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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 549 में से

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पृष्ठ 508

५८० कंब रामायण

मेरा ही तो कार्य था। यदि वह मैत्री मिट जाय, तो उस पाप से क्या कोई मुक्त हो सकता है ? उस कारण से हमारा भी चित्त मलिन हो जायगा न ?

हे हमारे प्रभु ! (हमारे) तप, सुकृत, धर्म-देवता तथा अन्य सब कुछ आप ही हैं। ऐसा मेरा सुदृढ विश्वास है। पर, यह सब रहने दीजिए। यदि त्रिलोक की रक्षा करनेवाले आप क्रोध करें, तो हमारे लिए अन्य आश्रय क्या रहेगा ? (आपकी) करुणा ही (हमारे लिए) गति है।

वानरराज (आपके कार्य को) भूले नहीं हैं। उन्होंने बलवान् वानर-सेनाओं को एकत्र करने के लिए स्थान-स्थान पर दूत भेजे हैं और उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसीलिए विलंब हो रहा है। आप स्वयं धर्म के रक्षक हैं। यदि वह आपको दिये हुए अपने वचन को तोड़ दें; तो इस लोक में उनका जन्म ही व्यर्थ होगा और नरक से भी उसको मुक्ति नहीं मिलेगी।

हे मत्तगज-सदृश वीर ! हमसे उपकार पाये बिना ही जो हमारा उपकार करता है. उसके लिए, यदि आवश्यकता पड़े, तो युद्ध में उसके सहायतार्थ जाकर, उसके शत्रुओं को निहत करना हमारा धर्म है। यदि हम उसके शत्रु का नाश न भी कर सकें, तो कम-से-कम उन शत्रुओं से आहत होकर अपने प्राण तो त्याग सकते हैं। इससे बढ़कर ससार में क्या उपकार हो सकता है ?

हे प्रतापी सिंह-सदृश ! यहाँ अब आपका खड़ा रहना उचित नहीं है। यदि हमारे शत्रु जान लेंगे, तो उससे आपकी और हमारी मित्रता भग हो जायगी। आपकी प्रदान की हुई संपत्ति को तथा आपके ज्येष्ठ भ्राता (राम-सदृश) वानराधिप को अब चलकर देखें।

हनुमान् के वचन सुनकर पर्वत-समान पुष्ट भुजाओंवाले लक्ष्मण ने अपना क्रोध शात करके मन में विचार किया—यह सुग्रीव, नई सम्पत्ति के प्राप्त होने से बेसुध हो गया है और अन्यत्र जाना नहीं चाहता है, अतएव संकीर्णबुद्धि हो गया है. यह राम की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाला नहीं है।

यों सोचकर फिर वीरकंकण-भूषित चरण तथा बलिष्ठ भुजाओंवाले राजकुमार (लक्ष्मण) ने हनुमान् को देखकर कहा—अभी तुमसे एक बात और कहनी है. यह तुमसे कहना ही उचित है, तुम इसपर विचार करो; यह कहकर वह आगे कहने लगा— -

मैंने अपनी आँखों देखा है कि (सीता) देवी के अपहरण के कारण उत्पन्न क्रोध तथा मानभग से उत्पन्न अग्नि किस प्रकार उनके प्राणों को सता रही है, राजधर्म छोड़कर दूसरों पर अत्याचार करनेवाले पापियों को उचित दंड देने का मैने निश्चय कर लिया है। उससे मुझे भले ही अपयश प्राप्त हो, फिर भी मुझे उसकी कोई चिन्ता नहीं है।

अपने कोप को शात करके मै जीवित रहता हूँ. तो यह अपने प्रभु को सांत्वना देने के लिए ही; अनेक दिन व्यर्थ व्यतीत हो गये हैं, अन्यथा (हम दोनो के क्रोध से) त्रिभुवन भी दग्ध हो जायंगे; देव भी मिट जायँगे, इतना ही नही. उत्तम धर्म भी विनष्ट हो जायँगे; अविनाशी प्रारब्ध कर्म को कौन मिटा सकता है ?