कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८८ | कंब रामायण |
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हे ज्ञानवान् ! हनुमान् नामक व्यक्ति के ( ज्ञान, शक्ति इत्यादि गुणों के ) परिमाण को हमने जान लिया है । किन्तु, अंगद आदि ५६० समुद्र संख्यावाले वानरों के स्वरूप को हमने देखा नहीं है । पाप के समान दुःखदायक ( वर्षाकाल के ) मास भी शीघ्र बीत रहे हैं, आपकी धनुष-समान भौंहोंवाली देवी सुलभता से आ पहुँचेगी, यह निश्चित है, ( अतः ) आप शोक छोड़ें ।
हे प्रभो ! पहले जब अरण्यवासी वेदों के पारगामी मुनि तुम्हारी शरण में आये थे, तब तुमने प्रतिज्ञा की थी कि 'तुम लोगों को सतानेवाले मायावी राक्षसों को परास्त करके तुम्हारे कष्ट दूर करूँगा।' विधिवश तुम्हारे प्रति भी उन ( राक्षसों ) ने अपराध किया है, अतः उन राक्षसों का विनाश करो और मधुर यश प्राप्त करो तथा और देवों को भी स्वर्गलोक दिलाओ । अब इस प्रकार प्रज्ञाहौन हो रहना उचित नहीं है ।
हे मेरे प्रभु ! शत्रु-विजय करने का श्रेय तुमको ही प्राप्त होगी, अन्यथा यह यश और किसको मिल सकता ? शोक करना वीरता का कार्य नहीं है, वह तो दुर्बलता है । यह उचित है कि हम समय की प्रतीक्षा करें और उसके अनुसार कार्य करें । यदि आप अभी प्रयत्न करना चाहते हो, तो भी आपके लिए असाध्य कार्य कुछ नहीं है । आप शोक से उद्विग्न न हो—इस प्रकार ( लक्ष्मण ने ) कहा ।
शिथिलप्राण हो निश्चेष्ट बैठे हुए आदि भगवान् (के अवतार रामचन्द्र) अनुज के वचनों से सांत्वना पाकर शोक-मुक्त हुए, इस प्रकार अनेक दिन व्यतीत हुए । एक रोग के शान्त होते ही दूसरा रोग उत्पन्न हो गया हो, ऐसे ही अब वर्षाकाल का उत्तरार्ध आरम्भ हुआ ।
बड़े-बड़े जलाशय भर गये । उनमें तरंगें घनी होकर उठने लगीं । काले वर्णवाले कोकिल दुर्बल हुए, ऊँचे पर्वत ठंडे हुए, विशाल दिशाएँ अदृश्य हुईं, अपने प्रियतमों से वियुक्त व्यक्ति दुःखी हुए, क्रौंचों के जोड़े एकप्राण होकर परस्पर गाढ़ालिंगन में बँध गये ।
उत्तरी पवन, स्वर्णमय आभरणों से भूषित अप्सराओं के अनिन्दनीय विशाल जघन-तट के वस्त्रों तथा उनके झूलों का स्पर्श करके उनके प्रेम से पीड़ित हुए व्यक्तियों पर ऐसे जा लगता था, जैसे जले हुए घाव में तीक्ष्ण बाण चुभ गया हो ।
समुद्र भर गये, सूर्य-किरणें अपना ताप तजकर ठंडी हो गईं । जल से आँके जानेवाले घटी-यन्त्र के द्वारा ही समय का ज्ञान संभव था, अन्यथा यह जानना असंभव था कि कब दिन हुआ है और कब रात ।
मयूर-सदृश तरुणियों की कोमल मधुर बोली से पराजित होनेवाले तोते धान के पौधों में जा छिपते थे, जिससे धान की बालियाँ टूट जाती थीं । ( रमणियो के ) धवल तथा मृदु दंतों से पराजित मुक्ताएँ विशाल सागर की लहरों में छिपी पड़ी रहती थीं । 'नेयिदल' प्रदेश ( समुद्री तटों ) की युवतियों के आँगनों में उत्पन्न होनेवाले पुष्पित 'पुन्ने' वृक्ष मानो सोने की गठरी को खोल रहे थे ।
ऊँचे हाथी उज्ज्वल तथा बड़ी बूँदों के गिरते रहने पर भी पर्वत के समान अचल तथा निद्राहीन स्थिर खड़े थे, जैसे काली रात तथा दिन के समय में निरंतर ध्यानरत रहनेवाले दृढचित्त तपस्वी हों ।