कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 522, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें५१४ | कंब रामायण
सुगन्धित दीर्घ अगरु-वृक्ष तथा और ऊँचे बढे हुए चंदन-वृक्ष, जिस देश की बाड बने हुए हैं, उसे धीरे-धीरे पार करना और अनेक अन्य देशो को भी पीछे छोड़कर जल से समृद्ध दंडकारण्य में जाना।
दंडकारण्य में मुडकोपवन नाम से प्रसिद्ध एक वन है, जहाँ प्राचीन अगस्त्य मुनि निवास करते हैं। तपस्या-निरत मुनियो से युक्त होने के कारण वह उपवन, दर्शन-मात्र से मन की पीडा को दूर करनेवाला है। तुमलोग वहाँ भी देखना।
पुष्प-भरित वह उपवन, उत्तम धार्मिक व्यक्तियो की संपत्ति के समान शोभायमान है, जिसका उपभोग सारे ससार के लोग करते हैं। वहाँ के वृक्ष उत्तम शील-संपन्न सुन्दरियो के अधरो के समान अकाल मे भी फले रहते हैं। वह दृश्य भी तुम लोग देखना।
वहाँ के निवासी सदा अपलक रहते हैं। कभी गाढी निद्रा मे नही सोते। वह स्थान सूर्य के लिए भी दुर्गम है। सभी प्रकार की भोग्य वस्तुएँ वहाँ प्राप्त होती हैं।
उस स्थान को पार कर, उससे आगे पाण्डुगिरि नामक पर्वत पर जाना, जो गगन में स्थित चन्द्र को छूता है और जिसे देखकर अरुणकिरण सूर्य भी यह विचार करता है कि इसपर किंचित् विश्राम करके ही आगे बढना चाहिए।
उस पर्वत के समीप एक नदी बहती, है जिसकी अनादि धारा मोतियों को बहाती हुई, स्वर्ण-धूलि को बटोरती हुई, रत्नो को लुढकाती हुई, ग्वालों के आँगनों से मथानियों को समेटती हुई, वृक्षों को बहाती हुई, पर्वत-शिलाओ को ढकेलती हुई, मृगों को भी खींचती हुई बहती है। वह धारा किसी भी व्यक्ति को, पुत् नामक नरक में जाकर क्लेश भोगने से बचाती है। उस पावन धारा का नामक गोदावरी है।
उस नदी को पारकर उसके आगे सुवर्ण नामक नदी पर जाना, जो धर्म-मार्ग के समान है, निर्मल करुणा के अभिलषणीय मार्ग के समान है, जिसके दोनों कूलों पर शीतल तथा विकसित पुष्पों से पूर्ण घने वृक्ष यो छाये रहते हैं कि सूर्य की किरणें भी उसके भीतर प्रवेश नही पाती। जिसमें रत्न ऐसे चमकते हैं कि अंधकार का नाम भी मिट जाता है और जहाँ देवताओ की प्रार्थना से छह मुखवाला विलक्षण देव (कार्तिकेय) एकांत में रहता था।
सुवर्ण नदी को पारकर उस सूर्यकात पर्वत को जाकर देखना, जहाँ की (कृषक) बालाएँ जब फदे में रखकर पत्थर के टुकडे फेंकती हैं, तब वे पत्थर धूप-जैसी कांति को बिखरते हैं। वहाँ से आगे चलकर चद्रकात पर्वत को भी देखना। उन पर्वतो को लाँघकर अनेक विशाल देशो को पार करना। फिर, कोंकण देश में जाना, जहाँ आदि-शेष, पक्षिराज (गरुड) से डरा हुआ, छिपकर अपना जीवन बिताता है। फिर, कुलिन्द देश मे जाना।
जो इस बात पर झगड़ते रहते हैं कि शिव बडे हैं या विश्व को नापनेवाले हरि बडे हैं, ऐसे ज्ञान-हीन लोगों के लिए जिस प्रकार सुगति दुर्गम होती है, उसी प्रकार दुर्गम रहनेवाला अरुंधति नामक एक पर्वत वहाँ है, जो आकाशगगा के अति निकट रहता है। जिसके गगनोन्नत शृंगों पर दोनो ज्योतिष्पिण्ड (सूर्य-चन्द्र) विश्राम करते हैं, जिसमे ऐसी