कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५१० | कंब रामायण |
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युगांत मे समुद्र के उमड़ आने पर भी नाश न होनेवाला, पद्ममुख नामक वानर, उनचास कोटि बलवान्, सुन्दर तथा दीर्घ भुजावाले वानरों की सेना लेकर ऐसे आ पहुँचा कि धरती की धूल उठकर गगन में छा गई।
ऋषभ नामक वीर, नौ सहस्र कोटि संख्यावाले ऐसे वानरो की सेना को लेकर आ पहुँचा, जिनकी भुजाएँ युगात मे भी विनष्ट न होनेवाले ऊँचे पर्वतो के समान बलवान् थी।
दीर्घपाद, विनत और शरभ नामक वानर-वीर तरगों से पूर्ण नीले महासमुद्र से भी अधिक विशाल रूपवाले, किसी के लिए भी गणना करने मे असाध्य, काले मुखवाले करोड़ो वानरों की सेना को लेकर, एक के पश्चात् एक ऐसे आ पहुँचे कि ब्रह्मांड के अतर में और उसके बाहर भी धूलि व्याप्त हो गई।
मनोहर सहस्र किरणोंवाले सूर्य को देखकर भी भयभीत न होनेवाला हनुमान्, पच्चीस सहस्र कोटि वानरो को लेकर ऐसे आ पहुँचा कि सारी दिशाओ का अतर छोटा ज्ञात होने लगा और धरती एक ओर झुक गई।
देवशिल्पी विश्वकर्मा का मनोहर तथा सत्यनिष्ठ नल नामक पुत्र, शीघ्र एकत्र हुए लक्ष कोटि वानरों की सेना को लेकर आ पहुँचा, तो देवता भी अनुमान नही कर सके कि उसकी सीमा क्या है और यम भी भ्रात तथा व्याकुलचित्त हो उठा।
कुभ, शख इत्यादि वानर-सेनापतियों के साथ आनेवाली वानर सेना की गणना करना इस ससार के लोगों के लिए असभव है। यों कह सकते हैं कि वह सेना उतनी थी, जितनी राघव के तूणीर में बाण थे। इसके अतिरिक्त दूसरे ढंग से उसका वर्णन करना असंभव है।
यदि वह वानर-सेना निमज्जित हो, तो सप्त महासमुद्रो का भी जल सूख जायगा और उसके स्थान में श्वेत धूलि फैल जायगी। यदि (वह सेना) एक ओर झुके, तो भूमडल और महामेरु भी एक साथ झुक जायेंगे। यदि (वह सेना) उठकर चलने लगे, तो इस पृथ्वी में तिल भर भी स्थान नही रह जायगा। यदि क्रोध कर उठे, तो कठोर अग्नि तथा सूर्य भी झुलस जायेंगे।
धरती पर एकत्र हुई उस वानर-सेना की गणना करने लगें, तो सत्तर सहस्र ब्रह्माओं से भी उसकी गणना नही हो सकती। यदि (वह वानर-सेना) खाने लगे, तो सभी अडगोल उनके लिए एक-एक मुट्टी भरकर खाने के लिए भी पर्याप्त नही होगे। यदि (वह सेना) आँख उठाकर देखे, तो ललाट में अग्निमय नेत्रवाले (शिव) को भी मात कर देगी।
वह वानर-सेना यदि तोडने लगे, तो उत्तर के मेरु को भी तोड़ देगी। यदि टकराना चाहे, तो विशाल आकाश के ढक्कन से भी टकरा जाय। यदि पकड़ना चाहे, तो महान् प्रभजन को भी पकड़ ले। यदि पीना चाहे, तो सप्त समुद्रों के जल को भी अजलि में भरकर पी जाय।
वे वानर, प्रख्यात दिशाओं के उस पार भी कूद जा सकते थे। अपने प्रभु अनुपम सुग्रीव के सोचे हुए प्रत्येक कार्य को तुरत कर देने की क्षमता रखते थे। ऐसे सहसठ