कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
४१० कंब रामायण
शुभ्र वर्णवाले तथा विनाशकारी शर मेरे तूणीर में सोये पड़े हैं। मैं गगनोन्नत भुजावाला होकर भी इस प्रकार की पीड़ा भोग रहा हूँ। मेरी ऐसी दशा है, मानों मेरे कंठ में बरछा चुभा हो, फिर भी मैं निष्प्राण नहीं हुआ हूँ।
पत्ती जोड़ों के भीतर चमकते हुए जुगनुओं के प्रकाश में अपनी संगिनियों के साथ सो रहे हैं। (मन्मथ के द्वारा) चुनकर फेंके गये पुष्पबाणों से मेरा हृदय छिन्न हो गया है और दुःसह पीडा से पीड़ित हो रहा हूँ। फिर भी, मैं जीवित हूँ।
मेघ में विद्युत् की कौंध को और वज्र के गर्जन को देखता तथा सुनता हुआ मैं विषदंतवाले सर्प के समान पीडित होकर चुप पड़ा हूँ। वनवास में मैंने जो कार्य किये हैं, उनपर स्वर्गवासी (देवता) और धरतीवासी (मनुष्य) हँसेंगे। अब (मेरे अपमान के लिए) और क्या आवश्यक है ?
वेदना से पीड़ित होता हुआ मैं (सीता को) भूलकर जीवित नहीं रह सकता हूँ। यदि वर्षा इसी प्रकार रहेगी, तो मेरा प्राण त्याग कर स्वर्ग पहुँचना निश्चित है। तो क्या मैं इस अपयश को अगले जन्म में ही मिटा सकूँगा। कदाचित् अगले जन्म में भी मैं गृहस्थी से सन्यास लेकर ही यह अपयश मिटा सकूँगा।
हे वीर ! इस स्थान पर रहकर यदि हम राक्षसों का पता लगावें, तो बहुत समय व्यतीत होगा। अतः, यह प्रयत्न (सीता का अन्वेषण) आवश्यक नहीं। मेरे लिए इसी में यश है कि मैं (सीता की) विरह-पीडा में प्राण त्याग दूँ।
मैं शर-सदृश उज्ज्वल कटाक्ष-पूर्ण नयनोंवाली तथा श्रेष्ठ आभरणों से भूषित (सीता) के प्रवाल वर्णयुक्त तथा कुमुद-सदृश अधर का अमृतपान करता रहा। यह वर्षा मानो ताँबे को पिघलाकर बरसा रही है और मेरे शरीर को जला रही है। तो, क्या अब ऐसे ही मरना मेरे लिए उचित है ?
घृत की आहुति देकर प्रज्वलित की हुई अग्नि के समक्ष, जनक ने मुझसे कहा था कि यह (सीता) तुम्हारी शरण में है। उनके उस वचन को मैंने असत्य कर दिया है। ऐसे मुझ अधार्मिक व्यक्ति में सत्य कैसे टिक सकता है ? अतः, अब मुझे मर जाना ही उचित है।
सांत्वना देने के लिए तुम हो। सांत्वना पाकर सहन करने के लिए मैं हूँ। कंकण-धारिणी (सीता) अब यहाँ आ जाय—यह संभव नहीं है। इस पीडा को कौन दूर कर सकता है ? क्या इस पीडा का कभी अन्त भी होनेवाला है ?
मैं श्रेष्ठ शरों को चुन-चुनकर प्रयोग करूँ, तो उनसे जब सत्यलोक जल जाय, देवता प्रभृति सृष्टि के अतिप्राचीन व्यक्ति मिट जायें तथा सभी लोक एवं वहाँ के प्राणी अशेष रूप से ध्वस्त हो जायें, तभी क्या मैं मयूर-सदृश उस (सीता) को देख सकूँगा ?
वज्र-निर्घोष-सदृश टंकार से युक्त धनुष को धारण करनेवाले हे वीर ! इस प्रकार मैं सब लोकों तथा वहाँ के प्राणियों को न मिटाकर पीडा का अनुभव करता हुआ बैठा हूँ, तो यह इसी डर से कि (वैसा करके) मैं धर्म की रक्षा नहीं कर पाऊँगा; अन्यथा शत्रु-राक्षस सब देवताओं के साथ मिलकर मेरे विरुद्ध आवें, तो भी वे मुझसे बच नहीं सकते।—राम ने इस प्रकार कहा।
किष्किन्धाकाण्ड ४११
तब अनुज ने कहा—हे आज्ञा-रूपी चक्र से युक्त प्रभु ! जिस वर्षा ऋतु को हमने यहाँ व्यतीत करना चाहा, वह अब व्यतीत हो चुका है। शरद्-काल भी अब समाप्ति पर आ गया है। अतः, उस चोर (रावण) के आवास को खोजकर पहचानने का समय आ पहुँचा है। अब आप क्यो शिथिलमन हो रहे हैं ?
अरुण नयनवाले विष्णु भगवान् के यह आज्ञा करने पर कि तुम अमृत-तरंगो से पूर्ण विशाल क्षीरसागर से अमृत को दे सकते थे, फिर भी वैसी आज्ञा देना उचित न समझ-कर, पर्वत आदि सभी मथन-उपकरणो के द्वारा उसे मथकर ही अमृत को निकलवाया था।
चक्रधारी भगवान् यदि मन में संकल्प-मात्र कर लें, तो समस्त लोको के टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें अपने मुँह में डालकर चबा डालें, तो भी वह वैसा नही करता, परन्तु अनेक बड़े शस्त्रों को लेकर युद्ध करके ही सब (दुर्जनों) को वह विजित करता है।
हे महाभाग ! ललाटनेत्र तथा परशुधारी शिव भगवान्, जब क्रुद्ध होकर, आकाश मे संचरण करनेवाले त्रिपुरो को ध्वस्त करने लगे, तब उन्होने जो-जो उपाय किये थे और जो-जो उपकरण जुटाये, उन्हे कौन जान सकता है ?
यदि हम अपने अनुकूल रहनेवाले सब (मित्रो) को अपना साथी बना लें, मन्त्रणा करने योग्य सब विषयों को भली भाँति विचार कर निर्णय करें, फिर उचित समय को पहचानकर उचित ढंग से कार्य करें, तब 'विजय' नामक वस्तु क्या हमसे दूर रह सकती है ?
बलवान् राक्षसो ने धर्म-मार्ग से विमुख होकर अधर्म-मार्ग को ही अपने लिए ग्राह्य मान लिया है, उचित सन्मार्ग से जब वे (राक्षस) भ्रष्ट हो गये हैं, तब यश और विजय दोनो (तुम्हारे सिवा) अन्य किसके पास होंगे ?
स्वर्ण-आभरण पहननेवाली उन देवी के कष्टो को दूर करने का समय धीरे-धीरे आ पहुँचा है। अब आप दुःख-मुक्त हो जायें । ऋषि-मुनियों की सहायता करनेवाले हम क्या राक्षसो के (शस्त्रो के) लक्ष्य बनेगे ? हे मनोहर धनुष धारण करनेवाले ! आप ही कहिए।—इस प्रकार लक्ष्मण ने कहा।
युगो के अधिपति (विष्णु भगवान् के अवतार रामचन्द्र ने) लक्ष्मण के वचनो को उचित समझा। इसी प्रकार, जब वे यह सोचते हुए कि क्या इस वर्षाकाल का भी कभी अन्त होनेवाला है, कृश हो रहे, तब वर्षाकाल भी समाप्ति पर आ गया।
महान् दान-कार्य मे निरत कोई उदार व्यक्ति, धरती के सभी लोगों को उनके इच्छानुसार सभी पदार्थ का दान देकर निर्धन हो गया हो और फिर, किसी उत्तम याचक के द्वारा कुछ माँगे जाने पर उसे दान देने के लिए अपने पास कुछ न होने से लज्जित हो गया हो। इसी प्रकार सब मेघ श्वेत वर्ण हो गये (अर्थात्, शरत्काल आ गया)।
पाप-पुण्य नामक दो कर्मों के फल को जानने से सद्द्विवेक के प्राप्त होने पर जिस प्रकार अविद्या के तम मिट जाते हैं, उसी प्रकार (शरत्काल के आगमन पर) वर्षाकाल का गाढ अन्धकार मिट गया।
जिस प्रकार घोर युद्ध के समाप्त होने पर युद्ध की भेरी निःशब्द हो जाती है, उसी प्रकार जल-भरे मेघ भी गर्जन करना छोड़कर निःशब्द हो गये। भयंकर बाणो के सदृश
४१२ | कंब रामायणं
वर्षा की बौछार भी थम गई। जैसे करवाळ कोशों मे बंद करके रख दिये गये हो, वैसे ही विद्युत् भी अदृश्य हो गई।
विशाल प्रान्तवाले ऊँचे पर्वत अपने सानुओ के निर्झरो से रहित हो गये। उनके केवल कुछ जल-स्रोत ही बहते रह गये। वे (पर्वत) ऐसे लगते थे, मानो वे यज्ञोपवीत और उत्तरीय के साथ श्वेत वस्त्र भी कटि मे धारण किये हों।
पर्वतो के ऊपर से मेघो के हट जाने से दिगंतों तक प्रवाहित होनेवाली नदियाँ जल-रहित हो गईं। अतः, वे (नदियाँ) सन्मार्ग पर न चलनेवाले उस व्यक्ति के समान थीं, जो उत्तम पुण्य के घट जाने पर निर्धन हो गया हो।
गड-स्थलों से मद-जल बहानेवाले हाथियो के समान स्थित काले मेघ गगन के प्रदेश को उन्मुक्त छोड़कर उड़े जा रहे थे। चन्द्रमा इस प्रकार चमक उठा, जिस प्रकार यवनिका के उठने पर विविध नाट्य-भंगियाँ दिखानेवाली नर्तकी का वदन हो।
उत्तरी पवन पुष्प-मकरन्द को बिखेरता हुआ इस प्रकार प्रवाहित हो उठा, जिससे स्वर्णमय आभरण धारण करनेवाली तरुणियो के विशाल तथा मनोज्ञ स्तनों पर अंकित चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम आदि का लेप सूख गया।
हंस गगन मे सभी दिशाओ में मानो यह सोचकर उड़ रहेथे कि दशरथ चक्रवर्ती के कुमार (श्रीराम) के दुःख को दूर करने के लिए उचित समय अब आ गया है। अतः, हम भी (सीता) देवी का अन्वेषण करने चलें।
सरोवरों का जल छल-कपट से रहित तपस्वी जनो के मन के सदृश स्वच्छ हो गया। उन जलाशयो में विचरनेवाले मीन, 'रुई पर चलना है'—इस कथन को सुनने मात्र से जिनके कोमल चरण लाल हो जाते हो, ऐसी सुन्दर युवतियो के अञ्जन-लगे नयनों के समान घूम रहे थे।
नालो पर विकसित कमल-पुष्प रूठी हुई तरुणियो के वदन की समता करते थे। 'किडै' नामक पौधे, जिनमे अतिसुन्दर, सुगन्धित तथा रक्तवर्ण पुष्प भरे थे, सुरत-श्रांत युवतियो के रक्त अधरो का दृश्य उपस्थित करते थे।
अनेक प्रकार के मेढ़क जो (वर्षाकाल मे) शिक्षा देने में चतुर अध्यापकों के पास पाठ सीखनेवाले कोलाहल से पूर्ण वटुकों के समान बोल रहे थे, अब उन बुद्धिमानो के समान ही मौन हो गये, जो अपना वचन जहाँ फलप्रद होता हो, वही बोलते हैं और अन्यत्र मौन रहते हैं।
मेघों की विशाल वर्षा से हीन होकर मयूर अपने पंखो को सिकोड़े हुए दुःखी बने हुए और मन में कोई भी उमंग या फल की कामना से रहित होकर मिथिला-नगर के हंस (अर्थात्, देवी सीता) के समान ही व्याकुल हो दबे पड़े रहे।
समुद्र, मानो अपने तरंग-रूपी करो से नदी-रूपी अपनी पत्नियों के उमड़ते हुए जल-रूपी सुन्दर आँचल को पकड़कर खींच रहे थे और वे नदियाँ मानो अपने बलवान् पति का आलिंगन करके मदहास कर रही थी, जो (मंदहास) मुक्ताजल का दृश्य उपस्थित करते थे।
गुवाक (सुपारी)-वृक्षों के फल, शास्त्रों के ज्ञानमय वचनो का श्रवण करनेवाले
किष्किन्धाकाण्ड ४६३
पुरुषो के समान तथा विरह से पीडित तरुणियो के समान ही धीरे-धीरे अपने पूर्व रंग का त्याग कर अनिन्दनीय सुनहले रंग को प्राप्त करने लगे।
गगर नामक प्राणी, अनेक दिनों तक जल में रहने से शीत की पीडा से व्याकुल होकर जलाशयो से बाहर धूप में ऐसे पडे हुए थे कि सूर्य की कांति उनके शरीर पर बिखर रही थी। इस प्रकार, जलाशयो के तटो पर अनेक स्थानो में अपने मुख को बन्द किये वे सोये पड़े थे।
'वजी' नामक लताएँ, जिनमें (बैठकर) तोते मधुर स्वर मे बोल रहे थे, जिनमें मनोहर पंखोवाले भ्रमर केशों का दृश्य उपस्थित करते हुए उड़ रहे थे, जिनमें अतिसुन्दर पल्लव थे (जो कान की समता करते थे) और जो कटि के समान ही लचक-लचक जाती थी, तरुणियो के समान शोभायमान थी।
घोंघे, जिनकी पीठ झुकी हुई थी, अपने नेत्रो को सिकोड़कर कीचड़ में धँस गये, मानो उनके द्वारा उत्पन्न किये गये मोती के (रमणियों के दाँतो से) पराजित हो जाने से वे हरिण-सदृश रमणियों के सम्मुख प्रकट होना नही चाहते हो।
वर्षा के कारण पुष्ट हुए समतल प्रदेशों के कमल-पुष्पों के विशाल पत्तो की छाया में विश्राम करनेवाले दोषहीन केंकडे अब अपनी स्त्रियों के साथ अपने बिलो में उनके द्वारो को बन्द करके ऐसे पड़े थे, जैसे लोभी व्यक्ति हों। (१-१२१)
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अध्याय १०
किष्किन्धा पटल
इस प्रकार शरत् काल जब व्यतीत होने लगा, तब वीर अग्रज राम ने अपने अनुज को देखकर कहा—हे वीर ! निश्चित अवधि व्यतीत हो गई। किन्तु, निद्रा मे पड़ा हुआ वह राजा (सुग्रीव) अभी तक नही आया। उसका यह कैसा कार्य है ?
वह (सुग्रीव) दुर्लभ राज्य-सपत्ति को पाकर हमारे उपकारो को भूल गया है। अतः, उत्तम सदाचार मे वह भ्रष्ट हो गया है, धर्म को भुला दिया है, इसके प्रति किये हमारे स्नेह की बात छोड़ दो, वह हमारे पराक्रम को भी भूल गया है। इस प्रकार वह सुखी जीवन मे मत्त हो गया है।
जो कृतघ्न होकर अपूर्व रूप में प्राप्त स्नेह को भी भुला दे, उचित सत्य को मिटा दे एव अपने प्रण को पूर्ण न करे, उसको मारना दोष नहीं है। अतः, तुम जाओ और उसकी मनोदशा को जानकर लौट आओ।
तुम जाकर यह मेरा संदेश उस (सुग्रीव) को दो कि घोर पापियों को युद्ध में निर्मल करके स्वर्ग भेजने तथा (लोक मे) धर्म को सुरक्षित बनाने के लिए मैने जो धनुष
४६४ | कम्ब रामायण
उठाया है, वह अभी वर्त्तमान है। भयंकर यम भी है। तुमलोगो को मारनेवाला बाण भी मेरे पास है।
विष के समान व्यक्तियो को दण्ड देना पाप नहीं है। मनु का यही विधान है। इस बात को तुम उस (सुग्रीव) के हृदय में बिठा दो, जिसने पाँच वर्ष (की आयु) में कुछ नहीं जाना।
तुम उससे यह सत्य वचन भी कहना कि यदि वह चाहता है कि नगर, प्रजा, राज्य तथा अपने बन्धुजन—इन सबके साथ स्वयं भी राज करता हुआ सुखी रहे, तो अविलंब यहाँ चला आये। यदि वह इस प्रकार नहीं आयगा, तो संसार में वानरी का नाम तक शेष नहीं रहेगा।
यदि सुग्रीव प्रभृति वानर, हमसे भी अधिक बलवान् वीर को खोजने का विचार करें, तो उनसे कहना कि तुमको (अर्थात्, लक्ष्मण को) जीतनेवाला तीनों भुवनों में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है।
तुम पहले उन्हें नीतिमार्ग को समझाना। यदि उस वचन से उनका मन न बदले, तो तुम क्रुद्ध न होना और वहीं उन्हें मिटा न देना। किन्तु, उनके दिये उत्तरों को मेरे पास आकर कहना।—यों कहकर यशोभूषित (रामचन्द्र) ने लक्ष्मण को विदा किया।
रामचन्द्र की आज्ञा को सिर पर धारण करके, उनके चरणों को नमस्कार करके, किंचित् भी विलंब न करके अपनी विशाल पीठ पर तूणीर बाँध तथा शर-प्रयोग के लिए अतिश्रेष्ठ धनुष को कर में लिये हुए, अनन्यचित्त से वह (लक्ष्मण) दुर्गम मार्ग पर चल पड़ा।
(राम की) आज्ञा से चलनेवाला वह (लक्ष्मण) सुकुमार होते हुए भी (पूर्व में सुग्रीव जिस मार्ग से उन दोनों को किष्किंधा तक ले गया था उसी) पूर्व-प्रसिद्ध मार्ग से नहीं गया, किन्तु वृक्षों और शिलाओं को चूर-चूर करके उन्हें दूर फेंकता हुआ एक नया मार्ग बनाकर उसपर चला। (भाव यह है कि सुग्रीव ने प्रसिद्ध मार्ग में कोई रुकावट अथवा हानिकारक उपाय कर रखा होगा, इस विचार से लक्ष्मण उस मार्ग से नहीं गये।)
वीर-कंकण से भूषित लक्ष्मण के अरुण चरणों की चाप से, स्वर्ग को छूनेवाले मेरु पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए पर्वत धरती में धँसकर समतल हो गये। पाताल में स्थित कर्ण- नेत्र (अर्थात्, सर्प या आदिशेष) भी लोगों की दृष्टि में आ गया।
बलिष्ठ वाली के भाई के पास जानेवाला मनुकुल श्रेष्ठ का अनुज, भयंकर अरण्य को भेदकर अतिवेग से आगे बढ़ता हुआ, गगन-चुम्बी सालवृक्षों को छेदनेवाले (राम के) बाण की समता करता था।
किसी दिग्गज के बच्चे के खो जाने पर उसे ढूँढ़ता हुआ, उसके पद-चिह्नों का अनुसरण करके दूसरा कोई दिग्गज चल पड़ा हो—सुग्रीव को ढूँढ़ता हुआ जानेवाला वह लक्ष्मण वैसे ही लगता था।
जिस प्रकार सूर्य ऊँचे उदयाचल से अस्ताचल पर जा पहुँचा हो, उसी प्रकार स्वर्ण की कांति से युक्त शरीरवाला लक्ष्मण एक ऊँचे उज्ज्वल पर्वत से (ऋष्यमूक से) दूसरे पर्वत पर (किष्किंधा पर) शीघ्र जा पहुँचा।
किष्किन्धाकाण्ड २६५
अपने रक्षक अग्रज के अनुपम शर के समान वह अत्युन्नत किष्किन्धा-पर्वत पर जा पहुँचा। वह एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर फाँदकर जानेवाले स्वर्णरंग केसरी की समता करता था।
उसे देखकर वानर, ऐसे भागे, जैसे यम को देख लिया हो। वे वालिकुमार के निकट जा पहुँचे और उससे कहा—हे प्रभु ! अतिक्रुद्ध रामानुज चंडवेग से यहाँ आ रहा है। यही सुनते ही—
वह कुमार भी, साहसिक कृत्य करनेवाले लक्ष्मण के आगमन का कारण जानने के लिए (लक्ष्मण के) समीप आया और उस चक्रवर्ती कुमार के मन का भाव पहचानकर स्वर्ण का वीर-कंकण धारण करनेवाले अपने पितृव्य (सुग्रीव) के प्रासाद में जा पहुँचा।
नल (नामक वानर-शिल्पी) के द्वारा निर्मित प्रासाद में पुष्प-दलों की शय्या पर पड़े उस सुग्रीव के निकट जा पहुँचा, जो दीर्घ कुंतलों तथा बाल-स्तनोंवाली रमणियों के द्वारा अपने सुन्दर पैरों को सहलाये जाते हुए, निद्रा का अतिथि बनने की इच्छा कर रहा था।
जो स्वच्छ ज्ञानवाले राम-लक्ष्मण के द्वारा प्रदत्त उस विशाल राज्य-सम्पत्ति-रूपी मदिरा का पान करके अतिमत्त हो गया था, जो अति उच्च्वल स्वर्ण-पर्वत के मध्य ठहरे हुए ऊँचे रजत-पर्वत के समान शोभायमान था।
जो, सिंधुवार, साखू, अगरु, चंदन तथा सुगन्धित लताओं तथा सुरभित पुष्पों का स्पर्श करके वहनेवाले बाल-पवन के कारण सुख-निद्रा में मग्न था।
जो मधुर ‘किडे’ (नामक फूल) के समान अधखिली स्त्रियों के, धवल हास करनेवाले मुक्ता-सदृश पैने दंतों से मधु-समान जो रस उत्पन्न होता था, उसका पान करके उन्माद, मूर्च्छा तथा अन्य (तंद्रा, शिथिलता आदि) गुणों के बढ़ जाने से मत्त गज के समान पड़ा था।
जो, मुकुट, कुंडल आदि के कांति-पुंजों के व्याप्त होने से ऐसा उज्ज्वल लगता था, जैसे सूर्य-किरणों से आवृत हिमाचल हो।
वह सुग्रीव लेटा था। तारा के गर्भ से उत्पन्न वीर अंगद पहले उसके समीप गया और अपने विशाल करों को जोड़े, उसे निद्रा से जगाने के लिए मृदु वचन कहने लगा—
हे मेरे पिता ! मेरे वचन सुनिए। उन रामचन्द्र का अनुज, अपने मुख से अपने मन के महान् क्रोध को प्रकट करते हुए अवार्य वेग से आ पहुँचा है। अब आपका विचार क्या है? कहिए।
वह (सुग्रीव) राज्य-सम्पत्ति के मोह से भूला हुआ था और सुगंधित मद्य-रूपी विष भी उसके शिर पर चढ़ा हुआ था। अतएव प्रज्ञा-रहित हो कोमल पर्यङ्क पर पड़ा था; अंगद के वचनों को वह सुन नहीं सका।
यह दशा देखकर कपिशार्दूल एवं केसरी की समता करनेवाला वह युवराज (अंगद), यह सोचकर कि अब सुग्रीव के सम्मुख खड़े रहने से कुछ न होगा, दोषरहित चित्तवाले हनुमान् को बुलाने के लिए उनके पास गया।
४९६ कंब रामायण
इन्द्रपुत्र का सुत (अंगद) मन्त्रणा मे अतिकुशल वायुकुमार को साथ लिये हुए उग्र सेनापतियो के साथ चलकर (सुग्रीव के प्रासाद से) बाहर निकलकर अपनी माता के प्रासाद की ओर चला।
वहाँ पहुँचकर उसने (तारा से) प्रश्न किया कि अब क्या करना चाहिए ? तब तारा ने उत्तर दिया—तुमलोग न करने योग्य पाप-कर्म सुलभता से कर डालते हो, फिर उन कर्मों के परिणाम को अनायास ही दूर करने का उपाय भी करना चाहते हो । क्या उपकार को भूलकर (कृतघ्न होनेवाले) तुमलोग (पाप से) मुक्त हो सकते हो ?
उसने फिर आगे कहा—विजयी (रामचन्द्र) ने तुम्हें सेना-सहित आने की जो अवधि दी है. यदि वह व्यतीत हो जायगी, तो तुम लोगों के जीवन की अवधि भी समाप्त हो जायगी—यो मेरें कहते रहने पर भी तुमलोगों ने कुछ सुना नहीं। अब देखो, तुमलोग कैसे फँस गये हो।
जिन वीर ने अपने धनुष को ऐसा झुकाया कि यम ने बाली के अपूर्व प्राणो का हरण कर लिया और जिन्होने तुमलोगो को अतुलित राज्य-सम्पत्ति प्रदान की, वे भी आज तुम्हारी उपेक्षा-योग्य हो गये हैं। तुम्हारे जैसे स्वभाववाले लोगों के लिए यह कार्य (रामचन्द्र की उपेक्षा करना) ठीक ही तो है।
देवताओ से भी उत्तम वे (राम) अपनी पत्नी के वियोग में निष्प्राण-से हो मूर्च्छित पडे हैं। इधर तुम उनकी उस व्यथा को मन में भी न लाकर सद्योविकसित नीलोत्पल-समान नेत्रवाली रमणियों के प्रेमामृत का पान कर रहे हो।
(तुमलोग) सत्य से मुकर गये हो, कृतघ्न हो गये हो। तुमलोगों के पापों का परिणाम अब दीख रहा है। तुमलोग इस प्रकार गुणहीन हो गये हो। यदि उन महावीर (राम) से युद्ध मोल लोगे, तो विनष्ट हो जाओगे।—जब तारा इस प्रकार उनकी भर्त्सना करती हुई बोल रही थी, तब—
उधर बड़े-बड़े पराक्रमी वानरों ने नगर के विशाल कपाट को, जो बड़ी अर्गला से बद करने योग्य था, बन्द करके भीतर से अर्गला डाल दी और बड़ी शिलाओ को लाकर (उस कपाट के पीछे) चुन दिया।
वे वानर-वीर इस प्रकार नगर-द्वार को सुरक्षित करके और यह विचार कर कि (यदि कदाचित् लक्ष्मण भीतर प्रविष्ट हो जाय तो) उनसे युद्ध करने के लिए सन्नद्ध रहना चाहिए, वृक्षो को तोड़कर एव बड़ी शिलाओ को उखाड़कर हाथ में लिये हुए, प्राकार के समीप खडे रहे।
राजपुगव (लक्ष्मण) ने यह सोचते हुए कि ये हमसे बचना चाहते हैं, क्रोध से मन्दहास करके, लक्ष्मी के निवास कमलपुष्प की समता करनेवाले अपने चरण से, उस नगर के कपाट पर अनायास ही आघात किया।
उनके दिव्यचरण का स्पर्श पाते ही वह नगर-कपाट, सुरक्षा के लिए द्वार पर रखी शिलाएँ तथा दृढ प्राचीर, सब ऐसे विध्वस्त हो गये, जैसे अस्पृश्य पाप-पुज हों।
वह दृढ कपाट, वह पुरातन नगर-द्वार शिलाओ से निर्मित प्राचीर, सब सहज ही
किष्किन्धाकाण्ड ४९७
ढहकर सब दिशाओ मे दस योजन तक बिखर गये । तब वानर भय से विह्वल हो उठे ।
उस दृढ तथा उन्नत प्राचीर और उस विशाल नगर-द्वार के ढहकर गिरने से पत्थरों के प्रहार से शिर मे चोट खाये हुए वानर व्याकुल होकर दीर्घ दिशाओं मे भागकर अपने अपूर्व प्राणो को बचा पाये ।
अकथनीय घोर दुःख पाकर, अपना स्थान छोड़कर भागे हुए दोषहीन वे वानर, भयभीत होकर घोर शब्द करने लगे । उस ध्वनि से वह (किष्किन्धा) नगरी, उन्नत शिखरवाले मन्दर-पर्वत से मथे जानेवाले मीन-भरे तथा शब्दायमान समुद्र की समता करने लगी ।
अनेक वानर, भयभीत होकर, किष्किन्धा पर्वत से हटकर समीपवर्ती वनों में जा छिपे । उससे वह ऊँचा (किष्किन्धा) पर्वत, ऐसा लगने लगा जैसा नक्षत्रपूर्ण आकाश नक्षत्रहीन होने पर दीखता है ।
उस समय प्रतापी (रामचन्द्र) की आज्ञा-रूपी चक्र के जैसे लगनेवाले वे (लक्ष्मण) उस स्वर्णमय नगर की बीथियों म प्रविष्ट हो चलने लगे । तारा को घेरकर खड़े रहनेवाले (अंगद आदि) वानर कह उठे—अहो ! वे आ गये हैं । अब क्या करें ?
हे उत्तम कंकण धारण करनेवाली ! उन (लक्ष्मण) का हृदय पुष्प के समान कोमल है । यदि आप राजप्रासाद के द्वार पर जाकर उन्हें रोक दें, तो वह वीर, जो विचारवान् हैं, उस ओर आँख उठाकर भी नही देखेंगे । यही उत्तम उपाय है ।—यों हनुमान् ने कहा ।
तब तारा ने (उनसे) यह कहकर कि, तुम सब लोग जाओ । मै जाकर उन वीर (लक्ष्मण) के मन को शांत करूँगी—साहस के साथ पुष्पांकृत केशोंवाली अन्य सखियों-सहित चल पड़ी । इधर अन्य वानर उनसे हटकर दूर पर खड़े हो गये ।
कंठ में रस्सी (का आभरण) धारण किये हुए हाथी-जैसे लक्ष्मण, प्रसिद्ध वानरो के आनन्दपूर्ण आवास किष्किन्धा की राजवीथियों को पार कर विशाल राज-सौध में ज्यों ही प्रविष्ट होनेवाले थे, त्यों ही सहज सुगन्ध-भरित केशोंवाली तारा उनके मार्ग के मध्य उन्हें रोककर खड़ी हो गई ।
मनोज्ञ लावण्य, धवल चन्द्र-सदृश मन्दहास, सुन्दर कटि, उत्तम तथा नित्य यौवन-पूर्ण मृदु स्तन—इनसे युक्त उत्तम मयूर-तुल्य रमणियों के साथ वह तारा उस श्रेष्ठमार्ग को रोके खड़ी रही ।
रमणियों की सेना ने दृढता से (लक्ष्मण को) इस प्रकार घेर लिया कि (लक्ष्मण के) धनुष तथा करवाल उनके आभरणों में चमक उठे । उन (रमणियों) के मंजीर, जिनमें छोटे-छोटे कंकड़ भरे थे, बज उठे । मेखलाएँ भी बड़ा कोलाहल कर उठीं । सर्वत्र विविध भ्रू-लताएँ फैल गईं ।
शब्दायमान नूपुर नगाड़े बने थे । रमणियों के जघन बड़े रथ थे । परस्पर अनुरूप नयन-युगल बरछे थे । कठोर भौंहें युद्ध करनेवाले धनुष थीं । इस प्रकार, जब वे रमणियाँ घेरकर खड़ी हो गईं, तब स्वयं गौरव से भी गुरु होनेवाली भुजाओंवाले उन (लक्ष्मण) का
४६८ | कंब रामायण
शांत न होनेवाला क्रोध भी शांत हो गया। वे अपने सिर को झुकाकर उनकी ओर दृष्टि उठाने से भी संकोच करते हुए खड़े रहे।
लक्ष्मण, अपना कमल-वदन नीचा किये, अपने विशाल धनुष को धरती पर टेके, ऐसे खड़े रहे, जैसे अपनी साँसों के बीच खड़े हों। तब मनोहर कंधों, परिशुद्ध हृदय और दीर्घ नयनोंवाली तारा, उन वानर-रमणयों में से, जो धरती की अप्सराएँ जैसी थीं, पृथक होकर गद्गद स्वर में ये वचन कहने लगी—
हे वीर! हमारा यह बडा भाग्य है कि तुम हमारे इस घर में पधारे हो। अनंतकाल तक तप करने पर ही ऐसा भाग्य प्राप्त होता है, अन्यथा इन्द्र आदि के लिए भी ऐसा भाग्य दुर्लभ है। (तुम्हारे आगमन से) हम कर्मरहित हो उत्तम-गति प्राप्त कर चुकीं। इससे बढकर अन्य क्या सुकृत हो सकता है?
फिर, संगीत से भी मधुर बोलीवाली उस तारा ने प्रश्न किया—हे वीर! तुम उग्र रूप धारण करके यहाँ आये हो। तुम्हें देखकर वानर-सेना (तुम्हारे) आगमन का कारण न जानने से भयभीत हो रही है। तुम्हारा क्या उद्देश्य है? हे प्रभो! आज्ञा-रूपी चक्र को प्रवर्त्तित करनेवाले (चक्रवर्ती श्रीराम) के चरण-युगल को कभी न छोड़नेवाले तुम अब (उन्हें छोड़कर) किस कार्य से यहाँ आये हो?
पुष्पहार-भूषित वक्षवाले (लक्ष्मण) करुणा से आर्द्र हुए। उनका क्रोध कम हुआ। यह सोचते हुए कि कौन यह वचन कह रही है, उस तारा के मुख को, जो मानो दिन में धरती पर अवतीर्ण उज्ज्वल पूर्ण चन्द्र-जैसा था, निहारकर देखा। तब उसे देखकर उन्हें अपनी माताओं का स्मरण हो आया, जिससे वे व्याकुल हो उठे।
मंगल-सूत्ररहित, रत्नमय अन्य आभरणों से हीन, सुगंधित मधुपूर्ण पुष्पहार से आभूषित, कुंकुम, चंदन आदि के रस से अलिप्त, पीन एवं तापमय स्तनों तथा क्रमुकवृक्ष-सदृश अपने कंठ को (अपने आँचल से) ढके हुए उस नारीरत्न (तारा) को देखकर उदार स्वभाववाले वे (लक्ष्मण) अपने नयनों में अश्रु-भरे खड़े रहे।
उन (लक्ष्मण) के मन में यह विचार उठने से कि मेरी दोनों माताएँ (अर्थात्, कौशल्या और सुमित्रा) इसी वेश में रहती होंगी, वे शिथिलचित्त होकर दीर्घकाल तक वैसे ही खड़े रहे। फिर, यह सोचकर कि उनसे पूछे गये प्रश्नों का उन्हें कुछ उत्तर देना है, सुन्दर कुंतलोंवाली उस (तारा) को देखकर अपने उद्दिष्ट कार्य के बारे में यों कहने लगे—
सूर्यपुत्र सुग्रीव, मनुकुल के श्रेष्ठ नरेश (राम) के प्रति दिये अपने इस वचन को कि 'मैं अपनी सेना के साथ आपकी देवी का अन्वेषण कर उनका समाचार प्राप्त करूँगा' भूल गया है। मेरे अग्रज ने आदेश दिया है कि तुम शीघ्र जाकर उस सुग्रीव का हाल जानकर आओ। इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। उसके उत्तम राज्य-शासन का हाल तुम बताओ—लक्ष्मण ने कहा।
हे प्रभु! क्रोध न करो। छोटे लोगों के अपराध को क्षमा करके तुम शांत हो जाओ। इस प्रकार क्षमा कर सकनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त और कौन हैं? वह अपने वचन
' किष्किन्धाकाण्ड ४६६
को भूला नहीं है। उसने संसार मे सर्वत्र अपने अनेक दूतों को भेजा है और सब स्थानो से वानरों की सेना के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है। (तुम लोगो के) उपकार का प्रत्युपकार भी क्या सम्भव है ?
सहस्र कोटि वानर-दूत, सेनाओ को बुला लाने के लिए (सुग्रीव की) आज्ञा से गये हैं। उनके लौट आने का समय भी आ गया है। तुम जो शरणागत के लिए माता से भी अधिक हितकारी हो, अपने क्रोध को शांत करो। यही धर्म है, यदि अपराधी ही न हो, तो दण्डनीय कौन होगा ?^१
तुम लोगो ने अपने शरणागत को अभयदान देकर जो अपार सम्पत्ति प्रदान की है, उसे प्राप्त कर यदि वह कभी तुम्हारी आज्ञा का उल्लङ्घन करे, तो वह भी तुम्हारे ही कार्य का परिणाम होगा न ? स्त्री के निमित्त होनेवाले युद्ध में (अपने मित्र के साथ जाकर) यदि कोई अपना शरीर न त्याग करे, तो क्या उसकी मित्रता टिक सकेगी ?
तुम सरल स्वभाववाले ने उस शत्रु को मिटाकर (सुग्रीव को) राज्य का वैभव प्रदान किया और उसके साथ शाश्वत रहनेवाला महान् उपकार किया है। यदि वही तुम्हारी उपेक्षा करे, तो अपनी इस क्षुद्रता के कारण वह अपना महत्त्व ही नहीं खो बैठेगा, किंतु इसी जन्म मे दारिद्र्य को पाकर इह एव पर दोनों लोको के सुख से वञ्चित हो जायगा।
उस समय, युद्ध-कुशल वाली के प्रताप को मिटानेवाला एक ही बाण तो था। अब (यदि तुम इस सुग्रीव को मिटाना चाहो तो) तुम्हे किसकी सहायता अपेक्षित है ? तुम्हारे धनुष से बढकर तुम्हारा अन्य सहायक कौन है ? तुम्हे तो देवी का अन्वेषण करने- वाले लोगों की आवश्यकता है। तुम्हारे चरणों की शरण में आये हुए (सुग्रीव आदि) जन तुम्हारा कार्य करके कृतार्थ होगे।
तारा के ये वचन सुनकर बहुश्रुत लक्ष्मण, करुणार्द्र होकर मन में लज्जा का अनुभव करता हुआ खड़ा रहा। उसको इस दशा में देखकर और समझकर कि, इनका क्रोध शांत हो गया, घोर युद्ध में सहायक बननेवाले दृढ कंधो से युक्त हनुमान् उनके समीप आया।
क्रोध के समय में भी अकुटिल प्रेमवाले लक्ष्मण ने अपने समीप आकर चरणो को नमस्कार करके खडे हुए हनुमान् को देखकर कहा—तुम तो अपार शास्त्र-ज्ञान से युक्त हो। तुम भी कैसे पूर्व घटित वृत्तांत को भूल गये ? तब वचन-चतुर हनुमान् ने उत्तर दिया—हे प्रभो ! सुनो—
अविकृत प्रेमवाली माता का, पिता का. गुरु का, दिव्य शक्ति से युक्त ब्राह्मणो का, गाय का, शिशुओं का और स्त्रियों का वध करनेवालों का भी कुछ प्रायश्चित्त हो सकता है। किन्तु, अनश्वर उपकार को भूल जाने का भी क्या कोई प्रायश्चित्त हो सकता है ?
हे स्वामिन् ! आप और वानराधिप सुग्रीव में जो सच्चा स्नेह उत्पन्न हुआ, वह
^१. भाव यह है कि जो अपराध करे और दण्ड के योग्य हो वही क्षमा के योग्य भी होता है। यदि कोई अपराधी न हो और दंडनीय भी न हो, तो क्षमा का भाव कहाँ रहेगा ? —अनु०
५८० कंब रामायण
मेरा ही तो कार्य था। यदि वह मैत्री मिट जाय, तो उस पाप से क्या कोई मुक्त हो सकता है ? उस कारण से हमारा भी चित्त मलिन हो जायगा न ?
हे हमारे प्रभु ! (हमारे) तप, सुकृत, धर्म-देवता तथा अन्य सब कुछ आप ही हैं। ऐसा मेरा सुदृढ विश्वास है। पर, यह सब रहने दीजिए। यदि त्रिलोक की रक्षा करनेवाले आप क्रोध करें, तो हमारे लिए अन्य आश्रय क्या रहेगा ? (आपकी) करुणा ही (हमारे लिए) गति है।
वानरराज (आपके कार्य को) भूले नहीं हैं। उन्होंने बलवान् वानर-सेनाओं को एकत्र करने के लिए स्थान-स्थान पर दूत भेजे हैं और उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसीलिए विलंब हो रहा है। आप स्वयं धर्म के रक्षक हैं। यदि वह आपको दिये हुए अपने वचन को तोड़ दें; तो इस लोक में उनका जन्म ही व्यर्थ होगा और नरक से भी उसको मुक्ति नहीं मिलेगी।
हे मत्तगज-सदृश वीर ! हमसे उपकार पाये बिना ही जो हमारा उपकार करता है. उसके लिए, यदि आवश्यकता पड़े, तो युद्ध में उसके सहायतार्थ जाकर, उसके शत्रुओं को निहत करना हमारा धर्म है। यदि हम उसके शत्रु का नाश न भी कर सकें, तो कम-से-कम उन शत्रुओं से आहत होकर अपने प्राण तो त्याग सकते हैं। इससे बढ़कर ससार में क्या उपकार हो सकता है ?
हे प्रतापी सिंह-सदृश ! यहाँ अब आपका खड़ा रहना उचित नहीं है। यदि हमारे शत्रु जान लेंगे, तो उससे आपकी और हमारी मित्रता भग हो जायगी। आपकी प्रदान की हुई संपत्ति को तथा आपके ज्येष्ठ भ्राता (राम-सदृश) वानराधिप को अब चलकर देखें।
हनुमान् के वचन सुनकर पर्वत-समान पुष्ट भुजाओंवाले लक्ष्मण ने अपना क्रोध शात करके मन में विचार किया—यह सुग्रीव, नई सम्पत्ति के प्राप्त होने से बेसुध हो गया है और अन्यत्र जाना नहीं चाहता है, अतएव संकीर्णबुद्धि हो गया है. यह राम की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाला नहीं है।
यों सोचकर फिर वीरकंकण-भूषित चरण तथा बलिष्ठ भुजाओंवाले राजकुमार (लक्ष्मण) ने हनुमान् को देखकर कहा—अभी तुमसे एक बात और कहनी है. यह तुमसे कहना ही उचित है, तुम इसपर विचार करो; यह कहकर वह आगे कहने लगा— -
मैंने अपनी आँखों देखा है कि (सीता) देवी के अपहरण के कारण उत्पन्न क्रोध तथा मानभग से उत्पन्न अग्नि किस प्रकार उनके प्राणों को सता रही है, राजधर्म छोड़कर दूसरों पर अत्याचार करनेवाले पापियों को उचित दंड देने का मैने निश्चय कर लिया है। उससे मुझे भले ही अपयश प्राप्त हो, फिर भी मुझे उसकी कोई चिन्ता नहीं है।
अपने कोप को शात करके मै जीवित रहता हूँ. तो यह अपने प्रभु को सांत्वना देने के लिए ही; अनेक दिन व्यर्थ व्यतीत हो गये हैं, अन्यथा (हम दोनो के क्रोध से) त्रिभुवन भी दग्ध हो जायंगे; देव भी मिट जायँगे, इतना ही नही. उत्तम धर्म भी विनष्ट हो जायँगे; अविनाशी प्रारब्ध कर्म को कौन मिटा सकता है ?
किष्किन्धाकाण्ड ५०१
प्रभु ने ( पहले ) तुमको देखा ( तुम्हारे द्वारा मित्रता करके ) आपत्ति के समय में तुम्हारे स्वामी ( सुग्रीव ) की सहायता की और मेरे समान ही उस ( सुग्रीव ) को भी अपना भाई समझा ; इसी कारण से उन्होंने इतने दिन यहाँ व्यतीत किये हैं ; अन्यथा एक धनुष की सहायता से ही विद्युत्-सदृश देवी का अन्वेषण करना कोई बड़ी बात नहीं थी ।
केवल आकाश में ही नहीं, किंतु इस सारे ब्रह्माण्ड मे । जिसमें चतुर्दश भुवन, सात बड़े पर्वत और सात कुलपर्वत हैं । जहाँ भी सीताजी हों, उस स्थान को पहचान कर, उन्हें मुक्त करके लाना ( श्रीराम के शर के लिए ) कोई असंभव कार्य नहीं है ; फिर भी, उस दिन तुमलोगो ने जो वचन दिया था, उसकी उपेक्षा करना तुम्हारे लिए उचित नहीं ।
तुम लोगो ने विलंब-मात्र नहीं किया । किन्तु, चिरकाल से गर्व से फूले हुए राक्षसो को जीवित रहने दिया । देवताओं को दुःखी होने दिया । परम्परा से आगत शास्त्रज्ञान तथा होमाग्नि से युक्त मुनियों को विपदा मे पड़ने दिया, पाप को बढ़ने दिया । क्रोध न करनेवाले ( श्रीराम ) को क्रुद्ध कर दिया । तुम्हारा तो इससे अंत ही हो जायगा—यों ( लक्ष्मण ने ) कहा ।
उत्तम कुल में अवतीर्ण ( लक्ष्मण ) के यह कहते ही मारुति ने उनको नमस्कार करके कहा—हे प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता ! बीती बातो को मन में न रखो । यदि हम लोग अपने ऊपर लिये हुए कार्य को पूर्ण नही करेंगे, तो हम मरण के योग्य हैं : इसका साक्षी धर्म ही है । आप भीतर आइए और अपने ज्येष्ठ भ्राता ( सुग्रीव ) से मिलिए ।
स्वर्ण-वलयो से भूषित धनुष को धारण करनेवाले ( लक्ष्मण ) यह कहकर कि, पूर्व में हमने तुम्हारे कहे अनुसार कार्य किया और अब भी हम तुम्हारे कहे अनुसार करने को तैयार हैं, सुग्रीव के मन की थाह लेने के लिए हनुमान् के संग चल पड़े ।
तारा भी, भाले-सदृश नयन, रक्तकुमुद-सदृश अधर, धनुष-सदृश ललाट, हंस की गति, कलापी-तुल्य छवि, ध्वजायुक्त रथ-सदृश जघन, मुक्ता-सदृश दंत, बलिष्ठ बाँस-जैसी मृदु भुजाएँ, कोकिल सदृश ध्वनि, स्वर्ण-कलश-तुल्य स्तन, बिजली-जैसी कटि, कुमिल ( नामक ) पुष्प-सदृश नासिका, कालमेघ-तुल्य केश—इनसे युक्त रमणियों के साथ वहाँ से ( अतःपुर मे चली ) ।
वालिपुत्र ( अंगद ) भी चतुर मंत्रियों के साथ जाकर वीर ( लक्ष्मण ) के कमल-सदृश चरणों पर नत हुआ और भयमुक्त हो खड़ा रहा । तब धनुर्धारी ( लक्ष्मण ) ने उससे कहा—हे वीर, तुम शीघ्र जाकर अपने पिता को मेरे आगमन का समाचार दो । अंगद 'हाँ !' कहकर उन्हें नमस्कार करके चला गया ।
दीर्घ बाहुवाला ( अंगद ) वहाँ से चलकर अपने चाचा के सौध में प्रविष्ट हुआ । वहाँ सुग्रीव के सुन्दर चरणों को दृढ़ता से पकड़ लिया और उसे निद्रा से जगाकर कहा—उस महान् ( राम ) का अनुज आपके सौध के द्वार पर उपस्थित हैं । उसका क्रोध मीनों से भरे समुद्र से भी विशाल हैं। फिर उसने सारा वृत्तांत भी सुनाया ।
अविमुक्त निद्रावाला ( सुग्रीव ) रमणियों के चलने से उत्पन्न कोलाहल को सुनकर जाग पड़ा । पूर्वघटित किसी भी वृत्तांत को न जानने के कारण उसने अंगद से प्रश्न
५०२ कंब रामायण
किया। घने स्वर्णहारों तथा पुष्पहारों से विभूषित हे वीर ! हमने कोई अपराध नहीं किया। ऐसी अवस्था में उनका हमपर क्रोध करने का क्या कारण है ?
(तब सुग्रीव से अंगद ने कहा—) हे पिता। निश्चित तिथि को आप (श्रीरामचन्द्र के समीप) गये नहीं। अपार संपत्ति प्राप्त करके गर्व में फूल गये। उपकार को भूल गये। इन कारणों से (लक्ष्मण का) क्रोध भड़क उठा है। नीतिशास्त्र के पंडित हनुमान् ने उनका क्रोध शांत करने के लिए उनसे प्रार्थना की, तब (लक्ष्मण ने) हमें जीवित रहने दिया।
वानर-वीरों ने (लक्ष्मण के) आगमन का वेग (उग्रता) देखकर किष्किन्धानगर के गगनचुंबी दरवाजे को बंद कर दिया और आसपास के एक भी पर्वत को छोड़े बिना, सब पर्वतों को लाकर (दरवाजे पर) रख दिया। एवं उमड़ते क्रोध के साथ उन (लक्ष्मण) से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो खड़े रहे।
पौरुषवान् (लक्ष्मण) ने (वानरों का) वह कार्य देखकर अपने सुन्दर कमल- सदृश चरण से (फाटक को) छुआ—(अर्थात्, पदाघात किया)। उसके छूने के पहले ही, दक्षिण से उत्तर तक फैली हुई, शिला-निर्मित प्राचीर, सुदृढ़ नगर-द्वार तथा फाटक पर चुने गये पर्वत, सब टूटकर बिखर गये और चूर-चूर हो गये।
यह देखकर बलवान् वानर-सेना किस दशा को प्राप्त हुई—मैं क्या कहूँ? कहाँ भागकर छिपी—मैं क्या कहूँ? (वानरों की) वह दशा देखकर माता (तारा) आभरण- भूषित रमणियों के साथ, बिजली-सदृश तथा पत्राकार बरछा धारण किये हुए (लक्ष्मण) के सम्मुख जाकर (उनके) मार्ग में खड़ी हो गई।
कुमार (लक्ष्मण) ने स्त्रियों की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा, मन-ही-मन उमड़नेवाले क्रोध के साथ खड़े रहे। तब नारी-रत्न (तारा) ने मधुर वचन कहकर प्रश्न किया--हे उत्तम ! हमारे यहाँ आपका यों आगमन कैसे हुआ? तब उन कुमार ने अपने आगमन का कारण कह सुनाया।
माता (तारा ने) उनके आगमन का प्रयोजन ठीक-ठीक समझ लिया। उनके क्रोध को शांत करते हुए ये वचन कहे—(सुग्रीव) आपकी आज्ञा को नहीं भूला है। भयंकर सेना को शीघ्र लाने के लिए दूतों को पर्वतों तथा पत्थरों से भरी विविध दिशाओं में प्रेषित कर दिया है और उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है। यही अब घटित वृत्तांत है।—यों (अंगद ने) कहा।
(अंगद के यों) कहते ही, सूर्यपुत्र कह उठा—यदि वे (राम-लक्ष्मण) क्रोध- करके उठ आयेंगे, तो इस धरती में तथा स्वर्ग में कौन उनके सम्मुख खड़ा रह सकेगा? धनुर्वीर वह कुमार (लक्ष्मण) जब इस प्रकार क्रोध के साथ, शीघ्र गति से आया, तो मुझे समाचार दिये बिना तुम लोगों ने क्या किया?
तब अंगद ने उत्तर दिया—विविध पुष्प-मालाओं से भूषित बलिष्ठ तथा उन्नत भुजावाले हे मेरे पिता ! मैंने पहले ही आपसे निवेदन किया था। किंतु, तब आप मत्त होकर पड़े थे। अतः, आपने ध्यान नहीं दिया। फिर, अन्य कोई उपाय न देखकर मैंने
किष्किन्धाकाण्ड ५०३
हनुमान् से जाकर कहा। अब शीघ्र ही आप जाकर (लक्ष्मण से) मिलें—यही कर्त्तव्य है।
(राम-लक्ष्मण के प्रति) स्नेह से पूर्ण मनवाले (सुग्रीव) ने कहा—हे कुमार! उन्होंने मेरा जैसा उपकार किया है, क्या वह अन्य किसी के द्वारा संभव है? मुझे जो संपत्ति प्राप्त हुई है, क्या उसका कोई अंत भी है? उन्होंने (रामचन्द्र ने) मुझसे अपने जिन कष्टों को दूर करने की आशा की थी, उन्हें मैं मदिरा के नशे में पड़कर भूल गया। अब मैं उन्हें (लक्ष्मण को) देखने के लिए लज्जित हो रहा हूँ।
मुझसे जो कार्य हुआ है, इससे बढ़कर अज्ञान-भरा कार्य और क्या हो सकता है। (मद्य पीने से) यह पत्नी है, यह माता है—ऐसा विवेक भी जब नहीं रह जाता, तब अन्य धर्म के विषय में क्या कहना? यह (मद्य-पान) पंच महापापों में एक है। यही नहीं, हम तो पहले ही से माया में पड़े हुए हैं, उसपर मद्य के नशे में भी चूर हो जायें, तो फिर क्या कहना?
अविनश्वर ज्ञान से युक्त महात्माओं तथा वेदों ने कहा है कि जो माया-वशीभूत न होकर विवेक के साथ पापों से दूर रहते हैं, जन्म-मरण के दुःख से मुक्ति पायेंगे। पर, हम तो ऐसे हैं, जो मदिरा में पड़े हुए कीड़ों को निकालकर मद्य पी लेते हैं। हम ऐसे हैं, जैसे घर में लगी आग को घी डाल-डालकर बुझाने की चेष्टा करते हैं।
वेद-शास्त्र तथा अन्य सब यही कहते हैं कि यदि कोई अपना स्वरूप पहचान लेगा, तो उसका क्षुद्र जन्म मिट जायगा। हम तो पहले से ही, आत्म-स्वरूप को न पहचानने के कारण व्याधिपूर्ण गंदे शरीर को पाये हुए हैं। फिर, ऊपर से मद्य पीकर मति-भ्रष्ट भी हो जायें, तो क्या यह उचित होगा?
अभयदान देकर (शरणागत की) रक्षा करनेवाले, पंचेन्द्रियों पर नियंत्रण रखनेवाले, तत्त्वज्ञान (के समुद्र) में निमग्न रहनेवाले, सुख-दुःख के द्वन्द्व को मिटानेवाले ऐसे व्यक्तियों को छोड़कर क्या वे लोग सद्गति पा सकते हैं, जो दूसरों की आँख बचाकर मद्य पीते हैं और संसार के सम्मुख प्रकट रूप में हँसते-खेलते रहते हैं?
शत्रुओं के द्वारा कृत हानि को, मित्रों के द्वारा कृत उपकार को, अधीत विद्या को, प्रत्यक्ष देखे पदार्थों को, शास्त्रों के उपदेशों को, अपने को प्राप्त गौरव के कारण को, अपने को प्राप्त दुःख को—यदि कोई जान ले, तो इससे बढ़कर हितकारी ज्ञान उसके लिए और क्या हो सकता है?
मद्यपान करनेवाले में वंचना, चौर्य, असत्य, मोह, परंपरा के विरुद्ध विचार, शरणागत को छोड़ देने का स्वभाव, दंभ—ये सब (दुर्गुण) आकर निवास करते हैं। कमल-पुष्प में निवास करनेवाली लक्ष्मी उन्हें तजकर चली जाती है। विष तो केवल खानेवाले के प्राण हरण करता है, किंतु नरक में नहीं पहुँचाता—(मद्यपान नरक का निवास भी देता है)।
मैंने सुना था कि मदिरा-पान से हानि होती है, वह सुना हुआ वचन अब प्रत्यक्ष प्रमाणित हो गया। अब फिर कहने को क्या शेष रह गया है? हनुमान् की नय-निपुणता
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से मैं बचा। अन्यथा उग्र गति से आनेवाले वीर के क्रोध से मेरी मृत्यु होने में क्या संदेह था ?
हे तात ! इस मद्यपान¹ से उत्पन्न होनेवाले दुष्परिणाम से मैं भीत हो रहा हूँ। उसका कर से स्पर्श ही नहीं, मन से स्मरण करना भी अच्छा नहीं है। यदि मैं फिर, कभी उस (मद्य) की इच्छा करूँ, तो वीर (राम) के रक्त कमल-समान चरण मुझे विनष्ट कर दें—इस प्रकार सुग्रीव ने कहा।
फिर, अनेक सद्गुणों से पूर्ण (सुग्रीव) ने उपयुक्त प्रकार से कहकर अंगद को यह आज्ञा देकर प्रेषित किया कि तुम लक्ष्मण के स्वागतार्थ आवश्यक सामग्री लेकर स्वयं उनके समीप जाओ। वह स्वयं भी अपनी सहधर्मिणी पत्नियों तथा परिवार के व्यक्तियों के साथ विशाल सौध-द्वार पर जा पहुँचा।
(लक्ष्मण के आगमन के समय) चंदन-लेप, पुष्प, सुगंधित चूर्ण, (अगुरु आदि) का सुरभित धूम, पंक्तियों में रखे हुए स्वर्ण-कलश, दीपों की आवलियाँ, श्रेणियों में लटकने-वाले मुक्ताहार, वितानों में हिलनेवाले मयूरपंख, ध्वजाएँ, ऊँची ध्वनि करनेवाले शंख तथा मृदंग—ये सब वीथियों में भरे थे।
वह किष्किन्धानगर इस प्रकार शोभायमान हो रहा था कि उसकी शुद्ध, दृढ़ स्फटिकमय भित्तियों के मध्यभाग में तथा चारों ओर उत्तम रत्नों के बने स्तंभों के मध्यभाग में (लक्ष्मण की) परछाईं पड़ने से दर्शकों के मन में संदेह होता था कि क्या सहस्रों वीर हाथ में धनुष लिये आ रहे हैं।
अंगद उस समय समीप आकर (लक्ष्मण के) चरणों पर प्रणत हुआ। तब लक्ष्मण ने उससे पूछा—हे तात ! तुम्हारे महाराज कहाँ हैं ? अंगद ने उत्तर दिया—हे वीर केसरी ! वे पुण्यवान् आपका स्वागत करने के लिए मेघस्पर्शी सौध-द्वार पर खड़े हैं।
चूड़ियों और कंकणों से भूषित करोंवाली वानर-रमणियाँ सुगंधित चूर्ण और वस्त्रों को उछाल रही थीं और विशाल चामरों को हिला-हिलाकर हवा कर रही थीं। श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था, जैसा पूर्ण उज्ज्वल चन्द्रमा आसमान में चमक रहा हो—इस प्रकार कपिकुलराज, सुन्दर धनुष को धारण करनेवाले पराक्रमी वीर (लक्ष्मण) के सम्मुख आया।
पलाश-पुष्प-समान अधरोंवाली रमणियाँ अर्घ्य इत्यादि के लिए उपयुक्त सामग्री लिये आ रही थीं। नगाड़े मेघों के समान गरज रहे थे। ऋषिगण वेद-पाठ कर रहे थे। संगीत-नाद सब दिशाओं में फैल रहा था। इस प्रकार सुग्रीव आ रहा था, तो उसके नवीन वैभव को देखकर देवता लोग भी विस्मय में पड़ गये।
महिमावान् (लक्ष्मण) का स्वागत करने के लिए श्रीयुक्त सुग्रीव आ पहुँचा। (उसके साथ आनेवाली) स्पृहणीय स्तनोंवाली वानर-स्त्रियाँ नक्षत्रों के समान चमक रही थीं और सुग्रीव स्वयं उदयाचल पर उदित होकर आकाश में दृष्टिगत होनेवाले, कलाओं से
१. मद्यपान-संबंधी ऊपर के कुछ पद्य प्रक्षिप्त-से लगते हैं।—अनु०
किष्किन्धाकाण्ड ५०५
परिपूर्ण चन्द्रमा के समान शोभित था तथा उस उदयाचल पर उदित होनेवाले अपने पिता (अर्थात्, सूर्य) के समान प्रकाशमान था ।
वीर लक्ष्मण ने अपने सम्मुख कपिकुल के राजा को प्रकट होते देखा । तब उनका क्रोध भड़क उठा । किन्तु, उन्होंने धर्म की व्यवस्था का विचार करते हुए अपने क्रोध को निर्मल विवेक से शात कर लिया ।
उन दोनो ने लौह-स्तम्भो तथा पर्वतो से भी भारी भुजाओ से परस्पर आलिंगन किया । फिर, वानर-स्त्रियो तथा वानर-वीरो के समुदाय के साथ स्वर्ण-निर्मित सौध के भीतर जा पहुँचे ।
कपिकुलाधिप ने पहले से तैयार किये हुए एक उत्तम आसन को दिखाकर (लक्ष्मण से) कहा—हे वीर ! इसपर आसीन होओ । तब (लक्ष्मण) मन मे सोचने लगे कि जब लक्ष्मी के नायक (राम) तृणमय पृथ्वी पर विश्राम करते हैं, तब ऐसे आसन पर बैठना मेरे लिए उचित नहीं है ।
फिर (सुग्रीव से) कहा—पत्थर-जैसे (कठोर) मनवाली कैकेयी के लिए उज्ज्वल रत्न-किरीट को त्यागकर वन में आये हुए मेरे स्वामी (राम) जब तृण-शय्या पर सोते हैं, तब क्या स्वर्ण-विनिर्मित, पुष्पांलंकृत मृदुल आसन पर बैठना मेरे लिए उचित है ?
लक्ष्मण के यों कहने पर सूर्यपुत्र अपने कमल-सदृश नयनो मे आँसू भरकर खड़ा रहा । तब मनु के वंश में उत्पन्न उत्तम क्षत्रियकुमार (लक्ष्मण) पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए उस प्रासाद की फर्श पर बैठ गये ।
युवक, वृद्ध, असंख्य स्त्रियाँ—सब उस समय अश्रुमय नयनों और मलिन दृष्टि के साथ, कुछ कह न सकने के कारण मौन रहे । मन की व्यथा से विह्वल हो रहे और पंचेन्द्रियो का दमन करनेवाले मुनियो के समान स्थित रहे ।
महाराज (सुग्रीव) ने (लक्ष्मण से) कहा—आप यथाविधि स्नान करके मधुर भोजन करें, तो हम सब कृतार्थ हो जायेगे । उसके यह कहने पर अंजनवर्ण (राम) के अनुज कहने लगे—
दुःख और अपवाद हमारे पेट को भर रहे हैं । इसीसे हम जीवित हैं, तो अब हमे मधुर लगनेवाला अन्य पदार्थ क्या चाहिए ? अत्यन्त बुभुक्षा के होने पर भी, यदि दुःख के कारण मन फिरा हुआ रहता है, तो अमृत भी तो कडुवा ही लगता है ।
प्रभु की देवी का अन्वेषण करके उनका पता लगा दोगे, तो तुम मानों हमारे अपयश-रूपी अग्नि को बुझाकर हमे गंगाजल में स्नान करानेवाले होओगे । समुद्र मे उत्पन्न अमृत पिलानेवाले होओगे और हमे अन्य कोई दुःख नही रह जायगा ।
पत्ते, कंद, शाक-फल आदि प्रभु के आहार करने के पश्चात् शेष का आहार मैं करता हूँ । वही मेरा भोजन है । उससे अन्य कुछ मै नही खा सकता । यदि वैसा कुछ खाना चाहूँ, तो वह कुत्ते के जूठन के बराबर होगा । इसमे सन्देह नहीं ।
हे राजन् ! इतना ही नही, एक बात और सुनो। यहाँ से जाकर मैं शाक-कंद
५०६ | कम्ब रामायण
आदि लाकर सन्नद्ध करूँगा, तो तुम्हारे मित्र (राम) भोजन कर सकेंगे, इसलिए अब एक क्षण भी मेरा यहाँ बिलम्ब करना उचित नहीं है—यों लक्ष्मण ने कहा। वानरपति ने यह कहकर कि जब वह मनुकुलाधिप दुःख में डूबा है, तब मैं सुखी जीवन व्यतीत कर रहा हूँ—यह कर्म वानर-जाति में उत्पन्न हम-जैसे लोग ही कर सकते हैं, व्याकुल होकर अत्यन्त दुःखी हुआ। सूर्यपुत्र तब झट उठा, अश्रु बहाता हुआ, ऐश्वर्यमय जीवन से विरक्त होकर, अत्यंत दुःखी तथा व्याकुल चित्त के साथ, उत्तम (राम) के निकट जाने की इच्छा में हनुमान् को देखकर कहने लगा— हे नीति-निपुण ! गये हुए दूतों के द्वारा जो सेना लाई जायगी, उसको तुम अपने साथ ले आना। उस समय तक तुम यहीं रहो।—यों हनुमान् को आदेश देकर शीघ्र प्रभु के आवास के लिए चल पड़ा। अरुण किरणोंवाले (सूर्य) का पुत्र आशंका से मुक्त चित्तवाले (लक्ष्मण) का आलिंगन करके शीघ्रता से अपने भाई (राम) के आवास की ओर चल पड़ा। उसके साथ अंगद भी चला। वानर वीर आगे-आगे जा रहे थे। वानर-रमणियो का मन उनके पीछे- पीछे जा रहा था। मार्ग पीछे-पीछे छूट रहा था। नौ सहस्त्र कोटि वानर उसके आगे और पीछे और दोनों ओर जा रहे थे। अति उत्तम बन्धुजन समीप में चल रहे थे। बिजली के समान उज्ज्वल आभरण धारण किये हुए सुग्रीव यो जा रहा था। उस समय— ध्वजाओ के समुदाय सर्वत्र भर गये। बजनेवाले नगाड़ो की ध्वनि सर्वत्र भर गई। शंख सर्वत्र बज उठे। चमकनेवाले आभरणो की कांति-रूपी विद्युत्-पुंज सर्वत्र भर गये। (धरती से) धूल उठने लगी और आकाश में सर्वत्र छा गई। स्वर्ण, मुक्ता, मनोहर एव महीन वस्त्रो, उज्ज्वल रत्नो, स्फटिक-खंडो तथा रजत- खडो से निर्मित शिविकाएं समीप में आ रही थी; श्वेत छत्र आकाश में ऊँचे उठे मनोरथ ढंग से आ रहे थे। रामचन्द्र के अनुज के उज्ज्वल अरुण चरण धरती पर चलने से, सूर्य-पुत्र भी, अपने चरणों के वीर-वलयो को शब्द्रित करता हुआ, अपनी पालकी के पीछे-पीछे (पैदल ही) पत्नी-रूपी रथ पर जा रहा था। वीर-लक्षण तथा मनोहर धनुष धारण करनेवाले लक्ष्मण तथा सुग्रीव, इतनी शीघ्रता से चलकर रामचन्द्र के आवास-पर्वत पर पहुँचे कि वानरों की सेना पीछे रह गई; अंगद भी उनके पार्श्व से पीछे रह गया। किन्तु, उनका (रामचन्द्र के प्रति) प्रेम आगे-आगे जा रहा था। गुणहीन अपार मर्यादा की आशंका त्यागकर प्रभु के चरणों की सेवा करने के लिए भक्ति-सरित् आगम सुग्रीव निष्कम्प धर्म-स्वरूप (राम) के चरणों की निकट ऐसा बैठा, मानो, दोनों भुवन की समता करता था। अपने केशों, चमर के रेशों, लाये (अक्षत, पुष्प) के ...
किष्किन्धाकांड ५०७
रामचन्द्र इस प्रकार स्थित रहे, जिस प्रकार वे समस्त सृष्टि के विनष्ट हो जाने पर एकमात्र अवशिष्ट रहते हैं। उन प्रभु के रक्त कमल-जैसे चरणो को सुग्रीव ने अपने शिर से यो स्पर्श किया कि उसके वक्ष पर के रत्नहार तथा मुक्ताहार शब्द करते हुए धरती पर लोटने लगे।
इसे प्रकार, सुग्रीव के प्रणाम करने पर, प्रभु ने अपनी दीर्घ, लबी, मनोहर बाहुओ को फैलाकर उसे अपने वक्ष से गाढालिंगन कर लिया। तब उनके वक्ष पर स्थित लक्ष्मी भी पीडित हो उठी। प्रभु का उमड़ता हुआ क्रोध शात हो गया और पूर्ववत् प्रेमभाव उमड़ आया। फिर, उससे आसीन होने को कहा।
रामचन्द्र ने (सुग्रीव को) अपने निकट सुखासीन करके पूछा—तुम्हारा शासन ठीक चल रहा है न ? कोई विरोध नही है न ? तुम्हारी मेघ-सदृश भुजाओ के द्वारा सुरक्षित सब प्राणी, तुम्हारे श्वेत छत्र की छाया में तापहीन होकर रहते हैं न ?
अर्थ-गर्भित उन वचनो को सुनकर गगनचारी एक चक्रवाले रथ पर चलनेवाले (सूर्य) का पुत्र कह उठा—युगांतकालिक घने अंधकार से आवृत्त पृथ्वी के लिए जब आप सूर्य बने हुए हैं और मै आपकी कृपा का पात्र बना हूँ, तो ये कार्य (शासन आदि कार्य) असाध्य कैसे हो सकते हैं ?
सुग्रीव ने फिर कहा—हे महिमाशालिन् ! हे प्रभु ! आपकी मधुर कृपा से मै संपत्ति प्राप्त कर सका। किन्तु, आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर मैने अपनी क्षुद्र वानर-बुद्धि को प्रकट किया।
दीर्घ दिशाओ मे जाकर, अन्वेषण कर (देवी सीता को) लाने की शक्ति रखकर भी मैंने उस प्रकार नही किया। किन्तु, उत्तम आभरणधारिणी (सीता) के वियोग में जब आपका निर्मल अन्तःकरण व्याकुल हो रहा था, तब मै सुखी जीवन व्यतीत करता रहा।
वीर-कंकण तथा दृढ धनुष धारण करनेवाले हे उदारमना प्रभु ! जब मेरा स्वभाव और विचार ऐसा है और आपकी मनोदशा ऐसी हैं, तो मै भविष्य मे क्या कर सकता हूँ। क्या पराक्रम दिखा सकता हूँ ? इनके बारे मे आपसे क्या कहूँ ? (अर्थात्, अपने कार्य के बारे में मै आपसे कुछ निवेदन करने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ।)
लक्ष्मी का निरंतर आवाम बने वक्षवाले प्रभु ने सुग्रीव से कहा—बडी कठिनाई से व्यतीत होनेवाला वर्षाकाल भी बीत गया। तुम्हारा यह अधिकार-पूर्ण वचन भी ऐसा है कि उससे (देवी सीता का अन्वेषण) कार्य पूरा करने की तुम्हारी दृढता व्यक्त होती है। अतः, वह (वचन) क्षुद्र कैसे हो सकता है ? तुम (मेरे लिए) भरत-समान हो। ऐसे (दीनतापूर्ण) वचन कैसे कह रहे हो ?
फिर, आर्य ने पुनः प्रश्न किया कि विशष्ट ज्ञानवाला मारुति कहाँ है ? तब सूर्य-पुत्र ने कहा—वह जल-भरे समुद्र के समान विशाल सेना को लेकर आ रहा है।
एक सहस्रकोटि दूत विशाल वानर-सेना को लाने के लिए शीघ्र गति से गये हैं। सेना को जुटाकर लाने की अवधि भी पूरी होनेवाली है। अतः, आज या कल, बलवान वानर-सेना के साथ वह (हनुमान्) भी आ जायगा।
आपकी नो सहस्र कोटि की एक विशाल सेना अब मेरे साथ है। दूसरी सेना भी
५०८ | कंब रामायण
अब मेरे साथ है। दूसरी सेना के आने की अवधि भी कल ही है। वह सेना भी आ जाय, तो तब आगे के कर्त्तव्य के बारे में विचार करना उचित होगा।—यो सुग्रीव ने कहा।
प्रेम-भरे रामचन्द्र ने कहा—हे वीर ! तुम्हारे लिए यह (सेना-संगठन) कोई कठिन कार्य नहीं हैं। तुम्हारी विनम्रता भी अच्छी है। फिर, आगे कहा—अब दिन का अधिक भाग बीत गया है। अब तुम जाओ, अपनी सेना के आने के पश्चात् आओ—यो प्रभु के आदेश देने पर उन्हे प्रणाम करके सुग्रीव विदा हुआ।
अरुण कमलदल-सदृश नेत्रवाले (रामचन्द्र) ने अंगद के प्रति मधुर वचन कहकर यो आदेश दिया कि हे तात ! तुम भी जाकर अपने पिता (सुग्रीव) के साथ विश्राम करो। फिर, अपने भाई तथा अपने ध्यान में स्थित (सीता) देवी के साथ स्वय भी उस रात को वही विश्राम करते रहे।
अति महान् कीर्त्तिवाले ने (अपने अनुज के प्रति) आदेश किया कि सुग्रीव के पास तुम्हारे जाने तथा वहाँ घटित अन्य सभी घटनाओं का वृत्तांत सुनाओ। तब सबको सत्य रूप में समझने की शक्ति रखनेवाले पराक्रमी लक्ष्मण ने (सारा वृत्तांत) कह सुनाया। (१-१३६)
अध्याय ११
सेना-संदर्शन पटल
उस दिन रात को वे (रामचन्द्र) वही ठहरे। प्राची दिशा के स्वर्णमय उन्नत गिरि पर सूर्य का प्रकाश फैलने के पहले ही किस प्रकार, बलवान् वानर-दूतों के द्वारा लाई गई पर्वत-समान सेना वहाँ आ पहुँची—अब यह हम उसका वर्णन करेंगे।
शतबली नामक वानर-वीर, दस लाख गजो के बल से युक्त एक सहस्र वानर-सेनापतियों को तथा सुचारु रूप से दलों मे विभाजित, शंख-समान उज्ज्वल, अति मनोहर दस सहस्र कोटि संख्यावाली वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।
सुषेण नामक उत्तम वानर-वीर, मेरु पर्वत को उखाड़नेवाली, सचेत होकर मदिरा का पान करने से स्वच्छ मनवाली शत सहस्र कोटि वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।
अमृत-सदृश बोलीवाली रूमा का पिता, अड़तालीस सहस्र कोटि वानर-सेना को लेकर आ पहुँचा, जो अपार समुद्र को भी क्षणमात्र में कीचड़ बना सकती थी।
इस धरती तथा ऊपर के लोको मे भी अपनी कीर्त्तिको सुस्थिर बनानेवाले उत्तम (हनुमान्) को जन्म देनेवाला केसरी (नामक वानर-वीर) पचास लाख कोटि, उन्नत पर्वत-सदृश कंधोवाले वानरों की सेना को लेकर ऐसे आ पहुँचा, मानो कोई समुद्र ही आ गया हो।
क्रोध करने पर एक-एक वानर सूर्य को भी प्रतापहीन कर देने तथा अपने बल का
किष्किन्धाकाण्ड ५०६
अभिमान करने पर एक-एक वानर अकेले ही सारी धरती को मिटा देने की शक्ति रखनेवाले प्रमन्न चित्तवाले चार सहस्र वानर-वीरों की सेना को संचालित करते हुए, गवाक्ष आ पहुँचा।
अति बलवान् धूम्र नामक ऋक्षपति, दो सहस्र कोटि भालुओं की विशाल सेना को साथ लिये आ पहुँचा। ये ऋक्ष उज्ज्वल दंतवाले उस आदि वराह के सदृश बलवान् थे, जिसने अपने दाँत पर धरती को उठा लिया था और ऋक्ष, जो इतने भयंकर रूपवाले थे, मानो ऊँच तथा विशाल, पर्वतो को अपने एक रोम-कूप में समा सकते थे।
चलते-फिरते किसी पर्वत के सदृश रूपवाला, क्रोध के कारण स्मरण करने मात्रसे विष एव वज्र-जैसे ही कँपा देनेवाला, पनस नामक वीर, बारह सहस्र कोटि, कठोर क्रोधवाले वानरो की सेना को लेकर आ पहुँचा।
नील नामक वीर, वज्रघोष तथा समुद्रघोष को भी परास्त करनेवाली अपार कोलाहल ध्वनि से युक्त, अतिविशाल, बलवान् तथा कठोर यम की समानता करनेवाले पचास करोड वानरों की सेना लेकर आया।
दरीमुख नामक वानर-वीर, भारी भुजावाले, दृढ़ वक्षवाले, वलशाली, स्थिर (स्वभाववाले), उग्र, कठोर नेत्रो से अग्नि उगलनेवाले, तथा पर्वत से भी अधिक विशाल आकारवाले तीम करोड़ वानरो की सेना-रूपी समुद्र को लेकर आ पहुँचा।
प्रख्यात गज नामक वानर वीर, तीस हजार कोटि की संख्या से, संसार-भर में फैले हुए कठोर क्रोध से सिंह-समूह को भी कँपा देनेवाले (सेना-रूपी) समुद्र के साथ आया, जिसकी सेना को देखकर ऐसा विचार होता था कि इसके लिए यह धरती भी पर्याप्त नहीं है। और दूसरी एक विशाल धरती की आवश्यकता है।
विशाल पर्वत के सदृश कधोंवाला जाम्बवान् समुद्र की वीचियो-जैसे लपककर चलनेवाली एक सहस्र साठ सौ करोड़ सख्यावाली, समस्त प्रदेश पर छाई हुई चलनेवाली बड़ी वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।
असमान वल से युक्त दुर्मुख नामक वानर-वीर, कमल में उत्पन्न ब्रह्मा के यह आदेश देने से कि तुम जाकर राक्षसों को मिटा दो, दस लाख के दलो में विभाजित दो करोड़ वानर-सेना को साथ लेकर आया।
पुष्प-मालाओं से अलंकृत, पर्वत-समान विशालकाय द्विविध नामक वीर, कठोर क्रोधवाले अनेक लाखो वानरो को लेकर ऊपर के गगन और पृथ्वी को धूल से आवृत करता हुआ आ पहुँचा।
साकार विजय-जैसे रूपवाला, प्रभूत पराक्रमवाला मैन्द नामक वानर, मल्लयुद्ध में श्रेष्ठ गजगोमुख नामक वीर के साथ तथा अति क्रोधवाली शतलक्षसंख्य वानर-सेना के साथ आ पहुँचा।
कुमुद नामक वीर, चरखी-जैसे (वेग से) चलनेवाली, पवन से भी अधिक वेगवाली तथा यम से भी अधिक कठोर, इस प्रकार चलनेवाली, जैसे उज्ज्वल वीचियोवाला समुद्र अपने स्थान से उमड़कर जा रहा हो—ऐसे नौ करोड़ बलवान् वानरो की सेना को लेकर आ पहुँचा।