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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

किष्किन्धाकाण्ड ५०१

प्रभु ने ( पहले ) तुमको देखा ( तुम्हारे द्वारा मित्रता करके ) आपत्ति के समय में तुम्हारे स्वामी ( सुग्रीव ) की सहायता की और मेरे समान ही उस ( सुग्रीव ) को भी अपना भाई समझा ; इसी कारण से उन्होंने इतने दिन यहाँ व्यतीत किये हैं ; अन्यथा एक धनुष की सहायता से ही विद्युत्-सदृश देवी का अन्वेषण करना कोई बड़ी बात नहीं थी ।

केवल आकाश में ही नहीं, किंतु इस सारे ब्रह्माण्ड मे । जिसमें चतुर्दश भुवन, सात बड़े पर्वत और सात कुलपर्वत हैं । जहाँ भी सीताजी हों, उस स्थान को पहचान कर, उन्हें मुक्त करके लाना ( श्रीराम के शर के लिए ) कोई असंभव कार्य नहीं है ; फिर भी, उस दिन तुमलोगो ने जो वचन दिया था, उसकी उपेक्षा करना तुम्हारे लिए उचित नहीं ।

तुम लोगो ने विलंब-मात्र नहीं किया । किन्तु, चिरकाल से गर्व से फूले हुए राक्षसो को जीवित रहने दिया । देवताओं को दुःखी होने दिया । परम्परा से आगत शास्त्रज्ञान तथा होमाग्नि से युक्त मुनियों को विपदा मे पड़ने दिया, पाप को बढ़ने दिया । क्रोध न करनेवाले ( श्रीराम ) को क्रुद्ध कर दिया । तुम्हारा तो इससे अंत ही हो जायगा—यों ( लक्ष्मण ने ) कहा ।

उत्तम कुल में अवतीर्ण ( लक्ष्मण ) के यह कहते ही मारुति ने उनको नमस्कार करके कहा—हे प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता ! बीती बातो को मन में न रखो । यदि हम लोग अपने ऊपर लिये हुए कार्य को पूर्ण नही करेंगे, तो हम मरण के योग्य हैं : इसका साक्षी धर्म ही है । आप भीतर आइए और अपने ज्येष्ठ भ्राता ( सुग्रीव ) से मिलिए ।

स्वर्ण-वलयो से भूषित धनुष को धारण करनेवाले ( लक्ष्मण ) यह कहकर कि, पूर्व में हमने तुम्हारे कहे अनुसार कार्य किया और अब भी हम तुम्हारे कहे अनुसार करने को तैयार हैं, सुग्रीव के मन की थाह लेने के लिए हनुमान् के संग चल पड़े ।

तारा भी, भाले-सदृश नयन, रक्तकुमुद-सदृश अधर, धनुष-सदृश ललाट, हंस की गति, कलापी-तुल्य छवि, ध्वजायुक्त रथ-सदृश जघन, मुक्ता-सदृश दंत, बलिष्ठ बाँस-जैसी मृदु भुजाएँ, कोकिल सदृश ध्वनि, स्वर्ण-कलश-तुल्य स्तन, बिजली-जैसी कटि, कुमिल ( नामक ) पुष्प-सदृश नासिका, कालमेघ-तुल्य केश—इनसे युक्त रमणियों के साथ वहाँ से ( अतःपुर मे चली ) ।

वालिपुत्र ( अंगद ) भी चतुर मंत्रियों के साथ जाकर वीर ( लक्ष्मण ) के कमल-सदृश चरणों पर नत हुआ और भयमुक्त हो खड़ा रहा । तब धनुर्धारी ( लक्ष्मण ) ने उससे कहा—हे वीर, तुम शीघ्र जाकर अपने पिता को मेरे आगमन का समाचार दो । अंगद 'हाँ !' कहकर उन्हें नमस्कार करके चला गया ।

दीर्घ बाहुवाला ( अंगद ) वहाँ से चलकर अपने चाचा के सौध में प्रविष्ट हुआ । वहाँ सुग्रीव के सुन्दर चरणों को दृढ़ता से पकड़ लिया और उसे निद्रा से जगाकर कहा—उस महान् ( राम ) का अनुज आपके सौध के द्वार पर उपस्थित हैं । उसका क्रोध मीनों से भरे समुद्र से भी विशाल हैं। फिर उसने सारा वृत्तांत भी सुनाया ।

अविमुक्त निद्रावाला ( सुग्रीव ) रमणियों के चलने से उत्पन्न कोलाहल को सुनकर जाग पड़ा । पूर्वघटित किसी भी वृत्तांत को न जानने के कारण उसने अंगद से प्रश्न

५०२ कंब रामायण

किया। घने स्वर्णहारों तथा पुष्पहारों से विभूषित हे वीर ! हमने कोई अपराध नहीं किया। ऐसी अवस्था में उनका हमपर क्रोध करने का क्या कारण है ?

(तब सुग्रीव से अंगद ने कहा—) हे पिता। निश्चित तिथि को आप (श्रीरामचन्द्र के समीप) गये नहीं। अपार संपत्ति प्राप्त करके गर्व में फूल गये। उपकार को भूल गये। इन कारणों से (लक्ष्मण का) क्रोध भड़क उठा है। नीतिशास्त्र के पंडित हनुमान् ने उनका क्रोध शांत करने के लिए उनसे प्रार्थना की, तब (लक्ष्मण ने) हमें जीवित रहने दिया।

वानर-वीरों ने (लक्ष्मण के) आगमन का वेग (उग्रता) देखकर किष्किन्धानगर के गगनचुंबी दरवाजे को बंद कर दिया और आसपास के एक भी पर्वत को छोड़े बिना, सब पर्वतों को लाकर (दरवाजे पर) रख दिया। एवं उमड़ते क्रोध के साथ उन (लक्ष्मण) से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो खड़े रहे।

पौरुषवान् (लक्ष्मण) ने (वानरों का) वह कार्य देखकर अपने सुन्दर कमल- सदृश चरण से (फाटक को) छुआ—(अर्थात्, पदाघात किया)। उसके छूने के पहले ही, दक्षिण से उत्तर तक फैली हुई, शिला-निर्मित प्राचीर, सुदृढ़ नगर-द्वार तथा फाटक पर चुने गये पर्वत, सब टूटकर बिखर गये और चूर-चूर हो गये।

यह देखकर बलवान् वानर-सेना किस दशा को प्राप्त हुई—मैं क्या कहूँ? कहाँ भागकर छिपी—मैं क्या कहूँ? (वानरों की) वह दशा देखकर माता (तारा) आभरण- भूषित रमणियों के साथ, बिजली-सदृश तथा पत्राकार बरछा धारण किये हुए (लक्ष्मण) के सम्मुख जाकर (उनके) मार्ग में खड़ी हो गई।

कुमार (लक्ष्मण) ने स्त्रियों की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा, मन-ही-मन उमड़नेवाले क्रोध के साथ खड़े रहे। तब नारी-रत्न (तारा) ने मधुर वचन कहकर प्रश्न किया--हे उत्तम ! हमारे यहाँ आपका यों आगमन कैसे हुआ? तब उन कुमार ने अपने आगमन का कारण कह सुनाया।

माता (तारा ने) उनके आगमन का प्रयोजन ठीक-ठीक समझ लिया। उनके क्रोध को शांत करते हुए ये वचन कहे—(सुग्रीव) आपकी आज्ञा को नहीं भूला है। भयंकर सेना को शीघ्र लाने के लिए दूतों को पर्वतों तथा पत्थरों से भरी विविध दिशाओं में प्रेषित कर दिया है और उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है। यही अब घटित वृत्तांत है।—यों (अंगद ने) कहा।

(अंगद के यों) कहते ही, सूर्यपुत्र कह उठा—यदि वे (राम-लक्ष्मण) क्रोध- करके उठ आयेंगे, तो इस धरती में तथा स्वर्ग में कौन उनके सम्मुख खड़ा रह सकेगा? धनुर्वीर वह कुमार (लक्ष्मण) जब इस प्रकार क्रोध के साथ, शीघ्र गति से आया, तो मुझे समाचार दिये बिना तुम लोगों ने क्या किया?

तब अंगद ने उत्तर दिया—विविध पुष्प-मालाओं से भूषित बलिष्ठ तथा उन्नत भुजावाले हे मेरे पिता ! मैंने पहले ही आपसे निवेदन किया था। किंतु, तब आप मत्त होकर पड़े थे। अतः, आपने ध्यान नहीं दिया। फिर, अन्य कोई उपाय न देखकर मैंने

किष्किन्धाकाण्ड ५०३

हनुमान् से जाकर कहा। अब शीघ्र ही आप जाकर (लक्ष्मण से) मिलें—यही कर्त्तव्य है।

(राम-लक्ष्मण के प्रति) स्नेह से पूर्ण मनवाले (सुग्रीव) ने कहा—हे कुमार! उन्होंने मेरा जैसा उपकार किया है, क्या वह अन्य किसी के द्वारा संभव है? मुझे जो संपत्ति प्राप्त हुई है, क्या उसका कोई अंत भी है? उन्होंने (रामचन्द्र ने) मुझसे अपने जिन कष्टों को दूर करने की आशा की थी, उन्हें मैं मदिरा के नशे में पड़कर भूल गया। अब मैं उन्हें (लक्ष्मण को) देखने के लिए लज्जित हो रहा हूँ।

मुझसे जो कार्य हुआ है, इससे बढ़कर अज्ञान-भरा कार्य और क्या हो सकता है। (मद्य पीने से) यह पत्नी है, यह माता है—ऐसा विवेक भी जब नहीं रह जाता, तब अन्य धर्म के विषय में क्या कहना? यह (मद्य-पान) पंच महापापों में एक है। यही नहीं, हम तो पहले ही से माया में पड़े हुए हैं, उसपर मद्य के नशे में भी चूर हो जायें, तो फिर क्या कहना?

अविनश्वर ज्ञान से युक्त महात्माओं तथा वेदों ने कहा है कि जो माया-वशीभूत न होकर विवेक के साथ पापों से दूर रहते हैं, जन्म-मरण के दुःख से मुक्ति पायेंगे। पर, हम तो ऐसे हैं, जो मदिरा में पड़े हुए कीड़ों को निकालकर मद्य पी लेते हैं। हम ऐसे हैं, जैसे घर में लगी आग को घी डाल-डालकर बुझाने की चेष्टा करते हैं।

वेद-शास्त्र तथा अन्य सब यही कहते हैं कि यदि कोई अपना स्वरूप पहचान लेगा, तो उसका क्षुद्र जन्म मिट जायगा। हम तो पहले से ही, आत्म-स्वरूप को न पहचानने के कारण व्याधिपूर्ण गंदे शरीर को पाये हुए हैं। फिर, ऊपर से मद्य पीकर मति-भ्रष्ट भी हो जायें, तो क्या यह उचित होगा?

अभयदान देकर (शरणागत की) रक्षा करनेवाले, पंचेन्द्रियों पर नियंत्रण रखनेवाले, तत्त्वज्ञान (के समुद्र) में निमग्न रहनेवाले, सुख-दुःख के द्वन्द्व को मिटानेवाले ऐसे व्यक्तियों को छोड़कर क्या वे लोग सद्गति पा सकते हैं, जो दूसरों की आँख बचाकर मद्य पीते हैं और संसार के सम्मुख प्रकट रूप में हँसते-खेलते रहते हैं?

शत्रुओं के द्वारा कृत हानि को, मित्रों के द्वारा कृत उपकार को, अधीत विद्या को, प्रत्यक्ष देखे पदार्थों को, शास्त्रों के उपदेशों को, अपने को प्राप्त गौरव के कारण को, अपने को प्राप्त दुःख को—यदि कोई जान ले, तो इससे बढ़कर हितकारी ज्ञान उसके लिए और क्या हो सकता है?

मद्यपान करनेवाले में वंचना, चौर्य, असत्य, मोह, परंपरा के विरुद्ध विचार, शरणागत को छोड़ देने का स्वभाव, दंभ—ये सब (दुर्गुण) आकर निवास करते हैं। कमल-पुष्प में निवास करनेवाली लक्ष्मी उन्हें तजकर चली जाती है। विष तो केवल खानेवाले के प्राण हरण करता है, किंतु नरक में नहीं पहुँचाता—(मद्यपान नरक का निवास भी देता है)।

मैंने सुना था कि मदिरा-पान से हानि होती है, वह सुना हुआ वचन अब प्रत्यक्ष प्रमाणित हो गया। अब फिर कहने को क्या शेष रह गया है? हनुमान् की नय-निपुणता

५०४कंब रामायण

से मैं बचा। अन्यथा उग्र गति से आनेवाले वीर के क्रोध से मेरी मृत्यु होने में क्या संदेह था ?

हे तात ! इस मद्यपान¹ से उत्पन्न होनेवाले दुष्परिणाम से मैं भीत हो रहा हूँ। उसका कर से स्पर्श ही नहीं, मन से स्मरण करना भी अच्छा नहीं है। यदि मैं फिर, कभी उस (मद्य) की इच्छा करूँ, तो वीर (राम) के रक्त कमल-समान चरण मुझे विनष्ट कर दें—इस प्रकार सुग्रीव ने कहा।

फिर, अनेक सद्गुणों से पूर्ण (सुग्रीव) ने उपयुक्त प्रकार से कहकर अंगद को यह आज्ञा देकर प्रेषित किया कि तुम लक्ष्मण के स्वागतार्थ आवश्यक सामग्री लेकर स्वयं उनके समीप जाओ। वह स्वयं भी अपनी सहधर्मिणी पत्नियों तथा परिवार के व्यक्तियों के साथ विशाल सौध-द्वार पर जा पहुँचा।

(लक्ष्मण के आगमन के समय) चंदन-लेप, पुष्प, सुगंधित चूर्ण, (अगुरु आदि) का सुरभित धूम, पंक्तियों में रखे हुए स्वर्ण-कलश, दीपों की आवलियाँ, श्रेणियों में लटकने-वाले मुक्ताहार, वितानों में हिलनेवाले मयूरपंख, ध्वजाएँ, ऊँची ध्वनि करनेवाले शंख तथा मृदंग—ये सब वीथियों में भरे थे।

वह किष्किन्धानगर इस प्रकार शोभायमान हो रहा था कि उसकी शुद्ध, दृढ़ स्फटिकमय भित्तियों के मध्यभाग में तथा चारों ओर उत्तम रत्नों के बने स्तंभों के मध्यभाग में (लक्ष्मण की) परछाईं पड़ने से दर्शकों के मन में संदेह होता था कि क्या सहस्रों वीर हाथ में धनुष लिये आ रहे हैं।

अंगद उस समय समीप आकर (लक्ष्मण के) चरणों पर प्रणत हुआ। तब लक्ष्मण ने उससे पूछा—हे तात ! तुम्हारे महाराज कहाँ हैं ? अंगद ने उत्तर दिया—हे वीर केसरी ! वे पुण्यवान् आपका स्वागत करने के लिए मेघस्पर्शी सौध-द्वार पर खड़े हैं।

चूड़ियों और कंकणों से भूषित करोंवाली वानर-रमणियाँ सुगंधित चूर्ण और वस्त्रों को उछाल रही थीं और विशाल चामरों को हिला-हिलाकर हवा कर रही थीं। श्वेत छत्र ऐसा सुशोभित हो रहा था, जैसा पूर्ण उज्ज्वल चन्द्रमा आसमान में चमक रहा हो—इस प्रकार कपिकुलराज, सुन्दर धनुष को धारण करनेवाले पराक्रमी वीर (लक्ष्मण) के सम्मुख आया।

पलाश-पुष्प-समान अधरोंवाली रमणियाँ अर्घ्य इत्यादि के लिए उपयुक्त सामग्री लिये आ रही थीं। नगाड़े मेघों के समान गरज रहे थे। ऋषिगण वेद-पाठ कर रहे थे। संगीत-नाद सब दिशाओं में फैल रहा था। इस प्रकार सुग्रीव आ रहा था, तो उसके नवीन वैभव को देखकर देवता लोग भी विस्मय में पड़ गये।

महिमावान् (लक्ष्मण) का स्वागत करने के लिए श्रीयुक्त सुग्रीव आ पहुँचा। (उसके साथ आनेवाली) स्पृहणीय स्तनोंवाली वानर-स्त्रियाँ नक्षत्रों के समान चमक रही थीं और सुग्रीव स्वयं उदयाचल पर उदित होकर आकाश में दृष्टिगत होनेवाले, कलाओं से


१. मद्यपान-संबंधी ऊपर के कुछ पद्य प्रक्षिप्त-से लगते हैं।—अनु०

किष्किन्धाकाण्ड ५०५

परिपूर्ण चन्द्रमा के समान शोभित था तथा उस उदयाचल पर उदित होनेवाले अपने पिता (अर्थात्, सूर्य) के समान प्रकाशमान था ।

वीर लक्ष्मण ने अपने सम्मुख कपिकुल के राजा को प्रकट होते देखा । तब उनका क्रोध भड़क उठा । किन्तु, उन्होंने धर्म की व्यवस्था का विचार करते हुए अपने क्रोध को निर्मल विवेक से शात कर लिया ।

उन दोनो ने लौह-स्तम्भो तथा पर्वतो से भी भारी भुजाओ से परस्पर आलिंगन किया । फिर, वानर-स्त्रियो तथा वानर-वीरो के समुदाय के साथ स्वर्ण-निर्मित सौध के भीतर जा पहुँचे ।

कपिकुलाधिप ने पहले से तैयार किये हुए एक उत्तम आसन को दिखाकर (लक्ष्मण से) कहा—हे वीर ! इसपर आसीन होओ । तब (लक्ष्मण) मन मे सोचने लगे कि जब लक्ष्मी के नायक (राम) तृणमय पृथ्वी पर विश्राम करते हैं, तब ऐसे आसन पर बैठना मेरे लिए उचित नहीं है ।

फिर (सुग्रीव से) कहा—पत्थर-जैसे (कठोर) मनवाली कैकेयी के लिए उज्ज्वल रत्न-किरीट को त्यागकर वन में आये हुए मेरे स्वामी (राम) जब तृण-शय्या पर सोते हैं, तब क्या स्वर्ण-विनिर्मित, पुष्पांलंकृत मृदुल आसन पर बैठना मेरे लिए उचित है ?

लक्ष्मण के यों कहने पर सूर्यपुत्र अपने कमल-सदृश नयनो मे आँसू भरकर खड़ा रहा । तब मनु के वंश में उत्पन्न उत्तम क्षत्रियकुमार (लक्ष्मण) पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए उस प्रासाद की फर्श पर बैठ गये ।

युवक, वृद्ध, असंख्य स्त्रियाँ—सब उस समय अश्रुमय नयनों और मलिन दृष्टि के साथ, कुछ कह न सकने के कारण मौन रहे । मन की व्यथा से विह्वल हो रहे और पंचेन्द्रियो का दमन करनेवाले मुनियो के समान स्थित रहे ।

महाराज (सुग्रीव) ने (लक्ष्मण से) कहा—आप यथाविधि स्नान करके मधुर भोजन करें, तो हम सब कृतार्थ हो जायेगे । उसके यह कहने पर अंजनवर्ण (राम) के अनुज कहने लगे—

दुःख और अपवाद हमारे पेट को भर रहे हैं । इसीसे हम जीवित हैं, तो अब हमे मधुर लगनेवाला अन्य पदार्थ क्या चाहिए ? अत्यन्त बुभुक्षा के होने पर भी, यदि दुःख के कारण मन फिरा हुआ रहता है, तो अमृत भी तो कडुवा ही लगता है ।

प्रभु की देवी का अन्वेषण करके उनका पता लगा दोगे, तो तुम मानों हमारे अपयश-रूपी अग्नि को बुझाकर हमे गंगाजल में स्नान करानेवाले होओगे । समुद्र मे उत्पन्न अमृत पिलानेवाले होओगे और हमे अन्य कोई दुःख नही रह जायगा ।

पत्ते, कंद, शाक-फल आदि प्रभु के आहार करने के पश्चात् शेष का आहार मैं करता हूँ । वही मेरा भोजन है । उससे अन्य कुछ मै नही खा सकता । यदि वैसा कुछ खाना चाहूँ, तो वह कुत्ते के जूठन के बराबर होगा । इसमे सन्देह नहीं ।

हे राजन् ! इतना ही नही, एक बात और सुनो। यहाँ से जाकर मैं शाक-कंद

५०६ | कम्ब रामायण

आदि लाकर सन्नद्ध करूँगा, तो तुम्हारे मित्र (राम) भोजन कर सकेंगे, इसलिए अब एक क्षण भी मेरा यहाँ बिलम्ब करना उचित नहीं है—यों लक्ष्मण ने कहा। वानरपति ने यह कहकर कि जब वह मनुकुलाधिप दुःख में डूबा है, तब मैं सुखी जीवन व्यतीत कर रहा हूँ—यह कर्म वानर-जाति में उत्पन्न हम-जैसे लोग ही कर सकते हैं, व्याकुल होकर अत्यन्त दुःखी हुआ। सूर्यपुत्र तब झट उठा, अश्रु बहाता हुआ, ऐश्वर्यमय जीवन से विरक्त होकर, अत्यंत दुःखी तथा व्याकुल चित्त के साथ, उत्तम (राम) के निकट जाने की इच्छा में हनुमान् को देखकर कहने लगा— हे नीति-निपुण ! गये हुए दूतों के द्वारा जो सेना लाई जायगी, उसको तुम अपने साथ ले आना। उस समय तक तुम यहीं रहो।—यों हनुमान् को आदेश देकर शीघ्र प्रभु के आवास के लिए चल पड़ा। अरुण किरणोंवाले (सूर्य) का पुत्र आशंका से मुक्त चित्तवाले (लक्ष्मण) का आलिंगन करके शीघ्रता से अपने भाई (राम) के आवास की ओर चल पड़ा। उसके साथ अंगद भी चला। वानर वीर आगे-आगे जा रहे थे। वानर-रमणियो का मन उनके पीछे- पीछे जा रहा था। मार्ग पीछे-पीछे छूट रहा था। नौ सहस्त्र कोटि वानर उसके आगे और पीछे और दोनों ओर जा रहे थे। अति उत्तम बन्धुजन समीप में चल रहे थे। बिजली के समान उज्ज्वल आभरण धारण किये हुए सुग्रीव यो जा रहा था। उस समय— ध्वजाओ के समुदाय सर्वत्र भर गये। बजनेवाले नगाड़ो की ध्वनि सर्वत्र भर गई। शंख सर्वत्र बज उठे। चमकनेवाले आभरणो की कांति-रूपी विद्युत्-पुंज सर्वत्र भर गये। (धरती से) धूल उठने लगी और आकाश में सर्वत्र छा गई। स्वर्ण, मुक्ता, मनोहर एव महीन वस्त्रो, उज्ज्वल रत्नो, स्फटिक-खंडो तथा रजत- खडो से निर्मित शिविकाएं समीप में आ रही थी; श्वेत छत्र आकाश में ऊँचे उठे मनोरथ ढंग से आ रहे थे। रामचन्द्र के अनुज के उज्ज्वल अरुण चरण धरती पर चलने से, सूर्य-पुत्र भी, अपने चरणों के वीर-वलयो को शब्द्रित करता हुआ, अपनी पालकी के पीछे-पीछे (पैदल ही) पत्नी-रूपी रथ पर जा रहा था। वीर-लक्षण तथा मनोहर धनुष धारण करनेवाले लक्ष्मण तथा सुग्रीव, इतनी शीघ्रता से चलकर रामचन्द्र के आवास-पर्वत पर पहुँचे कि वानरों की सेना पीछे रह गई; अंगद भी उनके पार्श्व से पीछे रह गया। किन्तु, उनका (रामचन्द्र के प्रति) प्रेम आगे-आगे जा रहा था। गुणहीन अपार मर्यादा की आशंका त्यागकर प्रभु के चरणों की सेवा करने के लिए भक्ति-सरित् आगम सुग्रीव निष्कम्प धर्म-स्वरूप (राम) के चरणों की निकट ऐसा बैठा, मानो, दोनों भुवन की समता करता था। अपने केशों, चमर के रेशों, लाये (अक्षत, पुष्प) के ...

किष्किन्धाकांड ५०७

रामचन्द्र इस प्रकार स्थित रहे, जिस प्रकार वे समस्त सृष्टि के विनष्ट हो जाने पर एकमात्र अवशिष्ट रहते हैं। उन प्रभु के रक्त कमल-जैसे चरणो को सुग्रीव ने अपने शिर से यो स्पर्श किया कि उसके वक्ष पर के रत्नहार तथा मुक्ताहार शब्द करते हुए धरती पर लोटने लगे।

इसे प्रकार, सुग्रीव के प्रणाम करने पर, प्रभु ने अपनी दीर्घ, लबी, मनोहर बाहुओ को फैलाकर उसे अपने वक्ष से गाढालिंगन कर लिया। तब उनके वक्ष पर स्थित लक्ष्मी भी पीडित हो उठी। प्रभु का उमड़ता हुआ क्रोध शात हो गया और पूर्ववत् प्रेमभाव उमड़ आया। फिर, उससे आसीन होने को कहा।

रामचन्द्र ने (सुग्रीव को) अपने निकट सुखासीन करके पूछा—तुम्हारा शासन ठीक चल रहा है न ? कोई विरोध नही है न ? तुम्हारी मेघ-सदृश भुजाओ के द्वारा सुरक्षित सब प्राणी, तुम्हारे श्वेत छत्र की छाया में तापहीन होकर रहते हैं न ?

अर्थ-गर्भित उन वचनो को सुनकर गगनचारी एक चक्रवाले रथ पर चलनेवाले (सूर्य) का पुत्र कह उठा—युगांतकालिक घने अंधकार से आवृत्त पृथ्वी के लिए जब आप सूर्य बने हुए हैं और मै आपकी कृपा का पात्र बना हूँ, तो ये कार्य (शासन आदि कार्य) असाध्य कैसे हो सकते हैं ?

सुग्रीव ने फिर कहा—हे महिमाशालिन् ! हे प्रभु ! आपकी मधुर कृपा से मै संपत्ति प्राप्त कर सका। किन्तु, आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर मैने अपनी क्षुद्र वानर-बुद्धि को प्रकट किया।

दीर्घ दिशाओ मे जाकर, अन्वेषण कर (देवी सीता को) लाने की शक्ति रखकर भी मैंने उस प्रकार नही किया। किन्तु, उत्तम आभरणधारिणी (सीता) के वियोग में जब आपका निर्मल अन्तःकरण व्याकुल हो रहा था, तब मै सुखी जीवन व्यतीत करता रहा।

वीर-कंकण तथा दृढ धनुष धारण करनेवाले हे उदारमना प्रभु ! जब मेरा स्वभाव और विचार ऐसा है और आपकी मनोदशा ऐसी हैं, तो मै भविष्य मे क्या कर सकता हूँ। क्या पराक्रम दिखा सकता हूँ ? इनके बारे मे आपसे क्या कहूँ ? (अर्थात्, अपने कार्य के बारे में मै आपसे कुछ निवेदन करने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ।)

लक्ष्मी का निरंतर आवाम बने वक्षवाले प्रभु ने सुग्रीव से कहा—बडी कठिनाई से व्यतीत होनेवाला वर्षाकाल भी बीत गया। तुम्हारा यह अधिकार-पूर्ण वचन भी ऐसा है कि उससे (देवी सीता का अन्वेषण) कार्य पूरा करने की तुम्हारी दृढता व्यक्त होती है। अतः, वह (वचन) क्षुद्र कैसे हो सकता है ? तुम (मेरे लिए) भरत-समान हो। ऐसे (दीनतापूर्ण) वचन कैसे कह रहे हो ?

फिर, आर्य ने पुनः प्रश्न किया कि विशष्ट ज्ञानवाला मारुति कहाँ है ? तब सूर्य-पुत्र ने कहा—वह जल-भरे समुद्र के समान विशाल सेना को लेकर आ रहा है।

एक सहस्रकोटि दूत विशाल वानर-सेना को लाने के लिए शीघ्र गति से गये हैं। सेना को जुटाकर लाने की अवधि भी पूरी होनेवाली है। अतः, आज या कल, बलवान वानर-सेना के साथ वह (हनुमान्) भी आ जायगा।

आपकी नो सहस्र कोटि की एक विशाल सेना अब मेरे साथ है। दूसरी सेना भी

५०८ | कंब रामायण

अब मेरे साथ है। दूसरी सेना के आने की अवधि भी कल ही है। वह सेना भी आ जाय, तो तब आगे के कर्त्तव्य के बारे में विचार करना उचित होगा।—यो सुग्रीव ने कहा।

प्रेम-भरे रामचन्द्र ने कहा—हे वीर ! तुम्हारे लिए यह (सेना-संगठन) कोई कठिन कार्य नहीं हैं। तुम्हारी विनम्रता भी अच्छी है। फिर, आगे कहा—अब दिन का अधिक भाग बीत गया है। अब तुम जाओ, अपनी सेना के आने के पश्चात् आओ—यो प्रभु के आदेश देने पर उन्हे प्रणाम करके सुग्रीव विदा हुआ।

अरुण कमलदल-सदृश नेत्रवाले (रामचन्द्र) ने अंगद के प्रति मधुर वचन कहकर यो आदेश दिया कि हे तात ! तुम भी जाकर अपने पिता (सुग्रीव) के साथ विश्राम करो। फिर, अपने भाई तथा अपने ध्यान में स्थित (सीता) देवी के साथ स्वय भी उस रात को वही विश्राम करते रहे।

अति महान् कीर्त्तिवाले ने (अपने अनुज के प्रति) आदेश किया कि सुग्रीव के पास तुम्हारे जाने तथा वहाँ घटित अन्य सभी घटनाओं का वृत्तांत सुनाओ। तब सबको सत्य रूप में समझने की शक्ति रखनेवाले पराक्रमी लक्ष्मण ने (सारा वृत्तांत) कह सुनाया। (१-१३६)


अध्याय ११

सेना-संदर्शन पटल

उस दिन रात को वे (रामचन्द्र) वही ठहरे। प्राची दिशा के स्वर्णमय उन्नत गिरि पर सूर्य का प्रकाश फैलने के पहले ही किस प्रकार, बलवान् वानर-दूतों के द्वारा लाई गई पर्वत-समान सेना वहाँ आ पहुँची—अब यह हम उसका वर्णन करेंगे।

शतबली नामक वानर-वीर, दस लाख गजो के बल से युक्त एक सहस्र वानर-सेनापतियों को तथा सुचारु रूप से दलों मे विभाजित, शंख-समान उज्ज्वल, अति मनोहर दस सहस्र कोटि संख्यावाली वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।

सुषेण नामक उत्तम वानर-वीर, मेरु पर्वत को उखाड़नेवाली, सचेत होकर मदिरा का पान करने से स्वच्छ मनवाली शत सहस्र कोटि वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।

अमृत-सदृश बोलीवाली रूमा का पिता, अड़तालीस सहस्र कोटि वानर-सेना को लेकर आ पहुँचा, जो अपार समुद्र को भी क्षणमात्र में कीचड़ बना सकती थी।

इस धरती तथा ऊपर के लोको मे भी अपनी कीर्त्तिको सुस्थिर बनानेवाले उत्तम (हनुमान्) को जन्म देनेवाला केसरी (नामक वानर-वीर) पचास लाख कोटि, उन्नत पर्वत-सदृश कंधोवाले वानरों की सेना को लेकर ऐसे आ पहुँचा, मानो कोई समुद्र ही आ गया हो।

क्रोध करने पर एक-एक वानर सूर्य को भी प्रतापहीन कर देने तथा अपने बल का

किष्किन्धाकाण्ड ५०६

अभिमान करने पर एक-एक वानर अकेले ही सारी धरती को मिटा देने की शक्ति रखनेवाले प्रमन्न चित्तवाले चार सहस्र वानर-वीरों की सेना को संचालित करते हुए, गवाक्ष आ पहुँचा।

अति बलवान् धूम्र नामक ऋक्षपति, दो सहस्र कोटि भालुओं की विशाल सेना को साथ लिये आ पहुँचा। ये ऋक्ष उज्ज्वल दंतवाले उस आदि वराह के सदृश बलवान् थे, जिसने अपने दाँत पर धरती को उठा लिया था और ऋक्ष, जो इतने भयंकर रूपवाले थे, मानो ऊँच तथा विशाल, पर्वतो को अपने एक रोम-कूप में समा सकते थे।

चलते-फिरते किसी पर्वत के सदृश रूपवाला, क्रोध के कारण स्मरण करने मात्रसे विष एव वज्र-जैसे ही कँपा देनेवाला, पनस नामक वीर, बारह सहस्र कोटि, कठोर क्रोधवाले वानरो की सेना को लेकर आ पहुँचा।

नील नामक वीर, वज्रघोष तथा समुद्रघोष को भी परास्त करनेवाली अपार कोलाहल ध्वनि से युक्त, अतिविशाल, बलवान् तथा कठोर यम की समानता करनेवाले पचास करोड वानरों की सेना लेकर आया।

दरीमुख नामक वानर-वीर, भारी भुजावाले, दृढ़ वक्षवाले, वलशाली, स्थिर (स्वभाववाले), उग्र, कठोर नेत्रो से अग्नि उगलनेवाले, तथा पर्वत से भी अधिक विशाल आकारवाले तीम करोड़ वानरो की सेना-रूपी समुद्र को लेकर आ पहुँचा।

प्रख्यात गज नामक वानर वीर, तीस हजार कोटि की संख्या से, संसार-भर में फैले हुए कठोर क्रोध से सिंह-समूह को भी कँपा देनेवाले (सेना-रूपी) समुद्र के साथ आया, जिसकी सेना को देखकर ऐसा विचार होता था कि इसके लिए यह धरती भी पर्याप्त नहीं है। और दूसरी एक विशाल धरती की आवश्यकता है।

विशाल पर्वत के सदृश कधोंवाला जाम्बवान् समुद्र की वीचियो-जैसे लपककर चलनेवाली एक सहस्र साठ सौ करोड़ सख्यावाली, समस्त प्रदेश पर छाई हुई चलनेवाली बड़ी वानर-सेना को साथ लेकर आ पहुँचा।

असमान वल से युक्त दुर्मुख नामक वानर-वीर, कमल में उत्पन्न ब्रह्मा के यह आदेश देने से कि तुम जाकर राक्षसों को मिटा दो, दस लाख के दलो में विभाजित दो करोड़ वानर-सेना को साथ लेकर आया।

पुष्प-मालाओं से अलंकृत, पर्वत-समान विशालकाय द्विविध नामक वीर, कठोर क्रोधवाले अनेक लाखो वानरो को लेकर ऊपर के गगन और पृथ्वी को धूल से आवृत करता हुआ आ पहुँचा।

साकार विजय-जैसे रूपवाला, प्रभूत पराक्रमवाला मैन्द नामक वानर, मल्लयुद्ध में श्रेष्ठ गजगोमुख नामक वीर के साथ तथा अति क्रोधवाली शतलक्षसंख्य वानर-सेना के साथ आ पहुँचा।

कुमुद नामक वीर, चरखी-जैसे (वेग से) चलनेवाली, पवन से भी अधिक वेगवाली तथा यम से भी अधिक कठोर, इस प्रकार चलनेवाली, जैसे उज्ज्वल वीचियोवाला समुद्र अपने स्थान से उमड़कर जा रहा हो—ऐसे नौ करोड़ बलवान् वानरो की सेना को लेकर आ पहुँचा।

५१०कंब रामायण

युगांत मे समुद्र के उमड़ आने पर भी नाश न होनेवाला, पद्ममुख नामक वानर, उनचास कोटि बलवान्, सुन्दर तथा दीर्घ भुजावाले वानरों की सेना लेकर ऐसे आ पहुँचा कि धरती की धूल उठकर गगन में छा गई।

ऋषभ नामक वीर, नौ सहस्र कोटि संख्यावाले ऐसे वानरो की सेना को लेकर आ पहुँचा, जिनकी भुजाएँ युगात मे भी विनष्ट न होनेवाले ऊँचे पर्वतो के समान बलवान् थी।

दीर्घपाद, विनत और शरभ नामक वानर-वीर तरगों से पूर्ण नीले महासमुद्र से भी अधिक विशाल रूपवाले, किसी के लिए भी गणना करने मे असाध्य, काले मुखवाले करोड़ो वानरों की सेना को लेकर, एक के पश्चात् एक ऐसे आ पहुँचे कि ब्रह्मांड के अतर में और उसके बाहर भी धूलि व्याप्त हो गई।

मनोहर सहस्र किरणोंवाले सूर्य को देखकर भी भयभीत न होनेवाला हनुमान्, पच्चीस सहस्र कोटि वानरो को लेकर ऐसे आ पहुँचा कि सारी दिशाओ का अतर छोटा ज्ञात होने लगा और धरती एक ओर झुक गई।

देवशिल्पी विश्वकर्मा का मनोहर तथा सत्यनिष्ठ नल नामक पुत्र, शीघ्र एकत्र हुए लक्ष कोटि वानरों की सेना को लेकर आ पहुँचा, तो देवता भी अनुमान नही कर सके कि उसकी सीमा क्या है और यम भी भ्रात तथा व्याकुलचित्त हो उठा।

कुभ, शख इत्यादि वानर-सेनापतियों के साथ आनेवाली वानर सेना की गणना करना इस ससार के लोगों के लिए असभव है। यों कह सकते हैं कि वह सेना उतनी थी, जितनी राघव के तूणीर में बाण थे। इसके अतिरिक्त दूसरे ढंग से उसका वर्णन करना असंभव है।

यदि वह वानर-सेना निमज्जित हो, तो सप्त महासमुद्रो का भी जल सूख जायगा और उसके स्थान में श्वेत धूलि फैल जायगी। यदि (वह सेना) एक ओर झुके, तो भूमडल और महामेरु भी एक साथ झुक जायेंगे। यदि (वह सेना) उठकर चलने लगे, तो इस पृथ्वी में तिल भर भी स्थान नही रह जायगा। यदि क्रोध कर उठे, तो कठोर अग्नि तथा सूर्य भी झुलस जायेंगे।

धरती पर एकत्र हुई उस वानर-सेना की गणना करने लगें, तो सत्तर सहस्र ब्रह्माओं से भी उसकी गणना नही हो सकती। यदि (वह वानर-सेना) खाने लगे, तो सभी अडगोल उनके लिए एक-एक मुट्टी भरकर खाने के लिए भी पर्याप्त नही होगे। यदि (वह सेना) आँख उठाकर देखे, तो ललाट में अग्निमय नेत्रवाले (शिव) को भी मात कर देगी।

वह वानर-सेना यदि तोडने लगे, तो उत्तर के मेरु को भी तोड़ देगी। यदि टकराना चाहे, तो विशाल आकाश के ढक्कन से भी टकरा जाय। यदि पकड़ना चाहे, तो महान् प्रभजन को भी पकड़ ले। यदि पीना चाहे, तो सप्त समुद्रों के जल को भी अजलि में भरकर पी जाय।

वे वानर, प्रख्यात दिशाओं के उस पार भी कूद जा सकते थे। अपने प्रभु अनुपम सुग्रीव के सोचे हुए प्रत्येक कार्य को तुरत कर देने की क्षमता रखते थे। ऐसे सहसठ

किष्किन्धाकाण्ड ५११

संख्या में वानर-सेनापति उत्तरोत्तर उमड़ आनेवाली विशाल सेना को एकत्र करके अनायास ही आ पहुँचे।

वे वानर-सेनापति ऐसी वानर-सेना को लेकर आये, जो सप्त समुद्रों की विस्तीर्णता से भी अधिक विशाल थी। 'एक चक्र तथा उत्तम अश्ववाले रथ पर चलनेवाले सूर्य के पुत्र (सुग्रीव) के चरण जीते रहें!'—यों जयघोष के साथ उन्होंने प्रणाम करके पुष्प बरसाये।

उस प्रकार की वानर-सेना के आ पहुँचते ही सूर्यपुत्र, दशरथ-पुत्र के निकट शीघ्र जा पहुँचा और कहा—पाप-कर्मों के लिए यम-सदृश आपकी यह विशाल सेना विचार करने के पहले ही (अर्थात्, अति-शीघ्र ही) आ एकत्र हुई है। आप उसे देखने की कृपा करें।

प्रभु, प्रसन्न हुए और उनके मन के समान ही उनका मुख भी विकसित हो उठा। वे इस प्रकार आनन्दित हुए, जैसे देवी को ही देख रहे हों। वहाँ स्थित एक ऊँचे पर्वत के शिखर पर वे जा पहुँचे। सूर्य-कुमार फिर, उस सेना के मध्य लौट गया।

सुग्रीव ने उस अपार वानर-सेना को यह आदेश दिया कि वह पन्द्रह योजन के विस्तार में, उत्तर से दक्षिण की ओर पंक्तियों में खड़ी हो जाये। फिर, अतिक्रोधी वानर-सेनापतियों को साथ लेकर वह (रामचन्द्र के निकट) लौट आया।

सुग्रीव लौटकर रामचन्द्र के समीप आ पहुँचा और बोला—हे पराक्रमी, विजय-शील शूल धारण करनेवाले ! आप उस ओर दृष्टि डालें—यों कहकर क्रमशः (अपने सेना-पतियों का) परिचय कराया और वहीं खड़ा रहा। इधर एकत्र वानर-सेना तरंगायमान क्षीर-सागर के समान बड़े कोलाहल के साथ बढ़ चली।

अष्ट दिशाओं, धरती के विस्तृत प्रदेश, देवताओं के आवासभूत ऊपर के वसुला-कार लोक तथा वीचियों से पूर्ण सप्त समुद्रों को भी आवृत्त करके धूलि नीचे से ऊपर तक उठ चली, जिससे यह ब्रह्माण्ड धूलि से भरे हुए कुंभ के समान दीखने लगा।

यदि कहें कि (इस सेना का) समुद्र उपमान हो सकते हैं, तो (यह कथन अनु-चित होगा, क्योंकि) उन समुद्रों के परिमाण को पहचाननेवाले लोग भी हैं—(किन्तु उस वानर-सेना के परिमाण को जानना कठिन था।) अब विद्वान् उस वानर-सेना का अन्य क्या उपमान दे सकते हैं? बीस दिन पर्यंत, दिन-रात लगातार देखते रहने पर भी राम-लक्ष्मण उस सेना के मध्य को भी नहीं देख पाये। फिर, उसकी अंतिम सीमा को कैसे देखा जाय ?

रामचन्द्र—जो ऐसे थे कि विजय प्राप्त करने में उनके उपमान वे स्वयं ही थे और ऊपर के लोकों में, सुन्दर समुद्र से आवृत धरती पर तथा नागों के लोक में उनका उपमान अन्य कोई नहीं था, अपनी आँखों से, मन से, शास्त्र-ज्ञान से तथा सहज ज्ञान से भली भाँति विचार करके, महिमापूर्ण अपने अनुज को देखकर कहने लगे—

हे विकसित पुष्पों की माला धारण करनेवाले ! हमने अपनी बुद्धि से, इस विशाल वानर-सेना के कुछ भाग को तो किसी प्रकार देख लिया। इसकी सीमा को देखने का भी

५१२कंब रामायण

कोई उपाय है ? लोग कहते हैं कि उन्होंने इस भूलोक में समुद्र की सीमा को देखा है । किन्तु, इस सेना-समुद्र की सीमा को भली भाँति देखनेवाले कौन हैं ?

हे सुगंधित पुष्पमाला को धारण करनेवाले । ईश्वर के स्वरूप को, दस दिशाओं को, पञ्च महाभूतो को, सूक्ष्म ज्ञान को, उच्चारित शब्दो को, विभिन्न धर्मों के परस्पर के विभेद को तथा यहाँ एकत्र इस दोषहीन वानर-सेना को, संपूर्ण रूप से कौन देख सकता है ?

यदि हम इस विशाल सेना को यहाँ रहकर संपूर्ण रूप से देख लेंगे और फिर कार्य करने लगेंगे, तो उसीमें अनेक दिन व्यतीत हो जायेंगे । अतः, ठीक-ठीक विचार करके कर्त्तव्य कर्म पर मन लगाना ही उचित होगा—रामचन्द्र के यो कहने पर लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर कहा—

हे देव ! यहाँ एकत्र इन वानर-वीरो के लिए जिस लोक में जो कार्य करना है, वह अत्यन्त सुलभ है। इनके लिए अमुक कार्य कठिन है—यह कैसे कह सकते हैं ? देवी का अन्वेषण करना ( इनके लिए ) अत्यन्त सुलभ है । इस सेना से पाप परास्त हो गया और धर्म जीत गया ।

तरंगों से भरे जल मे उत्पन्न कमल से उद्भूत ब्रह्मदेव ने इस विशाल लोक में जिन महान् प्राणियों की सृष्टि की है, वह इसलिए ही कि वे सजीव पर्वत जैसे इन वानरो की सेना को गिनने के लिए संख्यासूचक चिह्न बन सकें ।

हे महान् शास्त्रों में निपुण । आठों दिशाओं में अन्वेषणार्थ जानेवाले इन वानरो को सत्वर न भेजकर यहाँ रोक रखना ठीक नही—यों लक्ष्मण ने कहा। तब महिमामय (प्रभु) ने अलंकृत रथवाले सूर्य-पुत्र से कहा। (१-४०)


अध्याय १२

अन्वेषणार्थ प्रेषण पटल

( श्रीरामचन्द्र ने सुग्रीव को देखकर कहा—) यह सेना श्रेणियों में विभाजित है। ( इसके सैनिक ) अहङ्कार और परस्पर के वैरभाव से रहित हैं। अतः, विशाल रूप में एकत्र यह सेना किसी से भी अभेद्य है, क्या इसका परिमाण भी कुछ है ?

( सुग्रीव ने उत्तर दिया—) बुद्धिमानो के द्वारा विचार कर निश्चय किया हुआ एक संख्यावाचक शब्द है—'वेल्लम' ( १८,३५,००८ करोड़ का एक वेल्लम होती है)। वैसे सत्तर वेल्लम के परिमाण मे यह सेना है। इसको छोड़कर, यह कहना असंभव है कि इस सेना के परिमाण को सूचित करनेवाला अन्य कोई शब्द है।

इस सेना के वीरो मे मङ्गमठ करोड़ विजयी सेनापति हैं। इन सेनापतियो में सब से प्रमुख महासेनापति, कठोर यम को भी भस्म करने की शक्ति रखनेवाला नील (नामक) वानर है। यों (सुग्रीव ने) कहा।

किष्किन्धाकाण्ड ५६३

यों कहनेवाले उष्णकिरण के पुत्र को देखकर विजयी धनुर्धारी ने कहा—यहाँ खडे रहकर बातें करते रहने से क्या प्रयोजन है ? अब चलकर आगे के कार्यों के संबंध में विचार करें।

तब उस (सुग्रीव) ने महानुभाव हनुमान् को देखकर इस प्रकार आज्ञा दी—हे तात ! तुम अपने पिता (पवन) के समान ही त्रिभुवन में संचरण करने की शक्ति रखते हो, तो भी उस शक्ति को न पहचान कर व्यर्थ ही विलंब कर रहे हो। क्या तुम पहले दूसरे बड़े वेगवान् वानरो का कार्य देखना चाहते हो ?

तुम अब जाओ। उत्तम आभरणधारिणी देवी कहाँ है, इसका पता लगाओ। पहले तुम नागों के लोक (पाताल) में जाकर खोजो। धरती पर खोजो। तुम्हारा वेग तो ऐसा है कि तुम भोगभूमि स्वर्ग में भी जा सकते हो। तुम्हारा वह वेग भी तो अब प्रकट होना चाहिए।

मेरी बुद्धि कहती है कि रावण का विशाल (लंका) नगर दक्षिण दिशा में है। हे मारुति ! अब इस बलपूर्ण दिशा को जीतकर यश पाने का अधिकारी तुम्हें छोड़कर और कौन है ?

हे स्वच्छ ज्ञानवाले ! मेरा खयाल है कि उदारशील (प्रभु) की देवी का अपहरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले जाते हुए हमने रावण को देखा था। तुम इसपर विचार करो।

तारा पुत्र (अंगद), जांबवान् आदि अनेक वीर बड़े गौरव के साथ तुम्हारे संग जावें। दो 'वेल्लम' संख्यावाली वानर-सेना भी अपने साथ ले जाओ।

पश्चिम दिशा में ऋषभ, कुबेर की उत्तर दिशा में शतवली तथा इन्द्र की प्राची दिशा में विनत, बड़ी-बड़ी सेनाएँ लेकर जायें—यों सुग्रीव ने कहा।

फिर, सुग्रीव ने उन ऋषभ आदि वानरों से कहा—हे विजयी वीरो, विजय करने-वाली दो 'वेल्लम' वानर-सेना के साथ घूम-घूमकर देवी का अन्वेषण करना और एक मास व्यतीत होने के पूर्व ही यहाँ लौट आना।

फिर, दक्षिण दिशा में जानेवाले वानरों को देखकर सुग्रीव ने कहा—तुम यहाँ से चलकर उस विन्ध्याचल पर्वत पर जाओ, जो अपने अतिसुन्दर सहस्रों उज्ज्वल शिखरों के कारण विष्णु के विराट् रूप-सा दिखाई पड़ता है और आगे बढ़कर प्रणाम करने योग्य है।

उस (विन्ध्य) पर्वत पर खोजने के पश्चात् नर्मदा नदी पर जाना, जिसमें देवता भी स्नान करते रहते हैं। जहाँ भ्रमर (पुष्पों के) मधु का पान करके पंचम स्वर में गाते रहते हैं तथा जहाँ के विविध रत्नो (के प्रकाश) से अंधकार दूर होता रहता है।

फिर, हेमकूट नामक पर्वत पर जाना, जहाँ धूम्नकर्ण के सदृश पक्षी (जो संगीत सुनकर तल्लीन हो जाते हैं) मनोहर मेखलाधारिणी देव-रमणियो के, आनन्द से गाये जानेवाले संगीत-रूपी मधु का पान करते हुए निद्रा लेते हैं।

शीघ्र ही उस (हेमकूट) पर्वत से चलकर वहाँ के अपने साथी वानरों के साथ आगे बढ़ जाना। फिर, काले रंगवाली पेन्ना नदी के तटों में उत्तम गुणवाली देवी को ढूँढ़ना और वहाँ से सत्वर आगे बढ़ जाना।

५१४ | कंब रामायण

सुगन्धित दीर्घ अगरु-वृक्ष तथा और ऊँचे बढे हुए चंदन-वृक्ष, जिस देश की बाड बने हुए हैं, उसे धीरे-धीरे पार करना और अनेक अन्य देशो को भी पीछे छोड़कर जल से समृद्ध दंडकारण्य में जाना।

दंडकारण्य में मुडकोपवन नाम से प्रसिद्ध एक वन है, जहाँ प्राचीन अगस्त्य मुनि निवास करते हैं। तपस्या-निरत मुनियो से युक्त होने के कारण वह उपवन, दर्शन-मात्र से मन की पीडा को दूर करनेवाला है। तुमलोग वहाँ भी देखना।

पुष्प-भरित वह उपवन, उत्तम धार्मिक व्यक्तियो की संपत्ति के समान शोभायमान है, जिसका उपभोग सारे ससार के लोग करते हैं। वहाँ के वृक्ष उत्तम शील-संपन्न सुन्दरियो के अधरो के समान अकाल मे भी फले रहते हैं। वह दृश्य भी तुम लोग देखना।

वहाँ के निवासी सदा अपलक रहते हैं। कभी गाढी निद्रा मे नही सोते। वह स्थान सूर्य के लिए भी दुर्गम है। सभी प्रकार की भोग्य वस्तुएँ वहाँ प्राप्त होती हैं।

उस स्थान को पार कर, उससे आगे पाण्डुगिरि नामक पर्वत पर जाना, जो गगन में स्थित चन्द्र को छूता है और जिसे देखकर अरुणकिरण सूर्य भी यह विचार करता है कि इसपर किंचित् विश्राम करके ही आगे बढना चाहिए।

उस पर्वत के समीप एक नदी बहती, है जिसकी अनादि धारा मोतियों को बहाती हुई, स्वर्ण-धूलि को बटोरती हुई, रत्नो को लुढकाती हुई, ग्वालों के आँगनों से मथानियों को समेटती हुई, वृक्षों को बहाती हुई, पर्वत-शिलाओ को ढकेलती हुई, मृगों को भी खींचती हुई बहती है। वह धारा किसी भी व्यक्ति को, पुत् नामक नरक में जाकर क्लेश भोगने से बचाती है। उस पावन धारा का नामक गोदावरी है।

उस नदी को पारकर उसके आगे सुवर्ण नामक नदी पर जाना, जो धर्म-मार्ग के समान है, निर्मल करुणा के अभिलषणीय मार्ग के समान है, जिसके दोनों कूलों पर शीतल तथा विकसित पुष्पों से पूर्ण घने वृक्ष यो छाये रहते हैं कि सूर्य की किरणें भी उसके भीतर प्रवेश नही पाती। जिसमें रत्न ऐसे चमकते हैं कि अंधकार का नाम भी मिट जाता है और जहाँ देवताओ की प्रार्थना से छह मुखवाला विलक्षण देव (कार्तिकेय) एकांत में रहता था।

सुवर्ण नदी को पारकर उस सूर्यकात पर्वत को जाकर देखना, जहाँ की (कृषक) बालाएँ जब फदे में रखकर पत्थर के टुकडे फेंकती हैं, तब वे पत्थर धूप-जैसी कांति को बिखरते हैं। वहाँ से आगे चलकर चद्रकात पर्वत को भी देखना। उन पर्वतो को लाँघकर अनेक विशाल देशो को पार करना। फिर, कोंकण देश में जाना, जहाँ आदि-शेष, पक्षिराज (गरुड) से डरा हुआ, छिपकर अपना जीवन बिताता है। फिर, कुलिन्द देश मे जाना।

जो इस बात पर झगड़ते रहते हैं कि शिव बडे हैं या विश्व को नापनेवाले हरि बडे हैं, ऐसे ज्ञान-हीन लोगों के लिए जिस प्रकार सुगति दुर्गम होती है, उसी प्रकार दुर्गम रहनेवाला अरुंधति नामक एक पर्वत वहाँ है, जो आकाशगगा के अति निकट रहता है। जिसके गगनोन्नत शृंगों पर दोनो ज्योतिष्पिण्ड (सूर्य-चन्द्र) विश्राम करते हैं, जिसमे ऐसी

किष्किन्धाकाण्ड ५१५

शक्ति है कि उसको नमस्कार करनेवालों को वह सब अभीष्ट प्रदान करता है। उसको प्रणाम करके आगे बढ़ना।

भयंकर तथा जलते हुए रेगिस्तानो, नदियों, विशाल जल-स्रोतों, ऊँचे पर्वतों; जो अगरु, चंदन आदि वृक्षों एवं मेघों से आवृत रहते हैं, तथा समृद्धियुक्त देशों को पीछे छोड़कर आगे के मार्ग पर बढ़ जाना। फिर, मरकत पर्वत के पास जाना, जहाँ गरुड़ ने विषमुख नागों को अमृत देकर अपनी माता विनता को (दासता से) मुक्त किया था। उस (पर्वत) को नमस्कार करके उसके पार्श्वमार्ग से आगे जाना।

फिर, उस ऊँचे वेंकटाचल पर जाना, जो उत्तरी भाषा तथा दक्षिणी भाषा (तमिल) की सीमा-रेखा बना है, जिसपर स्वयं भगवान् विराजमान रहते हैं; जो वेदों तथा शास्त्रों में प्रतिपादित सब पदार्थों की सीमा है, जो स्वयं सब धर्मों की पराकाष्ठा हैं, जिनका उपमान बनने योग्य कोई वस्तु नहीं है, जो ऐसा शोभायमान है, जैसा साकार यश हो और जिसके सानुओं में मधु के छत्ते भरे रहते हैं।

उस वेंकटाचल पर ऐसे महात्मा लोग रहते हैं, जो दोनों प्रकार के (पाप और पुण्य) फलो से संबद्ध कोई कर्म नहीं करते, जो देवताओ से प्रशंसित संपन्न जीवन तथा दूसरों पर निर्भर रहनेवाला दरिद्र जीवन—दोनों को समान मानते हैं तथा जो ऐसे उन्नत आत्मज्ञान से संपन्न हैं, जिससे इस जन्म के कारणभूत कर्म-बंधन मिट जाते हैं। वे ऐसे महान् हैं कि हमारे द्वारा यहाँ से भी नमस्कार करने योग्य हैं।

वहाँ ऐसी नदियाँ हैं, जिनमें कपटहीन उत्तम ब्राह्मणस्नान करते हैं। ऐसे आश्रम हैं, जिनमें वेद तथा प्राचीन शास्त्रों के ज्ञाता मुनि निवास करते हैं। ऐसे रत्नमय पर्वतशृंग हैं, जिनके मध्य मेघ विश्राम करते हैं। ऐसे स्थान हैं, जहाँ देवरूपधारियों के संगीत के लय-युक्त किन्नरवाद्य की तंत्रियों से उत्पन्न नाद से गजों तथा व्याघ्रों के बच्चे सो जाते हैं।

ऊँचे शिखरों से युक्त उस वेंकटाचल के निकट जाओ, तो तुम लोगों के सभी पाप मिट जायेंगे और मोक्ष प्राप्त कर लोगे। अतएव (उस पर्वत के निकट न जाकर) वहाँ से दूर हटकर जाना। फिर, वहाँ से आगे स्थित जल से समृद्ध 'तोंडे' देश में जाना। वहाँ खोजने के पश्चात् फिर, गंभीर गतिवाली, 'पोन्नि' नामक महिमान्वय शीतल जल से पूर्ण दिव्य कावेरी नदी के किनारे पर जाना।

तुम उस चोल देश में जाना, जहाँ (कावेरी नदी का) जल इतना स्वच्छ है, जितना स्वर्ग को प्राप्त किये हुए महात्माओं का मन होता है। जहाँ प्रारब्धकर्म से मुक्त पुरुष गुप्त रूप से निवास करते हैं। उसे पार करके तुम लोग सत्वर आगे बढ़ जाना और निद्राशील व्यक्ति किस परिणाम को पहुँचते हैं, उसका स्मरण करके वहाँ से हट जाना। फिर, रत्नमय पर्वतों से युक्त मलय देश में जाकर ढूँढ़ना। इसके पश्चात् विशाल तमिल देश—पाण्ड्यदेश में जाना।

दक्षिण में स्थित, तमिल देश में विशाल पोदिय नामक पर्वत है; जहाँ मुनिश्रेष्ठ (अगस्त्य) का तमिल-संघ है। वहाँ जाकर तुम मुनि के निरंतर आवासभूत उस पर्वत को नमस्कार करके आगे बढ़ना। फिर, सुन्दर जलधारा से युक्त ताम्रपर्णी नदी को पार करके

५१६कंब रामायण

गजों के आवास बने ऊँचे सानुओ से शोभित महेंद्र पर्वत को एव दक्षिण के समुद्र को देखोगे।

उन स्थान को पार कर आगे जाना और वहाँ सर्वत्र खोजकर, एक मास की अवधि में तुम यहाँ लौट आना। अब तुम लोग शीघ्र विदा हो—(सुग्रीव के) इस प्रकार आज्ञा देने पर, त्रिविक्रम (के अवतारभूत राम) ने मारुति को कृपा-भरी दृष्टि से देखकर कहा—हे नीतिनिपुण ! सीता के लक्षण सुनो, जिनसे तुम्हें उनका अन्वेषण करने में सुविधा हो। फिर, आगे कहने लगे—

हे तात ! (सीता की) पादांगुलियाँ ऐसी हैं, मानो क्षीरसागर में उत्पन्न प्रवाल के खंडों में महावर लगाकर उनके उपरी भाग में अनेक चंद्रों को रख दिया गया हो। प्रसिद्ध कमल तथा अन्य पदार्थ भी उन पादों के उपमान नहीं बन सकते। इतना कहने के अतिरिक्त उन पादयुगल का उपमान क्या कहा जाय ?

हे तात ! जिस कच्छप को, बुद्धिमानों ने, कंकण-पंक्तियों से भूषित रमणियों के चरणों के ऊपरी भाग का उपमान बताया है, उससे रात्रिकाल की वीणा से भी अधिक मधुर बोलीवाली सीता के चरणों की उपमा देना उस (चरण-युगल) का अपमान करना है। इसे निश्चित जानो।

हे सत्यनिष्ठ ! चित्रकारों के लिए जिनके चित्र खींचना दुस्साध्य है, वैसे केश-पाशों से विशिष्ट उस देवी की जानुएँ ऐसी हैं कि बहुत सोच-विचार करने पर भी कोई उनका उचित उपमान नहीं पा सकता। विद्वान् लोग, गर्भिणी 'वराल' (नामक मछली), तूणीर, पुष्ट धानका गाभा,$^१$ इत्यादि को जानुओं के उपमान कहते हैं। ऐसा तो कोई भी कह सकता है। उसे पुनः मैं कहूँ, तो इसमें क्या रस है ?

केशपाश से सुशोभित सुन्दरियों की जाँघों के अति उत्तम उपमान बननेवाले जो कदली-वृक्ष हैं, वे भी जब उन (सीता की) जाँघों से परास्त हो गये हैं, तब उन जाँघों की अन्य उपमा क्या दी जाय ? वीणा की ध्वनि को, अमृत-समान मधु को और जल में पूर्ण खेतों में उत्पन्न ईख के रस को भी परास्त करनेवाली बोली से युक्त उस (सीता) की जाँघ इतनी सुन्दर है।

हे उत्तम ! कन्दुक-बद्ध, चक्रवाक एवं कलश-समान स्तनों से युक्त, 'वल्लि' लता-समान (पतली) कटिवाली उस (सीता) के, मेखला-भूषित, चक्राकार धृतारूत जघन-रूपी समुद्र का क्या उपमान हो सकता है—यह मैं तुम-जैसे को क्या कहूँ, जिसने समुद्रावृत धरती का सिर पर धारण करनेवाले आदिशेष के फन को देखा है तथा हिम को दबाकर ऊपर उठनेवाले, एक चक्रवाले (सूर्य के) रथ को भी देखा है ?

वह ऐसी है कि उसके आकार को देखकर ही (ब्रह्मा) अन्य किसी सुन्दरी का निर्माण कर सकता है। उसकी सूक्ष्म कटि के आकार का वर्णन यदि तुम सुनना चाहो, तो इसके लिए उपमान ढूँढ़ना व्यर्थ है। उस कटि को आँखों से नहीं देखा जा सकता है, केवल मैं हाथ के स्पर्श से ही उसे जान सकता हूँ। अन्य किसी उपाय से उसका स्पर्श करने के लिए सुकर ही नहीं है।


१. धान का पौधा, जिसमें से अभी-अभी बाली निकल रही हो, जानु का उपमान होता है।—अनु.

किष्किन्धाकाण्ड ५१७

साधारण दृष्टि से यह कथन कि (सुन्दरियों के) उदर, वटपत्र, चित्र 'से अंकित सूक्ष्म चित्र-फलक, दुग्ध-सदृश मृदुल रजत-फलक, वर्तुलाकार दर्पण—ऐसे ही अन्य पदार्थों के समान होते हैं, अत्युक्तिपूर्ण कथनमात्र होता है। किंतु, सीता का उदर इतना सुन्दर है कि उन वस्तुओं के साथ उसकी उपमा देना भी उचित नहीं है।

हे समुद्र से भी अधिक विस्तृत ज्ञानवाले ! यदि (सीता देवी की) नाभि का उपमान निर्दोष 'कूदालि' (नामक पुष्प) तथा 'मंटि' (नामक पुष्प) को कहें, तो वे भी क्षुद्र ही होंगे। हाँ, मैं सोचता हूँ कि नदी की भँवर उसका उपमान हो सकती है। गंगा (की भँवर) को देखकर तुम यह बात समझ सकते हो।

लता-सदृश उस (देवी) के उदर पर जो रोमावली है, वह मेरे प्राणों की धारा ही है। यदि उसकी कोई उपमा देनी हो, तो उस अलान से दी जा सकती है, जिसपर दोषहीन कटि के तुल्य कोई छोटी लता स्थिर होकर लिपटी हो।

वह सीता, यह सोचकर कि कमल-दल पर रहने से उसके कोमल शरीर को कष्ट होता है, कमल का आसन छोड़कर धरती पर अवतीर्ण हुई है। उसके उदर पर स्वर्णवर्ण की त्रिवली ऐसी है, मानो मन्मथ ने तीनों भुवनों की सुन्दरियों की (सीता से) पराजय को सूचित करने के लिए ही तीन रेखाएँ अंकित कर दी हों।

उसके स्तनों के उपमान रत्न-संपुट (रत्न की डिबिया) कहूँ, स्वर्ण-कलश कहूँ, रक्तवर्ण कोमल नारिकेल कहूँ, प्रवाल को सान पर चढ़ाकर बनाई हुई चौसर की गोटी कहूँ, दिन में प्रकट हुए चक्रवाक कहूँ? क्या कहूँ? उसके स्तनों का कोई भी उचित उपमान मैने नहीं देखा है।

गन्ने को देखने पर या सुडौल बाँस को देखने पर, मेरी आँखों से अश्रु की वर्षा होने लगती है। इस प्रकार पीड़ा का अनुभव करने के अतिरिक्त, भ्रमरों से गुंजरित पुष्प-माला को धारण करनेवाली उस (सीता) की भुजाओं के उचित उपमान खोजने या कहने की दृढ़ता मुझमें नहीं है। अब और क्या कहूँ?

(सीता के) करों के सदृश कोई पदार्थ त्रिभुवन में नहीं है—ऐसा कहना भी अनुचित है। यदि कुछ उपमान कहने भी लगें, तो क्या 'कांदल' पुष्प को उनका उपमान कहें? वह तो (सीता के करों के सामने) अत्यन्त कठिन है। यदि मकरवीणा को उसका उपमान कहें, तो कुछ गुणों में समान होने पर भी अन्य गुणों में वह उसके अनुरूप नहीं है। जो स्वयं अत्यन्त सुन्दर है, उससे भी अधिक सुन्दर क्या वस्तु हो सकती है?

मनोहर अशोक-वृक्ष के पल्लव तो दूर रहे। कल्पवृक्ष के नवपल्लव या कनक-लता के कोमल दलवाले पुष्प भी उसकी हथेली के उपमान नहीं हो सकते। वे, सूत्र-सदृश सूक्ष्म कटिवाली उन सीता के नूपुरों से मुखर चरणों के भी उपमान जब नहीं बनते, तब उनकी हथेली के उपमान कैसे हो सकते हैं?

धवल दंत, अरुण अधर और चमकते आभरणों से युक्त, यौवनपूर्ण, मनोहर पुष्प-शाखा-सदृश उन सीता के नोकदार हस्त नखों के उपमान कहना असंभव है। तोते, पलाश-पुष्पों पर इसलिए क्रुद्ध रहते हैं कि उन्हीं के कारण (जो सीता के नखों के उपमान

५१० कंब रामायण

बनते हैं) उन (तोतों) के चञ्चु सीता के नखों के उपमान नही रह गये हैं, और उन (पलाश-पुष्पों) को फाड़ते रहते हैं। अब उन नखो के और क्या उपमान कहे ?

हे उत्तम ! (सीता के) अरुण कर एव अरुण चरण देखकर जिस प्रकार तुम्हें लाल कमल स्मरण आयेंगे, उसी प्रकार रक्त कुमुद-सदृश मदभरे दिव्य नयनोवाली उस (सीता) का कठ देखकर, यदि तुम्हें बढ़नेवाला क्रमुक-वृक्ष तथा जल मे उत्पन्न होनेवाला शंख स्मरण आवें, तो तुम उन्ही को उपमान मान लेना।

नील कुवलय के समान, काजल-लगे नयनोवाली सीता का मनोहर मुँह ऐसा है कि 'किडै' (नामक लाल सेवार), विंबफल, नवीन रक्तकुमुद, इन्द्रगोप, पलाश-पुष्प इत्यादि उपमान के योग्य पदार्थ भी, उस मुँह के सम्मुख श्वेत-से पड़ जाते हैं। ऐसे रक्त तथा अमृत-भरे उस मुख का उपमान वही मुख है।

रक्तवर्ण का अमृत नही होता। उस रंग का मधु भी नही होता। यदि वैसा अमृत और मधु कही होते भी हो, तथापि उनका पान करने पर ही वे मधुर लगते होगे। स्मरणमात्र से वे आनन्ददायक नही होगे। अतः, उज्ज्वल ललाटवाली सीता के प्रवाल-सम अधर के उपमान यदि हम अपने मन की पसंद के कोई पदार्थ बतावें, तो क्या वे उचित उपमान हो सकते हैं? (अर्थात्, नही हो सकते)।

हे अनुपम महिमावान् ! (सीता के) दंत कुंद मोर-पंखो के मूल, मुक्ता इत्यादि की समता करते हैं—यह कथन ऐसा ही है, जैसा यह कहना है कि उसकी वाणी अमृत, दुग्ध तथा मधु की समता करती है। वास्तव में, उन दाँतो के उपयुक्त उपमान कुछ नहीं हैं। यदि (देव) अमृत का कोई उपमान हो सकता है, तो उन (दाँतो) का भी उपमान हो सकता है।

हे अपार ज्ञानयुक्त ! गिरगिट (की नाक), तिल-पुष्प, रत्न-सहित कुभिल (नामक पुष्प) सीता की नासिका के उपमान हैं—यदि ऐसा कहे भी, तो वे सब उपमान, निखारे गये स्वर्ण तथा उज्ज्वल रत्न की समता नही करते (सीता की नासिका तो स्वर्ण एवं रत्न के समान भी है)। वह (नासिका) निपुण चित्रकार के लिए भी अंकित करने को दुस्साध्य हैं। तुम इसका विचार कर स्वयं समझ लो।

'वल्लै' लता के पत्र और कैंची—ये कानो के उपमान होते हैं?—यह बच्चो का कथन-मात्र है। यदि बड़े लोग भी इसी को दुहरायेंगे, तो वह उनका पागलपन होगा। तुम यह समझो कि शुक्रतारा के समान उज्ज्वल ताटंको ने जो तपस्या की थी, वह तपस्या (सीता के कानो को प्राप्त कर) सफल हुई। जो ससार की सब वस्तुओ के स्वय उपमान हैं, उनके उपमान कहाँ मिल सकते हैं?

(सीता के) करवाळ-सदृश दीर्घ नयनो के, जो देवाधिदेव (विष्णु) के समान काले हैं तथा श्वेत वर्ण से भी युक्त हैं, अति-विशाल समुद्र भी उपमान नहीं हो सकते। अहो ! यदि कोई दूसरा उपमान खोजना भी चाहें, तो वे नयन किसीके मन में ही नही समाते।

यदि करवाळ-सदृश नेत्रवाली सीता की भौंहो का वर्णन करने लगें, तो क्या उपमान दें? यदि ऐसा उपमान दें, जो पूर्ण रूप से उपमेय की समता न करें, तो वह अधम होगा। यदि किसी पदार्थ को सुन्दर मानकर उसे उपमान कहें, तो भी उससे (सीता की भौंहो

किष्किन्धाकाण्ड ५१६

की ) सहधर्मिता सिद्ध नही हो सकेगी । दोनो छोरो पर झुके हुए दो मन्मथ चाप नहीं होते । अतः उसके भौंहो के उपमान भी कही नही हैं ।

शुक्लपक्ष की प्रथमा का चन्द्रमा, यदि उस सीता के ललाट की शोभा का अनेक दिनों तक ध्यान करता रहे और पूर्णिमा के दिन भी पूर्ण न होकर अर्द्ध ही बना रहे, तो उस सीता के ललाट की कुछ-कुछ समता कर सकेगा, जिसके चरणो की सुन्दरता मे दिन में प्रफुल्ल कमल-प्रभा भी लजा जाती है ।

हमारे अरण्य-वास मे आने के उपरान्त ( सीता के केशो को ) सजाने के लिए कोई ( दासी ) नही रही । ऐसा होने पर भी उन केशों की सुन्दरता घटी नही । कघी करने से नही, किन्तु स्वभाव से ही उसके केश घुंघराले हैं । नीलरत्न के समान वे अलक नित-नवीन रहते हैं । अतः, उनका कोई उपमान नही है ।

ब्रह्मदेव ने, काले मेघ के टुकड़े को, लाल कुमुद को झुके हुए धनुषों को, 'वल्ले' ( नामक लता ) के पत्तों को, उत्तम मीनों को, तथा उज्ज्वल मुक्ताओं को चन्द्रमा मे जोड़कर उसको सीता का वदन बना दिया । जब उस पुण्डरीक (-सदृश वदन ) के दर्शन तुम करोगे, तभी इस कथन को सच्चा मानोगे ।

अनेक सूक्ष्म केशो से भारी बना हुआ अति सुगन्धित उसका केशभार ऐसा है, मानो काले मेघ को काटकर उसपर मधु, अगरु-धूम आदि की सुगन्ध चढ़ा दी गई हो, फिर उसे घने अन्धकार के द्रव मे डुबो दिया गया हो और उसे ही घने तथा दीर्घ केश-पाश का नाम दिया गया हो ।

दिव्य कमल-पुष्प मे भी आवरण के दल लगे रहते हैं । सौदर्य की सीमा बना हुआ चन्द्र भी कलंक से युक्त है । इनके अतिरिक्त अन्य सभी उत्तम पदार्थों में कोई ऐसा नही है, जिसमें कुछ-न-कुछ दोष न हो । हसिनी-समान मनोहर गतिवाली सीता के अंग मे सब गुण-ही-गुण हैं । कही कुछ दोष नही है ।

हे तात ! विचार कर देखने पर ( विदित होता है कि ) उत्तम नारी के सभी लक्षण मनोहर तथा सुरभित कमल मे निवास करनेवाली लक्ष्मी में भी नही होते । किन्तु, कोकिल-सदृश मधुर बोली, मनोज्ञ मीन-सदृश नयनो, अरुण अधर तथा अप्सराओ को भी लज्जित कर देनेवाले स्तनो से युक्त उस ( सीता ) मे सभी लक्षण विद्यमान हैं ।

कमलासन ( ब्रह्मा ) ने बाँसुरी, वीणा, पिक, शुक, तोतली बोली आदि की सृष्टि करके अच्छी कुशलता प्राप्त करने के पश्चात् ही हार-युक्त स्तनोवाली ( सीता ) की मधुर-वाणी की सृष्टि की है । उस निर्दोष वाणी का कोई उपमान उस ब्रह्मदेव ने नही उत्पन्न किया है । क्या भविष्य मे कभी करेगा भी ?

स्वर्ग, भूमि और पाताल—तीनों भुवन अतिविशाल रूप मे फैले हैं । इनमे कही मीन-सदृश नयनवाली उस ( सीता ) की मधुरवाणी का उपमान कोई वस्तु नहीं है । यदि कह सकते हैं, तो एक मधु है और एक क्षीर है । तो भी वे दोनो श्रवण को मधुर नहीं लगते । एक दूसरा उपमान अमृत भी है, पर वह भी केवल रसना को स्वाद देनेवाला ही है, ( श्रवण-सुखद नही है ) ।

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हे उत्तम गुणवाले ! कमल-पुष्प में निवास करनेवाली मधुर बोलीवाली राजहंसिनी तथा मनोहर बालकरिणी ऐसी सुन्दर गतिवाली होती हैं कि उन्हें देखकर देवता भी विस्मय करते हैं। किन्तु, मुझे ( यह ) निश्चय नहीं होता है ( कि वे सीता के उपमान हो सकती हैं या नहीं )। हाँ, कविता करने में निपुण, प्राचीन कवि द्वारा विरचित सरस शब्द-गुम्फन से युक्त कविता की गति ही उस (सीता) की गति की समता कर सकती है।

( सीता की देह-कांति का क्या उपमान दें ? ) आम्रवृक्ष का कोमल पल्लव भी ( सीता के सम्मुख ) गाढ़ा दीख पड़ता है। सोने का रंग मंद पड़ जाता है। रत्नों की कांति-पूर्ण समता नहीं करती। विद्युत् की चमक (सीता से) लज्जित होकर छिप जाती है और बाहर नहीं निकलती। कमल का रंग पीछे रह जाता है। तो, अब अन्य कौन-सा रंग उपमान के योग्य है ? सीता की देह की कांति का उपमान उनकी देह ही है।

हे उत्तम गुणवाले ! उस (सीता) की समता करनेवाली स्त्री कोई भी नहीं है—केवल इस विचार को ही मन में दृढ रख लो और अपने चित्त से सीता को, उसके स्थान में पहचान लो, फिर उसके समीप जाकर ये अभिज्ञान-वचन कहो—यों कहकर (रामचन्द्र) आगे कहने लगे—

मैं पूर्व में (विश्वामित्र) मुनि के संग जल-संपन्न प्राचीन मिथिला नगरी में दीर्घकेशधारी जनक महाराज के यज्ञ को देखने के लिए गया था। तब उस परिखा के समीप, जिसमें हंस खेल रहे थे, कन्या-निवास के सौध में स्थित सीता को मैंने देखा। यह बात तुम उससे कहना।

अपार समुद्र से भी अधिक (विशाल तथा गभीर) पातिव्रत्य धर्म से युक्त सीता ने प्रतिज्ञा की थी कि पर्वत-समान धनुष को तोड़नेवाला व्यक्ति, यदि वह मुनि के संग आया हुआ राजकुमार (राम) न होगा, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी। यह बात उसे सुनाना।

उस दिन, जनक महाराज की सभा में मैंने उस सीता को देखा। वह अपने मनोहर स्तन-रूपी गिरि-युगल का भार वहन करती हुई इस प्रकार आई, जिस प्रकार कोई मत्तगज, मुखपट्ट से आवृत परस्पर तुल्य दंतद्वय को लिये आ रहा हो। वह (स्तन-भार के कारण) गगन की विद्युल्लता के समान लचकती हुई आई थी।

तुम उस (सीता) से मेरे ये वचन कहना, जिन्हें मैंने उससे पहले कहा था—'हे मुग्धे ! तुम मेरे संग ऐसे भयंकर कानन में जाना चाहती हो, जिसे पहले तुमने देखा भी नहीं है। अबतक तुम मेरे लिए मुझे सुख देनेवाली रहीं। मेरे अपूर्व प्राणों के अनुकूल बनी रहीं। अब क्या तुम दुःख देनेवाली बनना चाहती हो ?'

तब सीता ने कहा—'हे अपने स्वत्व-राज्य-को भी त्यागकर वन में जानेवाले प्रभु ! क्या अब मेरे अतिरिक्त अन्य सब पदार्थ आपके लिए आनन्ददायक हो गये ?' और वह अपने मीन-सदृश तड़पते हुए विशाल कमल-दल की समता करनेवाले नयनों से अश्रु बहाती हुई, शरीर से निकलने के लिए तड़पते हुए अपने प्राणों के समान ही अत्यंत व्याकुल हो गई और मूर्च्छित होकर गिर पड़ी।—यह भी उससे कहना।

जब हम समृद्ध (अयोध्या) महानगर को छोड़कर चले थे, तब चन्द्र को छूनेवाली