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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 549 में से

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पृष्ठ 515

किष्किन्धाकांड ५०७

रामचन्द्र इस प्रकार स्थित रहे, जिस प्रकार वे समस्त सृष्टि के विनष्ट हो जाने पर एकमात्र अवशिष्ट रहते हैं। उन प्रभु के रक्त कमल-जैसे चरणो को सुग्रीव ने अपने शिर से यो स्पर्श किया कि उसके वक्ष पर के रत्नहार तथा मुक्ताहार शब्द करते हुए धरती पर लोटने लगे।

इसे प्रकार, सुग्रीव के प्रणाम करने पर, प्रभु ने अपनी दीर्घ, लबी, मनोहर बाहुओ को फैलाकर उसे अपने वक्ष से गाढालिंगन कर लिया। तब उनके वक्ष पर स्थित लक्ष्मी भी पीडित हो उठी। प्रभु का उमड़ता हुआ क्रोध शात हो गया और पूर्ववत् प्रेमभाव उमड़ आया। फिर, उससे आसीन होने को कहा।

रामचन्द्र ने (सुग्रीव को) अपने निकट सुखासीन करके पूछा—तुम्हारा शासन ठीक चल रहा है न ? कोई विरोध नही है न ? तुम्हारी मेघ-सदृश भुजाओ के द्वारा सुरक्षित सब प्राणी, तुम्हारे श्वेत छत्र की छाया में तापहीन होकर रहते हैं न ?

अर्थ-गर्भित उन वचनो को सुनकर गगनचारी एक चक्रवाले रथ पर चलनेवाले (सूर्य) का पुत्र कह उठा—युगांतकालिक घने अंधकार से आवृत्त पृथ्वी के लिए जब आप सूर्य बने हुए हैं और मै आपकी कृपा का पात्र बना हूँ, तो ये कार्य (शासन आदि कार्य) असाध्य कैसे हो सकते हैं ?

सुग्रीव ने फिर कहा—हे महिमाशालिन् ! हे प्रभु ! आपकी मधुर कृपा से मै संपत्ति प्राप्त कर सका। किन्तु, आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर मैने अपनी क्षुद्र वानर-बुद्धि को प्रकट किया।

दीर्घ दिशाओ मे जाकर, अन्वेषण कर (देवी सीता को) लाने की शक्ति रखकर भी मैंने उस प्रकार नही किया। किन्तु, उत्तम आभरणधारिणी (सीता) के वियोग में जब आपका निर्मल अन्तःकरण व्याकुल हो रहा था, तब मै सुखी जीवन व्यतीत करता रहा।

वीर-कंकण तथा दृढ धनुष धारण करनेवाले हे उदारमना प्रभु ! जब मेरा स्वभाव और विचार ऐसा है और आपकी मनोदशा ऐसी हैं, तो मै भविष्य मे क्या कर सकता हूँ। क्या पराक्रम दिखा सकता हूँ ? इनके बारे मे आपसे क्या कहूँ ? (अर्थात्, अपने कार्य के बारे में मै आपसे कुछ निवेदन करने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ।)

लक्ष्मी का निरंतर आवाम बने वक्षवाले प्रभु ने सुग्रीव से कहा—बडी कठिनाई से व्यतीत होनेवाला वर्षाकाल भी बीत गया। तुम्हारा यह अधिकार-पूर्ण वचन भी ऐसा है कि उससे (देवी सीता का अन्वेषण) कार्य पूरा करने की तुम्हारी दृढता व्यक्त होती है। अतः, वह (वचन) क्षुद्र कैसे हो सकता है ? तुम (मेरे लिए) भरत-समान हो। ऐसे (दीनतापूर्ण) वचन कैसे कह रहे हो ?

फिर, आर्य ने पुनः प्रश्न किया कि विशष्ट ज्ञानवाला मारुति कहाँ है ? तब सूर्य-पुत्र ने कहा—वह जल-भरे समुद्र के समान विशाल सेना को लेकर आ रहा है।

एक सहस्रकोटि दूत विशाल वानर-सेना को लाने के लिए शीघ्र गति से गये हैं। सेना को जुटाकर लाने की अवधि भी पूरी होनेवाली है। अतः, आज या कल, बलवान वानर-सेना के साथ वह (हनुमान्) भी आ जायगा।

आपकी नो सहस्र कोटि की एक विशाल सेना अब मेरे साथ है। दूसरी सेना भी