कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें' किष्किन्धाकाण्ड ४६६
को भूला नहीं है। उसने संसार मे सर्वत्र अपने अनेक दूतों को भेजा है और सब स्थानो से वानरों की सेना के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है। (तुम लोगो के) उपकार का प्रत्युपकार भी क्या सम्भव है ?
सहस्र कोटि वानर-दूत, सेनाओ को बुला लाने के लिए (सुग्रीव की) आज्ञा से गये हैं। उनके लौट आने का समय भी आ गया है। तुम जो शरणागत के लिए माता से भी अधिक हितकारी हो, अपने क्रोध को शांत करो। यही धर्म है, यदि अपराधी ही न हो, तो दण्डनीय कौन होगा ?^१
तुम लोगो ने अपने शरणागत को अभयदान देकर जो अपार सम्पत्ति प्रदान की है, उसे प्राप्त कर यदि वह कभी तुम्हारी आज्ञा का उल्लङ्घन करे, तो वह भी तुम्हारे ही कार्य का परिणाम होगा न ? स्त्री के निमित्त होनेवाले युद्ध में (अपने मित्र के साथ जाकर) यदि कोई अपना शरीर न त्याग करे, तो क्या उसकी मित्रता टिक सकेगी ?
तुम सरल स्वभाववाले ने उस शत्रु को मिटाकर (सुग्रीव को) राज्य का वैभव प्रदान किया और उसके साथ शाश्वत रहनेवाला महान् उपकार किया है। यदि वही तुम्हारी उपेक्षा करे, तो अपनी इस क्षुद्रता के कारण वह अपना महत्त्व ही नहीं खो बैठेगा, किंतु इसी जन्म मे दारिद्र्य को पाकर इह एव पर दोनों लोको के सुख से वञ्चित हो जायगा।
उस समय, युद्ध-कुशल वाली के प्रताप को मिटानेवाला एक ही बाण तो था। अब (यदि तुम इस सुग्रीव को मिटाना चाहो तो) तुम्हे किसकी सहायता अपेक्षित है ? तुम्हारे धनुष से बढकर तुम्हारा अन्य सहायक कौन है ? तुम्हे तो देवी का अन्वेषण करने- वाले लोगों की आवश्यकता है। तुम्हारे चरणों की शरण में आये हुए (सुग्रीव आदि) जन तुम्हारा कार्य करके कृतार्थ होगे।
तारा के ये वचन सुनकर बहुश्रुत लक्ष्मण, करुणार्द्र होकर मन में लज्जा का अनुभव करता हुआ खड़ा रहा। उसको इस दशा में देखकर और समझकर कि, इनका क्रोध शांत हो गया, घोर युद्ध में सहायक बननेवाले दृढ कंधो से युक्त हनुमान् उनके समीप आया।
क्रोध के समय में भी अकुटिल प्रेमवाले लक्ष्मण ने अपने समीप आकर चरणो को नमस्कार करके खडे हुए हनुमान् को देखकर कहा—तुम तो अपार शास्त्र-ज्ञान से युक्त हो। तुम भी कैसे पूर्व घटित वृत्तांत को भूल गये ? तब वचन-चतुर हनुमान् ने उत्तर दिया—हे प्रभो ! सुनो—
अविकृत प्रेमवाली माता का, पिता का. गुरु का, दिव्य शक्ति से युक्त ब्राह्मणो का, गाय का, शिशुओं का और स्त्रियों का वध करनेवालों का भी कुछ प्रायश्चित्त हो सकता है। किन्तु, अनश्वर उपकार को भूल जाने का भी क्या कोई प्रायश्चित्त हो सकता है ?
हे स्वामिन् ! आप और वानराधिप सुग्रीव में जो सच्चा स्नेह उत्पन्न हुआ, वह
^१. भाव यह है कि जो अपराध करे और दण्ड के योग्य हो वही क्षमा के योग्य भी होता है। यदि कोई अपराधी न हो और दंडनीय भी न हो, तो क्षमा का भाव कहाँ रहेगा ? —अनु०