक चन्द्रकला-समान बड़े दाँतों से युक्त अग्र राक्षसों का प्रभाव क्या तुम्हारे भव्य भ्रुकुटि-रूपी धनुष के वक्र होने मात्र से विनष्ट नहीं हो जायगा ।
१. 'कोप' और 'गोप'—दोनों शब्द तमिल में एक ही जैसे लिखे जाते हैं। अत, तमिल में 'रावणगोप' और 'इन्द्रगोप' शब्दों को 'रावणकोप' और 'इन्द्रकोप' भी पढ़ा जा सकता है।—अनु०