कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
पृष्ठ 498, कुल 549 में से
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४१० कंब रामायण
शुभ्र वर्णवाले तथा विनाशकारी शर मेरे तूणीर में सोये पड़े हैं। मैं गगनोन्नत भुजावाला होकर भी इस प्रकार की पीड़ा भोग रहा हूँ। मेरी ऐसी दशा है, मानों मेरे कंठ में बरछा चुभा हो, फिर भी मैं निष्प्राण नहीं हुआ हूँ।
पत्ती जोड़ों के भीतर चमकते हुए जुगनुओं के प्रकाश में अपनी संगिनियों के साथ सो रहे हैं। (मन्मथ के द्वारा) चुनकर फेंके गये पुष्पबाणों से मेरा हृदय छिन्न हो गया है और दुःसह पीडा से पीड़ित हो रहा हूँ। फिर भी, मैं जीवित हूँ।
मेघ में विद्युत् की कौंध को और वज्र के गर्जन को देखता तथा सुनता हुआ मैं विषदंतवाले सर्प के समान पीडित होकर चुप पड़ा हूँ। वनवास में मैंने जो कार्य किये हैं, उनपर स्वर्गवासी (देवता) और धरतीवासी (मनुष्य) हँसेंगे। अब (मेरे अपमान के लिए) और क्या आवश्यक है ?
वेदना से पीड़ित होता हुआ मैं (सीता को) भूलकर जीवित नहीं रह सकता हूँ। यदि वर्षा इसी प्रकार रहेगी, तो मेरा प्राण त्याग कर स्वर्ग पहुँचना निश्चित है। तो क्या मैं इस अपयश को अगले जन्म में ही मिटा सकूँगा। कदाचित् अगले जन्म में भी मैं गृहस्थी से सन्यास लेकर ही यह अपयश मिटा सकूँगा।
हे वीर ! इस स्थान पर रहकर यदि हम राक्षसों का पता लगावें, तो बहुत समय व्यतीत होगा। अतः, यह प्रयत्न (सीता का अन्वेषण) आवश्यक नहीं। मेरे लिए इसी में यश है कि मैं (सीता की) विरह-पीडा में प्राण त्याग दूँ।
मैं शर-सदृश उज्ज्वल कटाक्ष-पूर्ण नयनोंवाली तथा श्रेष्ठ आभरणों से भूषित (सीता) के प्रवाल वर्णयुक्त तथा कुमुद-सदृश अधर का अमृतपान करता रहा। यह वर्षा मानो ताँबे को पिघलाकर बरसा रही है और मेरे शरीर को जला रही है। तो, क्या अब ऐसे ही मरना मेरे लिए उचित है ?
घृत की आहुति देकर प्रज्वलित की हुई अग्नि के समक्ष, जनक ने मुझसे कहा था कि यह (सीता) तुम्हारी शरण में है। उनके उस वचन को मैंने असत्य कर दिया है। ऐसे मुझ अधार्मिक व्यक्ति में सत्य कैसे टिक सकता है ? अतः, अब मुझे मर जाना ही उचित है।
सांत्वना देने के लिए तुम हो। सांत्वना पाकर सहन करने के लिए मैं हूँ। कंकण-धारिणी (सीता) अब यहाँ आ जाय—यह संभव नहीं है। इस पीडा को कौन दूर कर सकता है ? क्या इस पीडा का कभी अन्त भी होनेवाला है ?
मैं श्रेष्ठ शरों को चुन-चुनकर प्रयोग करूँ, तो उनसे जब सत्यलोक जल जाय, देवता प्रभृति सृष्टि के अतिप्राचीन व्यक्ति मिट जायें तथा सभी लोक एवं वहाँ के प्राणी अशेष रूप से ध्वस्त हो जायें, तभी क्या मैं मयूर-सदृश उस (सीता) को देख सकूँगा ?
वज्र-निर्घोष-सदृश टंकार से युक्त धनुष को धारण करनेवाले हे वीर ! इस प्रकार मैं सब लोकों तथा वहाँ के प्राणियों को न मिटाकर पीडा का अनुभव करता हुआ बैठा हूँ, तो यह इसी डर से कि (वैसा करके) मैं धर्म की रक्षा नहीं कर पाऊँगा; अन्यथा शत्रु-राक्षस सब देवताओं के साथ मिलकर मेरे विरुद्ध आवें, तो भी वे मुझसे बच नहीं सकते।—राम ने इस प्रकार कहा।