भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 509

किष्किन्धाकाण्ड ५०१

प्रभु ने ( पहले ) तुमको देखा ( तुम्हारे द्वारा मित्रता करके ) आपत्ति के समय में तुम्हारे स्वामी ( सुग्रीव ) की सहायता की और मेरे समान ही उस ( सुग्रीव ) को भी अपना भाई समझा ; इसी कारण से उन्होंने इतने दिन यहाँ व्यतीत किये हैं ; अन्यथा एक धनुष की सहायता से ही विद्युत्-सदृश देवी का अन्वेषण करना कोई बड़ी बात नहीं थी ।

केवल आकाश में ही नहीं, किंतु इस सारे ब्रह्माण्ड मे । जिसमें चतुर्दश भुवन, सात बड़े पर्वत और सात कुलपर्वत हैं । जहाँ भी सीताजी हों, उस स्थान को पहचान कर, उन्हें मुक्त करके लाना ( श्रीराम के शर के लिए ) कोई असंभव कार्य नहीं है ; फिर भी, उस दिन तुमलोगो ने जो वचन दिया था, उसकी उपेक्षा करना तुम्हारे लिए उचित नहीं ।

तुम लोगो ने विलंब-मात्र नहीं किया । किन्तु, चिरकाल से गर्व से फूले हुए राक्षसो को जीवित रहने दिया । देवताओं को दुःखी होने दिया । परम्परा से आगत शास्त्रज्ञान तथा होमाग्नि से युक्त मुनियों को विपदा मे पड़ने दिया, पाप को बढ़ने दिया । क्रोध न करनेवाले ( श्रीराम ) को क्रुद्ध कर दिया । तुम्हारा तो इससे अंत ही हो जायगा—यों ( लक्ष्मण ने ) कहा ।

उत्तम कुल में अवतीर्ण ( लक्ष्मण ) के यह कहते ही मारुति ने उनको नमस्कार करके कहा—हे प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता ! बीती बातो को मन में न रखो । यदि हम लोग अपने ऊपर लिये हुए कार्य को पूर्ण नही करेंगे, तो हम मरण के योग्य हैं : इसका साक्षी धर्म ही है । आप भीतर आइए और अपने ज्येष्ठ भ्राता ( सुग्रीव ) से मिलिए ।

स्वर्ण-वलयो से भूषित धनुष को धारण करनेवाले ( लक्ष्मण ) यह कहकर कि, पूर्व में हमने तुम्हारे कहे अनुसार कार्य किया और अब भी हम तुम्हारे कहे अनुसार करने को तैयार हैं, सुग्रीव के मन की थाह लेने के लिए हनुमान् के संग चल पड़े ।

तारा भी, भाले-सदृश नयन, रक्तकुमुद-सदृश अधर, धनुष-सदृश ललाट, हंस की गति, कलापी-तुल्य छवि, ध्वजायुक्त रथ-सदृश जघन, मुक्ता-सदृश दंत, बलिष्ठ बाँस-जैसी मृदु भुजाएँ, कोकिल सदृश ध्वनि, स्वर्ण-कलश-तुल्य स्तन, बिजली-जैसी कटि, कुमिल ( नामक ) पुष्प-सदृश नासिका, कालमेघ-तुल्य केश—इनसे युक्त रमणियों के साथ वहाँ से ( अतःपुर मे चली ) ।

वालिपुत्र ( अंगद ) भी चतुर मंत्रियों के साथ जाकर वीर ( लक्ष्मण ) के कमल-सदृश चरणों पर नत हुआ और भयमुक्त हो खड़ा रहा । तब धनुर्धारी ( लक्ष्मण ) ने उससे कहा—हे वीर, तुम शीघ्र जाकर अपने पिता को मेरे आगमन का समाचार दो । अंगद 'हाँ !' कहकर उन्हें नमस्कार करके चला गया ।

दीर्घ बाहुवाला ( अंगद ) वहाँ से चलकर अपने चाचा के सौध में प्रविष्ट हुआ । वहाँ सुग्रीव के सुन्दर चरणों को दृढ़ता से पकड़ लिया और उसे निद्रा से जगाकर कहा—उस महान् ( राम ) का अनुज आपके सौध के द्वार पर उपस्थित हैं । उसका क्रोध मीनों से भरे समुद्र से भी विशाल हैं। फिर उसने सारा वृत्तांत भी सुनाया ।

अविमुक्त निद्रावाला ( सुग्रीव ) रमणियों के चलने से उत्पन्न कोलाहल को सुनकर जाग पड़ा । पूर्वघटित किसी भी वृत्तांत को न जानने के कारण उसने अंगद से प्रश्न