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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

किष्किन्धाकाण्डे ४८६

शीत से काँपनेवाले इस, चन्दन-वृक्ष के पत्तों से छायी हुई झोपड़ियों के भीतर, वेदिकाओं के निकट होम-कुण्डों में प्रातः और संध्या को जलाई जानेवाली अगरु की लकड़ियों के धुएँ में घुस-घूमकर अपनी ठंड दूर कर लेते थे। वानरियाँ पर्वत-कंदराओं में सोई पड़ी थी। बलिष्ठ वानर ऐसे सिकुड़े बैठे थे, जैसे अष्टांगयोग की प्रक्रिया के द्वारा अपनी इंद्रियों का दमन करनेवाले अनुपम योगी हों।

मेघ घोर वर्षा कर रहे थे, जिससे निर्मल पर्वत निर्झरों की धाराएँ तरुणियों के केश-पाश की सुगन्धि से सुवासित नहीं हो पाती थी—(अर्थात्, तरुणियाँ उनमें स्नान नहीं करती थी)। रत्नमय स्तम्भों पर डाले गये झूले सूने पड़े थे। मंच, चमकते हुए रत्नों को आकाश में नहीं फेंकते थे (अर्थात्, अनाजों के खेत में बने मंचों पर खड़े होकर अब कोई पक्षियों को उड़ाने के लिए रत्नमय पत्थरों को नहीं फेंकता था।)

केतकी-वृक्षों के काले तथा शीतल पत्तों के मध्य कामोद्दीपक पुष्प पंक्तियों में खिले थे और उनके घेरे के मध्य सारसियाँ अपने विशाल तथा सुन्दर पक्षों को सिकोड़े ऐसे बैठी थीं, जैसे अपने प्रियतम के विरह में पीड़ित स्त्रियाँ हों।

नाना विहग मृदंग के समान नाद कर रहे थे। विविध भ्रमर संगीत कर रहे थे। मयूर नृत्य की विविध भंगियाँ दिखा रहे थे और अनेक प्रकार के नृत्य दिखानेवाली वेश्याओं की समता करते थे। और, हरिण-समुदाय, जो मेघ-गर्जन से भयभीत होकर वृक्षों के नीचे आ ठहरते थे, (उस नृत्य के) दर्शक बने थे।

कोमल पुष्प-शाखा को परास्त करनेवाली कटि से शोभित तरुणियाँ तथा युवक अगरु-धूम से आवृत होनेवाले दीपों के प्रकाश में पर्यन्त पर शयन करते थे। शीत से काँपने-वाले भ्रमर पुष्प का त्याग कर, चन्दन-वृक्ष के कोटरों में विश्राम करते थे।

मनोहर हंसों के जोड़े कमल-शय्या को तजकर बड़े वृक्षों से भरे उद्यानों में आ ठहरे थे। सुगन्धित लकड़ियों से बने हुए झोपड़ों में धवल दंतोंवाली व्याध-स्त्रियों के साथ उनके प्रियपुरुष निद्रा करते थे।

ग्वाले लताओं से आवृत अत्युन्नत तथा छोटे पत्तोंवाले वृक्ष के नीचे बकरियों के बच्चों को गोद में लिये पड़े थे। चोरों के समान छिपकर फिरनेवाले भूत भी भूखे ही दाँत कटकटाते हुए एक स्थान में खड़े थे।

बड़े-बड़े दृढ़चित्तवाले हाथी आकाश के मेघों से बाण-सदृश पानी की बूँदों के अपने शरीर पर गिरने से सिकुड़ जाते थे और पर्वत के सानुओ के ऊपर जहाँ मधु के पुराने तथा असंख्य छत्ते लगे थे, नहीं रह पाते थे और कन्दराओं के भीतर घुस जाते थे।

इस प्रकार के वर्षाकाल में रात्रि का अंधकार भी आ पहुँचा। तब ज्ञानवान (रामचन्द्र) ने अंजन-सदृश आँखोंवाली तथा मंदहास-युक्त जानकी की याद में ज्वाला-सी निःश्वास भरते हुए लक्ष्मण से कहा—

आभरण-भूषिता, पीनस्तनी वह (सीता) मेघ के सदृश काले रंगवाले तथा बिजली के सदृश दाँतोंवाले राक्षस की माया का लक्ष्य बनकर पीड़ित हो अपने प्राण छोड़ेगी। मेरे लिए भी जीवित रहना सर्वथा असम्भव है। आह! यह कैसी अवस्था है।