कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 521, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ५६३
यों कहनेवाले उष्णकिरण के पुत्र को देखकर विजयी धनुर्धारी ने कहा—यहाँ खडे रहकर बातें करते रहने से क्या प्रयोजन है ? अब चलकर आगे के कार्यों के संबंध में विचार करें।
तब उस (सुग्रीव) ने महानुभाव हनुमान् को देखकर इस प्रकार आज्ञा दी—हे तात ! तुम अपने पिता (पवन) के समान ही त्रिभुवन में संचरण करने की शक्ति रखते हो, तो भी उस शक्ति को न पहचान कर व्यर्थ ही विलंब कर रहे हो। क्या तुम पहले दूसरे बड़े वेगवान् वानरो का कार्य देखना चाहते हो ?
तुम अब जाओ। उत्तम आभरणधारिणी देवी कहाँ है, इसका पता लगाओ। पहले तुम नागों के लोक (पाताल) में जाकर खोजो। धरती पर खोजो। तुम्हारा वेग तो ऐसा है कि तुम भोगभूमि स्वर्ग में भी जा सकते हो। तुम्हारा वह वेग भी तो अब प्रकट होना चाहिए।
मेरी बुद्धि कहती है कि रावण का विशाल (लंका) नगर दक्षिण दिशा में है। हे मारुति ! अब इस बलपूर्ण दिशा को जीतकर यश पाने का अधिकारी तुम्हें छोड़कर और कौन है ?
हे स्वच्छ ज्ञानवाले ! मेरा खयाल है कि उदारशील (प्रभु) की देवी का अपहरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले जाते हुए हमने रावण को देखा था। तुम इसपर विचार करो।
तारा पुत्र (अंगद), जांबवान् आदि अनेक वीर बड़े गौरव के साथ तुम्हारे संग जावें। दो 'वेल्लम' संख्यावाली वानर-सेना भी अपने साथ ले जाओ।
पश्चिम दिशा में ऋषभ, कुबेर की उत्तर दिशा में शतवली तथा इन्द्र की प्राची दिशा में विनत, बड़ी-बड़ी सेनाएँ लेकर जायें—यों सुग्रीव ने कहा।
फिर, सुग्रीव ने उन ऋषभ आदि वानरों से कहा—हे विजयी वीरो, विजय करने-वाली दो 'वेल्लम' वानर-सेना के साथ घूम-घूमकर देवी का अन्वेषण करना और एक मास व्यतीत होने के पूर्व ही यहाँ लौट आना।
फिर, दक्षिण दिशा में जानेवाले वानरों को देखकर सुग्रीव ने कहा—तुम यहाँ से चलकर उस विन्ध्याचल पर्वत पर जाओ, जो अपने अतिसुन्दर सहस्रों उज्ज्वल शिखरों के कारण विष्णु के विराट् रूप-सा दिखाई पड़ता है और आगे बढ़कर प्रणाम करने योग्य है।
उस (विन्ध्य) पर्वत पर खोजने के पश्चात् नर्मदा नदी पर जाना, जिसमें देवता भी स्नान करते रहते हैं। जहाँ भ्रमर (पुष्पों के) मधु का पान करके पंचम स्वर में गाते रहते हैं तथा जहाँ के विविध रत्नो (के प्रकाश) से अंधकार दूर होता रहता है।
फिर, हेमकूट नामक पर्वत पर जाना, जहाँ धूम्नकर्ण के सदृश पक्षी (जो संगीत सुनकर तल्लीन हो जाते हैं) मनोहर मेखलाधारिणी देव-रमणियो के, आनन्द से गाये जानेवाले संगीत-रूपी मधु का पान करते हुए निद्रा लेते हैं।
शीघ्र ही उस (हेमकूट) पर्वत से चलकर वहाँ के अपने साथी वानरों के साथ आगे बढ़ जाना। फिर, काले रंगवाली पेन्ना नदी के तटों में उत्तम गुणवाली देवी को ढूँढ़ना और वहाँ से सत्वर आगे बढ़ जाना।