कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 519, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिष्किन्धाकाण्ड ५११
संख्या में वानर-सेनापति उत्तरोत्तर उमड़ आनेवाली विशाल सेना को एकत्र करके अनायास ही आ पहुँचे।
वे वानर-सेनापति ऐसी वानर-सेना को लेकर आये, जो सप्त समुद्रों की विस्तीर्णता से भी अधिक विशाल थी। 'एक चक्र तथा उत्तम अश्ववाले रथ पर चलनेवाले सूर्य के पुत्र (सुग्रीव) के चरण जीते रहें!'—यों जयघोष के साथ उन्होंने प्रणाम करके पुष्प बरसाये।
उस प्रकार की वानर-सेना के आ पहुँचते ही सूर्यपुत्र, दशरथ-पुत्र के निकट शीघ्र जा पहुँचा और कहा—पाप-कर्मों के लिए यम-सदृश आपकी यह विशाल सेना विचार करने के पहले ही (अर्थात्, अति-शीघ्र ही) आ एकत्र हुई है। आप उसे देखने की कृपा करें।
प्रभु, प्रसन्न हुए और उनके मन के समान ही उनका मुख भी विकसित हो उठा। वे इस प्रकार आनन्दित हुए, जैसे देवी को ही देख रहे हों। वहाँ स्थित एक ऊँचे पर्वत के शिखर पर वे जा पहुँचे। सूर्य-कुमार फिर, उस सेना के मध्य लौट गया।
सुग्रीव ने उस अपार वानर-सेना को यह आदेश दिया कि वह पन्द्रह योजन के विस्तार में, उत्तर से दक्षिण की ओर पंक्तियों में खड़ी हो जाये। फिर, अतिक्रोधी वानर-सेनापतियों को साथ लेकर वह (रामचन्द्र के निकट) लौट आया।
सुग्रीव लौटकर रामचन्द्र के समीप आ पहुँचा और बोला—हे पराक्रमी, विजय-शील शूल धारण करनेवाले ! आप उस ओर दृष्टि डालें—यों कहकर क्रमशः (अपने सेना-पतियों का) परिचय कराया और वहीं खड़ा रहा। इधर एकत्र वानर-सेना तरंगायमान क्षीर-सागर के समान बड़े कोलाहल के साथ बढ़ चली।
अष्ट दिशाओं, धरती के विस्तृत प्रदेश, देवताओं के आवासभूत ऊपर के वसुला-कार लोक तथा वीचियों से पूर्ण सप्त समुद्रों को भी आवृत्त करके धूलि नीचे से ऊपर तक उठ चली, जिससे यह ब्रह्माण्ड धूलि से भरे हुए कुंभ के समान दीखने लगा।
यदि कहें कि (इस सेना का) समुद्र उपमान हो सकते हैं, तो (यह कथन अनु-चित होगा, क्योंकि) उन समुद्रों के परिमाण को पहचाननेवाले लोग भी हैं—(किन्तु उस वानर-सेना के परिमाण को जानना कठिन था।) अब विद्वान् उस वानर-सेना का अन्य क्या उपमान दे सकते हैं? बीस दिन पर्यंत, दिन-रात लगातार देखते रहने पर भी राम-लक्ष्मण उस सेना के मध्य को भी नहीं देख पाये। फिर, उसकी अंतिम सीमा को कैसे देखा जाय ?
रामचन्द्र—जो ऐसे थे कि विजय प्राप्त करने में उनके उपमान वे स्वयं ही थे और ऊपर के लोकों में, सुन्दर समुद्र से आवृत धरती पर तथा नागों के लोक में उनका उपमान अन्य कोई नहीं था, अपनी आँखों से, मन से, शास्त्र-ज्ञान से तथा सहज ज्ञान से भली भाँति विचार करके, महिमापूर्ण अपने अनुज को देखकर कहने लगे—
हे विकसित पुष्पों की माला धारण करनेवाले ! हमने अपनी बुद्धि से, इस विशाल वानर-सेना के कुछ भाग को तो किसी प्रकार देख लिया। इसकी सीमा को देखने का भी